नदिता माजी शर्मा
मुंबई, महाराष्ट्र
औरों की सुनकर कभी, लोगों को मत तोल।
हर पहलू को जाँच ले, तब जाकर कुछ बोल।।१।।
सच्ची मैत्री बोलती, सुख-दुख मिलकर बांट।
सही कर्म पर साथ दे, गलत कर्म पर डांट।।२।।
देखे हैं संसार ने, कितने नाना रोग।
सबसे दुष्कर आज भी, क्या बोलेंगे लोग।।३।।
क्षणभंगुर हैं आप, मैं, क्षणभंगुर सब लोग।
क्षणभंगुर हर कामना, क्षणभंगुर सब भोग।।४।।
खोजो अपने आप में, जीवन का अभिप्रेत।
दिन-प्रतिदिन जीवन सदा, फिसले बनकर रेत।।५।।
अहंकार से है भरा, जिनके मन का कोष।
औरों पर वे थोपते, निज करनी के दोष।।६।।
मन में हो सद्भावना, बसे मनन में बुद्ध।
प्रथम चयन बस शांति हो, अंतिम विकल्प युद्ध।।७।।
गगरी भरती पाप की, संचित हों जब पाप।
चरम बिन्दु को जब छुए, फूटे अपने आप।।८।।
घातक दुनिया रील की, बाँध रही निज खूँट।
सही रहे तो है सुधा, गलत विषैले घूँट।।९।।
