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रवींद्रनाथ टैगोर के बिलासपुर-पेंड्रारोड आगमन पर विवाद:123 साल पुराने इतिहास पर उठे सवाल, रेल मार्ग और सेनेटोरियम की तिथियों से जुड़े तथ्य सामने आए

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही,एजेंसी। रविंद्रनाथ टैगोर के बिलासपुर और पेंड्रारोड आगमन को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही बहस ने नए मोड़ ले लिया है। प्रख्यात लेखक राहुल सिंह ने कुछ महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखे हैं। बिलासपुर रेलवे स्टेशन में 26 दिसंबर 1983 को तत्कालीन डीआरएम की ओर से एक शिलालेख लगाया गया था।

इसमें टैगोर की फांकी कविता की पंक्ति अंकित है – ‘बिलासपुर स्टेशन से बदलनी है गाड़ी, जल्दी उतरना पड़ा और मुसाफिरखाने में पड़ेगा छह घंटे ठहरना’। मान्यता है कि 1902 में टैगोर अपनी पत्नी मृणालिनी देवी (बीनू) के इलाज के लिए पेंड्रारोड के सेनेटोरियम अस्पताल आए थे।

पेंड्रा में टैगोर की प्रतिमा स्थापित

दो महीने के उपचार के दौरान 23 नवंबर 1902 को उनकी पत्नी का निधन हो गया। इसी आधार पर पेंड्रा जिले में टैगोर की प्रतिमा स्थापित की गई। लेकिन नए तथ्य इस कहानी को चुनौती दे रहे हैं। रेलवे रिकॉर्ड के अनुसार बिलासपुर-कटनी रेल मार्ग 1891 में खुला। भनवारटंक का पहला बोगदा 1907 में बना।

दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य सेनेटोरियम से जुड़ा

ऐसे में 1902 में टैगोर के ट्रेन से पेंड्रारोड पहुंचने पर सवाल उठ रहे हैं। दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य सेनेटोरियम से जुड़ा है। भारत का पहला सेनेटोरियम 1906 में राजस्थान के तिलौनिया में स्थापित हुआ। पेंड्रारोड सेनेटोरियम 1916 में बना। 1902 में वहां मिस लांगडन का क्षयरोग आश्रम होने का उल्लेख मिलता है।

इलाज के लिए कलकत्ता जाते वक्त वे यहां रुके

आलोचकों का कहना है कि टैगोर की कविता ‘फांकी’ में बीनू का जिक्र तो है, लेकिन पेंड्रारोड का कहीं उल्लेख नहीं है। जबकि ऐतिहासिक रूप से माना जाता है कि 12 सितंबर 1902 को शांतिनिकेतन से इलाज के लिए कलकत्ता जाते वक्त वे यहां रुके थे। इस पर स्थानीय लोग और जनप्रतिनिधि विरोध जता रहे हैं।

उनका कहना है कि इतिहास से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती और यह अकाट्य सत्य है कि गुरूदेव पेंड्रारोड आए थे। बंग समाज के जिला अध्यक्ष डॉ. सुकांत विश्वास ने भी इसे सत्य बताते हुए विरोध जताया है। वहीं, इस मुद्दे पर विवाद और गहराने की आशंका है, हालांकि स्थानीय स्तर पर गुरूदेव से जुड़ी यादों को संरक्षित करने के प्रयास जारी हैं।

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