विदेश
ईरान पर हमले के लिए अमेरिका ने बनाया बंकर-बस्टर बम:15 साल में तैयार; चट्टान के 200 फीट नीचे ईरान का एटमी प्रोग्राम तबाह किया
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8 months agoon
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Divya Akashतेहरान,एजेंसी। अमेरिका ने पिछले हफ्ते 21 जून को ईरान की फोर्डो परमाणु साइट पर हमला किया था। इस हमले में अमेरिका ने पहली बार 30,000 पाउंड वजनी GBU-57 सीरीज के ‘बंकर बस्टर’ बमों का इस्तेमाल किया था। ये बम खास तौर पर गहरे बंकरों और जमीन के नीचे बनी साइट्स को नष्ट करने के लिए बनाए गए हैं।
अमेरिकी सेना के चेयरमैन लेफ्टिनेंट जनरल डैन केन ने गुरुवार को बताया कि इन बमों को बनाने में 15 साल लगे। 2009 में जब अमेरिका को ईरान की फोर्डो साइट के बारे में पता चला, तब उनके पास इसे तबाह करने के लिए कोई सही हथियार नहीं था। इसके बाद अमेरिका ने इन शक्तिशाली बमों को डेवलप किया।
अमेरिका ने ईरान के 3 परमाणु ठिकानों पर 7 B-2 बॉम्बर से हमला किया था। B-2 बॉम्बर ने फोर्डो और नतांज साइट पर एक दर्जन से ज्यादा GBU-57 बंकर बस्टर बम गिराए।
1000 फीट प्रति सेकेंड की रफ्तार से हमला किया
ईरान पर अमेरिकी हमले का नाम ऑपरेशन मिडनाइट हैमर था। इस हमले में फोर्डो साइट के दो मुख्य वेंटिलेशन शाफ्ट्स को निशाना बनाया गया। ईरान ने इन शाफ्ट्स को कंक्रीट से बंद करने की कोशिश की थी, लेकिन अमेरिकी सेना ने पहले से इसकी तैयारी कर ली थी।
पहला बम कंक्रीट को तोड़ने के लिए इस्तेमाल हुआ, जिससे शाफ्ट खुल गया। फिर चार बमों को मेन शाफ्ट पर गिराया गया, जो 1,000 फीट प्रति सेकेंड की रफ्तार से साइट के अंदर गिरे और जोरदार विस्फोट किया।
जनरल केन ने बताया कि इस ऑपरेशन में 15 साल की मेहनत शामिल थी। पायलटों, हथियार बनाने वाली टीम और लोड क्रू ने मिलकर इस हमले को सफल बनाया।
GBU-57 बंकर बम – दुनिया का सबसे शक्तिशाली हथियार
GBU-57 को मासिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर (MOP) भी कहते हैं, एक ऐसा बम है जो जमीन के 60 मीटर (200 फीट) नीचे तक घुसकर विस्फोट कर सकता है। यह बम खास तौर पर गहरे बंकरों और सुरक्षित ठिकानों को तबाह करने के लिए बनाया गया है।

वॉशिंगटन के सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के मासाओ डाहलग्रेन ने बताया कि इस बम में मोटी स्टील की परत होती है, जो चट्टानों और कंक्रीट को तोड़कर अंदर घुस सकती है। इसमें एक खास फ्यूज भी है, जो भारी दबाव और झटके सहने के बाद भी सही समय पर विस्फोट करता है।
B-2 विमानों से ही गिराया जा सकता है GBU-57 बम
यह बम केवल B-2 स्पिरिट स्टेल्थ बॉम्बर विमान से ही गिराया जा सकता है। B-2 एक ऐसा विमान है जो दुश्मन की मजबूत डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकता है और 9,600 किलोमीटर तक बिना रुके उड़ सकता है।
21 जून को ईरान की परमाणु साइट्स पर हमले में अमेरिका ने 7 B-2 विमानों का इस्तेमाल किया। यह अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा B-2 हमला था और दूसरा सबसे लंबा B-2 मिशन।
जनरल डैन केन ने बताया कि कुछ B-2 विमानों को प्रशांत महासागर की ओर भेजा गया ताकि दुश्मन का ध्यान भटकाया जाए, जबकि असली हमला करने वाले विमान दूसरी दिशा में गए। यह एक सीक्रेट प्लानिंग थी, जिसके बारे में सिर्फ कुछ चुनिंदा लोग जानते थे।
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इलॉन मस्क की AI कंपनी चांद पर फैक्ट्री लगाएगी:इससे सूर्य की ऊर्जा कैप्चर होगी, मस्क बोले- ये शायद इंसानों को एलियन से मिला सके
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13 hours agoon
February 12, 2026By
Divya Akashवॉशिंगटन,एजेंसी। दुनिया के सबसे अमीर इंसान इलॉन मस्क चांद पर AI सैटेलाइट फैक्ट्री लगाएंगे। मस्क ने बताया कि वे इसके जरिए सूरज की ऊर्जा कैप्चर करना चाहते हैं। मस्क ने अपनी AI कंपनी XAI की इंटरनल मीटिंग का 45 मिनट का वीडियो पोस्ट किया, जिसमें ये जानकारी सामने आई है।
इलॉन मस्क की मीटिंग से जुड़ी बड़ी बातें…
1. सूरज की ऊर्जा का इस्तेमाल
मस्क ने कहा अगर हम आज की मानव सभ्यता की ऊर्जा खपत को देखें, तो हम पृथ्वी की संभावित ऊर्जा का केवल 1% हिस्सा ही इस्तेमाल कर रहे हैं।
अगर हम सूरज की कुल ऊर्जा का 10 लाखवां हिस्सा भी हासिल कर लें, तो वह आज की सभ्यता द्वारा उपयोग की जाने वाली ऊर्जा से करीब 10 लाख गुना ज्यादा होगी।
सूरज हमारे सौर मंडल के कुल द्रव्यमान का 99.8% है। अगर हमें सूरज की ऊर्जा का सही इस्तेमाल करना है, तो हमें पृथ्वी की सीमा से बाहर निकलना ही होगा।
‘मास ड्राइवर’ से डीप स्पेस में चांद से लॉन्च होंगे सैटेलाइट्स
हमारा अगला कदम ‘अर्थ ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स’ है। हम स्पेसएक्स की मदद से हर साल 100 से 200 गीगावाट क्षमता वाले डेटा सेंटर्स अंतरिक्ष में लॉन्च करेंगे।
उन्होंने कहा अगर हमें 1 टेरावॉट से भी आगे जाना है, तो चांद पर जाना होगा। मस्क ने बताया वे चांद पर ऐसी फैक्ट्रियां बनाएंगे जो एआई सैटेलाइट्स तैयार करेंगी।
वहां एक ‘मास ड्राइवर’ भी लगाया जाएगा। यह चांद से एआई सैटेलाइट्स को सीधे डीप स्पेस में लॉन्च करेगा। इससे हम सूरज की ऊर्जा के कुछ प्रतिशत हिस्से तक पहुंच पाएंगे।

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्चर चांद से सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में छोड़ेगा।
पूरे सौर मंडल में कहीं भी इंसानी बस्तियां बसा सकेंगे
मस्क का विजन असल में ‘डाइसन स्फीयर’ के कॉन्सेप्ट पर आधारित है। यह एक ऐसा विशाल ढांचा होता है जो ऊर्जा को कैप्चर करने के लिए पूरे सूरज को चारों तरफ से ढक लेता है।
मस्क चांद पर ‘मास ड्राइवर’ के जरिए जो एआई सैटेलाइट्स भेजेंगे, वे धीरे-धीरे सूरज के चारों ओर ऐसा ही एक जाल या घेरा बनाएंगे। इससे हमारे पास इतनी बिजली होगी कि हम पूरे सौर मंडल में कहीं भी इंसानी बस्तियां बसा सकेंगे और बड़े से बड़े स्पेसशिप चला सकेंगे।

‘डाइसन स्फीयर’ एक मेगास्ट्रक्चर है, जिसे किसी तारे (जैसे सूरज) के चारों ओर उसकी ऊर्जा का पूरी तरह इस्तेमाल करने के लिए बनाया जा सकता है।
2. फाउंडिंग टीम के 12 मेंबर्स में से 6 को निकाला
मीटिंग में मस्क ने बताया कि कंपनी से कई पुराने कर्मचारियों को बाहर कर दिया गया है। इसमें कंपनी की शुरुआत करने वाली फाउंडिंग टीम के सदस्य भी शामिल हैं।
xAI की शुरुआत करने वाले 12 मुख्य सदस्यों में से अब केवल आधे ही मस्क के साथ बचे हैं। मस्क ने इसे कंपनी के ‘ऑर्गेनाइजेशनल स्ट्रक्चर’ में बदलाव का नाम दिया है।
3. चार टीमों में बंटी xAI, ‘मैक्रोहार्ड’ प्रोजेक्ट सबसे खास
- ग्रोक टीम: यह चैटबॉट और वॉयस फीचर्स पर काम करेगी।
- कोडिंग टीम: एप के सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए।
- इमेजिन टीम: यह वीडियो जेनरेशन टूल पर फोकस करेगी।
- मैक्रोहार्ड प्रोजेक्ट: यह कंप्यूटर सिम्युलेशन से लेकर पूरी कंपनियों की मॉडलिंग करेगी। इसका लक्ष्य एआई के जरिए रॉकेट इंजन तक डिजाइन करना है।
यह प्रोजेक्ट सिर्फ साधारण सॉफ्टवेयर नहीं बनाएगा, बल्कि पूरी की पूरी कंपनियों का ‘डिजिटल सिमुलेशन’ तैयार करेगा। इसका मतलब है कि एआई एक कंपनी के हर विभाग, सप्लाई चेन और बिजनेस फैसलों का एक कंप्यूटर मॉडल बना देगा। इससे किसी भी बड़े फैसले को असल में लागू करने से पहले एआई पर टेस्ट किया जा सकेगा कि उसका नतीजा क्या होगा।
मैक्रोहार्ड का एक बड़ा लक्ष्य एआई के जरिए जटिल मशीनों को डिजाइन करना है। यह एआई इतना एडवांस होगा कि खुद ही रॉकेट के इंजन और उनके पार्ट्स के डिजाइन तैयार करेगा, जिससे इंसानी गलती की गुंजाइश खत्म हो जाएगी और काम की रफ्तार कई गुना बढ़ जाएगी।
4. इंसानों की जगह सॉफ्टवेयर खुद लिखेगा पूरा प्रोग्राम
अब AI मॉडल्स किसी भी समस्या को एक अनुभवी इंजीनियर की तरह समझते हैं। अगर प्रोग्राम में कोई गलती आती है, तो वे उसे ढूंढकर खुद ही ठीक भी कर सकते हैं।
मस्क ने कहा कि इस साल के अंत तक शायद कोडिंग लिखने की जरूरत ही न पड़े। AI सीधे ‘बाइनरी’ (कंप्यूटर की अपनी भाषा यानी 0 और 1) में फाइलें बना देगा। यह काम किसी भी इंसानी प्रोग्रामर या मौजूदा सॉफ्टवेयर (कंपाइलर) से कहीं ज्यादा बेहतर और तेज होगा।
मस्क का दावा है कि अगले 2-3 महीनों में उनका ‘ग्रोक कोड’ दुनिया का सबसे बेहतरीन कोडिंग मॉडल बन जाएगा, जो चुटकियों में जटिल से जटिल सॉफ्टवेयर तैयार कर देगा।

मस्क ने भविष्यवाणी की है कि इस साल के अंत तक शायद कोडिंग लिखने की जरूरत ही न पड़े।
5. AI बना पाएगा 20 मिनट तक लंबे वीडियो
XAI की इमेजिन टीम साल के अंत तक ऐसे मॉडल्स लाएगी जो एक बार में 10 से 20 मिनट के लंबे वीडियो बना सकेंगे। इसमें किसी मानवीय दखल की भी जरूरत नहीं पड़ेगी।
6. ‘मेम्फिस क्लस्टर’ धरती का सबसे बड़ा सुपरकंप्यूटर
मस्क के पास दुनिया का सबसे बड़ा GPU क्लस्टर है। ये 24 घंटे बिना रुके काम करता है। इसका मुख्य काम AI चैटबॉट ‘ग्रोक’ के अगले और एडवांस वर्जन को ट्रेनिंग देना है। यहां हजारों ऑपरेटिंग सिस्टम एक साथ मिलकर विशाल दिमाग की तरह काम कर रहे हैं।
मस्क की टीम ने इस प्रोजेक्ट के बारे में बताया कि डेटा सेंटर का एक बड़ा हिस्सा मात्र 6 हफ्ते में तैयार किया गया है। हॉल के अंदर 1363 किलोमीटर लंबी फाइबर केबल बिछाई गई है। पूरा क्लस्टर तैयार होने पर यह 1 गीगावाट से ज्यादा बिजली खर्च करेगा।
7. छत पर लिखवाया ‘मैक्रो हार्ड’
मस्क ने अपनी सफलता का मंत्र ‘कंप्यूट एडवांटेज’ (ज्यादा से ज्यादा मशीनी ताकत) को बताया। एनवीडिया के CEO जेन्सेन हुआंग ने भी माना कि मस्क जितनी तेजी से एआई इंफ्रास्ट्रक्चर दुनिया में कोई नहीं बना सकता। मस्क ने डेटा सेंटर की छत पर ‘Macro Hard’ (माइक्रोसॉफ्ट के नाम पर तंज) लिखवाया है।

मस्क ने डेटा सेंटर की छत पर ‘Macro Hard’ (माइक्रोसॉफ्ट के नाम पर तंज) लिखवाया है।
8. ग्रोक वॉइस और ‘एवरीथिंग एप’ का विजन
वॉइस टीम ने बताया कि सितंबर 2024 तक उनके पास कोई वॉइस मॉडल नहीं था, लेकिन सिर्फ 6 महीने में उन्होंने स्क्रैच से ऐसा मॉडल बनाया जो ओपन एआई को टक्कर दे रहा है। उनका लक्ष्य इसे सिर्फ सवाल-जवाब तक सीमित न रखकर एक ‘एवरीथिंग एप’ बनाना है।

विदेश
अमेरिका ने इंडियन मैप वाला पोस्ट हटाया:PoK-अक्साई चिन को भारत का हिस्सा दिखाया था, पाकिस्तान-चीन से तनाव की अटकलें लगी थीं
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2 days agoon
February 11, 2026By
Divya Akashवॉशिंगटन डीसी,एजेंसी। अमेरिका ने बुधवार को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) और अक्साई चिन (चीन के कब्जे वाला इलाका) को भारत का हिस्सा दिखाने वाला पोस्ट डिलीट कर दिया है।
यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) ने 7 फरवरी को भारत-अमेरिका के बीच हुए ट्रेड एग्रीमेंट के बाद किए गए पोस्ट में इंडियन मैप शेयर किया था। जारी होने के बाद यह नक्शा चर्चा में आ गया था।
अब तक अमेरिकी एजेंसियां इंडियन मैप में PoK और अक्साई चिन को विवादित इलाके के तौर पर अलग रंग या ‘डॉटेड लाइन्स’ से दिखाती थी। हालांकि, इस पोस्ट में ऐसा कोई निशान या लाइन नहीं थी, बल्कि पूरे क्षेत्र को भारत का अभिन्न हिस्सा दिखाया गया था।
इस बदलाव के बाद कई एक्सपर्ट का कहना था कि पाकिस्तान और चीन के साथ अमेरिका के रिश्तों में तनाव के बीच यह कदम भारत के समर्थन का संकेत हो सकता है। वहीं, कुछ लोगों ने इसे गलती से जारी हुआ बताया। इन तमाम अटकलों के बीच अब USTR ने यह पोस्ट हटा दिया है। हालांकि, इस पर फिलहाल कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
अमेरिका ने यह इंडियन मैप शेयर किया था…

अमेरिकी ट्रेड ऑफिस ने यह इंडियन मैप अंतरिम व्यापार समझौते के फ्रेमवर्क के ऐलान के साथ पोस्ट किया था, जिसे अब हटा दिया गया है।
PoK को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच लंबे समय से विवाद
भारत और पाकिस्तान के बीच PoK विवाद जम्मू-कश्मीर क्षेत्र से जुड़ा सबसे पुराना विवाद है। यह 1947 से चला आ रहा है और दोनों देशों के बीच युद्ध, तनाव और कूटनीतिक लड़ाई का कारण बना हुआ है।
विवाद की शुरुआत
- 1947: भारत-पाकिस्तान विभाजन- भारत के विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर एक रियासत (प्रिंसली स्टेट) थी, जिसके महाराजा हरि सिंह हिंदू थे, लेकिन आबादी में मुस्लिम बहुमत में थे। विभाजन के नियम के अनुसार, रियासतें भारत या पाकिस्तान में शामिल हो सकती थीं या स्वतंत्र रह सकती थीं।
- 1947-48: पहला भारत-पाकिस्तान युद्ध- पाकिस्तान से आए मिलिशिया ने कश्मीर पर हमला किया। महाराजा हरि सिंह ने मदद के लिए भारत से संपर्क किया और 26 अक्टूबर 1947 को इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन (विलय पत्र) पर हस्ताक्षर किए, जिससे जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया। भारत ने सैन्य मदद भेजी।युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने क्षेत्र के पश्चिमी और उत्तरी हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसे अब PoK कहा जाता है। 1949 में UN की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ और सीजफायर लाइन (बाद में लाइन ऑफ कंट्रोल – LoC) बनाई गई, जो दोनों देशों के नियंत्रण को अलग करती है।
- भारत का दावा- भारत कहता है कि पूरा जम्मू-कश्मीर (PoK सहित) उसका अभिन्न अंग है, क्योंकि महाराजा ने भारत में विलय किया था। 2019 में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। भारत PoK को अवैध कब्जा मानता है और इसे वापस लेने की बात करता है।
- पाकिस्तान का दावा- पाकिस्तान कहता है कि कश्मीर मुस्लिम बहुल क्षेत्र है, इसलिए वह पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए। पाकिस्तान PoK को आजाद कश्मीर कहता है और वहां अपनी तरह की सरकार चलाता है। पाकिस्तान UN के पुराने प्रस्तावों का हवाला देता है, जिसमें कश्मीरियों को जनमत संग्रह का अधिकार देने की बात थी।
पाकिस्तानी PM बोले थे- कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा
अमेरिका के मैप शेयर करने से पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 5 फरवरी को बयान जारी कर कहा था कि कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा।
शहबाज शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान कश्मीरियों के साथ मजबूती से खड़ा है और जम्मू-कश्मीर विवाद का हल कश्मीर के लोगों की इच्छा के मुताबिक होना चाहिए। शहबाज ने कहा कि जम्मू-कश्मीर विवाद का समाधान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्तावों को लागू करने से ही हो सकता है।
उन्होंने कहा, ‘मैं पाकिस्तानी लोगों और पाकिस्तानी नेतृत्व की ओर से कश्मीर के अपने भाइयों के साथ एकजुटता दिखाने आया हूं।’ उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने इस क्षेत्र को पाकिस्तान की लाइफ लाइन बताया था।
शहबाज बोले- कश्मीर का मुद्दा हमारी फॉरेन पॉलिसी की नींव है
शहबाज शरीफ ने कहा कि कश्मीर का मुद्दा पाकिस्तान की फॉरेन पॉलिसी का आधार है। शहबाज ने भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में हुए चार दिवसीय सैन्य संघर्ष को भी याद किया। उन्होंने दावा किया कि इस संघर्ष के बाद कश्मीर मुद्दा एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी ताकत के साथ उठाया गया है।
उन्होंने आरोप लगाया कि भारत अब प्रॉक्सी के जरिए आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। पाकिस्तान, मिलिटेंट ग्रुप बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) को भारत का समर्थन मिलने का दावा करता है, जबकि भारत ऐसे आरोपों को हमेशा खारिज करता रहा है।

देश
अब रूस नहीं, अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदेगा भारत:दावा- सरकारी कंपनियों को अमेरिकी क्रूड लेने को कहा, ट्रेड डील के बाद फैसला
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2 days agoon
February 11, 2026By
Divya Akashनई दिल्ली,एजेंसी। भारत सरकार ने देश की सरकारी तेल रिफाइनरी कंपनियों से कहा है कि वे अब अमेरिका और वेनेजुएला से ज्यादा कच्चा तेल खरीदने पर विचार करें। अमेरिकी मीडिया ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है।
ब्लूमबर्ग के मुताबिक, अमेरिका के साथ हुई हालिया ट्रेड डील के बाद भारत सरकार ने यह अनुरोध किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने ट्रेड डील के ऐलान के दौरान कहा था कि भारत ने रूसी तेल का आयात पूरी तरह बंद करने का वादा किया है।
प्राइवेट डील के जरिए क्रूड मंगाने की तैयारी
सरकार ने कंपनियों से कहा है कि जब भी टेंडर के जरिए स्पॉट मार्केट से तेल खरीदें, तो अमेरिकी तेल को प्राथमिकता दें। सरकार ने वेनेजुएला के कच्चे तेल को लेकर भी ऐसा अनुरोध किया है। हालांकि वेनेजुएला का तेल व्यापारियों के साथ प्राइवेट बातचीत से मंगाया जाएगा।
सरकार बोली- देश की ऊर्जा सुरक्षा पहले
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि भारत व्यापार समझौते के हिस्से के रूप में रूसी कच्चा तेल लेना बंद करने पर सहमत हो गया है। हालांकि, भारत ने अब तक सार्वजनिक रूप से इस दावे पर सीधा कोई जवाब नहीं दिया है। भारत का कहना रहा है कि वह अपने तेल के स्रोतों में विविधता ला रहा है और देश की ऊर्जा सुरक्षा उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
अमेरिकी तेल मंगाने में 2 बड़ी चुनौतियां
विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय रिफाइनरीज के लिए अमेरिकी और वेनेजुएला का तेल बड़े पैमाने पर लेना इतना आसान नहीं है। इसकी दो मुख्य वजहें हैं:
- रिफाइनिंग क्षमता: भारत की ज्यादातर रिफाइनरीज ‘मीडियम क्रूड’ के हिसाब से बनी हैं, जबकि अमेरिकी तेल ‘लाइट और स्वीट’ यानी कम सल्फर वाला होता है। इसे प्रोसेस करना भारतीय यूनिट्स के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं है।
- लागत और मालभाड़ा: अमेरिका से भारत की दूरी बहुत ज्यादा है। बढ़ते फ्रेट रेट्स (मालभाड़ा) के कारण वहां से तेल मंगाना महंगा पड़ता है। इसकी तुलना में कजाकिस्तान और पश्चिम अफ्रीका से तेल मंगाना सस्ता और नजदीक पड़ता है।
सरकारी कंपनियों ने 40 लाख बैरल क्रूड मंगाया
हाल ही में सरकारी कंपनियों जैसे IOC, BPCL और HPCL ने वेनेजुएला से करीब 40 लाख बैरल तेल खरीदा है। निकोलस मादुरो सरकार पर अमेरिकी नियंत्रण के बाद अब विटोल और ट्रेफिगुरा जैसी बड़ी कंपनियां वेनेजुएला के तेल की मार्केटिंग कर रही हैं। निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी रिलायंस ने भी 2025 के मध्य के बाद पहली बार वेनेजुएला से तेल की खेप खरीदी है।
अमेरिका से तेल का आयात लगभग दोगुना करने का लक्ष्य
भारतीय रिफाइनर हर साल अमेरिका से करीब 4 लाख बैरल प्रतिदिन तेल ले सकते हैं। यह पिछले साल के 2.25 लाख बैरल प्रतिदिन के मुकाबले काफी ज्यादा होगा।
हालांकि, ये कीमत और रूस के साथ कूटनीतिक संबंधों पर टिका है। फिलहाल पेट्रोलियम मंत्रालय और सरकारी तेल कंपनियों ने इस मामले में आधिकारिक टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है।
भारत ने 2019 के बाद वेनेजुएला से तेल लेना बंद कर दिया था
अमेरिका ने 2019 में वेनेजुएला पर सेंक्शंस लगा दिए थे। इस वजह से भारत समेत कई देशों ने वेनेजुएला का तेल खरीदना बंद कर दिया था। वेनेजुएला पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (OPEC) का सदस्य है। उसके पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, लेकिन वह वैश्विक सप्लाई का करीब 1% ही देता है।
भारत ने 2024 में दोबारा वेनेजुएलाई तेल खरीदना शुरू किया
अमेरिका ने कुछ समय के लिए (2023-2024 में) वेनेजुएला पर आंशिक रूप से सेंक्शंस ढीले किए, जिससे भारत ने फिर से वेनेजुएला से तेल खरीदा।
- 2024 में भारत का आयात औसतन 63,000 से 1 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया।
- 2025 में वेनेजुएला से भारत का तेल आयात बढ़कर करीब 1.41 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
- मई 2025 में अमेरिका ने एक बार फिर से वेनेजुएला के तेल पर सख्ती बढ़ा दी।


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