शरद पूर्णिमा की रात है। चाँद अपनी सोलह कलाओं के साथ आसमान में विराजमान है। धरती पर अमृत बरसने की मान्यता है और बाजार में धार्मिकता का पारा चढ़ा हुआ है। कहीं खीर चाँदनी में रखी जा रही है, तो कहीं भजन-कीर्तन के नाम पर लाउडस्पीकर चाँद से भी ऊँची आवाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। ऐसा लगता है कि चाँद को भी अपनी रोशनी फैलाने से पहले आयोजन समिति से अनुमति लेनी पड़ेगी!
भारतीय संस्कृति में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा की किरणों में अमृत बरसता है। अब विज्ञान इस अमृत की प्रयोगशाला में तलाश कर रहा है और श्रद्धालु उसे खीर के कटोरे में खोज रहे हैं। दोनों की अपनी-अपनी रिसर्च है। फर्क बस इतना है कि वैज्ञानिक प्रमाण माँगते हैं और श्रद्धालु प्रसाद!
शरद पूर्णिमा आते ही धार्मिक आयोजनों की बहार आ जाती है। मंदिरों में सजावट, भजन मंडलियों की तैयारी, प्रसाद की व्यवस्था और सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं की बौछार शुरू हो जाती है। कुछ लोग चाँद को निहारने से अधिक मोबाइल के कैमरे को निहारते हैं। चंद्रमा आसमान में चमक रहा होता है और भक्तों की नजर इस बात पर होती है कि फोटो में चाँद के साथ उनका चेहरा कितना चमक रहा है।
आजकल भक्ति भी डिजिटल हो गई है। पहले लोग भगवान के सामने हाथ जोड़ते थे, अब हाथ में मोबाइल जोड़ लेते हैं। पूजा पूरी हो या न हो, स्टेटस समय पर लगना चाहिए। चाँदनी में रखी खीर से पहले उसकी तस्वीर इंटरनेट पर पहुँच जाती है। कैप्शन भी ऐसा कि मानो अमृत की पूरी खेप उन्हीं के घर उतरी हो। उधर, धर्म के ठेकेदारों की अपनी चाँदनी है। त्योहार आते ही चंदा माँगने की परंपरा जाग उठती है। कोई पर्ची लेकर दरवाजे पर खड़ा है, तो कोई फोन करके याद दिला रहा है कि इस बार आयोजन पहले से भव्य होना चाहिए। श्रद्धा का हिसाब भले मन में रखा जाए, लेकिन चंदे का हिसाब रजिस्टर में बिल्कुल पक्का होना चाहिए। आखिर भक्ति में पारदर्शिता भी जरूरी है-कम से कम रसीद तक!
भजन-कीर्तन में भी प्रतिस्पर्धा कम नहीं है
एक मंडली ने माइक लगाया तो दूसरी ने उससे ऊँचा स्पीकर लगा दिया। पहली मंडली ने भजन शुरू किया, दूसरी ने जवाब में ढोल बजा दिया। अब भगवान किसकी सुन रहे हैं, यह तो वही जानें; लेकिन पड़ोसियों को दोनों की सुननी पड़ रही है। कुछ भक्तों की मान्यता है कि जितनी ऊँची आवाज, उतनी ऊँची भक्ति। उन्हें कौन समझाए कि भगवान बहरे नहीं हैं और पड़ोसियों के भी कान होते हैं!
सबसे दिलचस्प दृश्य तब दिखाई देता है, जब लोग चंद्रमा की पूजा करके घर लौटते हैं और रास्ते में किसी गरीब, बुजुर्ग या जरूरतमंद को देखकर नजरें फेर लेते हैं। चाँद की शीतलता का गुणगान करने वालों के व्यवहार में गर्मी बनी रहती है। खीर का कटोरा चाँदनी में रखने की चिंता है, लेकिन भूखे के कटोरे में दो चम्मच खीर डालने का समय नहीं है।
वैसे शरद पूर्णिमा का असली संदेश तो प्रेम, शांति, सद्भाव और मन की पवित्रता है। लेकिन हमने हर पर्व को दिखावे की प्रतियोगिता बना दिया है। पूजा कितनी भव्य हुई, सजावट कितनी महँगी थी, कितने लोग आए और कितनी तस्वीरें वायरल हुईं—इन सबका हिसाब रखा जाता है। बस यह हिसाब रखना भूल जाते हैं कि त्योहार मनाने के बाद हमारे भीतर कितनी इंसानियत बची।
काश! इस शरद पूर्णिमा में चाँदनी केवल छतों पर रखी खीर पर ही नहीं, हमारे विचारों पर भी पड़े। अमृत केवल कटोरों में नहीं, हमारी वाणी में भी उतरे। भक्ति केवल आरती की थाली में नहीं, हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे।
क्योंकि चाँदनी में खीर रखने से अमृत मिले या न मिले, लेकिन किसी भूखे को भोजन कराने से उसके चेहरे पर मुस्कान जरूर आ सकती है। चाँद की रोशनी उधार की होती है, मगर इंसानियत का उजाला अपना होता है!
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
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