चाँदनी रात में बिखरती भक्ति की दिव्यता
ये शरद की उजली रात है, और चाँदनी का नूर,
प्रकृति के कण-कण में छाया भक्ति का सुरूर।
नील गगन में चाँद दमके, तारे यहाँ करते श्रृंगार,
अमृत बरसाएँ चाँदनी, करती मन को पारावार।
आज चाँदनी में नहाई धरती, शीतल मंद बयार,
यूं भक्ति-भाव से ‘गूँज’ उठे मंदिर और घर-द्वार।
ये राधा-कृष्ण की रासलीला, प्रेम सुधा बरसाए,
मुरली की मधुरिम तान हृदय में रस घोल जाए।
वृंदावन की कुंज गलियों में प्रेम का हैं मधुमास,
कृष्ण के संग है राधा-रानी, भक्ति का उल्लास।
गोपियों के नृत्य में झलकता आत्मा का संगीत,
प्रेम जहाँ पूजा बन जाए, जीवन हो पावन-प्रीत।
देखों माँ लक्ष्मी के आगमन की मंगल बेला आई,
धन-धान्य एवं सुख-समृद्धि की शुभ आशा लाई।
व्रत, पूजन और दीप जलाकर करें प्रभु का ध्यान,
मन के भीतर ज्योति जले, मिट ही जाए अज्ञान।
हाँ,खीर की कटोरी चाँद तले श्रद्धा से सज जाए,
हरेक परिवार के आँगन में खुशियों की धुन गाए।
प्रेम, दया और सत्य का दीप हृदय में ऐसे जलाएँ,
दीन-दुखियों के जीवन में आशा के फूल खिलाएँ।
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
मो. 98260 25986

