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विशेष लेख

व्यंग्य : रावण की ऊँचाई नहीं, रावणी प्रवृत्तियों की करें ख़िचाई

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दशहरे का मौसम आते ही रावण की पूछ-परख बढ़ जाती है। साल भर समाज में रावण जैसी प्रवृत्तियाँ फलती-फूलती रहें, किसी को कोई खास परेशानी नहीं होती, लेकिन दशहरा आते ही रावण के पुतले की ऊँचाई पर बहस छिड़ जाती है। कोई 101 फीट का रावण बनाता है, तो कोई 151 फीट का। मानो रावण का कद जितना ऊँचा होगा, बुराई पर विजय उतनी ही शानदार होगी!

समझ में नहीं आता कि रावण को हराने की होड़ लगी है या उसे ऊँचा उठाने की। हर साल पुतले का कद बढ़ता है, आतिशबाजी का खर्च बढ़ता है, भीड़ बढ़ती है, जय श्रीराम के जयकारे गूँजते हैं और अंत में रावण धू-धू करके जल उठता है। लोग तालियाँ बजाते हैं, मोबाइल से वीडियो बनाते हैं और घर लौटकर चैन की नींद सो जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या रावण सचमुच जल गया?

अगर रावण केवल दस सिरों वाला एक पुतला होता, तो मामला बहुत आसान था। एक माचिस की तीली लगाई और बुराई का अंत! मगर आज के रावण के दस सिर नहीं, दसियों चेहरे हैं। कहीं वह भ्रष्टाचार बनकर बैठा है, कहीं रिश्वत की मेज पर मुस्करा रहा है, कहीं गरीब का हक मार रहा है, तो कहीं अपने पद और प्रतिष्ठा का दुरुपयोग कर रहा है। उसके चेहरे पर अच्छाई का मुखौटा है और जेब में स्वार्थ का हिसाब-किताब।

सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आधुनिक रावण को किसी सोने की लंका की जरूरत नहीं। उसे सरकारी दफ्तर की एक कुर्सी, किसी संस्था का ऊँचा पद, सत्ता का संरक्षण या कानून की कमजोर पकड़ भी काफी है। वह दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाता है और खुद नियमों को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ लेता है। पकड़ा जाए तो जांच का इंतजार, आरोप लगे तो साजिश का शोर और सवाल पूछे जाएँ तो चुप्पी की दीवार!

अब प्रश्न उठता है कि ऐसे रावणों का इलाज क्या है? क्या इनके लिए भी 151 फीट का पुतला बनाया जाए? क्या इनके नाम की आतिशबाजी हो? या फिर इनके पुतलों पर भी बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा जाए-‘बुराई पर अच्छाई की विजय’!

सच तो यह है कि इन रावणों के लिए पुतले जलाने से ज्यादा जरूरी है न्याय का दीप जलाना। कानून ऐसा हो जो गरीब और ताकतवर में अंतर न करे। जांच ऐसी हो जो रसूख के आगे न झुके और सजा ऐसी हो जो अपराधी को उसके अपराध के अनुसार मिले। केवल आरोप लगना अपराध सिद्ध होना नहीं है, लेकिन प्रमाणित अपराधों पर कार्रवाई न होना न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास जरूर कमजोर करता है।

विडंबना देखिए, हम हर साल रावण को जलाने का उत्सव मनाते हैं, लेकिन अपने भीतर बैठे अहंकार, लालच, छल और अन्याय को बचाकर रखते हैं। दूसरों के रावण का दहन हमें अच्छा लगता है, अपने भीतर के रावण से सामना करना नहीं। इसलिए इस दशहरे पर रावण की ऊँचाई नहीं, अपने चरित्र की गहराई नापिए। पुतले की राख से ज्यादा जरूरी है अन्याय की जड़ों को जलाना।

क्योंकि असली विजय उस दिन होगी, जब 151 फीट का रावण जलाने के लिए मैदान में भीड़ जुटाने की जरूरत नहीं पड़ेगी और समाज में बैठे रावण कानून से बचने के बजाय कानून का सम्मान करने लगेंगे। तब शायद दशहरा केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि पूरे साल दिखाई देने वाली अच्छाई की पहचान बनेगा।

संजय एम तराणेकर

(कवि, लेखक व समीक्षक)

इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)

मो. 98260 25986

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विशेष लेख

हर साल जलता हूँ, फिर भी पलता हूँ

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प्रभु श्रीराम! सुनो पुकार, क्यों सहूँ मैं अग्नि की मार?

हर साल मुझे जलाते हो, फिर अगले साल बुलाते हो!

मैं रावण हूँ और दशानन हूँ, अपने युग का मैं दर्पण हूँ।

कहते हो, मैं पापी हूँ, लेकिन आज भी क्यों व्यापी हूँ?

मेरे दस सिर अहंकार के, सिर लोभ व भ्रष्टाचार के थे।

परंतु आज सिरों की गिनती नहीं, पापों की सीमा नहीं!

मैंने सीता का हरण किया, अपने कुल का पतन किया,

आज इंसान ही इंसान को, लोभ में बेच रहा ईमान को।

मेरे भीतर अहंकार था, लेकिन ज्ञान का भी भंडार था,

आज ज्ञान की बातें करनेवाले, मुखौटे हैं पहनने वाले!

मैं लंका का राजा कहलाया, सोने का साम्राज्य बनाया,

आज बिना सोने की लंका के, बहुत रावण हैं सत्ता के!

संजय एम तराणेकर 

(कवि, लेखक व समीक्षक)

इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)

मो. 98260 25986

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देश

व्यंग्य : कोहनी का कमाल, आंदोलन में धमाल!

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अक्सर कोहनी मारना यानि एक तरह से ठिठोली करना ही होता है। यारी दोस्ती में कोहनी मारना मजे लेने के समान है। जिसका कोई बुरा भी नहीं मानता। पलकें टेढ़ी कर दस सेंटीमीटर उचका दो तो आनंद दुगुना हो जाता हैं। इसमें न कोई एफआईआर होती है, न कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस और न ही कोई राष्ट्रीय बहस!आजकल एक आंदोलन में चलते-चलते कोहनी मारने की चर्चा खूब चल पड़ी है। उसके बेकग्राउंड में टियाव-टियाव का भाई लोग म्यूजिक डाल के मजे ले रहें हैं।

लेकिन जनाब, कोहनी जब दोस्ती के दायरे से निकलकर राजनीति के मैदान में प्रवेश करती है, तो उसका महत्व अचानक बढ़ जाता है। वही कोहनी, जो कल तक ठिठोली का माध्यम थी, आज चर्चा का विषय बन जाती है। टीवी चैनलों को मसाला मिल जाता है, सोशल मीडिया को नया मुद्दा और राजनीतिक विश्लेषकों को अपनी प्रतिभा दिखाने का सुनहरा अवसर!

इस पर अपने बप्पी दा का गाना याद आता है-“जाना कहाँ है, दिलकश समाँ है…” अब आंदोलन के माहौल में इसकी पैरोडी कुछ यूँ बन सकती है-“जाना कहाँ है, आंदोलन रवाँ है, कोहनी का किस्सा, चर्चा में जमा है, गुस्सा जमा है, गुस्सा जमा है, किसने किसको मारा, यही मुद्दा बना है!”

हालाँकि आंदोलन किस दिशा में जा रहा है, यह तो आंदोलनकारी ही जानें, लेकिन आसपास चल रहे लोगों को एक नई सीख जरूर मिल गई होगी-राजनीति में कदमताल करते समय केवल आगे-पीछे ही नहीं, दाएँ-बाएँ भी देखते चलिए। पता नहीं कब कोई उत्साह में हाथ हिला दे और आपकी छाती या सीने तक कोहनी पहुँच जाए!

वैसे कोहनी का वार कोई मामूली बात नहीं। अगर जोर से लग जाए तो अस्पताल का बिल, एक्स-रे, डॉक्टर की फीस और तरह-तरह की जाँचें आपका पूरा बजट आंदोलन पर लगा सकती हैं। ऊपर से अगर मामला राजनीतिक हो, तो इलाज से पहले बयानबाजी का दौर शुरू हो सकता है। डॉक्टर पूछेगा, “दर्द कहाँ है?” और समर्थक पूछेंगे, “आप किस पक्ष में हैं?” और सबसे बड़ी मुसीबत तब होती है जब घटना का वीडियो वायरल हो जाए। फिर अदालत से पहले सोशल मीडिया फैसला सुनाने लगता है। किसी के लिए यह मजाक, किसी के लिए आक्रामकता और किसी के लिए राजनीतिक साजिश बन जाती है। वीडियो की लंबाई भले कुछ सेकंड हो, लेकिन उस पर बहस कई दिनों तक चल सकती है।

हमारे जमाने में रेडियो पर सावधानी के संदेश सुनाई देते थे—“जरा सी सावधानी, जिंदगी भर आसानी।” आज लगता है कि इसमें एक नई पंक्ति जोड़ने का समय आ गया है-“आंदोलन में चलें तो संभलकर चलें, हाथ-पैर अपने नियंत्रण में रखें और दूसरों की सीमाओं का सम्मान करें।”

क्योंकि लोकतंत्र में विचारों की टक्कर तो समझ में आती है, लेकिन विचार रखते-रखते कोहनी चलने लगे तो फिर विचार पीछे और कोहनी आगे हो जाती है। और अंत में, एक विनम्र सुझाव-आंदोलन में शामिल हों तो मुद्दों पर जोर लगाइए, आवाज बुलंद कीजिए, तर्कों की ताकत दिखाइए; कोहनी की ताकत नहीं। आखिर आंदोलन का उद्देश्य अपनी बात मनवाना है, किसी को अस्पताल पहुँचाना नहीं।

क्योंकि राजनीति में कोहनी मारकर सुर्खियाँ तो मिल सकती हैं, लेकिन सम्मान कमाने के लिए संयम और समझदारी ही काम आती है। और हाँ, दो गज दूरी वाला पुराना संदेश भले अब हर जगह सुनाई न देता हो, मगर एक बात आज भी जरूरी है-कोहनी को अपनी जगह लटकने दीजिये, अपने हाथों का प्रयोग किसी को भारी नुकसान पहुँचा सकता हैं। कोहनी मालिकों सावधान…!

संजय एम तराणेकर

(कवि, लेखक व समीक्षक)

इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)

मो. 98260 25986

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छत्तीसगढ़

“जलन”

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लघु कथा

“मुझे जलने से बहुत डर लगता है…”
आशीष से रूबी ने धीरे से कहा।
“देखो ना, मुझे रोज़ सपना आता है—मैं जल रही हूँ… मैं मरने के बाद भी जलना नहीं चाहती…” उसकी आवाज़ कांप रही थी।
आशीष ने उसके हाथ थामे।
“तुम इतनी डरती क्यों हो?”
रूबी ने अपने हाथ दिखाए—छोटे-छोटे जले के निशान।
“बचपन से… कभी रोटी बनाते हुए जल गई, कभी कुकर से… ये डर अब तक गया ही नहीं…”
कुछ पल खामोशी रही।
“सुनो ना…” रूबी फिर बोली, “मरने के बाद मुझे मत जलाना… प्लीज़…”
आशीष मुस्कुराया, “ठीक है, नहीं जलाएंगे।”
“तो फिर क्या करोगे?” रूबी ने मासूमियत से पूछा।
आशीष ने एक कागज़ उसकी ओर बढ़ाया—
“ये देखो… देहदान का फॉर्म है।”
रूबी चौंकी, “देहदान?”
“हाँ,” आशीष बोला, “तुम्हें जलाया नहीं जाएगा… बल्कि तुम्हारे जाने के बाद भी तुम ज़िंदा रहोगी—किसी की आँखों में, किसी की किडनी में, किसी के दिल में…”
रूबी कुछ देर चुप रही।
“जलने से तो डरती हूँ… पर इससे नहीं डरूँगी…”
“तो भरोगी ये फॉर्म?” आशीष ने पूछा।
रूबी हल्के से मुस्कुराई,
“हाँ… कम से कम… मैं कहीं न कहीं ज़िंदा तो रहूँगी…”
उसने पेन उठाया और फॉर्म पर साइन कर दिए।

डॉ ऋचा यादव
बिलासपुर,छत्तीसगढ़

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