रायपुर,एजेंसी। रायपुर के खरोरा स्थित मोजो मशरूम फैक्ट्री से एक बार फिर बाल मजदूरी का मामला सामने आया है। 17 नवंबर की शाम दिल्ली से आई मानवाधिकार आयोग की टीम, महिला बाल विकास विभाग और पुलिस ने संयुक्त रूप से छापा मारते हुए 109 बाल मजदूरों को मुक्त कराया।
इनमें 68 बच्चियां और 41 बच्चे शामिल हैं। इनमें ज्यादातर बच्चे नाबालिग हैं। सभी को फिलहाल माना के बाल संप्रेक्षण गृह में रखा गया है, जहां उनकी काउंसलिंग की जा रही है।

कूल 109 बाल मजदूरों को मुक्त कराया। इनमें 68 बच्चियां और 41 बच्चे शामिल हैं।
एक कमरे में रहते थे 15 बच्चे
इन बच्चों ने बताया कि एक कमरे के अंदर 10 से 15 लोगों को रखा जाता था। कुछ बच्चे तीन महीने, कुछ छह महीने, कुछ एक साल तो कुछ तीन-तीन साल से फैक्ट्री में फंसे हुए थे।
बच्चों ने बताया कि वहां उनके साथ मारपीट होती थी, लड़कियों से छेड़खानी की जाती थी और मजदूरी का भुगतान समय पर नहीं किया जाता था।
पैसे मांगने पर ठेकेदार और सुपरवाइजर जान से मारने की धमकी देते थे। उन्हें सुबह 4-5 बजे उठाकर देर रात तक काम करवाया जाता था। खाना सिर्फ दो वक्त दिया जाता था।
अधिकारियो के मुताबिक, मशरूम उगाने के लिए मिटटी में इस तरह के डिब्बों में भरे कैमिकल का उपयोग किया जाता है।
वहां उपयोग होने वाला फॉर्मलीन कैमिकल इतना जहरीला था कि पास जाने पर आंखों में जलन होने लगी।
खतरनाक कैमिकल के बीच रह रहे थे बच्चे
रेस्क्यू टीम के अधिकारियों ने बताया कि जब टीम फैक्ट्री के अंदर पहुंची तो सभी बच्चे अलग-अलग कामों में लगे हुए थे। कोई मिट्टी डाल रहा था, कोई पैकिंग कर रहा था, कोई बर्फ की सिल्ली उठा रहा था और कुछ बच्चे उन पर केमिकल छिड़कने का काम कर रहे थे।
टीम के सदस्यों ने बताया कि वहां उपयोग होने वाला फॉर्मलीन केमिकल इतना जहरीला था कि पास जाने पर आंखों में जलन होने लगी। अगर ये बच्चे लंबे समय तक इसके संपर्क में रहते, तो उन्हें गंभीर बीमारियां जिसमें कैंसर तक भी हो सकता था।
इन बच्चों ने कई खुलासे किए।
काम के बहाने ठेकेदार लाकर फंसा देते
काउंसलिंग के दौरान पता चला कि रेस्क्यू किए गए बच्चों में कुछ वही हैं, जिन्हें जुलाई में भी बचाया गया था। ठेकेदारों ने उन्हें फिर से काम दिलाने के नाम पर यहां लाकर फंसा दिया।
अधिकतर बच्चे असम, झारखंड, ओडिशा, यूपी, एमपी और पश्चिम बंगाल से हैं। हर राज्य में अलग-अलग ठेकेदार मजदूरों की सप्लाई कर रहे थे। 109 बच्चों में करीब 68 लड़कियां और 41 लड़के हैं।
हालांकि यह घटना पहली बार नहीं है। इसी साल जुलाई में भी इसी मोजो मशरूम फैक्ट्री से 90 से ज्यादा मजदूरों को रेस्क्यू किया गया था। तब कंपनी संचालक और ठेकेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।
मामला लेबर कोर्ट में चल रहा था, लेकिन कुछ समय बाद कार्रवाई ठंडे बस्ते में चली गई। इसके बाद कंपनी फिर से बाल मजदूरी करवाने लगी।
पॉलिथिन में पानी भरकर पीते थे मजदूर
फैक्ट्री के अंदर पहुंचे अधिकारियों के मुताबिक, जिन जगहों पर बाल मजदूरों को रखा गया था वहां दीवार पर पानी की पॉलिथिन टंगी हुई थी। पड़ताल में पता चला कि प्यास लगने पर इन्हीं पॉलिथिन पर छेद करके मजदूर पानी पीते हैं। इनके पास बर्तन नहीं होने की वजह से ऐसा करना पड़ता था।
मशरूम फैक्ट्री के अंदर की तस्वीर…जिसमें मजदूर काम करते हुए दिख रहे हैं।
विभाग ने पिछली बार कोर्ट में केस डालकर झाड़ा पल्ला
पिछली कार्रवाई के बाद श्रम विभाग, महिला बाल विकास विभाग और पुलिस की टीम ने संयुक्त जांच की थी। लेकिन श्रम विभाग ने सिर्फ केस तैयार कर लेबर कोर्ट में जमा कर दिया और उसके बाद किसी ने भी मामले की फॉलो-अप कार्रवाई नहीं की। अब वही स्थिति फिर दोहराई जा रही है।
इस मामले में सहायक श्रम आयुक्त देवेंद्र देवांगन ने कहा कि हम पिछली बार की कार्रवाई में श्रम विभाग शामिल था। इस बार महिला बाल विकास विभाग और मानवाधिकार आयोग ने छापा मारा है। हमें इसकी जानकारी नहीं थी। अगर शिकायत या रिपोर्ट आएगी तो कार्रवाई की जाएगी। पिछला मामला अभी भी लेबर कोर्ट में विचाराधीन है।
5 महीने पहले भी मजदूरो ने मीडिया से खुलकर फैक्ट्री में हो रहे अत्याचारों को बताया था।
5 महीने पहले भी मजदूरों का हुआ था रेस्क्यू
जानकारी के अनुसार, मोजो मशरूम में बंधक बनाकर मजदूरी का मामला जुलाई 2025 में भी आया था जिसमें करीब 90 से ज्यादा मजदूरों को इसी फैक्ट्री से रेस्क्यू किया गया था। उस समय कंपनी संचालक विश्वजीत राणा और ठेकेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी।
मामला लेबर कोर्ट पहुंचा, लेकिन उसके बाद कार्रवाई ठंडे बस्ते में चली गई। कुछ महीनों बाद कंपनी फिर से उसी तरह मजदूरों से काम करवाने लगी। यही जानकारी मानवाधिकार आयोग तक पहुंची, जिसके बाद टीम गठित कर पूरे फैक्ट्री की रेकी की गई और रेस्क्यू अभियान चलाया गया।
