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व्यंग्य – हार का झटका, नागपुर-वाराणसी पे अटका!

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चुनाव में हार-जीत तो लगी रहती है, लेकिन जब जीत का घोड़ा दौड़ते-दौड़ते अचानक ठोकर खा जाए तो सवार को भी अपनी सवारी पर शक होने लगता है। चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों में सत्तापक्ष को मिले झटकों ने कुछ ऐसा ही माहौल बना दिया है। खासकर नागपुर में विपक्ष की जीत ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। यानी एक ही तीर वह भी बड़ा गंभीर। जैसे सत्ता पक्ष के दिल पर चोट कर दी हो।

नागपुर कोई साधारण जगह नहीं है। इसे संघ का मुख्यालय होने का गौरव प्राप्त है। ऐसे में वहां विपक्ष की जीत होना सत्तापक्ष के लिए किसी राजनीतिक पहेली से कम नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि जब घर के आसपास ही मतदाताओं का मिजाज बदलने लगे तो चुनावी रणनीतिकार आखिर किस दिशा में रणनीति बना रहे हैं? 

प्रधानमंत्री ने विपक्ष की सीटों को लेकर सोशल मीडिया पर तंज कसा, लेकिन प्रकृति का न्याय देखिए कि कुछ ही समय बाद नागपुर ने ऐसा जवाब दिया कि राजनीतिक व्यंग्य का विषय ही बदल गया। लगता है मतदाता भी अब सोशल मीडिया की पोस्ट पढ़कर नहीं, अपनी पसंद से वोट डालने लगे हैं। इससे यह भी साबित होता है कि सोशल मीडिया पर जल्दबाजी में पोस्ट करना कितना भारी पड़ सकता है। इधर झट से पोस्ट की और उधर नुकसान हो गया।

उधर वाराणसी में भी सायकलवालों की जीत ने सत्तापक्ष को सोचने पर मजबूर कर दिया। अब इसे विपक्ष की किस्मत कहें या मतदाताओं की नाराजगी, लेकिन लोकतंत्र में जनता का फैसला सबसे ऊपर होता है।

वैसे चुनाव हारने के बाद आत्ममंथन करने की परंपरा बड़ी दिलचस्प है। हर पार्टी आत्ममंथन का ऐलान करती है, बैठकें होती हैं, रिपोर्ट बनती है और फिर अगले चुनाव में वही पुराने चेहरे, वही पुराने वादे और वही पुराने भाषण मैदान में उतर आते हैं। वैसे ही जैसे आते-जाते लहरों की तरह।

सच तो यह है कि लोकतंत्र में कोई भी पार्टी स्थायी विजेता नहीं होती। कुर्सी का तकिया कितना भी मुलायम क्यों न हो, जनता जब करवट बदलती है तो सत्तापक्ष की नींद उड़ ही जाती है। इसलिए बेहतर है कि नेता जनता की आवाज सुनें, वरना ईवीएम से पहले मतदाता ही राजनीतिक नींद का अलार्म बजा देते हैं!

संजय एम तराणेकर 

(कवि, लेखक व समीक्षक)

इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)

मो. 98260 25986

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