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सरकार का बड़ा फैसला, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में बेचेगी 8% हिस्सेदारी

नई दिल्ली, एजेंसी। केंद्र सरकार ने Central Bank of India में अपनी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सरकार ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए बैंक की 8 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचकर करीब 2,455 करोड़ रुपए जुटाने की योजना बना रही है। इस कदम को सरकार की विनिवेश नीति और सार्वजनिक शेयरधारिता बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

सरकार ने OFS के लिए 31 रुपए प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है, जो बैंक के पिछले बंद भाव 33.94 रुपए से लगभग 8.5 प्रतिशत कम है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि डिस्काउंट मूल्य पर शेयर उपलब्ध होने से निवेशकों की रुचि बढ़ सकती है। संस्थागत निवेशकों के लिए यह ऑफर 22 मई से खुल चुका है, जबकि खुदरा निवेशक और बैंक कर्मचारी 25 मई से इसमें भाग ले सकेंगे।

सरकार ने स्पष्ट किया है ये हिस्सेदारी बिक्री के बावजूद बैंक पूरी तरह सुरक्षित रहेगा और ग्राहकों की जमा राशि पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। बिक्री के बाद भी केंद्र सरकार की हिस्सेदारी बैंक में लगभग 81 प्रतिशत से अधिक बनी रहेगी। ऐसे में बैंक का नियंत्रण सरकार के पास ही रहेगा और यह सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक बना रहेगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, कई ग्राहकों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या हिस्सेदारी बिक्री का मतलब बैंक का निजीकरण है, लेकिन यह केवल सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ाने की प्रक्रिया है। बैंक में जमा धन, फिक्स्ड डिपॉजिट और बचत खाते पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे।

OFS में खुदरा निवेशकों के लिए भी विशेष अवसर रखा गया है। कुल इश्यू का 10 प्रतिशत हिस्सा छोटे निवेशकों के लिए आरक्षित किया गया है। बाजार जानकारों का कहना है कि मौजूदा बाजार मूल्य से कम कीमत पर शेयर मिलने के कारण निवेशकों को लंबी अवधि में लाभ मिलने की संभावना बन सकती है।

बैंक कर्मचारियों के लिए भी सरकार ने 75 लाख शेयर अलग से सुरक्षित रखे हैं। कर्मचारी अधिकतम 5 लाख रुपए तक के शेयरों के लिए आवेदन कर सकेंगे। वर्तमान में बैंक में सरकार की हिस्सेदारी 89.27 प्रतिशत है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के नियमों के अनुसार सूचीबद्ध कंपनियों में कम से कम 25 प्रतिशत सार्वजनिक हिस्सेदारी होना आवश्यक है। इसी नियम का पालन करने के लिए सरकार धीरे-धीरे अपनी हिस्सेदारी घटा रही है।

बाजार विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम से बैंक के शेयरों में तरलता बढ़ेगी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में निवेशकों की भागीदारी मजबूत होगी।

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