कोरबा/पाली। कटघोरा वनमंडल अंतर्गत पाली परिक्षेत्र के घने और औषधीय महत्व वाले जंगलों की हरियाली पर इन दिनों गहरा संकट मंडरा रहा है। शासन स्तर पर छत्तीसगढ़ के सुरक्षित वनों में बाहरी राज्यों के मवेशियों का प्रवेश और चराई पूरी तरह प्रतिबंधित होने के बावजूद राजस्थान और गुजरात से आए चरवाहे हजारों की संख्या में भेड़, बकरी और ऊंट लेकर पिछले एक महीने से जंगलों में बेधड़क डेरा डाले हुए हैं। स्थानीय ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि वन कर्मियों की मौन सहमति और संरक्षण के खेल में जंगल की प्राकृतिक वनस्पति और नर्सरियां बुरी तरह रौंदी जा रही हैं।

वर्तमान में चरवाहों का सबसे बड़ा डेरा लाफा सर्किल के नगोई-भादा जंगल में देखा जा रहा है। जंगल के बीचों-बीच सैकड़ों भेड़-बकरियों और ऊंटों की चहलकदमी से छोटे पौधे नष्ट हो रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, जिस क्षेत्र में ये मवेशी रुकते हैं, वहां की वनस्पतियां जड़ से समाप्त हो जाती हैं।
अंधाधूंध चराई और मानवीय दखल के कारण उत्पन्न शोरगुल से जंगली जानवरों का प्राकृतिक आवास भी प्रभावित हो रहा है, जिससे वन्यजीव अन्य क्षेत्रों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। ग्रामीणों ने बताया कि यह कोई पहली घटना नहीं है। हर साल सितंबर और अक्टूबर के महीने में राजस्थानी व गुजराती चरवाहे योजनाबद्ध तरीके से पाली परिक्षेत्र में प्रवेश करते हैं।
ये समूह बतरा, लाफा, बुड़बुड़, सराईपाली, पुटा-उड़ता के जंगलों से गुजरते हुए सीमावर्ती बिलासपुर जिले के खोंदरा वन क्षेत्र की ओर आगे बढ़ते हैं। रास्ते में अवैध रूप से मवेशियों की खरीद-बिक्री भी की जाती है। स्थानीय निवासियों का सीधा आरोप है कि बीट स्तर के वन कर्मियों को इस अवैध घुसपैठ की पूरी जानकारी रहती है। कथित तौर पर आर्थिक लाभ के चक्कर में न तो चरवाहों पर कोई दंडात्मक कार्रवाई की जाती है और न ही इसकी सूचना वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाई जाती है। यदि समय रहते इस पर कड़ा संज्ञान नहीं लिया गया, तो पाली के समृद्ध और औषधीय जंगल जल्द ही बंजर भूमि में तब्दील हो जाएंगे।
मामले की जानकारी बीट गार्ड के माध्यम से मुझे नहीं मिली थी। खबर संज्ञान में आने के बाद तत्काल वन विभाग की टीम को मौके पर भेजा जा रहा है। अवैध रूप से चराई करा रहे चरवाहों और मवेशियों को जब्त कर नियमानुसार सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
योगेश्वर प्रसाद
वन परिक्षेत्राधिकारी वनपरिक्षेेत्र पाली
