ढाका, एजेंसी। बांग्लादेश में साजिश के तहत शेख हसीना की सरकार गिराई गई थी। छात्र संगठन चाहते थे कि बांग्लादेश की सरकार मोहम्मद यूनुस चलाएं।
छात्रों की यूनुस से मुलाकात करवाने में न्यूज एजेंसी AFP के पत्रकार कादरुद्दीन शिशिर ने मदद की। यह दावा अंतरिम सरकार के सलाहकार रहे मोहम्मद यूनुस के पूर्व प्रेस सचिव शफीकुल आलम ने किया है।
शेख हसीना ने 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश छोड़ा था। इसके दो दिन पहले ही यूनुस और छात्रों के बीच बातचीत हुई थी। इसी बातचीत में तख्तापलट का प्लान बना।
शफीकुल आलम 13 अगस्त 2024 से 17 फरवरी 2026 तक मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में प्रेस सचिव रहे हैं। (फाइल फोटो)
सुरक्षा एजेंसियों को बातचीत की जानकारी ही नहीं थी
शफीकुल आलम के मुताबिक, छात्र नेताओं को यूनुस तक अपनी बात पहुंचाने के लिए एक भरोसेमंद व्यक्ति की जरूरत थी। ऐसे में कादरुद्दीन शिशिर ने दोनों पक्षों के बीच संपर्क कराने में मदद की।
आलम ने दावा किया कि सुरक्षा एजेंसियों को इस बातचीत की जानकारी नहीं थी। अगर अधिकारियों को इसका पता चल जाता तो शिशिर और AFP की पूरी टीम को खतरा हो सकता था।
आलम ने बातचीत का पूरा ब्योरा नहीं दिया। यह भी पता नहीं है कि शिशिर की भूमिका केवल शुरुआती बातचीत कराने तक सीमित थी या उन्होंने आगे की बातचीत में भी हिस्सा लिया था।
छात्र आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल नाहिद इस्लाम ने उन्हें अंतरिम सरकार का मुख्य सलाहकार बनाने का प्रस्ताव दिया था। बाद में यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी।
AFP की ढाका स्थित फैक्ट-चेकिंग टीम के तत्कालीन संपादक कादरुद्दीन शिशिर। (फाइल फोटो)
हसीना सरकार के खिलाफ कैसे शुरू हुआ था आंदोलन?
बांग्लादेश में 2024 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ छात्र आंदोलन शुरू हुआ था। वहां सरकारी नौकरियों में 1971 के मुक्ति संग्राम में लड़ने वालों के परिवारों के लिए 30% तक सीटें आरक्षित थीं।
छात्रों का कहना था कि इससे आम युवाओं के लिए सरकारी नौकरी पाने के मौके कम हो रहे हैं। वे चाहते थे कि भर्ती में परीक्षा और योग्यता के आधार पर ज्यादा नौकरियां मिलें।
इसी मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे सरकार के खिलाफ प्रदर्शन में बदल गया। सरकार की कार्रवाई में बड़ी संख्या में लोग मारे गए। संयुक्त राष्ट्र के आकलन के मुताबिक, जुलाई और अगस्त 2024 के दौरान करीब 1,400 लोगों की मौत हुई।
शेख हसीना की यह फुटेज हेलिकॉप्टर में बैठने से पहले की है। 5 अगस्त को बांग्लादेश छोड़ने के बाद वे भारत आ गईं थीं।
यूनुस की अंतरिम सरकार के बाद सत्ता में आए तारिक रहमान
यूनुस की अंतरिम सरकार का काम चुनाव कराकर सत्ता चुनी हुई सरकार को सौंपना था। इसके लिए 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव हुए, जिसमें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने बड़ी जीत हासिल की। पार्टी ने संसद की 300 में से 209 सीटें जीतीं।
इसके बाद 17 फरवरी 2026 को तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उनके सत्ता संभालने के साथ ही यूनुस की अंतरिम सरकार का कार्यकाल खत्म हो गया।
अब देश लौटना चाहती हैं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 19 अक्टूबर 2026 को कहा था कि वे दिसंबर में अपने देश लौटेंगी। उन्होंने कहा कि,
बांग्लादेश की मौजूदा तारिक रहमान सरकार उन्हें गिरफ्तार कर सकती है, मार सकती है या टॉर्चर कर सकती है, लेकिन वे इन खतरों से नहीं डरतीं। हसीना ने कहा कि खतरा कितना भी हो, उन्हें इसकी परवाह नहीं है और उन्हें अपने देश लौटना ही है।
रहमान की सरकार कई बार प्रत्यर्पण की मांग कर चुकी
तारिक रहमान की सरकार शेख हसीना को बांग्लादेश वापस भेजने की मांग कई बार उठा चुकी है। इस मुद्दे का असर बांग्लादेश और भारत के रिश्तों पर भी पड़ा है।
भारत ने BRICS समिट में तारिक रहमान को शामिल होने का न्योता दिया था। इसके अलावा, फरवरी से ही भारत की ओर से उन्हें अलग से भारत आने का निमंत्रण दिया गया था।
हालांकि, प्रधानमंत्री बनने के बाद से तारिक रहमान ने भारत का दौरा नहीं किया है। हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा दोनों देशों के बीच तनाव का कारण बना हुआ है।
तेल अवीव, एजेंसी। इजराइल में 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव में विदेशी दखल की आशंका जताई गई है। चुनाव आयोग ने जांच एजेंसी ‘शिन बेट’ को मामले की जांच के आदेश दिए हैं। द टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक, एजेंसी एक हफ्ते में जांच रिपोर्ट सौंपेगी।
प्रधानमंत्री नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को शक है कि कतर और तुर्किये से इजराइल और वेस्ट बैंक में पैसे भेजे गए। इनका इस्तेमाल अरब नागरिकों की फंडिंग के लिए किया गया।
चुनाव खत्म होने के बाद दूसरे दिन सभी बैलट वोट की गिनती पूरी हो चुकी है। अब सिर्फ दोहरे लिफाफों के वोटों की गिनती बाकी है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू और विपक्षी नेता आइजनकोट दोनों बहुमत से दूर हैं।
अब तक नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें, जबकि विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिलती दिख रही हैं। वहीं, अरब पार्टियों को कुल 19 सीटें मिलने का अनुमान है।
कतर ने इजराइली चुनाव में दखल के आरोपों को बेतुका बताया
कतर ने इजराइल के चुनाव में दखल देने और अरब वोट बढ़ाने के लिए पैसा देने के आरोपों को खारिज किया है।
कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल अंसारी ने इन आरोपों को बेतुका और खतरनाक बताया। उन्होंने कहा कि इजराइली नेता अपनी राजनीतिक नाकामी का दोष कतर पर डाल रहे हैं।
अंसारी ने X पर पोस्ट कर आरोप लगाया कि कुछ इजराइली नेता और मीडिया से जुड़े लोग गलत जानकारी फैलाकर कतर को अपने राजनीतिक विवादों में घसीट रहे हैं।
चुनाव आयोग ने धांधली के आरोपों को बेबुनियाद बताया
चुनाव आयोग ने चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली के आरोपों को बेबुनियाद बताया है। आयोग के कार्यवाहक महानिदेशक डीन लिवने ने कहा कि चुनाव कानून के मुताबिक हुआ और अब तक गड़बड़ी के कोई सबूत नहीं मिले हैं।
लिवने ने कहा कि मतदान केंद्रों पर चुनाव की निष्पक्षता बनाए रखने के पुख्ता इंतजाम किए गए थे।
उन्होंने यह भी बताया कि चुनाव आयोग के अध्यक्ष नोआम सोहलबर्ग ने शिन बेट को गोपनीय खुफिया जानकारी के आधार पर जांच करने को कहा है। हालांकि, इस जानकारी की अभी पुष्टि नहीं हुई है।
डबल-एनवेलप बैलेट से नतीजों में बड़े बदलाव की उम्मीद कम
27 अक्टूबर को एक IDF सैनिक ने ‘जनरल स्टाफ सप्लाई सेंटर’ बेस पर अपना वोट डाला।
डबल-एनवेलप बैलेट की गिनती गुरुवार सुबह शुरू हुई। इन बैलेट का इस्तेमाल उन लोगों के वोटों के लिए होता है, जो अपने तय मतदान केंद्र से अलग जगह पर वोट डालते हैं। इनमें सैनिक, राजनयिक, पुलिसकर्मी और विस्थापित लोग शामिल हैं।
द टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक, सैन्य ठिकानों, अस्पतालों और जेलों में डाले गए इन वोटों से चुनावी नतीजों में बड़े बदलाव की संभावना कम है। इस बार ऐसे करीब 5 लाख वोटों की गिनती होनी है, जो गुरुवार शाम तक पूरी हो जाएगी।
पिछले चुनावों में भी इन वोटों का रुझान देशभर के नतीजों जैसा ही रहा है। इजराइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के 2021 के चुनाव विश्लेषण के मुताबिक, नेतन्याहू के गठबंधन को डबल-एनवेलप वोटों में 48.76% वोट मिले थे। आम वोटों में उसका हिस्सा 47.95% था।
वहीं, विपक्षी पार्टियों को डबल-एनवेलप वोटों में 48.56% और आम वोटों में 50.06% वोट मिले थे। चुनाव समिति के कमांड सेंटर प्रमुख एलाद नवेह ने भी कहा कि इन वोटों का बंटवारा आमतौर पर देशभर में पड़े वोटों जैसा ही रहता है। दोनों में कोई बड़ा अंतर नहीं दिखता।
मैड्रिड, एजेंसी। स्पेन के टोलेडो प्रांत में बुधवार को दो हाई स्पीड ट्रेनें टकरा गईं। डीडी न्यूज के मुताबिक, हादसे में 64 लोगों की मौत हो गई, जबकि 179 लोग घायल हुए हैं। राहत और बचाव के लिए इमरजेंसी और मेडिकल टीमें मौके पर पहुंचीं।
स्पेनिश मीडिया के मुताबिक, हादसा स्थानीय समयानुसार सुबह 9 बजे मोरा और ओरगाज कस्बों के बीच हुआ। एक ट्रेन ने दूसरी को पीछे से टक्कर मार दी। टक्कर इतनी तेज थी कि कई डिब्बे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए।
हादसे के बाद राजधानी मैड्रिड को दक्षिणी अंदालूसिया क्षेत्र से जोड़ने वाली रेल लाइन बंद कर दी गई।
दोनों ट्रेनें सरकारी कंपनी रेनफे (Renfe) और निजी कंपनी इर्यो (Iryo) की थीं। इन ट्रेनों की रफ्तार आमतौर पर 200 किमी/घंटे से ज्यादा होती है।
हादसे के बाद लोगों ने घायलों को मलबे से निकालने में मदद की।
स्पेन ट्रेन हादसे से जुड़े कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं।
हादसे के बाद ट्रेन के डिब्बे पटरी से उतर गए।
ट्रेनों के टकराने के बाद उसका मलबा आस-पास फैला नजर आया।
राहत और बचाव कार्य जारी
स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज ने कहा कि इस हादसे की खबर सुनकर वे सदमे में हैं। राहत और बचाव दल मौके पर मौजूद हैं और हादसे में प्रभावित लोगों की मदद कर रहे हैं।
टोलेडो के पास उर्दा शहर के मेयर मैनुअल गालान ने बताया कि बचाव दल ने उनसे घायलों के इलाज और देखभाल के लिए एक स्पोर्ट्स हॉल तैयार रखने को कहा है।
ट्रेन हादसे के बाद घटनास्थल के पास बैठकर रोता युवक, उसकी महिला साथी लापता है।
रेस्क्यू अभियान में जुटे बचावकर्मी मृतकों के शव को बाहर निकालते हुए
हादसा टोलेडो प्रांत में लॉस येबेनेस और उर्दा कस्बों के बीच हुआ।
मैड्रिड में ट्रेन यात्रियों का इंतजार बढ़ा
यह साफ नहीं है कि हादसा किस वजह से हुआ। जांच की जाएगी कि ट्रेन समय पर क्यों नहीं रुकी। क्या सिग्नल सिस्टम में खराबी थी या ड्राइवर ब्रेक लगाने में चूक गया, इसकी भी जांच होगी।
जांच में यह भी देखा जाएगा कि टक्कर से पहले ये सिस्टम काम कर रहे थे या नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक, रेनफे ट्रेन का ड्राइवर अभी लापता है। ट्रेन ड्राइवरों के संगठनों ने हादसे को असामान्य बताया है।
राजधानी मैड्रिड को जोड़ने वाली ट्रेन सर्विस बंद होने की वजह से यात्रियों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। मैड्रिड के स्टेशनों पर यात्री ट्रेनों के इंतजार में खड़े हैं।
हादसे के बाद मैड्रिड की ओर आने वाली रेल लाइन बंद होने की वजह से बाद सेविला सांता खुस्ता रेलवे स्टेशन पर खड़ी दो ट्रेनें।
ट्रेन हादसे के बाद कई ट्रेनें रद्द कर दी गई हें। इसके बाद रेलवे स्टेशन पर लोग मोबाइल फोन पर ट्रेन स्टेटस चेक करते नजर आए।
स्पेन के सेविला सांता खुस्ता रेलवे स्टेशन पर ट्रेन सर्विस बहाल होने का इंतजार करते यात्री।
स्पेन के अटोचा रेलवे स्टेशन पर हादसे के बाद स्क्रीन पर मैड्रिड और अंदालुसिया के बीच रद्द हुई ट्रेनों की जानकारी दी गई।
9 महीने पहले भी Iryo और Renfe की ट्रेनें टकराईं थीं
स्पेन में इसी साल जनवरी में भी इन्हीं दोनों कंपनियों की ट्रेनें टकराई थीं। हादसा अंदालूसिया के अदामुज के पास हुआ था। इसमें 46 लोगों की मौत हुई थी।
Iryo कंपनी की हाई-स्पीड ट्रेन मालागा से मैड्रिड जा रही थी। ट्रेन के कुछ डिब्बे पटरी से उतरकर दूसरी पटरी पर चले गए थे और सामने से आ रही Renfe की ट्रेन से टकरा गए थे।
लोगों ने बताया था कि टक्कर इतनी जोरदार थी कि उन्हें भूकंप जैसा झटका महसूस हुआ था।
स्पेन के कॉर्डोबा प्रांत में 9 महीने पहले ट्रेन टकराई थीं।
तेल अवीव, एजेंसी। इजराइल में चुनाव के बाद वोटों की गिनती जारी है। अब तक 85.6% वोट गिने जा चुके हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिलती दिख रही हैं, जबकि गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटों पर आगे चल रहा है। दोनों के बीच सिर्फ 5 सीटों का अंतर है।
अरब पार्टियों की जॉइंट लिस्ट 12 और राअम 7 सीटों पर आगे हैं, दोनों को मिलाकर 19 सीटें हो रही हैं। जो इजराइल के चुनावी इतिहास में अरब पार्टियों का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा होगा। इससे पहले 2020 के चुनाव में इन पार्टियों ने 15 सीटें जीती थीं।
इजराइल की संसद में कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए 61 सीटें जरूरी हैं। अभी नेतन्याहू और विपक्ष, दोनों बहुमत से दूर हैं। ऐसे में अरब पार्टियों का समर्थन सरकार बनाने में अहम हो सकता है। चुनाव से पहले सर्वे में नेतन्याहू की हार का अनुमान लगाया गया था, लेकिन अब तक की गिनती में मुकाबला कड़ा बना हुआ है।
इजराइल में सरकार बनाने के लिए 42 दिन मिलेंगे
इजराइल में सरकार बनाने के लिए चुने गए नेता को शुरुआत में 28 दिन का समय मिलता है। जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति इसे 14 दिन और बढ़ा सकते हैं। यानी सरकार बनाने के लिए कुल 42 दिन मिल सकते हैं।
इस दौरान नेता को दूसरी पार्टियों से बातचीत कर समर्थन जुटाना होता है। इसके लिए पार्टियों के बीच नीतियों और मंत्रिपदों को लेकर समझौते हो सकते हैं।
सरकार बनाने के लिए आम तौर पर संसद में 61 सीटों का समर्थन जरूरी होता है। अगर नेता 61 सीटों का समर्थन नहीं जुटा पाता, तो वह छोटी पार्टियों के सहयोग से अल्पमत सरकार बनाने या दो नेताओं के बीच बारी-बारी से प्रधानमंत्री बनने का समझौता करने की कोशिश भी कर सकता है।
राष्ट्रपति बोले- नई सरकार के लिए सभी दल बातचीत करें
इजराइल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने सभी राजनीतिक दलों से नई सरकार बनाने के लिए बातचीत करने और दोबारा चुनाव से बचने की अपील की है। उन्होंने कहा कि सभी दलों को खुले मन से चर्चा करनी चाहिए। चुनाव के बाद किसी भी गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है।
हर्जोग ने कहा कि अगले हफ्ते चुनाव के आधिकारिक नतीजे मिलने के बाद वे संसद में सभी दलों से बातचीत शुरू करेंगे। उन्होंने चुनाव में रिकॉर्ड मतदान की भी तारीफ की।
स्पीकर को हटाने की तैयारी में जुटा आइजनकोट खेमा
इजराइल में गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाला विपक्षी खेमा संसद अध्यक्ष अमीर ओहाना को पद से हटाने की तैयारी कर रहा है। चैनल 12 की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके लिए विपक्षी खेमा अरब पार्टियों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है। ओहाना प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी के सदस्य हैं।
संसद अध्यक्ष पद के लिए अभी किसी नाम पर सहमति नहीं बनी है। रिपोर्ट के मुताबिक, यिस्राइल बेतेनु पार्टी के सांसद ओदेद फोरर और आइजनकोट की याशर पार्टी के एलेजर स्टर्न के नामों पर चर्चा हो रही है।
तस्वीर इजराइली संसद के स्पीकर अमीर ओहाना की है।
EU ने इजराइल के चुनाव की तारीफ की
यूरोपीय संघ (EU) ने इजराइल में हुए चुनाव के बाद वहां के लोगों को बधाई दी है। EU ने करीब 78% मतदान की तारीफ करते हुए इसे इजराइल के मजबूत लोकतंत्र की निशानी बताया। EU ने कहा कि वह इजराइल में नई सरकार बनने के बाद उसके साथ बेहतर रिश्ते बनाना चाहता है।
EU के प्रवक्ता ने कहा कि नई सरकार बनने के बाद दोनों पक्ष मिलकर काम करने की कोशिश करेंगे। उन्होंने कहा कि EU और इजराइल के बीच लंबे समय से रिश्ते हैं और दोनों लोकतंत्र में भरोसा करते हैं।
कुछ ही देर में चुनाव के पूरे नतीजे जारी होंगें
केंद्रीय चुनाव समिति ने सभी सामान्य मतों की गिनती पूरी कर ली है। समिति ने बताया कि कुछ ही देर में चुनाव के पूरे नतीजे जारी कर दिए जाएंगे।
इन नतीजों में सभी सामान्य मतों की गिनती शामिल होगी। हालांकि, डबल लिफाफे में आने वाले मतों की गिनती अभी बाकी है। यह गिनती आज रात शुरू होगी।
इजराइली राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग के सामने मुश्किल फैसला
इजराइल के राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग की भूमिका आमतौर पर औपचारिक होती है। लेकिन आम चुनाव के बाद उनकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उन्हें तय करना होता है कि किस नेता को सरकार बनाने का मौका दिया जाए।
राष्ट्रपति के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी के नेता को ही चुने। वह उस नेता को भी मौका दे सकते हैं, जिसके पास दूसरी पार्टियों का समर्थन जुटाकर संसद में बहुमत साबित करने की ज्यादा संभावना हो।
इजराइली राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग ने बुधवार को पत्नी के साथ वोटिंग की।
2009 में राष्ट्रपति शिमोन पेरेज ने बेंजामिन नेतन्याहू को सरकार बनाने का मौका दिया था, जबकि उनकी लिकुड पार्टी को कदीमा पार्टी से कम वोट मिले थे।
इस बार राष्ट्रपति के सामने क्या चुनौती है?
बुधवार को आए शुरुआती एग्जिट पोल में नेतन्याहू गठबंधन और विपक्षी गठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला दिखा। हालांकि, शुरुआती नतीजों में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को सबसे ज्यादा वोट मिलते दिख रहे हैं। ऐसे में नेतन्याहू दावा कर सकते हैं कि सरकार बनाने का पहला मौका उन्हें मिलना चाहिए।
हालांकि चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करना ही प्रधानमंत्री बनने के लिए काफी नहीं है। राष्ट्रपति को यह देखना होगा कि कौन-सा नेता अलग-अलग पार्टियों का समर्थन जुटाकर संसद में बहुमत साबित कर सकता है।
जिन इलाकों में जंग का असर, वहां भी नेतन्याहू आगे
इजराइल में चुनाव के शुरुआती नतीजों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड उन शहरों में भी आगे है, जहां जंग के दौरान सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था। इनमें लेबनान की सीमा के पास बसा किरयात शमोना और दक्षिणी इजराइल के स्देरोत और ओफाकिम शहर शामिल हैं।
किरयात शमोना में दोपहर 12:30 बजे तक करीब 48% वोट नेतन्याहू की पार्टी को मिले। वहीं, स्देरोत में करीब 39% लोगों ने उनकी पार्टी को वोट दिया।
जंग के दौरान इन शहरों पर रॉकेट और ड्रोन से हमले हुए थे। कई लोगों को अपना घर छोड़कर दूसरी जगह रहना पड़ा था।
जिस पार्टी को ज्यादा वोट, उसे ज्यादा सीटें
इजराइल में लोग किसी नेता को नहीं, बल्कि उसकी पार्टी को वोट देते हैं। चुनाव से पहले हर पार्टी अपने उम्मीदवारों की एक सूची बनाती है। पूरे देश में पार्टी को मिले वोटों के आधार पर तय होता है कि उसे संसद में कितनी सीटें मिलेंगी।
लेकिन संसद में सीट पाने के लिए एक शर्त है। किसी पार्टी को कुल वैध वोटों में से कम से कम 3.25% वोट हासिल करने होते हैं। इससे कम वोट मिलने पर पार्टी को संसद में कोई सीट नहीं मिलती।
पार्टी के कौन से उम्मीदवार सांसद बनेंगे, इसका फैसला उम्मीदवारों की लिस्ट से होता है। हर पार्टी चुनाव से पहले अपने उम्मीदवारों की एक लिस्ट जारी करती है। अगर किसी पार्टी को 20 सीटें मिलती हैं, तो लिस्ट में पहले 20 नंबर पर मौजूद उम्मीदवार सांसद बन जाएंगे।
वेस्ट बैंक में रहने वाले फिलिस्तीनियों को वोट देने का अधिकार नहीं
इजराइल के चुनाव का असर वेस्ट बैंक में रहने वाले फिलिस्तीनियों की जिंदगी पर भी पड़ता है, लेकिन उन्हें इन चुनावों में वोट देने का अधिकार नहीं है। कई फिलिस्तीनियों ने इस पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि वेस्ट बैंक पर इजराइल का कब्जा लगातार मजबूत होता जा रहा है और वहां उनकी जिंदगी से जुड़े फैसले इजराइली सरकार लेती है।
वेस्ट बैंक में दुकान चलाने वाले 32 साल के मोंटासेर अमरो ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कहा, “इजराइली सरकार का हमारी जिंदगी पर बहुत बड़ा नियंत्रण है। वह तय करती है कि सड़क पर लगे बैरिकेड कब खुलेंगे और कब बंद होंगे। सीमाओं पर उसका नियंत्रण है और वह यह भी तय करती है कि हमारी अर्थव्यवस्था का कितना हिस्सा काम कर पाएगा।”
अमरो ने सवाल उठाया, “जब कुछ सौ मीटर दूर रहने वाले यहूदी बस्तियों के लोग वोट दे सकते हैं, तो हम क्यों नहीं?”
वेस्ट बैंक की यहूदी बस्ती में रहने वाले इजराइली चुनाव में वोट डालते हैं।
इजराइल ने 1967 में वेस्ट बैंक पर कब्जा कर लिया था। 1990 के दशक में उसने फिलिस्तीन मुक्ति संगठन के साथ समझौता किया, जिसके तहत फिलिस्तीनी अथॉरिटी बनाया गया। यह वेस्ट बैंक के कुछ हिस्सों का प्रशासन संभालता है। हालांकि, फिलिस्तीनी अथॉरिटी में करीब 20 साल से संसदीय या राष्ट्रपति चुनाव नहीं हुए हैं।
कई फिलिस्तीनी लंबे समय से उम्मीद करते रहे हैं कि फिलिस्तीनी अथॉरिटी आगे चलकर एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश का रूप लेगा। लेकिन हाल के वर्षों में यह उम्मीद कमजोर हुई है।
इजराइल चुनाव में अरब पार्टियों का दमदार प्रदर्शन
एग्जिट पोल के नतीजे घोषित होने पर इजराइल के अरब नेतृत्व वाले जॉइंट लिस्ट गठबंधन के समर्थक खुशी मनाते हुए।
चुनाव में दो प्रमुख अरब पार्टियों ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है। इन पार्टियों के समर्थक बड़ी संख्या में वोट डालने पहुंचे। उन्होंने जॉइंट लिस्ट को संसद में अब तक की सबसे ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। ऐसे में अगली सरकार बनाने में इनकी भूमिका अहम हो सकती है।
राअम के नेता मंसूर अब्बास ने एक टीवी चैनल से कहा कि मतदान में बड़ी संख्या में अरब नागरिकों की भागीदारी दिखाती है कि उन्होंने अपनी निराशा और हताशा को उम्मीद में बदल दिया है। इजराइल की कुल आबादी में अरब नागरिकों की हिस्सेदारी करीब 20% है।
जॉइंट लिस्ट के नेता बोले- नेतन्याहू सरकार को हटाने में मदद के लिए तैयार
यूसुफ जबरीन हदाश पार्टी के नेता हैं। वे जॉइंट लिस्ट गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं।
जॉइंट लिस्ट गठबंधन के अध्यक्ष यूसुफ जबरीन ने कहा है कि उनका गठबंधन सत्ता में बदलाव लाने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि नेतन्याहू सरकार को हटाने की कोशिश करने वाली किसी भी पार्टी को उनसे बात करनी होगी।
जबरीन ने कहा कि इजराइल के सामने दो रास्ते हैं- यहूदी वर्चस्व को जारी रखना या यहूदियों और अरब नागरिकों के बीच सहयोग कायम करना।
अरब नेतृत्व वाली दो पार्टियों- जॉइंट लिस्ट और राअम को मिलाकर 19 सीटें मिलने का अनुमान है। इनमें जॉइंट लिस्ट को 13 और राअम को 6 सीटें मिलती दिख रही हैं। यह अरब पार्टियों के लिए अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा हो सकता है।
76.8% वोटों की गिनती पूरी, नेतन्याहू गठबंधन 54 पर आगे
76.8% वोटों की गिनती हो चुकी है। चुनाव आयोग के नतीजों के मुताबिक, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन को 54 सीटें मिलती दिख रही हैं। वहीं, गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधन को 47 सीटें मिलने का अनुमान है।
अरब पार्टियों जॉइंट लिस्ट और राअम की कुल सीटें बढ़कर 19 हो गई हैं। सरकार बनाने के लिए किसी भी गठबंधन को 120 सदस्यीय संसद में कम से कम 61 सीटों की जरूरत है। फिलहाल दोनों मुख्य गठबंधन बहुमत के आंकड़े से नीचे हैं।
चुनाव के नतीजों से शेकेल कमजोर, 0.75% गिरा
इजराइल में चुनाव के नतीजे स्पष्ट नहीं होने का असर देश की मुद्रा शेकेल पर भी पड़ा है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले शेकेल की कीमत में गिरावट दर्ज की गई। सुबह के कारोबार में शेकेल 0.75% कमजोर होकर 1 डॉलर के मुकाबले 3.077 पर आ गया।
चुनाव में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। ऐसे में अगली सरकार किसकी बनेगी और उसे बहुमत जुटाने के लिए किन पार्टियों का समर्थन लेना होगा, इसे लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।