DivyaAkash: Your Daily Source for Hindi News

10 तरह के कड़वे पत्तों से खुद बना रहे दवा:नेचुरल फार्मिंग से 75% लागत घटाई, 3 साल में 361 किसान यही प्रक्रिया अपना रहे

कोरबा। कोरबा जिले में करतला ब्लॉक के जोगीपाली निवासी 65 वर्षीय किसान बूंदराम मांझी 3 साल से प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। इससे रासायनिक खाद और रासायनिक दवा की निर्भरता समाप्त हो गई है। बूंदराम कड़वे पत्तों से खुद घर में ही दवा तैयार करते हैं।

पैदावार उतनी ही हो रही है, जितनी रासायनिक खाद डालने से होती थी, जबकि लागत 75 प्रतिशत तक कम हो गई है। इसे देखकर आसपास के 361 किसान भी रासायनिक छोड़कर प्राकृतिक खेती करने के लिए आगे आए हैं।

जोगीपाली निवासी 65 वर्षीय किसान बूंदराम मांझी की तस्वीर है।

पांचवीं तक पढ़े बूंदराम ने बताया, वर्तमान समय में खाद और बीज के लिए भारी मारामारी रहती है। समय पर खाद नहीं मिले तो फसल पर खराब असर पड़ता है। मेरे पास 4 एकड़ जमीन है, जिसमें मैं धान के साथ ही दलहन व तिलहन की फसल लेता हूं।

पूर्वज परंपरागत खेती करते थे और गोबर खाद ही डालते थे। लेकिन बाद में यूरिया और डीएपी के बिना खेती संभव नहीं हो पा रही थी। इससे खेती में लागत बढ़ रही थी। इस क्षेत्र में नाबार्ड का प्रोजेक्ट भी चलता है। वहां जैविक खेती और खुद ही खाद-दवा तैयार करने के बारे में बताया जाता था। लेकिन रासायनिक खाद के बिना उचित पैदावार लेना चुनौतीपूर्ण रहता है। इसलिए मैंने प्राकृतिक खेती को चुना।

बूंदराम ने बताया, पहले खाद बनाना सीखा। एक ड्रम लेकर 200 लीटर पानी, 10 किलो गोबर, 10 लीटर गोमूत्र, 2 किलो गुड़, 2 किलो बेसन और 1 किलो मिट्टी डालकर एक सप्ताह तक छोड़ दिया। खाद तैयार होने पर तीन बार छिड़काव किया। धान के साथ सब्जी की खेती में भी इसका उपयोग किया।

इससे खेत में हरियाली बढ़ गई। पौधे मजबूत होने से बीमारियां भी नहीं लगी। इसके बाद मैंने दवा के लिए 5 प्रकार के कड़वे पत्ते इकट्ठे किए। नीम, करंज, पपीता, सीताफल के पत्तों को पकाने के बाद 3-4 दिन छोड़ दिया। उसके बाद खेत में छिड़काव किया। इससे कीड़े नहीं लगे।

बूंदराम मांझी को देखकर 361 किसान भी रासायनिक छोड़कर प्राकृतिक खेती करने के लिए आगे आए हैं।

पहले एकड़ में 15 हजार रुपए तक लागत आई थी, वह अब 2 से 3 हजार तक आ गई है। सिर्फ गुड़ और बेसन खरीदना पड़ता है। गोबर और गोमूत्र घर में ही मिल जाता है। जब धान की कटाई हुई तो पैदावार में भी कोई अंतर नहीं दिखा। बल्कि मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ने से अब पैदावार बढ़ने लगी है।

रासायनिक खाद के लिए अब मुझे किसी तरह का लोन लेने या समितियों के चक्कर काटने की जरूरत नहीं पड़ती। बाड़ी में लगे आम के पौधों में भी यही दवा डालता हूं।

Exit mobile version