हिन्दी को कुर्सी के लिए विवादित नहीं बनानी चाहिए। देश के प्रख्यात अभिनेता एवं मोटिवेटर आशुतोष राणा ने कितनी अच्छी बात कही है- हिन्दी भाषा संवाद का विषय है, ना कि विवाद का। यदि इस गहन और प्रेरणास्पद संदेश को हर भारतीय समझ ले, तो यह देश के हर कोने में अपनी मिठास छोड़ेगी और एकता में पिरोएगी भी। हिन्दी वह भाषा है, जिसमें संवाद है, मिठास है, व्यवहार है और रिश्तों की प्रगाढ़ता है। प्रधानमंत्री मोदी ने मेडिकल जैसे कोर्स के लिए भी हिन्दी की अनिवार्यता को देश में लागू कर दिया, यह हिन्दी के लिए सर्वोच्च सम्मान जैसी पहल है। हिन्दी को देश में जब तक सर्वव्यापी समर्थन नहीं मिलेगा यह विश्व की भाषा कैसे बनेगी। हिन्दी को विश्वव्यापी बनाने के लिए भारत में हिन्दी को लेकर कहीं भी भाषा विवाद नहीं होना चाहिए। क्षेत्रीय भाषा का भी सम्मान होना चाहिए, यह हमारी बोल-चाल की भाषा प्रदेश स्तर तक ही सीमित रहती है, लेकिन हिन्दी बोलने वालों को किसी भी राज्य में अपमानित करना हिन्दी भाषा का अपमान है। भारत में हर कोई अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा बोलने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन किसी भी दिगर प्रांत के लोगों को किसी अन्य राज्य की मातृभाषा के लिए थोपना उचित नहीं है। महाराष्ट्र में विपक्ष और साऊथ में सत्तासीन के लोगों द्वारा अपनी मातृभाषा को थोपना कहां तक उचित है। गैर हिन्दी भाषी और हिन्दी भाषी इसी देश के नागरिक हैं और भाषा को सद्भाव का विषय बनाना चाहिए, ना कि विवाद का। हिन्दी भाषा जब भारत में सर्वमान्य होगी, तो ही इसे विश्वव्यापी बनाने का रास्ता खुलेगा।
हिन्दी वह भाषा है, जो हिन्दुस्तान का दर्पण है। हिन्दी, हिन्दुस्तान की आत्मा है। हिन्दुस्तान से उसकी आत्मा को अलग करना एक प्रकार से राष्ट्रद्रोह है। हिन्दी को किसी भी हालत में देश में सर्वमान्य बनाकर हमें इसे सार्वभौमिक बनाने के लिए प्रयास करना होगा।
हिन्दी से समृद्ध भारत का हर कोना
