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तेल बाजार में हड़कंप, 150 डॉलर तक जा सकता है Crude Oil, रिपोर्ट में चेतावनी

मुंबई, एजेंसी। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र की चिंताएं बढ़ा दी है। अप्रैल में हुए युद्धविराम के बाद हालात इतने गंभीर नजर आ रहे हैं कि तेल आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़े असर की आशंका जताई जा रहा है। ऊर्जा क्षेत्र की रिसर्च फर्म रिस्टैड एनर्जी के मुताबिक अगर दोनों देशों के बीच टकराव फिर से पूरी तरह शुरू हो जाता है, तो कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार खाड़ी क्षेत्र के छह बड़े तेल उत्पादक देशों में फिलहाल करीब 1.18 करोड़ बैरल प्रतिदिन तेल उत्पादन प्रभावित हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक दौर में यह तेल सप्लाई पर सबसे बड़ा असर माना जा सकता है। कंपनी के भू-राजनीतिक मामलों के प्रमुख जॉर्ज लियोन ने कहा कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि मौजूदा हालात पूरी तरह युद्ध की वापसी है या फिर ऐसा संकट है जिसे अभी भी काबू में किया जा सकता है।

तनाव बढ़ने के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमत एक समय 94.5 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, हालांकि बाद में इसमें थोड़ी नरमी आई और यह 93 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई।

बाजार को राहत देने वाले तीन कारण

विशेषज्ञों के अनुसार, फिलहाल तीन कारण तेल बाजार को पूरी तरह बेकाबू होने से बचा रही हैं। पहली, अमेरिका अपने रणनीतिक तेल भंडार से रिकॉर्ड स्तर पर तेल जारी कर रहा है। दूसरी, चीन ने कच्चे तेल के आयात में कुछ कमी की है। तीसरी, सऊदी अरब के यानबू बंदरगाह के माध्यमसे रोजाना लगभग 50 लाख बैरल तेल हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बायपास करके भेजा जा रहा है।

समझौते की उम्मीद कमजोर 

रिस्टैड एनर्जी का मानना है कि कुछ सप्ताह पहले तक अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की संभावना करीब 40 प्रतिशत मानी जा रही थी लेकिन मौजूदा हालाता में यह उम्मीद कमजोर पड़ती दिख रही है। रिपोर्ट के अनुसार आने वाले कुछ दिनों में यह तय होगा कि दोनों पक्ष बातचीत के रास्ते पर लौटते हैं या तनाव और गहराता है।

तीन महीने में बाजार से गायब हुआ 100 करोड़ बैरल तेल

रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद पिछले तीन महीनों में वैश्विक बाजार से कुल मिलाकर करीब 100 करोड़ बैरल कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है। यह मात्रा अमेरिका के रणनीतिक तेल भंडार की कुल क्षमता से करीब ढाई गुना अधिक बताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक युद्धविराम मजबूत होता नहीं दिखता, तब तक तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। 

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