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हर साल जलता हूँ, फिर भी पलता हूँ

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प्रभु श्रीराम! सुनो पुकार, क्यों सहूँ मैं अग्नि की मार?

हर साल मुझे जलाते हो, फिर अगले साल बुलाते हो!

मैं रावण हूँ और दशानन हूँ, अपने युग का मैं दर्पण हूँ।

कहते हो, मैं पापी हूँ, लेकिन आज भी क्यों व्यापी हूँ?

मेरे दस सिर अहंकार के, सिर लोभ व भ्रष्टाचार के थे।

परंतु आज सिरों की गिनती नहीं, पापों की सीमा नहीं!

मैंने सीता का हरण किया, अपने कुल का पतन किया,

आज इंसान ही इंसान को, लोभ में बेच रहा ईमान को।

मेरे भीतर अहंकार था, लेकिन ज्ञान का भी भंडार था,

आज ज्ञान की बातें करनेवाले, मुखौटे हैं पहनने वाले!

मैं लंका का राजा कहलाया, सोने का साम्राज्य बनाया,

आज बिना सोने की लंका के, बहुत रावण हैं सत्ता के!

संजय एम तराणेकर 

(कवि, लेखक व समीक्षक)

इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)

मो. 98260 25986

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