VIP ड्यूटी में दौड़ती रही एम्बुलेंस, घायल युवक की रास्ते में हो गई मौत
सरगुजा,एजेंसी। अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल विशेष संरक्षित जनजाति समुदाय के युवक को 26 घंटे तक एम्बुलेंस नहीं मिल सकी। वेंटिलेटर लगा एम्बुलेंस राज्यपाल के ड्यूटी में दौड़ता रहा। युवक की रायपुर ले जाते समय रास्ते में मौत हो गई। इस मामले को लेकर पूर्व स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य व्यवस्था प्रदेश में ध्वस्त हो गई है। स्वास्थ्य विभाग को तत्काल घायल को एम्बुलेंस उपलब्ध कराना था।
दरअसल, बलरामपुर जिले के राजपुर ब्लॉक के ग्राम ककना के मदेश्वरपुर निवासी गुड्डू कोरवा (34) शनिवार (4 अक्टूबर) को ग्राम घटगांव से लौटने के दौरान बाइक से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गया था। सिर में आई चोट के कारण 5 अक्टूबर को उसे अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज से रायपुर रेफर कर दिया गया। लेकिन वेंटिलेटर एम्बुलेंस उसे 26 घंटे बाद मिल सकी।

कांग्रेसियों ने शव रखकर किया था प्रदर्शन
प्रोटोकाल में दौड़ती रही एम्बुलेंस, रास्ते में हो गई मौत
अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल की एकमात्र वेंटिलेटर एम्बुलेंस राज्यपाल के दौरा कार्यक्रम के कारण VIP ड्यूटी में दौड़ती रही। अस्पताल प्रबंधन ने VIP ड्यूटी का हवाला देकर युवक को रायपुर ले जाने एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं कराई।
26 घंटे बाद एम्बुलेंस मिली तो रायपुर ले जाने के दौरान उसकी मौत हो गई। रायपुर से शव लाने के लिए भी वाहन की व्यवस्था नहीं हो सकी। परिजनों को 9 हजार रुपए देकर निजी वाहन से शव को लेकर अंबिकापुर पहुंचे। वाहन किराए की व्यवस्था भी कांग्रेसियों ने की।
सिंहदेव बोले- स्वास्थ्य व्यवस्थाएं ध्वस्त
पहाड़ी कोरवा की मौत के बाद परिजनों के साथ कांग्रेसियों ने मंगलवार को शव दो घंटे सड़क पर रखकर प्रदर्शन किया था। मामले को लेकर पूर्व स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने कहा कि “प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है।
अस्पताल में मरीज हैं आपके पास, यदि उनको रेफर कर रहे हैं और वेंटिलेटर युक्त एम्बुलेंस चाहिए, तो एम्बुलेंस किसी वीआईपी के ड्यूटी पर लगी हुई हैं, यह तो अस्पताल प्रबंधन की जिम्मेदारी है कि मरीज के जीवन को प्राथमिकता देते हुए बाजार से ही एम्बुलेंस उपलब्ध करा दें।
अस्पताल प्रबंधन ने ऐसा न करके VIP के जाने का इंतजार किया। तब तक मरीज की स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि रास्ते में ही रायपुर पहुंचने से पहले उसने दम तोड़ दिया। इसके बाद तो हद हो गई, रायपुर से घर वापसी में भी शव वाहन उपलब्ध नहीं होता है।
परिवार को 9,000 रुपए खर्च करके ही शव को वापस लाना पड़ता है और समाज के सामने अपना दुख-दर्द रखना पड़ता है। यह घटना प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर कई बड़े सवाल खड़े कर रही है। गरीब और आदिवासी समुदाय के लोग ऐसी व्यवस्था में कैसे जीवित रहें..?
