कोरबा। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति का प्रतीक भोजली पर्व का कोरबा में धूम रहा। शुक्रवार को कोरबा के कई हिस्सों में भोजली का विसर्जन किया गया। इसी कड़ी में रक्षाबंधन के दूसरे दिन भादो कृष्णपक्ष प्रतिपदा शनिवार को महिलाएं और युवतियां सिर पर भोजली की टोकरी रखकर पारंपरिक लोकगीत गाते हुए झरना पारा स्थित घाट में विसर्जित किया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।

लोक पंरपरा के अनुसार नाग पंचमी के दिन कुम्हार के घर से लाई मिट्टी और खाद से भरी टोकरी में गेंहू-जवार के अंकुरों को सात दिनों तक घरों में देवी स्वरूप मान कर पूजा की जाती है और भादो के प्रथम दिन इसे पूजा पाठ के साथ नदी, तालाबों में विसर्जित किया जाता है। बुजूर्गों के अनुसार भोजली जितनी विकसित और हरी होगी, धान भी उतना ही अच्छा होगा। यूं कहें तो भोजली का पर्व प्रकृति पूजा का एक स्वरूप है।
विपेंद्र कुमार साहू ने बताया 15 ब्लाक झरना पारा में भोजली विसर्जन के बाद मितान परंपरा का भी निर्वहन किया गया और प्रिय सहेली, प्रिय दोस्त को भोजली आदान-प्रदान कर एक-दूसरे के साथ मितान की रस्म पूरी की गई और आजीवन दोस्ती निभाने का संकल्प लिया गया।
