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अमेरिका H-1B वीजा के लिए ₹88 लाख वसूलेगा:6 साल का खर्च 50 गुना बढ़ा, 3 लाख भारतीयों पर असर

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वॉशिंगटन डीसी,एजेंसी।अमेरिका अब H-1B वीजा के लिए हर साल एक लाख डॉलर (करीब 88 लाख रुपए) एप्लिकेशन फीस वसूलेगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को व्हाइट हाउस में इस ऑर्डर पर साइन किए। नए चार्ज 21 सिंतबर से लागू होंगे।

H-1B वीजा के लिए पहले औसतन 5 लाख रुपए लगते थे। यह 3 साल के लिए मान्य होता था। इसे 3 साल के लिए रिन्यू किया जा सकता था। अब अमेरिका में H-1B वीजा के लिए 6 साल में 5.28 करोड़ लगेंगे, यानी खर्च करीब 50 गुना से ज्यादा बढ़ जाएगा।

अमेरिकी सरकार हर साल लॉटरी से 85,000 H-1B वीजा जारी करती है, जिनका इस्तेमाल ज्यादातर तकनीकी नौकरियों में होता है। सबसे ज्यादा भारतीय (72%) इसका इस्तेमाल करते हैं। अब वीजा फीस बढ़ने से 3 लाख से ज्यादा भारतीयों पर इसका सीधा असर पड़ेगा।

ट्रम्प ने 19 सितंबर को H-1B वीजा को लेकर नियमों में बदलाव से जुड़े ऑर्डर पर साइन किए।

ट्रम्प ने 19 सितंबर को H-1B वीजा को लेकर नियमों में बदलाव से जुड़े ऑर्डर पर साइन किए।

ट्रम्प ने 3 नए वीजा कार्ड लॉन्च किए

ट्रम्प ने H-1B में बदलाव के अलावा 3 नए तरह के वीजा कार्ड भी लॉन्च किए हैं। ‘ट्रम्प गोल्ड कार्ड’, ‘ट्रम्प प्लेटिनम कार्ड’ और ‘कॉर्पोरेट​​​​​ गोल्ड कार्ड’ जैसी सुविधाएं भी शुरू की गई हैं। ट्रम्प गोल्ड कार्ड (8.8 करोड़ कीमत) व्यक्ति को अमेरिका में अनलिमिटेड रेसीडेंसी (हमेशा रहने) का अधिकार देगा।

H-1B वीजा क्या है?

H-1B वीजा एक एक नॉन-इमिग्रेंट वीजा है। यह वीजा लॉटरी के जरिए दिए जाते रहे हैं क्योंकि हर साल कई सारे लोग इसके लिए आवेदन करते हैं।

यह वीजा स्पेशल टेक्निकल स्किल जैसे IT, आर्किटेक्चर और हेल्थ जैसे प्रोफेशन वाले लोगों के लिए जारी होता है।

हर साल कितने H-1B वीजा जारी होते हैं?

अमेरिकी सरकार हर साल 85,000 एच-1बी वीजा जारी करती है, जिनका इस्तेमाल ज्यादातर तकनीकी नौकरियों में होता है। इस साल के लिए आवेदन पहले ही पूरे हो चुके हैं।

आंकड़ों के अनुसार, केवल अमेजन को ही इस साल 10,000 से ज्यादा वीजा मिले हैं, जबकि माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी कंपनियों को 5,000 से अधिक वीजा स्वीकृत हुए हैं।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल H-1B वीजा का सबसे ज्यादा फायदा भारत को मिला। हालांकि इस वीजा कार्यक्रम की आलोचना भी होती है।

कई अमेरिकी तकनीकी कर्मचारियों का कहना है कि कंपनियां H-1B वीजा का इस्तेमाल वेतन घटाने और अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियां छीनने के लिए करती हैं।

H-1B वीजा में बदलाव से भारतीयों पर क्या असर होगा?

H-1B वीजा के नियमों में बदलाव से 2,00,000 से ज्यादा भारतीय प्रभावित होंगे। साल 2023 में H-1B वीजा लेने वालों में 1,91,000 लोग भारतीय थे। ये आंकड़ा 2024 में बढ़कर 2,07,000 हो गई।

भारत की आईटी/टेक कंपनियां हर साल हजारों कर्मचारियों को H-1B पर अमेरिका भेजती हैं। हालांकि, अब इतनी ऊंची फीस पर लोगों को अमेरिका भेजना कंपनियों के लिए कम फायदेमंद होगा।

71% भारतीय H-1B वीजा धारक हैं और यह नई फीस उनके लिए बड़ा आर्थिक बोझ बन सकती है। खासकर मिड-लेवल और एंट्री-लेवल कर्मचारियों को वीजा मिलना मुश्किल होगा। कंपनियां नौकरियां आउटसोर्स कर सकती हैं, जिससे अमेरिका में भारतीय पेशेवरों के अवसर कम होंगे।

88 लाख रुपए क्या हर साल लगेंगे?

नए नियम के अनुसार, H-1B वीजा के लिए $100,000 (लगभग ₹88 लाख रुपए) की फीस हर साल देनी होगी। यह फीस नए आवेदनों और मौजूदा वीजा धारकों के नवीनीकरण (renewals) दोनों पर लागू होगी।

यह फीस 21 सितंबर 2025 से लागू होगी और 12 महीनों के लिए प्रभावी रहेगी, जब तक कि इसे बढ़ाया न जाए। कंपनियों को इस भुगतान का प्रमाण रखना होगा। यदि भुगतान नहीं किया गया, तो याचिका को अमेरिकी राज्य विभाग या होमलैंड सुरक्षा विभाग (DHS) रद्द कर देगा।

अमेरिका से बाहर जाने पर क्या होगा?

अगर कोई H-1B कर्मचारी 21 सितंबर के बाद देश छोड़ता है, तो वापस अमेरिका आने के लिए उसकी कंपनी को 88 लाख का भुगतान करना होगा।

यही कारण है कि इस फैसले के बाद माइक्रोसॉफ्ट, जेपी मॉर्गन और अमेजन जैसी कंपनियों ने H-1B वीजा होल्डर कर्मचारियों को अमेरिका में ही रहने की सलाह दी है। रॉयटर्स के मुताबिक बाहर रहने वाले कर्मचारियों को सलाह दी कि वे शनिवार रात से पहले वापस आ जाएं।

कौन सी कंपनियां सबसे ज्यादा H-1B स्पॉन्सर करती हैं?

भारत हर साल लाखों इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस के ग्रेजुएट तैयार करता है, जो अमेरिका की टेक इंडस्ट्री में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इंफोसिस, TCS, विप्रो, कॉग्निजेंट और HCL जैसी कंपनियां सबसे ज्यादा अपने कर्मचारियों को H-1B वीजा स्पॉन्सर करती हैं।

कहा जाता है कि भारत अमेरिका को सामान से ज्यादा लोग यानी इंजीनियर, कोडर और छात्र एक्सपोर्ट करता है। अब फीस महंगी होने से भारतीय टैलेंट यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मिडिल ईस्ट के देशों की ओर रुख करेगा।

ट्रम्प प्रशासन बोला- H-1B का सबसे ज्यादा गलत इस्तेमाल हुआ

व्हाइट हाउस के स्टाफ सेक्रटरी विल शार्फ ने कहा कि H-1B वीजा प्रोग्राम उन वीजा सिस्टम में से एक है जिसका सबसे ज्यादा गलत इस्तेमाल हुआ। इसका मकसद उन सेक्टरों में काम करने वाले हाई स्किल्ड लेबरर्स को अमेरिका में आने की इजाजत देना है, जहां अमेरिकी काम नहीं करते।

विल शार्फ ने कहा- नए नियम के तहत, कंपनियां अपने लोगों को H-1B वीजा स्पॉन्सर करने के लिए एक लाख डॉलर फीस चुकाएंगी। इससे यह यह तय होगा कि विदेशों से जो लोग अमेरिका आ रहे हैं, वे सच में बहुत ज्यादा स्किल्ड हैं और उन्हें अमेरिकी कर्मचारी से रिप्लेस नहीं किया जा सकता।

सरकार 80 हजार गोल्ड कार्ड जारी करेगी

अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने कहा कि अभी हर साल लगभग 2,81,000 लोगों को ग्रीन कार्ड दिया जाता है, लेकिन इनमें से ज्यादातर की औसत कमाई सिर्फ 66,000 डॉलर (करीब 58 लाख रुपए) होती है और कई बार वे सरकार की मदद पर भी निर्भर रहते हैं।

लुटनिक ने कहा,

सभी कंपनियां H-1B वीजा के लिए सालाना एक लाख डॉलर देने के लिए तैयार हैं। हमने उनसे बात की है। अगर आप किसी को ट्रेनिंग देने जा रहे हैं, तो किसी अमेरिकी यूनिवर्सिटी से निकले ग्रेजुएट को ट्रेनिंग दीजिए। अमेरिकियों को ट्रेनिंग दीजिए। हमारी नौकरियां छीनने के लिए लोगों को बाहर से लाना बंद करिए।

लुटनिक के मुताबिक गोल्ड कार्ड की भारी फीस यह तय करेगी कि अमेरिका में सिर्फ सबसे योग्य और टॉप क्लास कर्मचारी ही लंबे समय तक टिक सकें। उन्होंने कहा कि ‘यह व्यवस्था पहले अनुचित थी, लेकिन अब हम सिर्फ उन्हीं को लेंगे जो वाकई बहुत काबिल हैं।’

लुटनिक ने कहा कि यह गोल्ड कार्ड अब तक चल रहे EB-1 और EB-2 वीजा की जगह लेगा। ये कार्ड केवल उन्हीं लोगों को मिलेगा, जो अमेरिका के लिए ‘फायदेमंद’ माने जाएंगे। शुरुआत में सरकार लगभग 80,000 गोल्ड कार्ड जारी करने की योजना बना रही है। लुटनिक ने कहा कि इस प्रोग्राम से अमेरिका को 100 अरब डॉलर की कमाई होगी।

ट्रम्प बोले- सिर्फ टैलेंटेड लोगों को वीजा देंगे

गोल्ड कार्ड की अनलिमिटेड रेसीडेंसी में नागरिकों को सिर्फ पासपोर्ट और वोट देने का अधिकार नहीं मिलता, बाकी सारी सुविधाएं एक अमेरिकी नागरिक के जैसी मिलती हैं। यह प्रक्रिया उसी तरह होगी, जैसे ग्रीन कार्ड के जरिए स्थायी निवास मिलता है।

राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि यह वीजा प्रोग्राम खास तौर पर धनी विदेशियों के लिए है, ताकि वे 10 लाख डॉलर देकर अमेरिका में रहते हुए काम कर सकें। उन्होंने कहा कि अब अमेरिका सिर्फ टैलेंटेड लोगों को ही वीजा देगा, न कि ऐसे लोगों को जो अमेरिकियों की नौकरियां छीन सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस रकम का इस्तेमाल टैक्स को घटाने और सरकारी कर्ज चुकाने में किया जाएगा।

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खेल

बांग्लादेश ने भारत-पाकिस्तान को पीछे छोड़ा:ऑस्ट्रेलिया में सबसे कम मैचों में टेस्ट जीतने वाली एशियन टीम, कंगारुओं को उनकी धरती पर पहली बार हराया

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डार्विन, एजेंसी। बांग्लादेश ने ऑस्ट्रेलिया को पहले टेस्ट में 9 विकेट से हराकर इतिहास रच दिया। ऑस्ट्रेलिया की धरती पर यह उसकी पहली टेस्ट जीत है। बांग्लादेश ने 57 रन का टारगेट चौथे दिन दूसरे सेशन में 9 विकेट रहते हासिल कर लिया।

इससे पहले बांग्लादेश ने 2003 में ऑस्ट्रेलिया में दो टेस्ट खेले थे, लेकिन दोनों में उसे हार का सामना करना पड़ा था।

अब 3 टेस्ट में पहली जीत दर्ज कर बांग्लादेश ऑस्ट्रेलिया में सबसे कम मैचों में टेस्ट जीतने वाली एशियन टीम बन गई है। पाकिस्तान ने 7 और भारत ने 12 टेस्ट में यह उपलब्धि हासिल की थी, जबकि श्रीलंका 15 टेस्ट के बाद भी जीत का इंतजार कर रहा है।

हसन महमूद प्लेयर ऑफ द मैच

बांग्लादेश की ऐतिहासिक जीत के हीरो तेज गेंदबाज हसन महमूद और ऑलराउंडर मेहदी हसन मिराज रहे। महमूद ने मैच में कुल 9 विकेट चटकाए, जबकि मिराज ने 65 रन बनाने के साथ 5 विकेट भी अपने नाम किए।

दोनों टीमों के बीच 7 मैच खेले गए

बांग्लादेश और ऑस्ट्रेलिया के बीच अब तक सात टेस्ट मैच खेले गए हैं। इस दौरान ऑस्ट्रेलियाई टीम ने 5 मैचों में जीत हासिल की। जबकि बांग्लादेश ने दो मुकाबले जीते। टेस्ट सीरीज का दूसरा मुकाबला 22 अगस्त से मैके में खेला जाएगा।

पहली पारी में बांग्लादेश ने बनाए 426 रन

ऑस्ट्रेलिया ने डार्विन में गुरुवार को टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया, लेकिन टीम की पहली पारी 198 रन पर सिमट गई। बांग्लादेश के तेज गेंदबाज हसन महमूद ने शानदार गेंदबाजी करते हुए 6 विकेट चटकाए।

जवाब में बांग्लादेश ने पहली पारी में 426 रन बनाए। तंजिद हसन ने 101 रन की शानदार पारी खेली। यह ऑस्ट्रेलियाई जमीन पर किसी बांग्लादेशी बल्लेबाज का पहला टेस्ट शतक था। नजमुल हुसैन शांतो ने 84 रन, जबकि मेहदी हसन मिराज ने 65 रन बनाए। इस तरह बांग्लादेश ने पहली पारी के आधार पर ऑस्ट्रेलिया पर 228 रन की बढ़त हासिल की।

कैमरन ग्रीन का शतक काम नहीं आया

ऑस्ट्रेलिया टीम पहली पारी में 198 रन पर आउट होने के कारण बांग्लादेश से 228 रन पीछे थी। चौथे दिन ऑस्ट्रेलिया ने अपनी दूसरी पारी के स्कोर 161/4 से आगे खेलना शुरू किया और 284 पर ऑलआउट हो गई। ऐसे में बांग्लादेश को 57 रन का टारगेट मिला। दूसरी पारी में कैमरन ग्रीन ने 4 चौके और एक छक्के की मदद से 201 गेंदों पर 104 रन बनाए। ग्रीन के टेस्ट करियर का ये तीसरा शतक रहा।

मेहदी हसन मिराज ने 5 विकेट लिए

मेहदी हसन मिराज ने ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी में 5 विकेट लिए। उन्होंने एलेक्स कैरी को 30 रन पर लिटन दास के हाथों कैच कराया, इसके बाद बो वेबस्टर को 12 रन पर बोल्ड किया। फिर पैट कमिंस को 9 रन पर शॉर्ट लेग में कैच कराया। ग्रीन के 104 रन के शतक के बाद मेहदी ने उनकी पारी भी खत्म की और आखिर में नाथन लायन को 15 रन पर LBW कर ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी 284 रन पर समेट दी।

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विदेश

सीरिया में पूर्व राष्ट्रपति असद को फांसी की सजा:लाखों लोगों की मौत का जिम्मेदार ठहराया गया, ममेरे भाई को पिंजरे में कोर्ट लाया गया

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दमिश्क, एजेंसी। सीरिया की एक अदालत ने मंगलवार को देश के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद और उनके छोटे भाई माहेर अल-असद को फांसी की सजा सुनाई। दोनों को गृहयुद्ध के दौरान लाखों लोगों की हत्या और अत्याचार के मामलों में दोषी ठहराया गया।

इसी मामले में बशर अल-असद के मामा के बेटे अतीफ नजीब को भी फांसी की सजा सुनाई गई। बशर और माहेर दिसंबर 2024 में सरकार गिरने के बाद रूस भाग गए थे। पुतिन सरकार ने उन्हें शरण दी हुई है। दोनों की गैरमौजूदगी में सजा सुनाई गई।

अतीफ नजीब को जनवरी 2025 में गिरफ्तार किया गया था। उन्हें मंगलवार को कैदी की वर्दी पहनाकर पिंजरे में कोर्ट लाया गया।

बशर अल असद के ममेरे भाई अतीफ नजीब को पिंजरे में कोर्ट लाया गया था।

बशर अल असद के ममेरे भाई अतीफ नजीब को पिंजरे में कोर्ट लाया गया था।

अतीफ के आदेश के बाद सीरिया में गृहयुद्ध भड़का

अतीफ नजीब सीरियाई सेना में ब्रिगेडियर जनरल रह चुके हैं। 2011 में वे दारा प्रांत में राजनीतिक सुरक्षा शाखा के प्रमुख थे। वह असद सरकार के सबसे बड़े अधिकारियों में से एक हैं, जिन पर अदालत में मुकदमा चला।

अतीफ पर आरोप है कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों से सख्ती से निपटने का आदेश दिया था। आदेश के बाद सीरिया में विरोध प्रदर्शन और उग्र हो गया। देश में गृहयुद्ध शुरू हो गया जो 2024 तक चलता रहा। इसमें करीब 5 लाख लोगों की मौत हुई।

सीरिया के इदलिब के एक रिफ्यूजी कैंप में गृहयुद्ध के दौरान घायल हुआ एक बच्चा। मार्च 2011 से 2024 तक सीरिया में 30 हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हुई थी।

सीरिया के इदलिब के एक रिफ्यूजी कैंप में गृहयुद्ध के दौरान घायल हुआ एक बच्चा। मार्च 2011 से 2024 तक सीरिया में 30 हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हुई थी।

दिसंबर 2024 में 53 साल पुराना राज खत्म हुआ

यह बशर अल-असद के खिलाफ किसी आपराधिक मामले में आया पहला फैसला है। दिसंबर 2024 में विद्रोहियों ने दमिश्क पर कब्जा कर उनकी सरकार गिरा दी थी। इसके साथ ही 1971 से सीरिया पर शासन कर रहे असद परिवार का 53 साल पुराना राज भी खत्म हो गया था।

सरकार गिरने से ठीक पहले बशर अल-असद ने देश छोड़ दिया था। इसके बाद सीरिया पर विद्रोही नेता अहमद अल-शरा का कब्जा हो गया। उनकी सरकार ने उनके शासन के दौरान लोगों पर हुए अत्याचार और हत्याओं के मामलों की जांच शुरू की।

दिसंबर 2024 में दारा शहर पर कब्जे के बाद विद्रोही लड़ाके सीरिया का झंडा लहराते हुए।

दिसंबर 2024 में दारा शहर पर कब्जे के बाद विद्रोही लड़ाके सीरिया का झंडा लहराते हुए।

रूस और ईरान के साथ के बावजूद कैसे गिरी असद सरकार?

गृहयुद्ध के दौरान बशर अल-असद की सरकार को रूस, ईरान और हिजबुल्लाह का समर्थन मिलता था। इसी वजह से वह कई साल तक सत्ता में बने रहे।

साल 2024 में हालात बदल गए। इजराइल के लगातार हमलों से हिजबुल्लाह और ईरान समर्थित गुट कमजोर पड़ गए। दूसरी ओर, रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ था, इसलिए वह भी पहले जैसी सैन्य मदद नहीं कर सका।

इसी मौके का फायदा उठाकर तुर्किये के समर्थन वाले विद्रोही गुटों ने उत्तर-पश्चिमी प्रांत इदलिब से बड़ा हमला शुरू किया। कुछ ही दिनों में उन्होंने कई शहरों पर कब्जा कर लिया और 8 दिसंबर 2024 को राजधानी दमिश्क पहुंच गए।

विद्रोहियों के दमिश्क पहुंचते ही बशर अल-असद अपने परिवार के साथ रूस भाग गए। उनकी सरकार गिर गई और असद परिवार का 53 साल से ज्यादा पुराना शासन खत्म हो गया।

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विदेश

परमाणु समझौता किए बिना जंग खत्म कर सकते हैं ट्रम्प:होर्मुज दोबारा खोलने की शर्त रखी, युद्ध लंबा खिंचने पर अमेरिका का फोकस बदला

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वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ईरान के साथ बिना परमाणु समझौते के भी जंग खत्म करने पर विचार कर रहे हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, अमेरिका की एक बड़ी शर्त होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलना है। अगर ईरान वहां से गुजरने वाले कारोबारी जहाजों को बिना किसी रुकावट के आने-जाने देता है, तो अमेरिका जंग से पीछे हट सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रम्प पिछले कुछ हफ्तों से इस योजना पर काम कर रहे हैं। उन्होंने अपने सीनियर अफसरों से कहा है कि अगर ईरान होर्मुज स्ट्रेट खोल देता है तो अमेरिका औपचारिक परमाणु समझौते के बिना भी संघर्ष खत्म करने को तैयार हो सकता है।

अब परमाणु समझौता नहीं, होर्मुज खोलना अमेरिका की नई प्राथमिकता

पहले अमेरिका की सबसे बड़ी शर्त ईरान के साथ नया परमाणु समझौता करना थी। लेकिन जंग लंबी खिंचने के बाद उसका फोकस बदलता दिख रहा है।

अब होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही शुरू कराना जंग खत्म करने की अहम शर्त बन सकता है। यह रास्ता दुनिया के लिए बेहद अहम है, क्योंकि यहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होती है।

ईरान ने रखीं 7 बड़ी शर्तें

होर्मुज स्ट्रेट खोलने के बदले ईरान ने भी अमेरिका के सामने कई शर्तें रखी हैं। सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहम्मद बाघेर जोलघदार के मुताबिक, अमेरिका को…

ईरान के सहयोगी गुटों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई बंद करनी होगी।

जंग हमेशा के लिए खत्म करनी होगी।

ईरान की समुद्री नाकाबंदी हटानी होगी।

क्षेत्र से अपने सैनिक वापस बुलाने होंगे।

ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाने होंगे।

विदेशों में रोकी गई ईरानी संपत्ति लौटानी होगी।

जंग में हुए नुकसान का मुआवजा देना होगा।

अमेरिका में बढ़ रहा जंग खत्म करने का दबाव

ईरान के साथ जंग लंबी खिंचने का असर अमेरिका में भी दिखने लगा है। पेट्रोल की कीमतें बढ़ने लगी हैं, जिससे आम लोगों पर असर पड़ रहा है। अगले साल होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले यह ट्रम्प प्रशासन के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है।

ऐसे में ट्रम्प पर जल्द से जल्द संघर्ष खत्म करने का दबाव बढ़ रहा है। यही वजह है कि वे पिछले कुछ समय से लगातार कह रहे हैं कि ईरान के साथ समझौता जल्द हो सकता है। हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया पर यह संकेत भी दिया था कि अमेरिका इस जंग में अपना मकसद हासिल कर चुका है।

परमाणु समझौते के बिना भी ट्रम्प क्यों तैयार?

रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प का मानना है कि उनके कार्यकाल में ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को दोबारा आसानी से शुरू नहीं कर पाएगा। उनका भरोसा है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां ईरान की हर गतिविधि पर नजर रख सकती हैं।

ट्रम्प यह भी मानते हैं कि अगर ईरान फिर से परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करता है, तो अमेरिका दोबारा सैन्य कार्रवाई कर सकता है। इसलिए उनके लिए औपचारिक परमाणु समझौते से ज्यादा अहम होर्मुज स्ट्रेट को फिर से पूरी तरह खुलवाना है।

ईरान होर्मुज स्ट्रेट खोलने के बदले अमेरिकी सैनिकों की वापसी, सभी प्रतिबंध हटाने, विदेशों में जमा अपनी संपत्ति लौटाने और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा जैसी बड़ी मांगें कर रहा है। ऐसे में दोनों देशों के बीच समझौता होना आसान नहीं माना जा रहा।

अमेरिका के लिए चुनौती क्यों बना हुआ है ईरान?

3,000+ बैलिस्टिक मिसाइलें, अंडरग्राउंड ‘मिसाइल सिटी’

अमेरिकी खुफिया एजेंसी ODNI के मुताबिक, युद्ध से पहले ईरान के पास 3,000 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें थीं, जिनकी मारक क्षमता 2,000 किमी तक है। इन मिसाइलों का बड़ा हिस्सा पहाड़ों के नीचे बने अंडरग्राउंड ठिकानों में रखा गया है। यहां मिसाइलें, लॉन्चर और कंट्रोल सेंटर सुरंगों के अंदर होते हैं, इसलिए हवाई हमलों में इन्हें पूरी तरह नष्ट करना आसान नहीं माना जाता।

दुनिया के 20% तेल का रास्ता ईरान के पास

हॉर्मुज स्ट्रेट से दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का करीब 20% और LNG का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसका उत्तरी तट ईरान के पास है। इसलिए यहां तनाव बढ़ने और हॉर्मुज बंद होने का असर सीधे वैश्विक तेल कीमतों और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ता है।

हजारों ड्रोन का बेड़ा

ईरान ने पिछले एक दशक में शाहेद जैसे हजारों ड्रोन विकसित किए हैं। इनका इस्तेमाल लंबी दूरी के हमलों और निगरानी के लिए किया जाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध में भी ईरानी ड्रोन के इस्तेमाल ने इसकी क्षमता को वैश्विक स्तर पर चर्चा में ला दिया।

पश्चिम एशिया में सहयोगी सशस्त्र नेटवर्क

ईरान के समर्थन वाले समूह हिजबुल्लाह (लेबनान), हूती (यमन) और इराक के कई शिया सशस्त्र गुट पश्चिम एशिया में एक्टिव हैं। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ इन्हें ईरान की फॉरवर्ड डिफेंस स्ट्रटजी का हिस्सा मानते हैं, जिससे वह अपने सीमावर्ती क्षेत्र से बाहर भी दबाव बना सकता है।

होर्मुज पर ईरान दावा क्यों करता है?

हॉर्मुज स्ट्रेट ईरान और ओमान के बीच स्थित है। इसका उत्तरी किनारा ईरान के पास है, जबकि दक्षिणी किनारा ओमान के पास है। सबसे संकरी जगह पर इसकी चौड़ाई सिर्फ 21 नॉटिकल मील (करीब 39 किलोमीटर) है।

शुरुआत में दोनों देशों का समुद्री क्षेत्र सिर्फ 3 नॉटिकल मील तक माना जाता था। लेकिन बाद में समुद्री कानूनों में बदलाव के बाद ईरान ने 1959 में और ओमान ने 1972 में अपने-अपने समुद्री क्षेत्र की सीमा बढ़ाकर 12-12 नॉटिकल मील (करीब 22-22 किलोमीटर) कर दी।

इस फैसले के बाद हॉर्मुज स्ट्रेट का सबसे संकरा हिस्सा पूरी तरह ईरान और ओमान के समुद्री क्षेत्रों में आ गया। हालांकि समुद्री आवाजाही जारी रहे इसके 2-2 नॉटिकल मील का चौड़ा ट्रांजिट लेन बनाया गया।

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