इस्लामाबाद/तेहरान,एजेंसी। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका के बीच ठप पड़ी वार्ता को दोबारा शुरू कराने के लिए पाकिस्तान ने अपनी कूटनीतिक गतिविधियां तेज कर दी हैं। पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी की तेहरान यात्रा और विदेश मंत्री इशाक डार की कतर के शीर्ष नेतृत्व से बातचीत को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मोहसिन नकवी ने तेहरान में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन समेत कई वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच अमेरिका-ईरान वार्ता को फिर से शुरू करने और क्षेत्रीय तनाव कम करने पर चर्चा हुई।
‘डॉन’ अखबार ने राजनयिक सूत्रों के हवाले से दावा किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के नए प्रस्तावों को खारिज किए जाने के बाद पाकिस्तान ने कूटनीतिक प्रयास और तेज कर दिए हैं। इस्लामाबाद की कोशिश है कि वार्ता पूरी तरह विफल न हो और दोनों पक्ष फिर से बातचीत की मेज पर लौटें। इसी बीच पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कतर के राज्य मंत्री मोहम्मद बिन अब्दुलअजीज अल-खुलैफी से फोन पर बातचीत की। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय हालात, पश्चिम एशिया संकट और शांति बहाली के प्रयासों पर चर्चा की।बयान में कहा गया कि दोनों देशों ने क्षेत्रीय चुनौतियों के समाधान के लिए “संवाद और कूटनीतिक भागीदारी” की अहमियत पर जोर दिया। इशाक डार ने कहा कि पाकिस्तान क्षेत्र और दुनिया में “शांति, स्थिरता और समृद्धि” के साझा उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी से फोन पर बातचीत की। दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया की स्थिति और ईरान-अमेरिका तनाव पर विचार-विमर्श किया। गौरतलब है कि अप्रैल में पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच पहली वार्ता इस्लामाबाद में हुई थी। हालांकि बातचीत किसी समझौते तक नहीं पहुंच सकी। इसके बाद दोनों देशों के बीच प्रस्ताव और जवाबी प्रस्तावों का दौर जारी है।विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य संकट, तेल आपूर्ति में रुकावट और क्षेत्रीय अस्थिरता को देखते हुए पाकिस्तान खुद को एक अहम मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
तेल अवीव, एजेंसी। इजराइल में अगला प्रधानमंत्री कौन होगा इसका ऐलान राष्ट्रपति इसाक हर्जोग रविवार को करेंगे। सरकार बनाने के लिए 61 सासंदों का समर्थन चाहिए। गादी आइजनकोट के गठबंधन को 6 पार्टियों के 67 सांसदों ने समर्थन दिया है।
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पास मात्र 46 सांसदों का समर्थन है। इस कारण माना जा रहा है कि राष्ट्रपति उन्हें सरकार बनाने का पहला मौका नहीं देंगे।
इजराइल में अब तक किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है। यही वजह है कि यहां हमेशा गठबंधन की सरकारें बनती रही हैं।
राष्ट्रपति बोले- सांसद साथ हैं, लेकिन पार्टियां राजी नहीं
राष्ट्रपति हर्जोग ने गुरुवार को संसद में चुनी गई सभी पार्टियों के नेताओं से बातचीत की थी। उन्होंने कहा था कि पहली नजर में सांसदों की राय साफ दिखाई देती है, लेकिन अलग-अलग राजनीतिक गुटों के बीच कई मुद्दों पर सहमति नहीं है।
उनके मुताबिक पार्टियों के बीच एक-दूसरे को लेकर आपत्तियां भी हैं। इसलिए सिर्फ सांसदों की सिफारिश के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कौन सरकार बना पाएगा।
राष्ट्रपति ने कहा कि वह कुछ पार्टी नेताओं से अलग से बातचीत करेंगे, ताकि सरकार बनाने की संभावनाएं साफ हो सकें।
इजराइल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने गुरुवार को संसद में चुनी गई सभी पार्टियों के नेताओं से बातचीत की थी। (फाइल फोटो)
छह पार्टियों ने आइजनकोट का नाम सुझाया, लेकिन साथ आने को तैयार नहीं
आइजनकोट को छह पार्टियों के 67 सांसदों का समर्थन मिला है। इनमें चार यहूदी पार्टियां और दो अरब पार्टियां शामिल हैं। चार यहूदी पार्टियों के पास कुल 48 सीटें हैं, जबकि दो अरब पार्टियों के पास 19 सीटें हैं।
सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि इन छह पार्टियों में से तीन यहूदी पार्टियां अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने को तैयार नहीं हैं। आइजनकोट ने भी चुनाव से पहले अरब पार्टियों को सरकार में शामिल करने से इनकार किया था। दूसरी ओर, अरब पार्टियों का कहना है कि वे नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए आइजनकोट का समर्थन कर रही हैं।
यानी राष्ट्रपति के सामने आइजनकोट के पक्ष में 67 सांसदों की सिफारिशें हैं, लेकिन यह संख्या अपने आप में गठबंधन सरकार बनने की गारंटी नहीं है।
आइजनकोट ने पहले अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने से इनकार किया था।
जॉइंट लिस्ट गठबंधन को जानिए
यह इजराइल की अरब आबादी के अधिकारों की बात करने वाला राजनीतिक गठबंधन है। इसमें तीन अलग-अलग पार्टियां शामिल हैं। गठबंधन में अरब नेताओं के साथ यहूदी नेता भी हैं।
हदाश: वामपंथी पार्टी है। अरब और यहूदी नागरिकों की समानता, मजदूरों के अधिकारों और फिलिस्तीन के साथ शांति की वकालत करती है।
ताल: अहमद तिबी की पार्टी है। अरब नागरिकों के समान अधिकार, शिक्षा और रोजगार के बेहतर अवसरों और फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना का समर्थन करती है।
बलद: अरब राष्ट्रवादी विचारधारा वाली धर्मनिरपेक्ष पार्टी है। इजराइल को ऐसा देश बनाने की वकालत करती है, जहां सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलें।
राष्ट्रपति की बैठक में किसने किसका समर्थन किया?
आइजनकोट के समर्थन में
यिस्राइल बेतेनु: अविग्दोर लिबरमैन की पार्टी ने आइजनकोट को समर्थन दिया है। इसके पास 7 सीटें हैं।
राअम: मंसूर अब्बास की अरब पार्टी के 8 सांसदों ने आइजनकोट को सरकार बनाने का मौका देने की सिफारिश की।
जॉइंट लिस्ट: 11 सांसदों वाले इस अरब गठबंधन ने भी आइजनकोट का समर्थन किया।
याशर और डेमोक्रेट्स: आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे की इन पार्टियों ने भी उनका नाम सुझाया। इसके अलावा नफ्ताली बेनेट के नेतृत्व वाली बियाचाद पार्टी ने भी उनका समर्थन किया।
नेतन्याहू के समर्थन में
लिकुड: बेंजामिन नेतन्याहू की अपनी पार्टी के सांसदों ने उन्हें दोबारा सरकार बनाने का मौका देने की सिफारिश की।
शास: आर्ये डेरी के नेतृत्व वाली इस पार्टी ने भी नेतन्याहू का समर्थन किया।
रिलिजियस जायनिज्म: बेजालेल स्मोट्रिच की पार्टी के सांसदों ने नेतन्याहू के पक्ष में सिफारिश की।
ओत्जमा येहुदित: इतमार बेन ग्विर की पार्टी ने भी नेतन्याहू को समर्थन दिया।
यूनाइटेड तोराह जूडिज्म: इस पार्टी के सांसदों ने भी नेतन्याहू के नेतृत्व में सरकार बनाने का समर्थन किया।
किसी का समर्थन नहीं किया:
यूनाइटेड तोरा जूडिज्म (UTJ): किसी भी नेता के नाम की सिफारिश नहीं की। इसके पास 7 सीटें हैं। यह पार्टी लंबे समय से नेतन्याहू की सहयोगी रही है, लेकिन इस बार उसने उनसे दूरी बना ली।
42 दिन में बनानी होगी सरकार, 10 नवंबर को संसद की बैठक
इजराइल में राष्ट्रपति का पद आमतौर पर औपचारिक माना जाता है, लेकिन चुनाव के बाद सरकार गठन में उनकी अहम भूमिका होती है। राष्ट्रपति उस नेता को सरकार बनाने का न्योता देते हैं, जिसके पास संसद में बहुमत जुटाने की सबसे अच्छी संभावना हो। इसके लिए वे सबसे ज्यादा सिफारिशें पाने वाले नेता को चुनने के लिए बाध्य नहीं हैं।
सरकार बनाने का मौका मिलने पर नेता को 28 दिन का समय दिया जाता है। अगर इस दौरान सरकार नहीं बन पाती, तो राष्ट्रपति 14 दिन का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। यानी कुल 42 दिन में सरकार बनाने की कोशिश पूरी करनी होती है।
इजराइल की नई संसद की पहली बैठक 10 नवंबर को होने की उम्मीद है। अगर आइजनकोट या नेतन्याहू तय समय में सरकार नहीं बना पाते, तो राष्ट्रपति किसी दूसरे नेता को मौका दे सकते हैं। सभी कोशिशें नाकाम होने पर नए चुनाव का रास्ता खुल सकता है।
इजराइल की संसद नेसेट।
चुनाव में नेतन्याहू के गठबंधन को ज्याद सीट मिली थी
27 अक्टूबर को हुए चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। हालांकि, उसके साथ गठबंधन में शामिल धार्मिक और राष्ट्रवादी पार्टियों को मिलाकर कुल 53 सीटें ही मिलीं।
वहीं, आइजनकोट के गठबंधन में शामिल चार पार्टियों ने 48 सीटें जीतीं। यह गठबंधन केंद्र से लेकर वामपंथ और दक्षिणपंथ तक की पार्टियों को मिलाकर बना है। चुनाव में अरब पार्टियों को रिकॉर्ड 19 सीटें मिलीं।
बीजिंग, एजेंसी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प और रूसी राष्ट्रपति पुतिन चीन में एक साथ बैठक करना चाहते हैं। पुतिन ने 19 अक्टूबर को इसका प्रस्ताव रखा। उसी दिन ट्रम्प ने बैठक में शामिल होने की रजामंदी भी दे दी। दोनों ने इस बातचीत में जिनपिंग को शामिल करने का प्रस्ताव रखा है।
यह बैठक 18-19 नवंबर को चीन के शेनझेन शहर में होने वाले APEC समिट के दौरान हो सकती है। हालांकि, चीन ने अभी तक इस पर सहमति नहीं दी है, लेकिन प्रस्ताव को खारिज भी नहीं किया है। फिलहाल तीनों देशों के बीच इस बैठक को लेकर बातचीत चल रही है।
जिनपिंग की हिचकिचाहट की एक बड़ी वजह यूक्रेन युद्ध है। उनके सामने मुश्किल यह है कि वह एक तरफ रूस के साथ अपने रिश्ते खराब नहीं करना चाहते। दूसरी तरफ यूरोप के साथ अपने आर्थिक संबंधों को भी नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते। यही वजह है कि तीनों की मुलाकात पर अब भी सस्पेंस बना हुआ है।
ट्रम्प-पुतिन और जिनपिंग आखिरी बार 11 नवंबर 2017 को वियतनाम के दा नांग में हुए APEC सम्मेलन में एक साथ नजर आए थे।
80 साल पहले तीन देशों ने मिलकर तय किया चीन का भविष्य
ट्रम्प-पुतिन और जिनपिंग के बीच बैठक से चीन खुद को अमेरिका के बराबर एक बड़ी वैश्विक ताकत के रूप में पेश कर सकता है। लेकिन उसे यह भी डर है कि कहीं यह बैठक 1945 के याल्टा समझौते जैसी स्थिति न पैदा कर दे, जिसकी चीन लंबे समय से आलोचना करता रहा है।
फरवरी 1945 में दूसरे विश्वयुद्ध के आखिरी दौर में अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन के नेता क्रीमिया के याल्टा में मिले थे। इन नेताओं ने बैठक में तय किया कि युद्ध खत्म होने के बाद यूरोप के देशों का बंटवारा और शासन कैसे होगा। उस समय चीन भी जापान के खिलाफ युद्ध लड़ रहा था, लेकिन उसे इस बैठक में शामिल नहीं किया गया।
दरअसल इसमें तीनों देशों ने एक गुप्त समझौता भी किया था। इसके तहत सोवियत संघ को चीन में कुछ खास अधिकार दिए गए। जैसे- रूस मंगोलिया में सैना तैनात रखेगा और मंचूरिया में रेलवे और बंदरगाहों के इस्तेमाल करेगा।
चीन इस समझौते से नाराज था। उसका मानना था कि उसकी गैरमौजूदगी में उसके इलाके और अधिकारों को लेकर फैसला करके उसकी पीठ में छुरा घोंपा गया।
बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट, सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन और ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल शामिल हुए थे।
80 साल बाद फिर तीन महाशक्तियां एक साथ बैठेंगी
80 साल बाद इतिहास खुद को दोहराता हुआ नजर आ रहा है। तब तीन बड़ी ताकतों ने एक मेज पर बैठकर यूरोप का भविष्य तय किया था। अब रूस एक बार फिर अपने राष्ट्रपति को अमेरिका और चीन के नेताओं को एक साथ बैठाना चाहता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार चर्चा का केंद्र यूक्रेन युद्ध हो सकता है।
रूस चाहता है कि ट्रम्प, पुतिन और जिनपिंग एक साथ बैठकर युद्ध खत्म करने के रास्तों पर बात करें। इस प्रस्ताव के साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ा है। जिस यूक्रेन की जमीन पर यह युद्ध लड़ा जा रहा है, वह खुद इस बैठक में शामिल नहीं होगा।
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पहले ही इस तरह की किसी बैठक पर आपत्ति जता चुके हैं। उनका कहना है कि यूक्रेन के भविष्य का फैसला उसकी गैरमौजूदगी में नहीं किया जा सकता। यानी दुनिया की तीन बड़ी ताकतें अगर यूक्रेन युद्ध पर कोई समझौता करती हैं, तो उसे यूक्रेन कैसे स्वीकार करेगा?
रूस, अमेरिका और चीन को बैठक से क्या मिलेगारूस- अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी वापसी चाहते हैं पुतिन
पुतिन को अमेरिका और चीन के राष्ट्रपतियों के साथ एक ही मंच पर बैठने का मौका मिलेगा। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस से दूरी बना रखी है। ऐसे में ट्रम्प और जिनपिंग के साथ बैठक पुतिन को यह दिखाने का मौका देगी कि रूस को दुनिया की बड़ी ताकतों की राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता।
अमेरिका- रूस से बातचीत का रास्ता खोलना
इस बैठक का फायदा रूस के साथ सीधे बातचीत करने और यूक्रेन युद्ध को खत्म करने की कोशिशों को आगे बढ़ाने में हो सकता है। ट्रम्प खुद को ऐसे नेता के रूप में पेश करते रहे हैं, जो बड़े अंतरराष्ट्रीय विवादों को बातचीत से सुलझा सकते हैं।
चीन- वैश्विक राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाना
शी जिनपिंग को दुनिया के दो बड़े देशों अमेरिका और रूस के नेताओं की मेजबानी करने का मौका मिलेगा। इससे चीन खुद को अंतरराष्ट्रीय विवादों में बातचीत कराने वाली एक बड़ी ताकत के रूप में पेश कर सकता है।
चीन पर दोस्ती और व्यापार, दोनों बचाने की चुनौती
जिनपिंग के लिए यह मामला आसान नहीं है। चीन ने अब तक यूक्रेन युद्ध में खुद को शांति का समर्थक बताया है। उसका कहना रहा है कि युद्ध खत्म करने के लिए रूस और यूक्रेन, दोनों को बातचीत में शामिल होना चाहिए।
अगर जिनपिंग अपने देश में ऐसी बैठक की मेजबानी करते हैं, जिसमें रूस और अमेरिका यूक्रेन के भविष्य पर चर्चा करें, लेकिन यूक्रेन खुद वहां मौजूद न हो, तो चीन की इस पुरानी नीति पर सवाल उठेंगे।
चीन का यूरोप से रिश्ते पर भी असर पड़ सकता है। यूक्रेन को सैन्य और आर्थिक मदद देने वाले कई यूरोपीय देश नहीं चाहते कि उनके महाद्वीप में चल रहे युद्ध का फैसला अमेरिका, रूस और चीन मिलकर करें।
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इसी साल मई में बीजिंग में रूस के राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात की थी।
बैठक हुई तो जिनपिंग अपना तरीका चुन सकते हैं
एक्सपर्ट्स का मानना है कि जिनपिंग के पास बैठक को पूरी तरह खारिज करने के बजाय उसका स्वरूप बदलने का विकल्प भी है। वे ट्रम्प और पुतिन से अलग-अलग मुलाकात कर सकते हैं या तीनों नेताओं की अनौपचारिक बातचीत करा सकते हैं।
ऐसी बैठक में यूक्रेन युद्ध पर किसी बड़े समझौते का दावा करने के बजाय वैश्विक अर्थव्यवस्था और अमेरिका-रूस-चीन के संबंधों जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है।
इससे जिनपिंग को दोनों नेताओं से बातचीत करने का मौका मिलेगा, लेकिन यूक्रेन के भविष्य पर फैसला कराने की जिम्मेदारी लेने से बच सकेंगे।
लास वेगास, एजेंसी। ओरेकल इंडिया के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और जापान एवं एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कंपनी की क्लाउड सेवा नेटसुइट के क्षेत्रीय प्रबंध निदेशक शैलेन्द्र कुमार ने कहा कि भारतीय कंपनियां कृत्रिम मेधा (ए.आई.) के प्रायोगिक इस्तेमाल से आगे बढ़कर अब इसे बड़े स्तर पर अपना रही हैं। उन्होंने कहा कि कंपनियों को इसके वास्तविक लाभ भी मिल रहे हैं। हालांकि, लागत, कुशल कर्मचारियों की उपलब्धता और बुनियादी ढांचे से जुड़ी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं।
कुमार ने ‘ओरेकल ए.आई. वर्ल्ड 2026’ से इतर कहा, ”करीब डेढ़ साल पहले तक हम ए.आई. के प्रायोगिक इस्तेमाल की बात कर रहे थे। अब हम इसे बड़े स्तर पर लागू होते देख रहे हैं और इसके वास्तविक लाभ भी सामने आ रहे हैं।” उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियां नई प्रौद्योगिकी को अपनाने से हिचकिचाती नहीं हैं लेकिन वे पहले यह जानना चाहती हैं कि इससे उन्हें वास्तव में क्या फायदा होगा।
कुमार ने कहा, ”कंपनियां यह देखना चाहती हैं कि ए.आई. से उनका समय बचेगा, लागत कम होगी या कोई अन्य लाभ मिलेगा। कुछ साल पहले सुरक्षा और कामकाज के प्रदर्शन को लेकर काफी आशंकाएं थीं, क्योंकि लोगों को इन पहलुओं पर भरोसा नहीं था।” उन्होंने कहा कि जब कंपनियों को ए.आई. के ठोस लाभ दिखाई देने लगते हैं, तो वे इसे तेजी से अपनाती हैं।
भारत में ए.आई. के इस्तेमाल की रफ्तार धीमी करने वाली चुनौतियों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि लागत निश्चित रूप से उनमें से एक है। कुशल कर्मचारियों की उपलब्धता के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि ओरेकल विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और राज्य सरकारों के साथ मिलकर विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देने का काम कर रही है। इसमें औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आई.टी.आई.) और पॉलिटेक्निक संस्थानों के विद्यार्थी भी शामिल हैं। उन्होंने बुनियादी ढांचे को भी एक चुनौती बताया लेकिन कहा कि देश में नए डेटा सेंटर स्थापित होने से इस समस्या का समाधान किया जा रहा है।
कुमार ने कहा, ”लोग ए.आई. को अपनाने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उन्हें इससे होने वाला लाभ दिखाई दे।” ए.आई. और मनुष्यों के बीच निर्णय लेने की जिम्मेदारी के बंटवारे के बारे में पूछे जाने पर कुमार ने कहा कि ए.आई. के मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसके इस्तेमाल की निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि संगठनों में ऐसे लोगों का होना जरूरी है, जो यह आकलन कर सकें कि ए.आई. सही नतीजे दे रहा है या नहीं और उसका इस्तेमाल तय उद्देश्य के अनुरूप हो रहा है या नहीं।
कुमार ने कहा कि कंपनियों की अपनी निगरानी व्यवस्था के अलावा ए.आई. के इस्तेमाल से जुड़े नियमों में भी समय के साथ बदलाव होंगे। उन्होंने कहा, ”नियमन के क्षेत्र में बदलाव होंगे। जैसे-जैसे यह उद्योग परिपक्व होगा, नियमों और व्यवस्थाओं का भी विकास होगा।” कुमार ने बताया कि ओरेकल भारत में 33 वर्षों से काम कर रही है और देश के 15 से अधिक शहरों में उसकी मौजूदगी है। कंपनी पिछले करीब 10 वर्षों से भारत में दो अंकों की वृद्धि दर्ज कर रही है।