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सुरेंद्र दुबे का अंतिम संस्कार, कुमार विश्वास शामिल हुए:कहा- छत्तीसगढ़ की बात दमदारी से रखते थे, इनका जाना प्रदेश के लिए बड़ी क्षति

रायपुर,एजेंसी।अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हंसी की बारीक परतों में गंभीर बातें कहने वाले पद्मश्री हास्य कवि डॉ. सुरेन्द्र दुबे अब हमारे बीच नहीं हैं। गुरुवार को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। मारवाड़ी श्मशान घाट पर आज उनका अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें कुमार विश्वास भी शामिल हुए। उन्होंने कहा कि सुरेंद्र दुबे का जाना प्रदेश की बड़ी क्षति है, वे छत्तीसगढ़ की बात दमदारी से रखते थे।

बता दें कि शब्दों के इस जादूगर के लिए एक ‘अभिनंदन ग्रंथ’ तैयार किया जा रहा था। जिसमें उनके जीवन, लेखनी, संघर्ष और स्मृतियों को सहेजने की कोशिश की जा रही थी। प्रकाशक सुधीर शर्मा ने बताया कि पिछले चार महीनों से इस ग्रंथ पर काम चल रहा था, जिसमें उनके पिता गर्जन सिंह दुबे, पुत्र डॉ. अभिषेक दुबे और खुद सुरेन्द्र दुबे की दुर्लभ रचनाएं, तस्वीरें और पत्र शामिल थे।

लेकिन किताब पूरी होने से पहले ही शब्दों का ये जादूगर इस दुनिया को अलविदा कह गया। अगले महीने किताब का विमोचन होना था।

अंतिम संस्कार और उनसे जुड़ी तस्वीरें

मारवाड़ी श्मशान घाट पर हास्य कवि सुरेंद्र दुबे का अंतिम संस्कार किया गया।

सुरेंद्र दुबे के अंतिम संस्कार में कवि कुमार विश्वास भी शामिल हुए।

सुरेंद्र दुबे की शवयात्रा में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।

निवास स्थल से मारवाड़ी श्मशान घाट तक उनकी अंतिम यात्रा निकली।

सुरेंद्र दुबे के निवास पर डिप्टी सीएम विजय शर्मा पहुंचे थे।

स्पीकर रमन सिंह के साथ सांसद संतोष पांडेय भी दुबे के निवास पहुंचकर परिजनों से मुलाकात की।

हास्य कवि सुरेंद्र दुबे की रायपुर में लास्ट परफॉर्मेंस, तस्वीर 22 जून की है।

ये किताब का कवर पेज है।

ये किताब का कवर पेज है।

बहुत कर लिया… अब ज़्यादा कुछ नहीं करना” – मीर अली मीर की यादों में सुरेन्द्र दुबे

कवि मीर अली मीर ने दैनिक भास्कर से बातचीत में उस आखिरी मुलाकात को याद किया, जो चार दिन पहले रायपुर के एक काव्यकुंभ कार्यक्रम में हुई थी। उन्होंने बताया –

“हम दोनों बैठे थे, अचानक सुरेन्द्र भाई ने मुझसे पूछा – ‘आपकी उम्र क्या है?’ मैंने जब बताया, तो मुस्कुराते हुए बोले – ‘अरे, आप तो मुझसे पांच महीने बड़े हैं… यानी आप ज़्यादा सम्मानीय हुए। अब उम्र के हिसाब से बात करनी होगी।’”

इसके बाद दोनों ने बिना शक्कर की चाय पी। बातचीत हल्की-फुल्की थी, लेकिन मीर बताते हैं कि उस दिन सुरेन्द्र दुबे कुछ अलग ही मन:स्थिति में थे।

“वे कहने लगे – ‘मैं अब ज्यादा कार्यक्रम नहीं लेता… इसलिए अब रेट ज़्यादा बताता हूं, ताकि आयोजक सोच लें। बहुत कर लिया ज़िंदगी में… अब ज्या कुछ नहीं करना।’ ये बात उन्होंने बड़े ठहराव के साथ कही। और मुझे यह बदलाव उनके भीतर नया लगा।”

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