जांजगीर-चांपा। छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के सुदूर वनांचल ग्राम पहरिया में प्रकृति और आस्था का अनूठा संगम देखने को मिलता है। यहां ग्रामीण जंगल को देवी का स्वरूप मानते हैं, जिसके कारण पूरा क्षेत्र आज भी हरा-भरा और सुरक्षित है।
गांव में स्थित मां अन्नधरी देवी मंदिर के प्रति गहरी आस्था है। ग्रामीण पेड़ों को काटना तो दूर, उनकी टहनियों को भी नहीं तोड़ते। यहां तक कि यदि कोई पेड़ अपने आप गिर जाए, तो उसे भी घर नहीं ले जाया जाता और वह वहीं पड़ा-पड़ा सूख जाता है।

माता से अपनी मनोकामनाएं पूरी होने का आशीर्वाद पाते हैं।
मां अन्नधरी देवी की प्रतिमा सैकड़ों साल पुरानी
मंदिर के बैगा बेदराम के अनुसार, मां अन्नधरी देवी की प्रतिमा सैकड़ों साल पुरानी है। मान्यता है कि माता की कृपा से गांव में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती, इसीलिए उनका नाम अन्नधरी देवी पड़ा। नवरात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। दूर-दूर से श्रद्धालु व्रत रखकर, नंगे पैर और लोट लगाकर माता के दर्शन करने आते हैं।
जंगल की लकड़ी घर ले जाने से होती है अनहोनी
इस जंगल को लेकर लोगों में गहरी आस्था के साथ एक भय भी जुड़ा हुआ है। ग्रामीणों का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति यहां की लकड़ी को अपने घर ले जाता है या उसका उपयोग करता है, तो उसे अनहोनी का सामना करना पड़ता है।
धार्मिक अनुष्ठानो में ही लकड़ी का उपयोग
कई लोगों ने ऐसा करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें परेशानी और कष्टों का सामना करना पड़ा। कुछ मामलों में तो बिच्छू के डंक जैसी घटनाएं भी हुईं, जिसके बाद माता से माफी मांगने पर ही राहत मिली। यही कारण है कि यहां की लकड़ी का उपयोग केवल धार्मिक कार्यों जैसे होली दहन, नवधा रामायण, भागवत कथा या हवन में ही किया जाता है, वह भी माता रानी से विधिवत अनुमति लेकर।
जंगल की लकड़ी घर ले जाने से होती है अनहोनी
पहरिया पहाड़ गांव का रक्षक
मंदिर समिति अध्यक्ष कार्तिकराम साहू बताते हैं कि पहरिया पहाड़ को गांव का रक्षक माना जाता है। जब भी गांव में किसी महामारी या संकट का खतरा होता है, तो लोग देवी की शरण में जाते हैं और उन्हें विश्वास है कि माता उनकी रक्षा करती हैं। यहां तक कि गांव में यह भी मान्यता है कि माता की कृपा से किसी भी परिवार को संतान सुख से वंचित नहीं रहना पड़ता।
इस पूरे क्षेत्र की सबसे खास बात यह है कि घने जंगलों से घिरे होने के बावजूद केवल पहरिया का यह जंगल पूरी तरह सुरक्षित है, और इसका कारण है लोगों की अटूट आस्था।
