बिलासपुर, एजेंसी। आमतौर पर रिटायरमेंट के बाद लोग आराम की जिंदगी बिताना पसंद करते हैं, लेकिन बिलासपुर की डॉ. पुष्पा दीक्षित ने अपना पूरा समय संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। उनका घर पिछले करीब 22 साल से संस्कृत की पाठशाला बना हुआ है।
यहां देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ नेपाल, चीन और अमेरिका समेत कई देशों से भी विद्यार्थी संस्कृत सीखने पहुंच चुके हैं। सबसे खास बात यह है कि यहां संस्कृत सीखने के लिए किसी तरह की फीस या शुल्क नहीं लिया जाता है।
डॉ. पुष्पा दीक्षित का घर करीब 22 साल से संस्कृत की पाठशाला बना हुआ है।
संस्कृत सीखने के लिए किसी तरह की फीस या शुल्क नहीं लिया जाता है।
बच्चों को संस्कृत पढ़ाती डॉ. पुष्पा दीक्षित।
दिल्ली से नेपाल तक पहुंच रहे विद्यार्थी
दरअसल, गोंड़पारा स्थित पाणिनीय शोध संस्थान में संस्कृत सीखने वालों का दायरा बिलासपुर तक सीमित नहीं है। दिल्ली, बेंगलुरु, देहरादून समेत देश के अलग-अलग हिस्सों से विद्यार्थी यहां आ चुके हैं। नेपाल समेत विदेशों से भी विद्यार्थी संस्कृत सीखने पहुंचे हैं।
यहां आने वाले विद्यार्थियों की पृष्ठभूमि भी अलग-अलग है। स्कूली बच्चों के साथ नौकरी और पढ़ाई करने वाले युवा भी संस्कृत सीखते हैं। BTech, MTech और PhD जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके युवा भी संस्कृत की गहराई समझने के लिए यहां पहुंच रहे हैं।
पाणिनीय पद्धति से संस्कृत की पढ़ाई
डॉ. पुष्पा दीक्षित की पाठशाला की सबसे बड़ी खासियत पाणिनीय पद्धति से संस्कृत पढ़ाना है। उनका मानना है कि संस्कृत को केवल रटकर नहीं, बल्कि उसकी व्याकरणिक संरचना और पद्धति को समझकर सीखा जाना चाहिए।
इसी वजह से दूर-दराज से आने वाले विद्यार्थियों के लिए उनका घर सीखने का केंद्र बन गया है। यहां सीखने के लिए न उम्र की सीमा है और न आर्थिक क्षमता की शर्त।
न फीस, न शुल्क, सीखने की इच्छा जरूरी
डॉ. दीक्षित संस्कृत को कमाई का जरिया बनाने के बजाय इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में विश्वास रखती हैं। इसी उद्देश्य से वे अपने स्तर पर बच्चों और युवाओं को निशुल्क संस्कृत पढ़ा रही हैं।
आधुनिक समय में जहां युवाओं का रुझान तकनीकी और प्रोफेशनल शिक्षा की ओर बढ़ रहा है, वहीं इंजीनियरिंग और उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं का संस्कृत सीखने के लिए यहां पहुंचना इस पहल को खास बनाता है।
दिल्ली, बेंगलुरु, देहरादून समेत देश के अलग-अलग हिस्सों से विद्यार्थी यहां आ चुके हैं।
शिक्षक दिवस पर शिक्षा व्यवस्था पर जताई चिंता
शिक्षक दिवस के मौके पर डॉ. पुष्पा दीक्षित ने मौजूदा शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ऐसी शिक्षा व्यवस्था के पक्षधर थे, जिसमें राष्ट्रहित, विचार और संस्कारों को महत्व मिले।
उनका मानना है कि शिक्षा में भारतीय संस्कृति और विचार आधारित अध्ययन को पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए। उनके अनुसार संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृति से जोड़ने का माध्यम भी है।
सरकारी मदद के बिना 22 साल से जारी अभियान
डॉ. पुष्पा दीक्षित की यह पहल किसी बड़े संस्थान या सरकारी सहायता पर निर्भर नहीं है। उन्होंने अपने घर से यह अभियान शुरू किया और करीब 22 वर्षों से लगातार बच्चों और युवाओं को संस्कृत का ज्ञान दे रही हैं।
बिलासपुर की यह पाठशाला बताती है कि किसी भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए हमेशा बड़े संस्थान की जरूरत नहीं होती। एक व्यक्ति की लगन और समर्पण भी कई लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ सकता है।
