बालकोनगर। किसी गांव में जब किसान अपनी फसल के लिए बारिश का इंतजार करने के बजाय सिंचाई के भरोसे दूसरी और तीसरी फसल लेने लगे, जब किसी महिला के हाथों का हुनर परिवार की आय का जरिया बन जाए, जब किसी युवा को कौशल प्रशिक्षण के बाद रोजगार का अवसर मिले और जब किसी बच्चे को गांव की आंगनबाड़ी में बेहतर शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य सुविधाएं मिलें, तब विकास केवल एक आंकड़ा नहीं रहता, वह जीवन में दिखाई देने वाला बदलाव बन जाता है।
भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) की सामुदायिक विकास यात्रा समुदाय के साथ मिलकर दीर्घकालिक बदलाव की सोच पर केंद्रित है। वित्तीय वर्ष 2026 में बालको की पहल ने 123 गांवों में 1.80 लाख लोगों तक पहुंच बनाई। शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, महिला सशक्तिकरण, सामुदायिक अधोसंरचना और खेल के माध्यम से लोगों की क्षमताओं को मजबूत किया गया। किसान आधुनिक कृषि अपनाकर दूसरों को प्रशिक्षित कर रहे हैं, महिलाएं स्वयं सहायता समूहों और उद्यमों का संचालन कर रही हैं तथा युवा कौशल के माध्यम से रोजगार और नेतृत्व के अवसर हासिल कर रहे हैं। यह साझी भागीदारी विकास को केवल परियोजना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और स्थायी सामाजिक बदलाव की यात्रा बनाती है।
जीवन के हर पड़ाव से जुड़ा विकास
बालको की सामुदायिक विकास रणनीति ‘मानव जीवन चक्र आधारित दृष्टिकोण’ पर आधारित है, जिसमें व्यक्ति और परिवार के जीवन के विभिन्न चरणों की जरूरतों को ध्यान में रखकर कार्यक्रम तैयार किए जाते हैं। प्रारंभिक बाल्यावस्था में पोषण और शिक्षा से लेकर स्कूली शिक्षा, कौशल, रोजगार, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामुदायिक कल्याण तक निरंतर विकास पर ध्यान दिया गया है।
इसी सोच का उदाहरण नंद घर हैं, जहां आंगनबाड़ी केंद्रों को आधुनिक और बच्चों के अनुकूल सीखने के स्थानों में विकसित किया गया है। वित्तवर्ष 2026 में 111 नंद घरों से बच्चों और माताओं को लाभ मिला। 7,226 विद्यार्थियों को डिजिटल कक्षाओं का सहयोग मिला, जबकि 400 से अधिक विद्यार्थी शैक्षणिक एवं रचनात्मक गतिविधियों से जुड़े। 800 से अधिक आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को प्रशिक्षण दिया गया तथा चिन्हित कुपोषित बच्चों में 75 प्रतिशत में स्वास्थ्य सुधार दर्ज हुआ।
शिक्षा के क्षेत्र में बालको ने सरकारी स्कूलों में डिजिटल कक्षाओं, रिमेडियल एजुकेशन और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों को बढ़ावा दिया। बालको कनेक्ट कोचिंग कार्यक्रम के तहत प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए कोरबा और कवर्धा में 2 कोचिंग केंद्र संचालित किए गए। वित्तवर्ष 2026 में 84 अभ्यर्थियों का सरकारी परीक्षाओं में चयन हुआ। इन प्रयासों ने युवाओं को बेहतर मार्गदर्शन, आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास के साथ अपने भविष्य को नई दिशा देने का अवसर दिया।
कृषि नवाचार और तकनीक से खेती में नया विश्वास
ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक स्थिरता का मजबूत आधार आज भी कृषि है। इसी सोच के साथ मोर जल मोर माटी कार्यक्रम के माध्यम से जल सुरक्षा, आधुनिक कृषि और आय के विविध स्रोतों को एक साथ जोड़ा गया है। वित्तवर्ष 2026 में यह पहल 40 गांवों के 9,420 किसानों तक पहुंची और 1,400 एकड़ से अधिक कृषि भूमि के लिए सिंचाई सुरक्षा को मजबूत किया गया।
जल संरक्षण की विभिन्न व्यवस्थाओं, सूक्ष्म सिंचाई और लिफ्ट सिंचाई के साथ किसानों को आधुनिक कृषि पद्धतियों, उन्नत गुणवत्ता वाले बीजों के चयन, मिट्टी की जांच तथा फसल में कीट एवं पोषक तत्वों के समुचित प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया।
इसके परिणामस्वरूप 80 प्रतिशत किसानों ने आधुनिक और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियां अपनाईं। इससे उत्पादन में लगभग 1.25 से 1.5 गुना वृद्धि, औसत कृषि आय में लगभग 50 प्रतिशत वृद्धि और खेती की लागत में 25 से 30 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। जल सुरक्षा से 3,000 से अधिक किसानों ने दूसरी और तीसरी फसल लेना शुरू किया। पशुपालन, लाख उत्पादन, बागवानी और मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों से आय के वैकल्पिक स्रोत भी विकसित हुए। इस तरह खेती अधिक स्थायी आजीविका का आधार बनी।
वेदांता स्किल स्कूल: कौशल से रोजगार तक
ग्रामीण युवाओं को रोजगार योग्य बनाने में वेदांता स्किल स्कूल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। वित्तवर्ष 2026 में कोरबा, कवर्धा और सरगुजा स्थित तीन केंद्रों में 1,202 युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया, जिनमें से 82 प्रतिशत युवाओं ने रोजगार या उद्यमिता से जुड़ाव हासिल किया। रोजगार उपलब्ध कराने वाली 75 संस्थाओं का नेटवर्क 12 राज्यों तक विस्तारित हुआ।
प्रशिक्षण में 61 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी रही, जबकि 59 प्रतिशत प्रतिभागी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदायों से थे। तकनीकी प्रशिक्षण के साथ युवाओं को व्यक्तित्व विकास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीक से परिचय, औद्योगिक भ्रमण, सुरक्षा प्रशिक्षण, स्वास्थ्य संबंधी सत्र और कर्मचारियों का मार्गदर्शन भी मिला। यह पहल युवाओं में ज्ञान, कौशल, आत्मविश्वास और कार्यक्षमता विकसित कर उन्हें बदलती अर्थव्यवस्था और उद्योग की जरूरतों के अनुरूप तैयार कर रही है।
उन्नति परियोजना: लाभार्थी से नेतृत्वकर्ता तक
बालको के सामुदायिक विकास प्रयासों में महिला सशक्तिकरण को आर्थिक और सामाजिक बदलाव का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है। उन्नति परियोजना के माध्यम से महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों, वित्तीय समावेशन और उद्यमिता से जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाने का प्रयास किया गया है। वित्तवर्ष 2026 में 40 नए स्वयं सहायता समूह बनाए गए, जिससे कुल संख्या बढ़कर 561 समूह और 6,003 महिलाओं तक पहुंची। इनमें 2,259 महिलाएं आर्थिक रूप से सक्रिय हैं। समूहों की सामूहिक बचत बढ़कर 0.92 करोड़ रुपये हुई, जबकि 90 प्रतिशत समूह नियमित बैठकों और आंतरिक ऋण व्यवस्था में सक्रिय रहे। 19 स्वयं सहायता समूहों को बैंक से जोड़ा गया, जिससे लगभग 27 लाख रुपये का ऋण सहयोग मिला। उन्नति महासंघ के सहयोग से उनाटेक्स, डेकोराती, छत्तीसा, क्लिनला, मशरूम उत्पादन और कोसाकारी के अंतर्गत कोसा रेशम जैसे उद्यमों से 600 से अधिक महिलाएं जुड़ीं और लगभग 20 लाख रुपये का राजस्व अर्जित हुआ। वहीं 21 सूक्ष्म उद्यमों के माध्यम से 104 महिलाओं को अवसर मिला और प्रति महिला लगभग 3,500 रुपये प्रतिमाह अतिरिक्त आय का अवसर बना।
कोसा रेशम: विरासत से आजीविका तक
छत्तीसगढ़ की पारंपरिक पहचान को आधुनिक बाजार से जोड़ने के लिए वित्तीय वर्ष 2025-26 में कोसाकारी पहल की शुरुआत की गई। धनगांव में कोसा बुनाई प्रशिक्षण केंद्र स्थापित कर 20 महिला बुनकरों को प्रशिक्षण दिया गया। ‘कोसाकारी’ नाम से ब्रांड और डिजिटल मंच की शुरुआत ने बुनकरों को बाजार से जोड़ने और उनके उत्पादों को व्यापक पहचान दिलाने की दिशा में नई राह खोली।
स्वास्थ्य: बेहतर उपचार आपके द्वार
स्वास्थ्य के क्षेत्र में बालको ने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर अत्याधुनिक कैंसर उपचार तक बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित की है। आरोग्य परियोजना के माध्यम से वित्तवर्ष 2026 में 93,442 लोगों तक सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई गईं। तीन ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में 4,799 मरीजों को ओपीडी सेवाएं मिलीं।
65 आंगनबाड़ियों में 3,340 बच्चों की स्वास्थ्य जांच की गई, जिसमें 915 कुपोषित बच्चों की पहचान हुई। 95 प्रतिशत बच्चों की पोषण स्थिति में सुधार दर्ज किया गया। 2,310 महिलाओं की एनीमिया जांच में 92 प्रतिशत महिलाओं के हीमोग्लोबिन स्तर में सुधार हुआ। दो मोबाइल स्वास्थ्य वाहनों ने 70 बस्तियों में पखवाड़ेवार सेवाएं दीं, जिनका 26,500 लोगों ने लाभ लिया।
नवा रायपुर स्थित बालको मेडिकल सेंटर ने उन्नत कैंसर उपचार की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। वित्तीय वर्ष 2025-26 में 17,290 मरीजों ने सामुदायिक विकास सहायता के तहत उपचार सेवाओं का लाभ लिया। केंद्र में 2,800 सर्जरी, 16,891 कीमोथेरेपी और 1,635 रेडियोथेरेपी उपचार हुए। साथ ही, मध्य भारत की पहली दा विंची एक्सआई रोबोट आधारित कैंसर शल्य चिकित्सा प्रणाली स्थापित की गई।
बेहतर जीवन के लिए सामुदायिक सुविधाएं
विकास का अर्थ बुनियादी सुविधाओं तक सम्मानजनक पहुंच भी है। वित्तवर्ष 2026 में बालको ने 4 सामुदायिक भवन, 12 सामुदायिक शौचालय और 2 सामुदायिक मंच बनाए, जिनसे 7,500 से अधिक लोगों को लाभ मिला। इन सुविधाओं ने स्वच्छता के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक गतिविधियों के लिए साझा स्थान उपलब्ध कराए।
खेल और संस्कृति से नई उड़ान
युवाओं की प्रतिभा को पहचानने और उन्हें अवसर देने के लिए लक्ष्यवेद-बालको तीरंदाजी कार्यक्रम शुरू किया गया। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक तीरंदाजी विरासत को आधुनिक प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं से जोड़ते हुए 29 स्कूलों में तीरंदाजी प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए। 1,200 से अधिक विद्यार्थियों की जांच हुई और 70 प्रतिभागियों ने चयन परीक्षण में सफलता हासिल की।
आंकड़ों से आगे, बदलाव की कहानी
1.80 लाख लोगों तक पहुंच बालको की सामुदायिक विकास यात्रा का महत्वपूर्ण आंकड़ा है, लेकिन इसकी असली पहचान उन बदलावों में है, जो लोगों के जीवन में दिखाई देते हैं। किसान का बढ़ा आत्मविश्वास, महिला की आर्थिक निर्णय लेने की क्षमता, कौशल और रोजगार से जुड़ता युवा, बेहतर सीखने के अवसर पाता बच्चा और समय पर स्वास्थ्य सेवा से मजबूत होता परिवार, यही इस यात्रा की वास्तविक उपलब्धियां हैं।
बालको का प्रयास सामुदायिक विकास को परियोजनाओं तक सीमित रखने के बजाय साझी विकास यात्रा बनाना है, जहां समुदाय अपनी क्षमताओं को मजबूत कर भविष्य की चुनौतियों का सामना स्वयं कर सके। स्थायी विकास तभी संभव है, जब सहयोग आत्मविश्वास में, आत्मविश्वास क्षमता में और क्षमता पूरे समुदाय की ताकत में बदल जाए। यही बालको की भावना है, प्रेरित करना, सक्षम बनाना और समुदाय के साथ मिलकर बेहतर, समावेशी और आत्मनिर्भर भविष्य का निर्माण करना।
कोरबा। कोरबा के सीतामढ़ी में नहर में कूदे सतीश रजक का तीन दिन बाद भी पता नहीं चल सका है। गोताखोरों की टीम लगातार उसकी तलाश कर रही है, लेकिन नहर में पानी का बहाव तेज होने के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन में परेशानी आ रही है। युवक के नहीं मिलने से परेशान परिजन और बस्ती के लोग गुरुवार सुबह कोतवाली थाना पहुंचे और युवक की तलाश तेज करने की मांग की।
सतीश रजक हमाली का काम करता है। उसके परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं, जिनकी उम्र 11 साल और 3 साल है। परिजनों के मुताबिक, तीन दिन पहले दोपहर करीब 3 बजे सतीश ने बच्चों को खाना खिलाया और खुद भी खाना खाया। इसके बाद वह घर के पास स्थित नहर की तरफ एक व्यक्ति के साथ गया था। इसी दौरान वह सीतामणी बसोड़ मोहल्ले के सामने से गुजर रही नहर में कूद गया।
साथ गए व्यक्ति ने इसकी जानकारी परिजनों को दी। इसके बाद मौके पर लोगों की भीड़ जुट गई। सूचना मिलने पर डायल 112 और कोतवाली थाना पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने जिला नगर सेना की गोताखोर टीम को बुलाकर तलाश शुरू कराई।
तीन दिन से तलाश, अब तक नहीं मिला सुराग
नहर में पानी का बहाव तेज होने के कारण गोताखोरों को युवक की तलाश करने में काफी दिक्कत हो रही है। तीन दिनों से रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है, लेकिन अब तक सतीश का कोई सुराग नहीं मिला है। इससे परिवार के लोग परेशान हैं।
परिजनों और बस्ती के लोगों ने मांग की है कि नहर में पानी का स्तर कम कराया जाए। साथ ही नहर किनारे बसे गांवों में मुनादी कराई जाए, ताकि लोगों को युवक के बारे में जानकारी मिल सके और उसकी तलाश में मदद मिल सके।
पुलिस ने दर्ज किया मामला
इस मामले में सीएसपी प्रतीक चतुर्वेदी ने बताया कि सतीश रजक के नहर में कूदने की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की। मामले में गुम इंसान की रिपोर्ट दर्ज की गई है। साथ ही भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 143 के तहत भी मामला दर्ज किया गया है। गोताखोरों और अन्य माध्यमों से युवक की तलाश लगातार जारी है।
सीएसपी ने लोगों से अपील की है कि वे नहर के पास नहाने न जाएं। फिलहाल नहर में पानी का बहाव तेज है, ऐसे में हादसा होने का खतरा बना हुआ है।
कोरबा। कोरबा में सिविल लाइन थाना क्षेत्र के पथरीपारा में संतोष (40-45) ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। सूचना मिलने पर सिविल लाइन पुलिस मौके पर पहुंची और जांच के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा।
पुलिस की जांच में सामने आया है कि संतोष की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी और उसका इलाज भी चल रहा था। वहीं, उसकी पत्नी लंबे समय से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही है। पुलिस मामले के सभी पहलुओं की जांच कर रही है।
मार्च में मेन्टल हॉस्पिटल में कराया गया था भर्ती
सीएसपी प्रतीक चतुर्वेदी ने बताया कि पुलिस को पथरीपारा में संतोष की आत्महत्या की सूचना मिली थी। इसके बाद सिविल लाइन पुलिस मौके पर पहुंची। जांच में सामने आया कि संतोष ने फांसी लगाकर जान दी है। पुलिस ने पंचनामा कार्रवाई के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
सीएसपी के अनुसार, संतोष की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। मार्च महीने में उसे सेंदरी स्थित मानसिक चिकित्सालय में भी भर्ती कराया गया था, जहां उसका इलाज चल रहा था।
पत्नी के इलाज के खर्च से परिवार आर्थिक परेशानी में
जानकारी के अनुसार, संतोष की पत्नी लंबे समय से कैंसर से पीड़ित है। उसके इलाज पर लगातार खर्च होने के कारण परिवार आर्थिक तंगी से भी गुजर रहा था। पुलिस की जांच में संतोष की मानसिक बीमारी और पारिवारिक परिस्थितियों से जुड़े पहलू सामने आए हैं। हालांकि, आत्महत्या के पीछे की परिस्थितियों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
पुलिस सभी पहलुओं की कर रही जांच
सिविल लाइन थाना पुलिस ने मामले में मर्ग कायम कर लिया है। पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया है। पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और परिजनों के बयान के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। मामले में पारिवारिक परिस्थितियों और आर्थिक स्थिति से जुड़े पहलुओं की भी जांच की जा रही है।
गंभीर ब्रेन स्ट्रोक के बाद बंद हो गई थी आवाज, शरीर का बायां हिस्सा पड़ गया था सुन्न, समय पर उपचार और पुनर्वास से लौटी जिंदगी की रफ्तार
डॉ. दिविक मित्तल के नेतृत्व में चिकित्सा टीम के प्रयास और फिजियोथेरेपी से मिली नई उम्मीद
कोरबा। कभी-कभी जिंदगी अचानक ऐसी परीक्षा लेती है कि परिवार की खुशियां पलभर में चिंता और डर में बदल जाती हैं। आंखों के सामने अपना प्रियजन असहाय हो जाए, बोलना बंद कर दे और शरीर का एक हिस्सा काम करना छोड़ दे, तो परिवार के लिए हर पल किसी सदमे से कम नहीं होता। लेकिन ऐसे कठिन समय में सही फैसला, समय पर चिकित्सा और अपनों का हौसला उम्मीद की नई किरण बन सकता है।
कोरबा के शिवाय हॉस्पिटल में सामने आई 63 वर्षीय श्रीमती लक्ष्मी सोरी की कहानी कुछ ऐसी ही है। 14 मई 2026 की सुबह अचानक तेज चक्कर, उल्टियां और बेहोशी ने उनके परिवार को चिंता में डाल दिया। शरीर का बायां हिस्सा सुन्न और कमजोर पड़ गया था। बोलने की क्षमता प्रभावित हो गई थी और याददाश्त पर भी असर दिखाई दे रहा था। परिवार ने बिना देर किए उन्हें न्यू बस स्टैंड, टी.पी. नगर स्थित शिवाय हॉस्पिटल पहुंचाया। जांच में गंभीर इस्कीमिक ब्रेन स्ट्रोक की स्थिति सामने आई।
परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी अपने प्रियजन को इस गंभीर संकट से बाहर निकालना। ऐसे समय में हर मिनट की अहमियत थी और तत्काल चिकित्सा सहायता जरूरी थी।
डॉ. दिविक मित्तल के नेतृत्व में शुरू हुआ उपचार
शिवाय हॉस्पिटल के वरिष्ठ न्यूरोसर्जन एवं डायरेक्टर डॉ. दिविक मित्तल के नेतृत्व में चिकित्सा टीम ने तत्काल आपातकालीन उपचार शुरू किया। मस्तिष्क में रक्त प्रवाह बाधित होने से उत्पन्न गंभीर स्थिति को देखते हुए मरीज की चिकित्सा देखभाल पर विशेष ध्यान दिया गया।
स्ट्रोक के मामलों में समय पर अस्पताल पहुंचना और शीघ्र चिकित्सकीय मूल्यांकन बेहद महत्वपूर्ण होता है। लक्ष्मी सोनी के परिवार ने बिना समय गंवाए अस्पताल पहुंचकर उपचार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।
उस समय परिवार के मन में कई सवाल थे, लेकिन डॉक्टरों की देखरेख और उपचार की प्रक्रिया के साथ उम्मीद कायम रही कि हालात बेहतर हो सकते हैं।
इलाज के बाद पुनर्वास ने बढ़ाई स्वस्थ होने की उम्मीद
गंभीर स्थिति के बाद मरीज को दोबारा सामान्य जीवन की ओर लौटाना भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। लक्ष्मी सोरी की रिकवरी में चिकित्सा देखभाल के साथ फिजियोथेरेपी की भूमिका रही। फिजियोथेरेपिस्ट अमन श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में कमजोर अंगों की कार्यक्षमता और चलने-फिरने की क्षमता में सुधार के लिए प्रयास किए गए।
इसके साथ स्पीच थेरेपी और मेडिसिन विभाग के समन्वय से बोलने तथा याददाश्त से जुड़ी परेशानियों में सुधार की दिशा में काम किया गया। लगातार देखभाल, पुनर्वास और परिवार के सहयोग ने उनकी रिकवरी के सफर को आगे बढ़ाने में मदद की।
यह सफर केवल बीमारी से उबरने का नहीं, बल्कि छोटे-छोटे सुधारों के साथ आत्मविश्वास दोबारा हासिल करने का भी था। परिवार के लिए लक्ष्मी जी की बेहतर होती स्थिति राहत और खुशी का कारण बनती गई।
गंभीर हालत से स्वस्थ होकर घर वापसी, परिवार के लिए भावुक पल
जिस लक्ष्मी सोरी को परिवार गंभीर हालत में अस्पताल लेकर पहुंचा था, उपचार और पुनर्वास के बाद वह होश में आईं, सामान्य रूप से बातचीत करने लगीं और अपने पैरों पर चलने की स्थिति में स्वस्थ होकर घर लौटीं।
यह परिवार के लिए भावुक कर देने वाला पल था। जिस घर में कभी अनहोनी की आशंका ने चिंता बढ़ा दी थी, वहां फिर से मुस्कान और राहत लौट आई। लक्ष्मी सोनी की रिकवरी ने उनके परिजनों को नई उम्मीद दी और इस बात को रेखांकित किया कि गंभीर बीमारी के बाद भी उचित चिकित्सा और पुनर्वास से सुधार की संभावनाएं बनी रहती हैं।
शिवाय हॉस्पिटल के लिए चिकित्सा सेवा की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि
लक्ष्मी सोरी की रिकवरी शिवाय हॉस्पिटल, कोरबा की चिकित्सा टीम के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आई है। गंभीर स्ट्रोक के उपचार से लेकर आगे की देखभाल और पुनर्वास तक, इस मामले में चिकित्सा सेवाओं के समन्वय की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
डॉ. दिविक मित्तल के नेतृत्व में चिकित्सा देखभाल, फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और मेडिसिन विभाग के प्रयासों ने मरीज को स्वस्थ जीवन की ओर लौटने में सहयोग दिया। यह कहानी अस्पताल में उपलब्ध उपचार सेवाओं के साथ-साथ स्ट्रोक के बाद पुनर्वास की अहमियत भी सामने लाती है।
विश्व स्ट्रोक दिवस पर शिवाय हॉस्पिटल का संदेश: लक्षण दिखें तो देर न करें
ब्रेन स्ट्रोक एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी है। इसके लक्षणों को पहचानकर तत्काल चिकित्सा सहायता लेना बेहद जरूरी है। अचानक चेहरा टेढ़ा होना, एक हाथ या पैर में कमजोरी अथवा सुन्नपन, बोलने या समझने में परेशानी और अचानक संतुलन बिगड़ना स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं।
ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत एंबुलेंस या आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें। लक्षण अपने आप ठीक होने का इंतजार न करें। स्ट्रोक के उपचार में देरी से मस्तिष्क को स्थायी नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ सकता है।
शिवाय हॉस्पिटल, न्यू बस स्टैंड, टी.पी. नगर, कोरबा की ओर से संदेश है कि जागरूकता, समय पर उपचार और उचित पुनर्वास मरीज की रिकवरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लक्ष्मी सोरी की कहानी एक परिवार की चिंता से राहत तक के सफर की कहानी है। यह उस उम्मीद की कहानी है, जो मुश्किल समय में भी बनी रहती है। और यह संदेश भी कि स्ट्रोक के लक्षणों को पहचानकर समय पर उठाया गया कदम किसी की जिंदगी में फिर से मुस्कान लौटाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।