रायपुर,एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को धर्मांतरण से जुड़े कानूनों पर 8 राज्यों को नोटिस जारी कर 4 हफ्ते में जवाब दाखिल करने को कहा है। कोर्ट छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल, उत्तराखंड, गुजरात, हरियाणा, झारखंड और कर्नाटक के कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था।
कोर्ट की टिप्पणी आने के बाद रायपुर पश्चिम के पूर्व विधायक विकास उपाध्याय ने कहा कि, बीजेपी की सरकार जब से केंद्र और राज्यों में आई है, धर्मांतरण को लेकर अलग मुहिम चला रही है। इस मुद्दे को सिर्फ चुनावी फायदा लेने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
धर्मांतरण को राजनीतिक टूल बनाकर इसका उपयोग हो रहा है। विकास ने कहा कि बीजेपी के लोग धर्म और जाति में बांटकर देश को कमजोर और बर्बाद करना चाहते हैं।

विकास उपाध्याय।
चुनाव नजदीक आते ही धर्मांतरण को मुद्दा बनाते है
विकास उपाध्याय ने कहा कि, जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, भाजपा की डबल इंजन सरकार धर्मांतरण को मुद्दा बना देती है। धर्मांतरण का कानून बनाकर आम नागरिकों के मौलिक अधिकार को छिनना चाहती है। हमारे देश में सभी धर्मों को साथ लेकर चलने की परंपरा रही है। लेकिन भाजपा जाति और धर्म में लोगों को बांटकर राजनीति करती है। मैं समझता हूं भाजपा को ऐसा नहीं करना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच के सामने याचिकाकर्ताओं ने कहा कि, भले ही इन कानूनों को फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट कहा जाता है, लेकिन ये अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर रोक लगाते हैं और इंटर रिलिजन मैरिज व धार्मिक रीति-रिवाजों को निशाना बनाते हैं।
कोर्ट ने वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह, संजय हेगड़े, एम.आर. शमशाद, संजय पारिख समेत अन्य पक्षकारों की दलीलें भी सुनीं और कहा कि मामले की अगली सुनवाई छह हफ्ते बाद होगी।
याचिकाकर्ता बोले- UP में धर्मांतरण को सख्त किया गया
सीनियर एडवोकेट चंदर उदय सिंह ने दलील दी कि UP में 2024 में धर्मांतरण से संबंधित कानून संशोधित कर सजा 20 साल से लेकर आजीवन कारावास तक कर दी गई है। जमानत की शर्तें भी कठोर कर दी गईं और तीसरे पक्ष को शिकायत दर्ज करने का अधिकार दे दिया गया।
उन्होंने कहा कि इससे चर्च की प्रार्थनाओं या इंटरफेथ मैरिज में शामिल लोगों को भी भीड़ और संगठनों की ओर से उत्पीड़न झेलना पड़ रहा है।
कोर्ट ने 2020 में नोटिस जारी किया था
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में नोटिस जारी किया था। बाद में जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने कोर्ट से मांग की कि 6 हाईकोर्ट में चल रही 21 याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में ही लाया जाए। फिलहाल गुजरात और मध्य प्रदेश में इन कानूनों की कुछ धाराओं पर रोक लगी हुई है।
