मुंबई, एजेंसी। देश में हेल्थ इंश्योरेंस लेने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है लेकिन इसके बावजूद मरीजों पर इलाज का आर्थिक बोझ कम नहीं हो रहा है। हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की ओर से जनवरी-दिसंबर 2025 के बीच किए घरेलू उपभोग सर्वे (Household Consumption Survey) में खुलासा हुआ है कि बीमा होने के बावजूद अधिकांश लोग इलाज का बड़ा हिस्सा अपनी जेब से या उधार लेकर चुका रहे हैं।

बीमा कवरेज बढ़ा लेकिन जेब पर बोझ कायम
सर्वे के अनुसार 2017-18 की तुलना में स्वास्थ्य बीमा कवरेज में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है लेकिन आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडेचर (OOPE) यानी अपनी जेब से होने वाले खर्च में कोई खास कमी नहीं आई है।
ग्रामीण और शहरी भारत की स्थिति
ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य योजनाओं का कवरेज 13% से बढ़कर 46% हो गया है लेकिन अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन 33,000 रुपए के खर्च में से करीब 95% राशि मरीजों को खुद वहन करनी पड़ रही है।
शहरी क्षेत्रों में कवरेज 9% से बढ़कर 32% हुआ है लेकिन यहां भी 47,000 रुपए के औसत अस्पताल खर्च में से लगभग 83% खर्च मरीजों की जेब से जा रहा है।
इलाज का खर्च लगभग दोगुना
पिछले 7–8 वर्षों में अस्पताल में भर्ती होने की लागत लगभग दोगुनी हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह बढ़ोतरी 97% और शहरी क्षेत्रों में 77% दर्ज की गई है। निजी अस्पतालों की बढ़ती लागत को इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है।
प्रसव और भर्ती दर की स्थिति
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि प्रसव के दौरान होने वाला खर्च और जेब से किया जाने वाला भुगतान लगभग बराबर है। देश में प्रति 1,000 लोगों पर अस्पताल में भर्ती होने की दर 29 पर स्थिर बनी हुई है, जिसमें ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में हल्का बदलाव देखा गया है।
