विशेष लेख
सर्वमान्य नेता, जिनके नेतृत्व में भारत खुशहाल हुआ, सक्षम हुआ
भारत रत्न स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी: 16 अगस्त: 07वीं पूण्यतिथि पर विशेष
जन्म- 25 दिसम्बर 1924
निधन- 16 अगस्त 2018
11 मई 1998 को भारत के लिए ऐतिहासिक दिन था। अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने प्रधानमंत्रीत्व काल में ऐतिहासिक कदम उठाया और पोखरण में तीन धमाके के साथ परमाणु परीक्षण कर दुनिया को दिखा दिया… कि हम भी अपने राष्ट्र की सुरक्षा के लिए सक्षम हैं। अमेरिका की खुफिया एजेंसियां हाथ मलते रह गई और अमेरिका भौंचक। परमाणु परीक्षण होने के बाद अटल जी की मिशन शक्ति ने अमेरिका ही नहीं पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया।
अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिया। अटल जी का जवाब था-ना हम झूकेंगे… ना डरेंगे। हम सक्षम हैं-अमेरिका प्रतिबंध लगा दे या रिश्ता तोड़ दे। हम सभी मामलों में सक्षम हैं। आज भारत के पास 5 हजार किलोमीटर रेंज वाली बलिस्टिक मिसाईलें हैं, सबमरीन हैं। 3 हजार किलोमीटर रेंज की के-4 सबमरीन बेस्ड मिसाईल सिस्टम है और भारत अपनी अखण्डता और सुरक्षा के लिए सक्षम है। हम अपने दुश्मनों को मारने में भी सक्षम हैं।
परमाणु परीक्षण कर अटल जी ने देश-दुनिया को संदेश दिया- यह नया भारत है और अब हम किसी भी प्रतिबंध से ना डिगने वाले, ना पीछे हटने वाले। ना हम झूके हैं… ना झूकेंगे।
अटल जी भारत के ही नहीं, बल्कि दुनिया के ताकतवर राष्ट्र प्रमुखों में सर्वमान्य नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई और दुनिया को हिन्दी की ताकत भी समझाई। अटल जी भारत के वे रत्न थे, जिन्होंने अपने कार्यकाल में भारत को सशक्त और सक्षम बनाया। अटल जी के नेतृत्व को देश ने सराहा और उनके कार्यकाल को स्वर्णीम काल के नाम से जाना जाने लगा।
7 साल पूर्व अटल जी इस दुनिया को अलविदा कह गए। उन्होंने मौत को भी चुनौती देने के लिए एक कविता रची… जो विश्व विख्यात बन गई।
पढ़ें उनकी यह खास कविता
मौत से ठन गई…
जुझने का मेरा ईरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे, इसका वादा न था।
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं।
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं।
तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ।
सामने वार कर, फिर मुझे आजमा।
अटल जी को सम्मान में देशवासियों ने न जाने क्या-क्या नाम दिया। युग पुरूष, भारत मां के सच्चे सपूत, राष्ट्र पुरूष, राष्ट्र मार्गदर्शक, भारत रत्न। वे सच्चे अर्थों में एक ऐसा राष्ट्रभक्त थे, जिन्होंने भारतीय राजनीति से द्वेष को मिटाने का काम किया। आज राजनीति में कहीं भी सात्विकता नहीं दिखती। अटल जी जब विपक्ष में थे, तो तत्समय के प्रधानमंत्री पी व्ही नरसिम्हा राव थे और दोनों की जुगलबंदी से राष्ट्र को नई दिशा मिली। वे एक-दूसरे को गुरू कह कर पुकारते थे। राजनीति में ऐसे दो विपरीत धु्रव शायद आज की राजनीति में दिखाई न दे। आज राजनीति फिर से कलुषित हो गई है और अटल जी का मार्ग शायद आज के राजनेता भूल गए हैं।
अटल जी का वह स्वर्णीम काल जब सभी धर्म के लोग खुशहाल और समभाव जीवन व्यतीत कर रहे थे। शायद आज भारतवासी उस काल को याद कर अपने आपको सांत्वना दे रहे होंगे। अटल जी प्रधानमंत्री के रूप में अपना सर्वश्रेष्ठ भारत को दिया और सबसे बड़ी बात वे एक अच्छे इंसान भी थे। स्पष्ट वक्ता होने के कारण उनकी लोकप्रियता भारत में ऐसी बढ़ी, कि वे सर्वमान्य नेता के रूप में आम जनता के साथ सभी दलों के लिए लोकप्रिय थे।
वे एक ऐसे राजनेता थे, जिन्होंने कभी भी किसी से दुर्व्यहार नहीं किया और न ही किसी के उपर व्यक्तिगत लांछन लगाया। वे सच्चे अर्थों में मां भारती के लाडले सपूत थे, जो बच्चों, युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों के बीच अतिलोकप्रिय थे।
देश का हर युवा, बच्चा उन्हें अपना आदर्श मानता था। आजीवन अविवाहित रह कर मां भारती की सेवा करते रहे और उन्होंने अपनी अंतिम सांस भी मां को समर्पित कर दिया। चंूकि वे आजीवन अविवाहित रहे, जिसके कारण उनकी संतान नहीं थी, लेकिन पूरे भारतवासी उनके संतान बन गए और उन्होंने भारत की हर संतान को खुशहाल बनाने की दृढ़ प्रतिज्ञा लेकर भारत को आगे ऊंचाईयों तक ले जाने के लिए प्रयास करते रहे और लोगों को पहली बार लगा कि भारत में सुशासन की स्थापना हुई है।
उनके कार्यों के बदौलत ही उन्हें भारत के ढांचागत विकास का दूरदृष्टा कहा जाता है। विरोधियों का भी दिल जीतने की ताकत अटल जी में थी और वे जब तक जीए, बेदाग रहे। उनका पूरा जीवन सार्वजनिक था और वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरी माना, तभी तो उन्हें राष्ट्रपुरूष का भी दर्जा दिया गया। अटल जी की बातें और विचार हमेशा तर्कपूर्ण रहते थे और जब वे विपक्ष में रहकर सत्तापक्ष को घेरते, तो बड़े-बड़े राजनेता और मंत्री स्तब्ध रह जाते थे। यहां तक कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू भी अटल जी की बातों को ध्यान से सुना करते थे। जब अटल जी बोलते थे, तो लगता था कि वे राष्ट्र के बारे में बोल रहे हैं, जहां पर राजनीतिक द्वेष का नामोनिशान नहीं रहता। उन्होंने संसद में जब भी बहस की, प्रधानमंत्री से लेकर विधायक तक उनकी बातों को गौर किया और जब अटल जी बोलते तो पूरे सदन में एक ही आवाज गूंजती थी, वह आवाज रहती अटल जी की। 25 दिसम्बर 1924 को भारत में एक ऐसे महापुरूष का जन्म हुआ, जो कालांतर में अटल बिहारी बाजपेयी के नाम से विश्व प्रसिद्ध हुआ। इस युगपुरूष के पिता पं. कृष्ण बिहारी बाजपेयी और माता कृष्णा बाजपेयी धन्य हुए, जिन्होंने इस मां भारती के सच्चे सेवक को जन्म दिया। संघ प्रचारक से लेकर प्रधानमंत्री तक का सफर करने वाले इस भारत रत्न को 16 अगस्त को देश फिर याद करेगा और उनके सुशासन को भी याद करेगा। ग्वालियर में जन्में अटल जी की बीए तक की शिक्षा ग्वालियर के वर्तमान लक्ष्मीबाई कालेज में पूरी हुई। कानपुर के डीएव्ही कालेज से उन्होंने कला में स्नातकोत्तर की उपाधि प्रथम श्रेणी में पास की। वे राजनीति के सविनय सूरज थे, जिनकी उष्मा और राष्ट्रभक्ति से वर्षों तक भारत को राजनीति का स्वर्णीम काल मिला।
सम्पादक की कलम से…
छत्तीसगढ़
रायपुर : विशेष लेख : मिट्टी की सौंधी महक, परंपराओं की खुशबू और लोकजीवन की मिठास
छत्तीसगढ़ जहां हर परंपरा में बसती है संस्कृति की आत्मा
- दीपक कुमार यादव, पीआरओ पर्यटन एवं संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन

आज आधुनिकता और वैश्वीकरण के दौर में भी छत्तीसगढ़ अपनी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजकर आगे बढ़ रहा है। राज्य सरकार, सांस्कृतिक संस्थाएं और स्थानीय समुदाय लोककला, लोकनृत्य और जनजातीय परंपराओं के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं। पर्यटन और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से प्रदेश की कला और संस्कृति को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल रही है।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान समाज की जीवंत चेतना है। यहां की लोक परंपराएं लोगों को प्रकृति से जुड़ना, सामूहिक जीवन जीना और अपनी जड़ों से जुड़े रहना सिखाती हैं। लोकगीतों की मधुर धुन, मांदर की गूंज, त्योहारों की जीवंतता और लोगों की सहज आत्मीयता मिलकर छत्तीसगढ़ को भारतीय संस्कृति की एक अद्वितीय और गौरवशाली पहचान प्रदान करती है।

छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक कला और जीवंत लोकजीवन के लिए पूरे देश में विशेष पहचान रखता है। यहां की संस्कृति मिट्टी की सोंधी खुशबू, लोकगीतों की मधुरता, जनजातीय परंपराओं की आत्मीयता और सामाजिक समरसता से परिपूर्ण है। यह प्रदेश विविधताओं से भरा हुआ ऐसा सांस्कृतिक क्षेत्र है, जहां आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद लोकपरंपराएं आज भी लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी हुई हैं। गांवों की चौपालों से लेकर जनजातीय अंचलों तक यहां की संस्कृति हर पल जीवंत दिखाई देती है।
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रही है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र दक्षिण कोसल के नाम से प्रसिद्ध था। रामायण काल से जुड़े अनेक प्रसंग यहां की धरती से संबंधित माने जाते हैं। जनश्रुतियों के अनुसार भगवान श्रीराम ने अपने वनवास का लंबा समय इसी क्षेत्र में व्यतीत किया था। यही कारण है कि यहां की लोक आस्था, धार्मिक परंपराओं और लोकगीतों में रामकथा का विशेष प्रभाव दिखाई देता है। समय के साथ यहां आदिवासी संस्कृति, ग्रामीण जीवन और विभिन्न समुदायों की परंपराओं ने मिलकर एक अनूठी सांस्कृतिक पहचान का निर्माण किया है।
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का सबसे सशक्त पक्ष यहां की लोकभाषा और लोकगीत हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा की मिठास और सहजता लोगों के व्यवहार में स्पष्ट रूप से झलकती है। यहां बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भावनाओं और लोक जीवन की अभिव्यक्ति है। इसके अलावा सरगुजिहा, हल्बी, गोंडी, कुड़ुख और अन्य जनजातीय बोलियां भी प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध बनाती हैं। ग्रामीण परिवेश में आज भी ददरिया, सुआ गीत, करमा गीत और पंथी गीतों की गूंज सुनाई देती है। इन गीतों में प्रेम, प्रकृति, श्रम, सामाजिक संबंध और लोक आस्था का सुंदर चित्रण मिलता है।
प्रदेश के लोकनृत्य यहां की सांस्कृतिक पहचान को विशेष रूप से दर्शाते हैं। लोकनृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन, सामाजिक उत्सव और धार्मिक आस्था का प्रतीक भी है। पंथी नृत्य सतनामी समाज की धार्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ है, जिसमें संत गुरु घासीदास जी की शिक्षाओं और आध्यात्मिक भावनाओं का प्रभाव दिखाई देता है। राउत नाचा दीपावली के अवसर पर किया जाने वाला प्रसिद्ध लोकनृत्य है। इसी प्रकार करमा नृत्य आदिवासी समाज में प्रकृति और फसल उत्सव से जुड़ा हुआ है। मांदर और ढोल की थाप पर सामूहिक रूप से किया जाने वाला यह नृत्य जनजातीय जीवन की ऊर्जा और उत्साह को अभिव्यक्त करता है। महिलाओं द्वारा किया जाने वाला सुआ नृत्य भी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बस्तर अंचल की जनजातीय संस्कृति छत्तीसगढ़ की आत्मा मानी जाती है। यहां रहने वाले गोंड, मुरिया, हल्बा, भतरा, माड़िया, भतरा और अन्य जनजातीय समुदाय आज भी अपनी पारंपरिक जीवनशैली, वेशभूषा और सांस्कृतिक मूल्यों को संजोए हुए हैं। जनजातीय समाज प्रकृति को जीवन का आधार मानता है। जंगल, नदी, पहाड़ और भूमि यहां केवल संसाधन नहीं, बल्कि आस्था और जीवन के प्रतीक हैं। बस्तर के हाट-बाजार केवल व्यापारिक केंद्र नहीं होते, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल के जीवंत मंच भी होते हैं। यहां लोकगीत, नृत्य, पारंपरिक वाद्ययंत्र और हस्तशिल्प एक साथ दिखाई देते हैं।
छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कला और हस्तशिल्प भी देशभर में विशेष पहचान रखते हैं। बस्तर की ढोकरा कला विश्व प्रसिद्ध है। धातु से बनी पारंपरिक मूर्तियां और कलात्मक वस्तुएं यहां की अद्भुत शिल्पकला का उदाहरण हैं। इसी प्रकार लकड़ी और बांस से निर्मित हस्तशिल्प ग्रामीण और जनजातीय कारीगरों की रचनात्मकता को दर्शाते हैं। मिट्टी के बर्तन, लोक चित्रकला, पारंपरिक आभूषण और गोदना कला भी प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। गोदना केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक विश्वासों का प्रतीक माना जाता है।
छत्तीसगढ़ के त्योहार यहां की लोक संस्कृति को और अधिक जीवंत बनाते हैं। यहां के अधिकांश पर्व कृषि, प्रकृति और लोक आस्था से जुड़े हुए हैं। हरेली किसानों का प्रमुख त्योहार है, जिसमें कृषि उपकरणों की पूजा की जाती है। पोला पर्व बैलों और कृषि संस्कृति के सम्मान का प्रतीक है। तीजा महिलाओं का प्रमुख पर्व है, जो परिवार की सुख-समृद्धि और दांपत्य-जीवन की मंगलकामना के लिए मनाया जाता है। छेरछेरा त्योहार सामाजिक समरसता और अन्नदान की परंपरा को दर्शाता है। इन पर्वों के दौरान लोकगीत, नृत्य और पारंपरिक व्यंजन पूरे वातावरण को उत्सवमय बना देते हैं।
बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपराओं का सबसे भव्य उदाहरण माना जाता है। यह देश का सबसे लंबा चलने वाला दशहरा उत्सव है, जो लगभग 75 दिनों तक मनाया जाता है। यह पर्व शक्ति की आराधना, जनजातीय परंपराओं और सामाजिक सहभागिता का अनूठा संगम है। मां दंतेश्वरी की पूजा के साथ निकलने वाली विशाल रथयात्रा यहां की सांस्कृतिक आस्था का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती है।
छत्तीसगढ़ का खान-पान भी यहां की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। चावल यहां का प्रमुख भोजन है। फरा, चीला, अंगाकर रोटी, ठेठरी-खुरमी, देहरौरी और बोरे बासी जैसे पारंपरिक व्यंजन प्रदेश की विशेष पहचान हैं। बोरे बासी को श्रमशील जीवनशैली और ग्रामीण संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। प्राकृतिक और सादगीपूर्ण भोजन यहां के लोगों के स्वास्थ्य और जीवनशैली से गहराई से जुड़ा हुआ है।
प्रदेश में स्थित प्राचीन मंदिर, ऐतिहासिक स्थल और प्राकृतिक धरोहरें भी इसकी सांस्कृतिक समृद्धि को प्रदर्शित करती हैं। बम्लेश्वरी मंदिर, सिरपुर, बत्तीसा मंदिर और चित्रकोट जलप्रपात जैसे स्थल प्रदेश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को और अधिक समृद्ध बनाते हैं।
कोरबा
मदर्स डे (10 मई) पर विशेष:माँ शब्द नहीं जीवन का एहसास है
विशेष लेख-गुरूनंदन प्रसाद राजवाड़े (कनकी/कोरबा)
जीवन में माँ का स्थान कोई नहीं ले सकता। माँ प्रकृति प्रदत्त जीवन की अमूल्य धरोहर है। हम जीवन में कितनो भी सफल हो जाएं, लेकिन माँ की बराबरी नहीं कर सकते। माँ है तो जीवन की सारी खुशियां होती हैं। माँ पूरे ब्रह्माण्ड में सबसे प्रिय और प्यार का अटूट विश्वास है। ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं, जिसकी कलम माँ की महिमा लिख सके। माँ एहसास है और एहसास सिर्फ अनुभव कर ही प्राप्त किया जा सकता है। सनातन काल से अब तक हुए देवपुरूष एवं कवियों ने माँ की महिमा का गुणगान किया, लेकिन वह संपूर्ण नहीं। माँ पर हम जितनी भी कविता या लेख लिख लें, वह कभी सम्पूर्ण नहीं होता। सम्पूर्ण सिर्फ माँ होती है, न कविता सम्पूर्ण होती है और न ही लेख।

मातृ दिवस पर माँ द्वारा उड़ेले गए दुलार का बखान करने का ही समय नहीं है, संकल्प लेने का भी समय है, कि हम चाहे युवा हो, माँ चाहे बुजूर्ग हो, हर समय उसका ख्याल मन में हो और उसकी हमेशा पूछ परख और ख्याल रखें। माँ ईश्वर तो नहीं, लेकिन ईश्वर से कम भी नहीं।
माँ वह रामायण है, जो जीवन के सुख-दुख में हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। हर संकट को झेलती है और हमें हर संकट से बचाती है। माँ अभिलेख है और हम इस अभिलेख का एक पन्ना। माँ की जगह कोई नहीं ले सकता। माँ जीवन का स्वर्णीम एहसास है और माँ के कदमों में ही स्वर्ग है। माँ का हमेशा ध्यान रखो। माँ जब तक है, उससे बढ़ कर कोई नहीं। जिन्दगी आती-जाती है, लेकिन माँ सदैव अमर और अखण्ड है। हमारे ऋषि-महर्षियों ने माँ को भगवान से भी ऊपर रखा है, क्योंकि माँ के कारण ही हम ईश्वर को जान पाए और ईश्वर से पहले माँ इस धरती पर आई। माँ के जाने के बाद भी वह हमेशा अपनी संतानों के प्रति चिंतित रहती है और उसका एहसास ही हमें जीवन जीने के लिए प्रेरणा देता है।
जब तक माँ इस दुनिया में है, कभी उसकी उपेक्षा मत करना, क्योंकि माँ से बढ़कर इस दुनिया में कोई नहीं। माँ हमारे जीवन का आधार है। माँ है तो घर स्वर्ग है और स्वर्ग में जीवन की खुशियां। छोटी-छोटी खुशियों से हमें बड़ा करने वाली माँ को अंतिम समय में भी आप छोटी-छोटी खुशियों से उसके जीवन को आबाद रखें। माँ की ख्वाहिश ज्यादा नहीं होती, उसे सिर्फ बच्चों का प्यार चाहिए, क्योंकि माँ के लिए बच्चे ही उनका संसार होता है और हमें भी एहसास होना चाहिए कि माँ ही हमारा संसार है।

छत्तीसगढ़
रायपुर : विशेष लेख : ‘सेवा सेतु’: छत्तीसगढ़ में सुशासन और डिजिटल प्रशासन का नया अध्याय
- नितेश चक्रधारी
(सहायक जनसंपर्क अधिकारी)


छत्तीसगढ़ में शासन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और जन-केंद्रित बनाने की दिशा में “सेवा सेतु” एक महत्वपूर्ण पहल बनकर उभरा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार प्रशासनिक सेवाओं को आम नागरिकों तक सरल,त्वरित और डिजिटल माध्यम से पहुंचाने के लिए लगातार प्रयासरत है। इसी सोच का परिणाम है कि अब आय,जाति, निवास प्रमाण-पत्र, विवाह पंजीयन, राशन कार्ड, भू-नक़ल सहित 441 से अधिक शासकीय सेवाएं एक ही ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराई जा रही हैं।

डिजिटल सुशासन का प्रभावी माध्यम
पहले नागरिकों को अलग-अलग विभागों की सेवाओं के लिए विभिन्न कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते थे। प्रमाण-पत्र बनवाने जैसी मूलभूत सेवाओं में समय, श्रम और आर्थिक संसाधनों की बड़ी खपत होती थी। “सेवा सेतु” ने इस पारंपरिक व्यवस्था को बदलते हुए नागरिकों को “वन स्टॉप सॉल्यूशन” उपलब्ध कराया है। अब लोग ऑनलाइन माध्यम से आवेदन कर रहे हैं और निर्धारित समय-सीमा में सेवाओं का लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
राज्य शासन की यह पहल केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति में बदलाव का भी संकेत है। यह व्यवस्था नागरिकों को यह भरोसा दिला रही है कि शासन उनकी सुविधा और अधिकारों को प्राथमिकता दे रहा है।
86 से बढ़कर 441 सेवाएं
छत्तीसगढ़ में पहले ई-डिस्ट्रिक्ट प्लेटफॉर्म के माध्यम से केवल 86 सेवाएं उपलब्ध थीं। समय की आवश्यकता को देखते हुए इसका उन्नत संस्करण “सेवा सेतु” विकसित किया गया,जिसमें अब 441 सेवाएं जोड़ी जा चुकी हैं। इनमें 54 नई सेवाएं शामिल हैं, जबकि विभिन्न विभागों की 329 री-डायरेक्ट सेवाओं का भी सफल एकीकरण किया गया है।
30 से अधिक विभाग इस प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं, जिससे नागरिकों को अलग-अलग पोर्टल या कार्यालयों पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा। इससे प्रशासनिक प्रक्रियाएं अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनी हैं।
समयबद्ध सेवा का भरोसा
छत्तीसगढ़ लोक सेवा गारंटी अधिनियम के अंतर्गत नागरिकों को निर्धारित समय-सीमा में सेवाएं प्राप्त करने का अधिकार दिया गया है। “सेवा सेतु” इसी अधिकार को व्यवहारिक रूप से मजबूत कर रहा है। पिछले 28 महीनों के आंकड़े इस व्यवस्था की प्रभावशीलता को दर्शाते हैं। इस अवधि में 75 लाख 70 हजार से अधिक आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से 68 लाख 41 हजार से अधिक मामलों का निराकरण किया गया। इनमें 95 प्रतिशत से अधिक आवेदन तय समय-सीमा में निपटाए गए। यह आंकड़ा प्रशासनिक दक्षता और जवाबदेही का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।
प्रमाण-पत्र सेवाओं की सबसे अधिक मांग
चिप्स कार्यालय के अनुसार सबसे अधिक आवेदन आय प्रमाण-पत्र के रहे, जिनकी संख्या 32 लाख से अधिक है। इसके अलावा मूल निवास प्रमाण-पत्र, अन्य पिछड़ा वर्ग प्रमाण-पत्र, अनुसूचित जाति एवं जनजाति प्रमाण-पत्र, विवाह प्रमाण-पत्र और भू-नक़ल संबंधी सेवाओं का भी बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ है।
यह दर्शाता है कि नागरिकों की दैनिक जरूरतों से जुड़ी सेवाओं को डिजिटल माध्यम में लाना कितना आवश्यक था। अब ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के लोग भी कॉमन सर्विस सेंटर, लोक सेवा केंद्र और इंटरनेट आधारित सेवाओं के माध्यम से सुविधाओं का लाभ उठा पा रहे हैं।
व्हाट्सएप तक पहुंची सरकारी सेवाएं तकनीक के बढ़ते उपयोग को देखते हुए अब “सेवा सेतु” की सेवाओं को व्हाट्सएप से भी जोड़ा गया है। इससे लोगों को जानकारी प्राप्त करने और सेवाओं तक पहुंचने में और अधिक सुविधा मिल रही है। अब तक 3.3 करोड़ से अधिक डिजिटल ट्रांजेक्शन इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से किए जा चुके हैं। यह कदम डिजिटल इंडिया की अवधारणा को स्थानीय स्तर पर मजबूत करने वाला माना जा रहा है।
पारदर्शिता और विश्वास का नया मॉडल
“सेवा सेतु” केवल एक पोर्टल नहीं, बल्कि नागरिक और शासन के बीच भरोसे का नया सेतु बनता जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक वर्कफ्लो प्रणाली के कारण आवेदन प्रक्रिया की निगरानी संभव हुई है, जिससे पारदर्शिता बढ़ी है और अनावश्यक विलंब में कमी आई है। राज्य सरकार की यह पहल प्रशासनिक सुधार, तकनीकी नवाचार और नागरिक सुविधा का समन्वित उदाहरण है। यदि इसी गति से सेवाओं का विस्तार और गुणवत्ता सुधार जारी रहा, तो “सेवा सेतु” आने वाले समय में देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक मॉडल बन सकता है।
डिजिटल युग में सुशासन का अर्थ केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि उन्हें समय पर और सरल तरीके से जनता तक पहुंचाना है। “सेवा सेतु” इसी सोच को साकार कर रहा है। यह प्लेटफॉर्म छत्तीसगढ़ में प्रशासन को अधिक मानवीय, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है। निश्चित रूप से “सेवा सेतु” आने वाले वर्षों में राज्य की डिजिटल प्रशासनिक पहचान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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