सक्ती। सक्ती जिले में अपनी ही मां की निर्मम हत्या करने वाले बेटे को प्रथम अपर सत्र न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। न्यायालय ने आरोपी पर एक हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। अर्थदंड जमा नहीं करने की स्थिति में उसे छह माह का अतिरिक्त सश्रम कारावास भुगतना होगा। यह फैसला प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश प्रशांत कुमार शिवहरे ने 24 जून को सुनाया।

पुलिस के अनुसार, 29 मई 2025 को डायल-112 के माध्यम से सूचना मिली थी कि ग्राम रेड़ा में एक युवक ने अपनी मां की हत्या कर दी है। सूचना मिलते ही थाना डभरा पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू की।
घरेलू विवाद के बाद ईंट से किया हमला
जांच में सामने आया कि 45 वर्षीय लक्ष्मीन बाई कुर्रे की हत्या उनके बेटे डमरूधर कुर्रे ने की थी। मामले के प्रत्यक्षदर्शी और सूचक शिवकुमार वारेन ने पुलिस को बताया कि घटना वाले दिन दोपहर करीब 1:30 बजे मां-बेटे के बीच घर के सामने विवाद हो रहा था।
शोर सुनकर जब वह बाहर आया तो उसने आरोपी को अपनी मां के साथ गाली-गलौज और मारपीट करते देखा। कुछ देर बाद लक्ष्मीन बाई घर की परछी के पास गंभीर रूप से घायल अवस्था में मिलीं। उनके सिर, कान और हाथ में गंभीर चोटें थीं। घटनास्थल पर खून से सनी ईंटें पड़ी हुई थीं। गंभीर चोटों के कारण उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
घटनास्थल से मिले अहम सबूत
पुलिस ने मर्ग कायम कर जाँच शुरू की। जांच के दौरान घटनास्थल से खून लगे तीन ईंट के टुकड़े, खूनयुक्त एवं साधारण मिट्टी, एक जोड़ी चप्पल और मृतका के रक्त नमूने जब्त किए गए। आरोपी के घटना के समय पहने गए कपड़े भी बरामद किए गए।
पटवारी से घटनास्थल का नजरी नक्शा तैयार कराया गया तथा प्रत्यक्षदर्शियों सहित अन्य गवाहों के बयान दर्ज किए गए। पर्याप्त सबूत मिलने के बाद आरोपी के खिलाफ थाना डभरा में अपराध दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया गया।
14 गवाहों के बयान के बाद दोष सिद्ध
जांच पूरी होने पर पुलिस ने अभियोग पत्र प्रथम अपर सत्र न्यायालय सक्ती में प्रस्तुत किया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अपने समर्थन में 14 साक्षियों के बयान दर्ज कराए।
सभी सबूतों और गवाहों के बयानों का परीक्षण करने के बाद न्यायालय ने आरोपी डमरूधर कुर्रे को दोषी करार दिया और उसे आजीवन कारावास तथा एक हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई।
अभियोजन पक्ष ने की पैरवी
प्रकरण में अभियोजन पक्ष की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक उदय कुमार वर्मा ने पैरवी की। न्यायालय के इस फैसले को गंभीर अपराधों के मामलों में सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
