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घरेलू हिंसा में पति ही नहीं, रिश्तेदार भी आरोपी:छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बहू और मायके पक्ष की याचिका खारिज की; कहा- साथ रहना जरूरी नहीं

बिलासपुर, एजेंसी। ‘घरेलू हिंसा के मामलों में आरोपी सिर्फ पति ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। परिवार के बाकी सदस्य और रिश्तेदार भी शिकायत में आरोपी बनाए जा सकते हैं।’ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बहू और उसके मायके पक्ष के रिश्तेदारों की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है।

जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने कहा कि, किसी व्यक्ति को घरेलू हिंसा के मामले से शुरुआती स्तर पर केवल इस आधार पर बाहर नहीं किया जा सकता कि, वह शिकायतकर्ता के साथ एक ही घर में नहीं रहता है।

साझा घर में रहने और पारिवारिक रिश्तों से जुड़े विवादों में आरोपों की वास्तविकता साक्ष्यों और गवाहों की जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। इसलिए इस स्तर पर कार्यवाही खत्म करना उचित नहीं है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बहू और उसके मायके पक्ष के रिश्तेदारों की याचिका खारिज की।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बहू और उसके मायके पक्ष के रिश्तेदारों की याचिका खारिज की।

क्या है पूरा मामला

दरअसल, रायपुर निवासी निर्मला अग्निवंशी और उनकी बेटी श्रुति अग्निवंशी ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत निचली अदालत में शिकायत की थी। शिकायत में उनकी बहू अनीशा अग्निवंशी के साथ उसके मायके पक्ष के सुषमा सिंह, अभिषेक सिंह, अविनाश सिंह, अंजू सिंह और अलका सिंह को भी पक्षकार बनाया गया था।

शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि, बहू और उसके मायके पक्ष के लोग उनके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने मानसिक प्रताड़ना देने और उन्हें परिवार से अलग करने के लिए दबाव बनाने के आरोप भी लगाए।

‘एक साथ नहीं रहते, इसलिए कानून लागू नहीं’

बहू और उसके परिजनों की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि वे शिकायतकर्ताओं के साथ साझा घर में नहीं रहते हैं। ऐसे में उनके खिलाफ घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कार्यवाही नहीं की जा सकती।

निचली अदालत ने यह तर्क स्वीकार नहीं किया। इसके बाद सत्र न्यायालय में भी उन्हें राहत नहीं मिली। दोनों अदालतों ने माना कि साझा घर और पारिवारिक संबंधों से जुड़े तथ्य साक्ष्यों के आधार पर तय किए जाने का विषय हैं। इसके बाद बहू और उसके परिजनों ने हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट ने ट्रायल को जरूरी माना

हाईकोर्ट ने निचली अदालत और सत्र न्यायालय के आदेशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने माना कि मामले में लगाए गए आरोपों की सत्यता का परीक्षण साक्ष्य और गवाहों के परीक्षण के बाद ही किया जा सकता है। इसलिए इस चरण पर कार्यवाही को समाप्त करना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी।

क्या है घरेलू हिंसा अधिनियम

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 का उद्देश्य घरेलू संबंधों में महिलाओं को शारीरिक, मानसिक, यौन और आर्थिक हिंसा से कानूनी संरक्षण देना है। कानून में घरेलू संबंध और साझा घर से जुड़े प्रावधान महत्वपूर्ण हैं।

किसी मामले में कौन व्यक्ति कानून के दायरे में आएगा और लगाए गए आरोप साबित होते हैं या नहीं, यह संबंधित मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करता है। इस मामले में भी हाईकोर्ट ने अंतिम दोष तय करने के बजाय यह माना कि आरोपों की जांच ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए।

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