यह दीपावली का पर्व है, खुशियों का पैगाम लाएँ,
अपने घर के साथ, किसी का ‘घर’ भी जगमगाएँ।
मिट्टी के दीपक जलाकर, अंधियारे को दूर भगाएँ,
अभावों में जीते हैं, उनके जीवन में ‘उजास’ लाएँ।
किसी के घर में मिठाई हो, किसी के घर पकवान,
नए कपड़ों की खुशियाँ, कहीं खाली पड़े अरमान।
किसी के आँगन रौनक, किसी की आँखों में नमी,
आओ बाँटें प्यार का दीपक, मिट जाए हर बेबसी।
ये आवश्यक नहीं कि लाखों के हम उपहार खरीदें,
न महँगी झालरें लाएँ, न सोने-चाँदी से भवन भरें।
एक दीप व थोड़ी मिठाई, कुछ कपड़ों का उपहार,
किसी जरूरतमंद के चेहरे पर ला सकता है बहार।
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
मो. 98260 25986

