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विदेश

रूसी संसदीय चुनाव में पुतिन समर्थक पार्टी जीती:यूक्रेन जंग के बाद पहला चुनाव, रूसी राष्ट्रपति के लिए बहुमत क्यों जरूरी

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मॉस्को, एजेंसी। रूस के संसदीय चुनाव में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की समर्थक यूनाइटेड रशिया पार्टी ने जीत हासिल कर ली है। शुरुआती नतीजों में पार्टी ने 57.5% वोट के साथ अजेय बढ़त बना ली है। चुनाव के आधिकारिक नतीजे अभी आने बाकी हैं।

यह फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद पहला संसदीय चुनाव है। पुतिन ने चुनाव को यूक्रेन में लड़ रहे रूसी सैनिकों के समर्थन से जोड़कर पेश किया था।

2021 के पिछले संसदीय चुनाव में यूनाइटेड रशिया ने स्टेट ड्यूमा की 450 में से 324 सीटें जीती थीं।

स्टेट ड्यूमा रूस की संसद का निचला सदन है। इसमें कुल 450 सीटें हैं। इनमें 225 सीटें पार्टी को मिले वोट के आधार पर और 225 सीटें अलग-अलग क्षेत्रों में सीधे चुनाव से तय होती हैं।

तस्वीर रूस की संसद के निचले सदन स्टेट ड्यूमा की है।

तस्वीर रूस की संसद के निचले सदन स्टेट ड्यूमा की है।

यूक्रेन युद्ध का विरोध करने वाली पार्टी चुनाव से बाहर

रूस की युद्ध-विरोधी पार्टी याब्लोको को इस बार पार्टी के नाम पर चुनाव लड़ने से रोक दिया गया। हालांकि, पार्टी के कुछ नेताओं को अलग-अलग सीटों से चुनाव लड़ने की अनुमति मिली।

इसके अलावा कई सरकार विरोधी नेताओं और उम्मीदवारों को भी चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिला। रूस में इस चुनाव में 56.66% लोगों ने वोट डाला। मॉस्को में मतदान रिकॉर्ड स्तर पर रहा।

पुतिन ने सैनिकों के नाम पर वोट मांगा

चुनाव से पहले राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने लोगों से यूक्रेन में लड़ रहे रूसी सैनिकों के समर्थन में वोट करने की अपील की। उन्होंने कहा कि लोगों का वोट सैनिकों के समर्थन को दिखाएगा।

पुतिन यूनाइटेड रशिया पार्टी के सदस्य नहीं

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूनाइटेड रशिया पार्टी के सदस्य नहीं हैं। हालांकि, वे 2008 से 2012 तक पार्टी के चेयरमैन रह चुके हैं। उस समय भी वे पार्टी के औपचारिक सदस्य नहीं थे।

यूनाइटेड रशिया के नियमों के मुताबिक, पार्टी का चेयरमैन होना जरूरी नहीं कि उसकी सदस्यता से जुड़ा हो। इसलिए पुतिन पार्टी के सदस्य बने बिना भी इसके चेयरमैन रहे।

2012 में पुतिन ने पार्टी चेयरमैन का पद छोड़ दिया। इसके बाद दिमित्री मेदवेदेव को पार्टी का चेयरमैन बनाया गया।

पुतिन ने खुद सार्वजनिक तौर पर यह स्पष्ट नहीं किया है कि उन्होंने यूनाइटेड रशिया की सदस्यता क्यों नहीं ली। इसलिए इसके पीछे किसी खास राजनीतिक रणनीति को वजह बताना सही नहीं होगा।

चुनाव के आखिरी दिन मॉस्को पर यूक्रेन का ड्रोन हमला

रूस में संसदीय चुनाव के आखिरी दिन रविवार को यूक्रेन ने मॉस्को और आसपास के इलाकों में 1,600 से ज्यादा ड्रोन भेजे। रूसी अधिकारियों के मुताबिक, इनमें करीब 450 ड्रोन मॉस्को की तरफ बढ़ रहे थे। हमले में कम से कम 2 लोगों की मौत हुई। इनमें एक 44 साल की महिला और एक बुजुर्ग व्यक्ति शामिल हैं।

मॉस्को के मेयर सर्गेई सोबयानिन के मुताबिक, हमले में राजधानी की एक बड़ी ऑयल रिफाइनरी को भी नुकसान पहुंचा है। रिफाइनरी में किसी के हताहत होने की जानकारी नहीं है।

एक ड्रोन 21 मंजिला अपार्टमेंट से टकरा गया, जिससे इमारत में आग लग गई। इसके बाद करीब 400 लोगों को बाहर निकाला गया। इनमें 70 बच्चे भी शामिल थे

मॉस्को की ऑयल रिफाइनरी में लगी आग से उठता धुआं। रूसी अधिकारियों के मुताबिक, रविवार को यूक्रेन के बड़े ड्रोन हमले में रिफाइनरी को नुकसान पहुंचा।

मॉस्को की ऑयल रिफाइनरी में लगी आग से उठता धुआं। रूसी अधिकारियों के मुताबिक, रविवार को यूक्रेन के बड़े ड्रोन हमले में रिफाइनरी को नुकसान पहुंचा।

मॉस्को की ऑयल रिफाइनरी में लगी आग से उठता धुआं। रूसी अधिकारियों के मुताबिक, रविवार को यूक्रेन के बड़े ड्रोन हमले में रिफाइनरी को नुकसान पहुंचा।

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देश

भारतवंशी नवनीतम पिल्लै को शांति का नोबेल:दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की लड़ाई में मंडेला की मदद की, छठवीं बार किसी भारतवंशी को नोबेल पुरस्कार

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ओस्लो, एजेंसी। नॉर्वे की नोबेल समिति ने 2026 का शांति पुरस्कार भारतवंशी नवनीतम नवी पिल्लै को देने का ऐलान किया है। दक्षिण अफ्रीका में जन्मीं पिल्लै ने रंगभेद के खिलाफ लड़ने वाले नेल्सन मंडेला समेत कई लोगों की मदद की थी।

पिल्लै को युद्ध अपराध और नरसंहार के दोषियों को सजा दिलाने और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने के प्रयासों के लिए यह सम्मान दिया गया है।

नोबेल समिति ने कहा कि दुनिया में युद्ध और संघर्ष बढ़ रहे हैं। ऐसे में शांति बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करना और उसे मजबूत करना बेहद जरूरी है।

पिल्लै नोबेल पुरस्कार हासिल करने वाली छठवीं भारतीय हैं। उन्हें दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा।

नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद पिल्लै का रिएक्शन…

नोबेल प्राइज मिलने के बाद पिल्लै ने कहा-

हम नूर्नबर्ग की अदालत में हैं। मुझे नहीं लगता कि उनके नोबेल पुरस्कार के लिए इससे ज्यादा मजबूत प्रतीक कोई और हो सकता है।

नूर्नबर्ग की अदालत जर्मनी के नूर्नबर्ग शहर में हुई उन ऐतिहासिक सुनवाइयों से जुड़ी है, जिनमें दूसरे विश्व युद्ध के बाद नाजी जर्मनी के बड़े नेताओं पर युद्ध अपराधों के मुकदमे चलाए गए थे।

1945-46 में यहां अंतरराष्ट्रीय सैन्य न्यायाधिकरण ने नाजी नेताओं पर युद्ध छेड़ने, युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए मुकदमा चलाया था।

नोबेल समिति के चीफ ने कहा- नॉर्वे से फोन आए तो उठा लीजिएगा

आम तौर पर नोबेल पुरस्कार समिति घोषणा से पहले विजेता को फोन पर सूचना दे देती है। लेकिन इस बार नोबेल समिति की पिल्लै से बात नहीं हो पाई थी।

पुरस्कार के ऐलान के बाद समिति के अध्यक्ष योर्गेन वाट्ने फ्राइडनेस ने कहा,

नॉर्वे का अंतरराष्ट्रीय फोन कोड +47 है। मैं उनसे यही कहूंगा कि अगर नॉर्वे के नंबर से फोन आए, तो कृपया उठा लीजिएगा।

फ्राइडनेस ने कहा कि इस साल के पुरस्कार के जरिए समिति दुनिया को याद दिलाना चाहती है कि देश हो या दुनिया कानून का पालन करना जरूरी है। इसी से व्यवस्था चलती है और विवादों को बिना हिंसा के सुलझाया जा सकता है।

पिल्लै अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में भी जज रहीं। 2008 से 2014 तक उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में काम किया।

पिल्लै अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में भी जज रहीं। 2008 से 2014 तक उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में काम किया।

दादा मजदूर बनकर दक्षिण अफ्रीका गए

नवनीतम नवी पिल्लै का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था। उनका परिवार भारतीय तमिल मूल का है। उनके दादा 1890 के दशक में भारत से बंधुआ मजदूर बनकर दक्षिण अफ्रीका गए थे। वहां वे गन्ने के खेतों में काम करते थे।

एक हादसे में उनके दोनों हाथ चले गए। परिवार की आर्थिक हालत खराब होने के कारण उनके बेटे नारायणसामी नायडू को महज 8 साल की उम्र में स्कूल छोड़कर काम करना पड़ा।

किसी भी फर्म ने नौकरी नहीं दी तो खुद की फर्म खोली

नारायणसामी बस चलाकर परिवार का गुजारा करते थे। उनकी पत्नी संथमा घर संभालती थीं। इसी दौरान 1941 में नवी पिल्लै का जन्म हुआ। वह आठ बच्चों वाले परिवार में पांचवें नंबर पर थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन मुश्किलों के बावजूद उनके माता-पिता ने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने की कोशिश की।

पिल्लै ने दक्षिण अफ्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ नेटाल से 1963 में ग्रेजुएशन और 1965 में कानून की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने अमेरिका की हार्वर्ड लॉ स्कूल से 1982 में मास्टर और 1988 में कानून में डॉक्टरेट की डिग्री ली।

1967 में पिल्लै ने नेटाल प्रांत में अपनी लॉ फर्म शुरू की। रंगभेद के दौर में नस्ल के कारण कोई भी लॉ फर्म उन्हें नौकरी देने को तैयार नहीं थी। ऐसे में उन्होंने अपना दफ्तर खोलकर वकालत शुरू की। वह नेटाल प्रांत में अपनी लॉ फर्म खोलने वाली पहली महिला बनीं।

रंगभेद के खिलाफ लड़ी लड़ाई, नरसंहार के दोषियों को सजा दिलाई

  • 1973 में पिल्लै ने याचिका दायर कर रॉबेन आइलैंड जेल में बंद राजनीतिक कैदियों को वकीलों की मदद लेने का अधिकार दिलाया। इनमें नेल्सन मंडेला भी शामिल थे। हालांकि कैदी के तौर पर उनकी मंडेला से कभी मुलाकात नहीं हुई।
  • 1995 में जब मंडेला राष्ट्रपति बने तो उन्होंने नवी पिल्लै को दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में जज नियुक्त करने की सिफारिश की थी। वह इस पद पर पहुंचने वाली पहली गैर-श्वेत महिला थीं।
  • 1994 में रवांडा में बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ था। इसमें तुत्सी समुदाय के लोगों की बड़े पैमाने पर हत्या की गई। पिल्लै के करियर का सबसे अहम पड़ाव रवांडा में नरसंहार से जुड़े मामलों की सुनवाई रहा।
  • 1995 में संयुक्त राष्ट्र ने रवांडा नरसंहार के अपराधियों को सजा दिलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण बनाया। पिल्लै इस न्यायाधिकरण में न्यायाधीश नियुक्त हुईं।
पिल्लै ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में 1999 से 2003 तक अध्यक्ष के रूप में काम किया।

पिल्लै ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में 1999 से 2003 तक अध्यक्ष के रूप में काम किया।

पिल्लै के 2 ऐतिहासिक फैसले जिनकी दुनियाभर में चर्चा हुई

1. बलात्कार को नरसंहार का हिस्सा माना

1998 में रवांडा के ताबा शहर के मेयर जीन-पॉल अकायेसू को तुत्सी समुदाय के लोगों के खिलाफ हिंसा में भूमिका के लिए नरसंहार का दोषी ठहराया। पिल्लै उन तीन जजों में शामिल थीं, जिन्होंने इस फैसले पर हस्ताक्षर किए।

इस फैसले में यह भी कहा गया कि अगर किसी समुदाय को पूरी तरह या उसके एक हिस्से को खत्म करने के इरादे से बलात्कार और यौन हिंसा की जाती है, तो उसे नरसंहार का अपराध माना जा सकता है।

यह फैसला इसलिए अहम था, क्योंकि युद्ध के दौरान महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा को अक्सर गंभीर अपराधों के मुकदमों में नजरअंदाज कर दिया जाता था।

फैसले के बाद पिल्लै ने कहा था,

बहुत लंबे समय से बलात्कार को युद्ध में जीत के इनाम की तरह देखा जाता रहा है। अब इसे युद्ध अपराध माना जाएगा क्योंकि बलात्कार युद्ध की ट्रॉफी नहीं है।

1994 में रवांडा में हुए नरसंहार में करीब 8 लाख लोग मारे गए थे। यह नरसंहार लगभग 100 दिनों तक चला था। इसमें मुख्य रूप से तुत्सी समुदाय के लोगों की हत्या की गई थी।

1994 में रवांडा में हुए नरसंहार में करीब 8 लाख लोग मारे गए थे। यह नरसंहार लगभग 100 दिनों तक चला था। इसमें मुख्य रूप से तुत्सी समुदाय के लोगों की हत्या की गई थी।

2. मीडिया केस में नफरत फैलाने वालों को सजा

2003 में न्यायाधिकरण ने रवांडा नरसंहार के दौरान नफरत फैलाने और लोगों को हिंसा के लिए उकसाने के मामले में मीडिया से जुड़े तीन लोगों को दोषी ठहराया। इनमें रेडियो स्टेशन के संस्थापकों में शामिल फर्डिनेंड नाहिमाना, रेडियो स्टेशन की शुरुआती समिति के सदस्य जीन-बोस्को बारायाग्विजा और अखबार ‘कांगुरा’ के संपादक हसन नगेजे शामिल थे।

इन तीनों को नरसंहार, नरसंहार के लिए उकसाने और मानवता के खिलाफ अपराधों समेत कई आरोपों में दोषी पाया। नाहिमाना और नगेजे को उम्रकैद की सजा सुनाई गई, जबकि बारायाग्विजा को 35 साल जेल की सजा मिली।

पहली बार इस फैसले ने यह साफ किया कि मीडिया के जरिए नरसंहार के लिए लोगों को भड़काने वालों को भी उनके काम के लिए सजा दी जा सकती है।

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विदेश

2026 का केमिस्ट्री नोबेल फ्रांस-जापान के वैज्ञानिकों को मिला:अणुओं के मिरर इमेज की 100 साल पुरानी गुत्थी सुलझाई; दवाएं बनाने में मदद मिली

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स्टॉकहोम, एजेंसी। 2026 का केमिस्ट्री नोबेल पुरस्कार फ्रांस के वैज्ञानिक हेनरी बी. कागन और जापान के केन्सो सोआई को दिया गया है। दोनों वैज्ञानिकों ने रसायन विज्ञान की करीब 100 साल पुरानी गुत्थी सुलझाई है।

हेनरी बी. कागन और केन्सो सोआई ने यह समझाने में बड़ी मदद की कि मिरर इमेज जैसे दिखने वाले दो अणुओं में से सिर्फ एक को कैसे बनाया जा सकता है। यह खोज खास तौर पर दवाएं बनाने में काम आ रही है।

नोबेल पुरस्कार के विजेताओं को दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। उन्हें मेडल, डिप्लोमा और पुरस्कार राशि दी जाएगी। 2026 में नोबेल पुरस्कार की राशि करीब 11.5 करोड़ रुपए है।

मिरर इमेज जैसे क्यों होते हैं अणु

इसे आसान तरीके से समझिए। हमारे दोनों हाथ लगभग एक जैसे दिखते हैं, लेकिन बायां हाथ दाएं हाथ की जगह नहीं ले सकता। कुछ अणु भी ऐसे ही होते हैं। इनके दो रूप होते हैं, जो एक-दूसरे की मिरर इमेज होते हैं।

दिक्कत यह है कि वैज्ञानिक जब ऐसे अणु बनाते हैं, तो कई बार दोनों रूप साथ बन जाते हैं। जबकि दवा बनाने में दोनों की जरूरत नहीं होती।

किसी दवा का एक रूप बीमारी पर असर कर सकता है, जबकि उसकी मिरर इमेज वाला दूसरा रूप कम असरदार या नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए वैज्ञानिकों की कोशिश थी कि जिस रूप की जरूरत है, वही बने।

कागन ने बताया- मिरर अणुओं में से जरूरत वाले को कैसे बनाया जाए

हमारे शरीर में अमीनो एसिड से प्रोटीन बनता है। अमीनो एसिड के दो रूप हो सकते हैं, जो एक-दूसरे की मिरर इमेज होते हैं। लेकिन शरीर प्रोटीन बनाने के लिए इनमें से सिर्फ एक रूप का इस्तेमाल करता है।

वैज्ञानिकों का सवाल था कि जब दोनों रूप बन सकते हैं, तो शरीर सिर्फ एक को ही क्यों चुनता है। 1986 में हेनरी बी. कागन ने इसका एक अहम रास्ता बताया।

उन्होंने ऐसा तरीका खोजा, जिससे रासायनिक प्रतिक्रिया में दोनों रूप बराबर नहीं बनते थे। एक रूप दूसरे से काफी ज्यादा बनने लगता था। यानी वैज्ञानिक ऐसी रासायनिक प्रक्रिया तैयार कर सकते हैं, जिसमें जिस अणु की जरूरत है, वही ज्यादा बने और दूसरा कम।

सोआई ने ऐसा अणु बनाया, जो अपने जैसे अणु बनाता था

इसके बाद केन्सो सोआई ने कागन के काम को आगे बढ़ाया। उन्होंने 5-पाइरिमिडिल एल्केनॉल नाम के एक रासायनिक पदार्थ पर प्रयोग किया। उन्होंने ऐसी प्रक्रिया बनाई, जिसमें एक तरह का अणु बनने के बाद वह अपने जैसे दूसरे अणु बनने में मदद करता था।

इसे ऐसे समझिए- शुरुआत में अगर किसी एक तरह के अणु थोड़े ज्यादा बन गए, तो वही अणु आगे और अपने जैसे अणु बनाने में मदद करने लगे। फिर नए बने अणु भी यही काम करने लगे। इस तरह एक तरह के अणुओं की संख्या लगातार बढ़ती गई।

1995 के प्रयोग में शुरुआत में एक तरह के अणु की मात्रा सिर्फ 2% ज्यादा थी। लेकिन प्रक्रिया चलने के बाद यह बढ़त 87% तक पहुंच गई। यानी शुरुआत का छोटा-सा फर्क बहुत बड़ा हो गया।

इसके बाद 2003 में सोआई ने इसी विचार को और आगे बढ़ाया। उन्होंने ऐसी प्रक्रिया दिखाई, जिसमें एक तरह के अणु की मात्रा बढ़ते-बढ़ते 99.99% तक पहुंच सकती थी। यानी आखिर में लगभग सारे अणु एक ही तरह के बन सकते थे।

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खेल

24 साल बाद लड़कों से आगे भारत की लड़कियां:4 गोल्ड ज्यादा जीते, हॉकी का ओलिंपिक टिकट मिला, 5 पॉइंट में एशियन गेम्स का एनालिसिस

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नई दिल्ली, एजेंसी। एशियन गेम्स 2026 में भारत का अभियान पूरा हो चुका है। आखिरी दिन घुड़सवारी के दो गोल्ड मेडल इवेंट हैं लेकिन इनमें कोई भारतीय खिलाड़ी शिरकत नहीं कर रहा है। भारत ने जापान के आइची-नागोया में 21 गोल्ड सहित कुल 85 मेडल जीते हैं।

उज्बेकिस्तान ने भी भारत के बराबर ही गोल्ड जीते हैं लेकिन ज्यादा सिल्वर के आधार पर भारत चौथे स्थान पर है। रविवार को अगर उज्बेकिस्तान कोई गोल्ड नहीं जीतता है तो भारत चौथे स्थान पर ही फिनिश करेगा।

आगे 5 पॉइंट्स में पढ़िए 2026 एशियन गेम्स का निचोड़

  • 2002 के बाद पहली बार भारत की लड़कियों को ज्यादा मेडल
  • बॉक्सिंग, रेसलिंग में बेहतर हुआ प्रदर्शन, शूटिंग-एथलेटिक्स में पिछड़े
  • टीम इवेंट्स में धाक, हॉकी में गोल्ड के साथ ओलिंपिक टिकट भी
  • चीन की बादशाहत को 44 साल से कोई चैलेंज नहीं
  • 53 वर्ल्ड रिकॉर्ड और 76 एशियन रिकॉर्ड टूटे

2002 के बाद पहली बार भारत की लड़कियों को ज्यादा मेडल

भारत ने इस बार लड़कियों के इवेंट में 11 तो लड़कों के इवेंट में 7 गोल्ड जीते। 3 गोल्ड मिक्स्ड इवेंट में आए। इससे पहले 2002 में बुसान में हुए एशियन गेम्स में भारत की लड़कियां आगे रही थीं। तब भारत ने लड़कियों के इवेंट में 6 और लड़कों के इवेंट में 5 गोल्ड जीते थे।

बॉक्सिंग, रेसलिंग में बेहतर हुआ प्रदर्शन, शूटिंग-एथलेटिक्स में पिछड़े

भारत ने 2023 में चीन के ग्वांगझू में हुए एशियन गेम्स में 28 गोल्ड के साथ 106 मेडल जीते थे। तब भारत ने शूटिंग में 7 और एथलेटिक्स में 6 गोल्ड जीते थे। इस बार शूटिंग में 3 और एथलेटिक्स में 1 ही गोल्ड आया। यानी इन दो खेलों में ही भारत को 9 गोल्ड का नुकसान हो गया। भारत ने पिछली बार स्कॉश में 2 और टेनिस, बैडमिंटन और घुड़सवारी में 1-1 गोल्ड जीता था। इन खेलों में इस बार भारत को कोई गोल्ड नहीं मिला।

बॉक्सिंग और रेसिलिंग में अच्छे प्रदर्शन ने कुछ हद तक गोल्ड में कमी की भरपाई की है। पिछली बार भारत को इन दोनों खेलों में एक भी गोल्ड नहीं मिला था। इस बार बॉक्सिंग में 3 और रेसलिंग में 2 गोल्ड आए हैं। आर्चरी में भारत ने पिछले प्रदर्शन को दोहराया है।

टीम इवेंट्स में धाक कायम, हॉकी में गोल्ड के साथ 2 ओलिंपिक टिकट भी

टीम इवेंट्स में भारत ने शानदार प्रदर्शन किया है। क्रिकेट, हॉकी और कबड्डी में भारत ने पुरुष और महिला दोनों वर्गों के गोल्ड मेडल जीते हैं। हॉकी में एशियाड गोल्ड जीतने पर सीधे ओलिंपिक का टिकट मिलता है, लिहाजा भारत की दोनों हॉकी टीम लॉस एंजिल्स में होने वाले 2028 ओलिंपिक के लिए क्वालिफाई कर गई है। यह पहला मौका है जब भारत की दोनों वर्गों की हॉकी टीमों ने एक ही इवेंट में गोल्ड जीता है।

मेडल टैली में 44 साल से चीन की चौधराहट कायम

चीन ने इस बार 169 गोल्ड सहित 341 मेडल जीते हैं। नंबर-2 पर रहे जापान ने 83 गोल्ड जीते हैं। चीन से आधे से भी कम। चीन 1982 से अब तक हर एशियन गेम्स में टेबल टॉपर रहा है।

भारत ने पोजीशन के लिहाज से पिछले एशियन गेम्स के प्रदर्शन की बराबरी की है। लेकिन, इस बार 7 गोल्ड सहित कुल 21 मेडल की कमी आई है।

53 वर्ल्ड रिकॉर्ड टूटे, भारतीय तीरंदाजी टीम ने वर्ल्ड रिकॉर्ड की बराबरी की

इस एशियन गेम्स में अलग-अलग इवेंट्स में कुल 53 वर्ल्ड रिकॉर्ड और 76 एशियन रिकॉर्ड टूटे हैं। साथ ही 166 नए गेम्स रिकॉर्ड भी बने। भारतीय विमेंस कंपाउंड तीरंदाजी टीम ने फाइनल में चीन के खिलाफ 238 पॉइंट्स बनाए। यह वर्ल्ड रिकॉर्ड की बराबरी है।

चिकाथा तनिपार्थी, प्रथिका प्रदीप और ज्योति सुरेखा वेन्नम की तिकड़ी ने चीन को 238-234 से हराकर गोल्ड जीता।

चिकाथा तनिपार्थी, प्रथिका प्रदीप और ज्योति सुरेखा वेन्नम की तिकड़ी ने चीन को 238-234 से हराकर गोल्ड जीता।

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