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छेरछेरा : सभी वर्ग के लोग पहुंचे घर-घर, गूंजा छेर…छेरा, कोठी के धान ला हेरतेच…हेरा

कोरबा। कोरबा जिले में छत्तीसगढ़ का प्रमुख पारंपरिक त्यौहार छेरछेरा उल्लास और उमंग के साथ मनाया गया। गांव से लेकर शहर तक सभी वर्ग के लोग छेरछेरा मांगने घर-घर पहुंचे।

गांव में सुबह से दोपहर तक छेरछेरा मांगने मंडली और टीम बनाकर लोग घर-घर झोला और बोरी लेकर पहुंचे। शहर में खासकर बच्चे ही छेरछेरा मांगने पहुंचे, कहीं-कहीं महिलाओं की टीम भी छेरछेरा मांगते नजर आए। सुबह से दोपहर तक छेर…छेरा, कोठी के धान ला हेरतेच हेरा की गूंज सुनाई दे रही थी। लोगों ने धान, चावल, पैसे, व्यंजन एवं चाकलेट देकर खुशियां मनाई। कहा जाता है कि आज के दिन भगवान राम ने भी घर-घर जा कर अन्न का दान मांगा था, तब से यह त्यौहार मनाया जाता है। लोग अन्न का दान इसलिए करते हैं, ताकि पूरा विश्व सम्पन्न बने और भगवान के बहाने लोगों को दान कर पुण्य प्राप्त करते हैं, ऐसा करने से घर में समृद्धि आती है।


घर-घर में व्यंजनों की खुशबू
छेरछेरा में छत्तीसगढ़ियों सहित दिगर प्रांत के लोगों के घरों में छत्तीसगढ़ी व्यंजन की खुशबू आती रही। लोग बड़े चाव से आज छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का लुफ्त उठाया। लोग मनपसंद के व्यंजन बनाकर अपने परिजनों एवं पड़ोसियों को भी बांटा। सुबह से शाम तक छेरछेरा की खुशियों की खुमार छाई रही।
क्यों मनाया जाता है छेरछेरा
छत्तीसगढ़ का पारंपरिक छेरछेरा त्यौहार हर साल पौष पूर्णिमा (जनवरी) के दिन मनाया जाता है, जो नई फसल की कटाई और दान-पुण्य का पर्व है। वर्ष 2025 में यह 13 जनवरी को मनाया गया था और वर्ष 2026 में 03 जनवरी को मनाया गया। छेरछेरा का यह महापर्व फसल की अच्छी पैदावार और धन-धान्य के प्रतीक के रूप में पूरे राज्य में धूमधाम से मनाया जाता है, जिसमें बच्चे और बड़े घर-घर जाकर अन्न और अनाज मांगते हैं।
मुख्य बातें:
तिथि: पौष पूर्णिमा।
महत्व: यह एक फसल उत्सव है, जो धान की कटाई के बाद मनाया जाता है।
परंपरा: लोग, विशेषकर बच्चे, एवं जवान घर-घर जाकर ‘छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरतेच हेरा…जैसे गीत गाकर अन्न, धान और पैसे मांगते हैं, जिसे दान करने से घर में समृद्धि आती है।
लोक नृत्य: इस दिन डंडा नृत्य भी किया जाता है।

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