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NCLT अब ऋण एवं चूक स्थापित होने पर ही स्वीकार करेगा मामलाः विशेषज्ञ

नई दिल्ली, एजेंसी। राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) किसी मामले को तभी स्वीकार करेगा जब ‘ऋण’ और ‘चूक’ दोनों स्थापित हों। विधि विशेषज्ञों ने शुक्रवार को यह जानकारी देते हुए कहा कि दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता (संशोधन) अधिनियम, 2026 के तहत ये प्रमुख शर्तें निर्धारित की गई हैं। विधि फर्म खेतान एंड कंपनी द्वारा आयोजित एक मीडिया गोलमेज बैठक में संशोधित दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) और प्रतिस्पर्धा कानून के प्रावधानों पर चर्चा की गई। 

फर्म में साझेदार प्रतीक कुमार और सिद्धार्थ श्रीवास्तव ने कहा कि संशोधित प्रावधानों के अनुसार कर्ज के बदले संपत्ति पर कानूनी सुरक्षा अधिकार केवल दो या अधिक पक्षों के बीच समझौते या व्यवस्था से ही लिया जा सकता है और एनसीएलटी में मामला स्वीकार होने के लिए ‘ऋण’ और ‘चूक’ दोनों का होना अनिवार्य है। श्रीवास्तव ने कहा कि संशोधित कानून में हितधारक परामर्श समिति को समाप्त कर दिया गया है। साथ ही, समाधान योजना को अब एनसीएलटी द्वारा दो चरणों-कार्यान्वयन एवं वितरण में मंजूरी दी जा सकती है और परिसमापन शुरू होने से पहले कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) की बहाली का प्रावधान रखा गया है। 

उन्होंने बताया कि समाधान पेशेवर को उसी कॉरपोरेट देनदार के लिए परिसमापक के रूप में कार्य करने से रोक दिया गया है। इसके अलावा, कर्ज समाधान योजना को निर्णायक प्राधिकरण के समक्ष रखने से पहले भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) की मंजूरी लेना जरूरी होगा और ऋणदाताओं की समिति को समाधान योजना को मंजूर करते समय कारण भी देने होंगे। प्रतीक कुमार ने कहा कि संशोधित अधिनियम के कुछ प्रावधान अभी लागू नहीं हुए हैं। इनमें सीमा-पार दिवाला ढांचा और ‘लेनदार द्वारा शुरू एवं अदालत से बाहर चलने वाली दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआईआरपी) की अवधारणा भी शामिल है। 

फर्म के एक अन्य साझेदार प्रांजल प्रतीक ने प्रतिस्पर्धा कानून पर चर्चा करते हुए कहा कि वर्ष 2025 ‘विलय नियंत्रण’ के लिहाज से अब तक का सबसे सक्रिय वर्ष रहा है और सीसीआई द्वारा मंजूरी देने की समयसीमा लगातार घट रही है। उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2024-25 में सीसीआई ने 59 मामलों का निपटारा किया, जिनमें केवल चार में उल्लंघन पाया गया, जबकि 39 मामलों को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया गया। 

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