एक आम आदमी की दीपावली यानि खर्चो की फेहरिस्त का जुबां की तरह लम्बी होना। ये घर का मुखिया ही जानता हैं कि उसे किस मद में कटोती करनी है और किसमे नहीं? दीपावली का त्योहार आते ही बाजारों में रौनक दिखाई देने लगती है। घरों की साफ-सफाई से लेकर सजावट तक हर तरफ उत्साह का माहौल रहता है। लेकिन इस बार बाजार ने शुभ-लाभ और स्वागत को भी महंगाई के रंग में रंग दिया है।
कभी घर के दरवाजे पर दस-बीस रुपये में मिलने वाला शुभ-लाभ का प्रतीक अब सौ रुपये तक पहुंच गया है। बंदनवार के दाम 80 से लेकर 1400 रुपये तक सुनकर लगता है कि लक्ष्मीजी के स्वागत के लिए अब जेब में भी कुबेर का खजाना होना चाहिए। ऊपर से ओम, स्वास्तिक, श्री यंत्र और कलश जैसे शुभ प्रतीकों के भाव भी आसमान छू रहे हैं।
अब तो आम आदमी सोचने लगा है कि घर में लक्ष्मीजी का स्वागत करें या पहले दुकानदार की लक्ष्मी का ख्याल रखें? महंगाई का आलम यह है कि शुभ-लाभ खरीदने से पहले भी आदमी को अपना बजट देखना पड़ रहा है। लगता है कि बाजार ने शुभ को भी प्रीमियम और लाभ को भी महंगे पैकेज में बेचने का फैसला कर लिया है।
मजेदार बात यह है कि बाजार में ग्राहक कम हैं, लेकिन उम्मीदें बड़ी हैं। दुकानदारों को लगता है कि दीपावली पर लोग दिल खोलकर खरीदारी करेंगे। मगर ग्राहक भी अब समझदार हो गया है। वह बंदनवार देखकर घर की चौखट नापता है और कीमत सुनकर अपनी जेब की औकात।
अब तो लगता है कि आने वाले समय में दुकानदार शुभ-लाभ के साथ एक चेतावनी भी टांग देंगे—’सावधान! यहां शुभ भी महंगा है और लाभ भी आपकी जेब देखकर मिलेगा।’
वैसे लक्ष्मीजी से हमारी प्रार्थना है कि इस बार घर में भले ही सादा बंदनवार लगे, लेकिन महंगाई की बंदनवार जरूर उतार दीजिए। आखिर आम आदमी को भी कभी तो सच्चे शुभ-लाभ का अनुभव तो हो!
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
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