नई दिल्ली, एजेंसी। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पूर्व पत्रकार निधि राजदान से शादी कर ली है। उमर ने शनिवार को दोनों की 2 तस्वीरें पोस्ट करते हुए लिखा- ‘कल एक नई शुरुआत हुई, निधि।’
पोस्ट के साथ उन्होंने रिंग इमोजी भी लगाया। इसके बाद सोशल मीडिया यूजर्स दोनों की शादी और सगाई को लेकर कयास लगा रहे हैं।
निधि ने भी सोशल मीडिया पोस्ट में रिंग इमोजी के साथ लिखा, इट्स डन ब्रो। उमर का पहली पत्नी पायल के साथ इस साल 31 जुलाई को तलाक हुआ था।
उमर और निधि के पोस्ट
उमर और निधि की 3 फोटोज
पायल से 32 साल पहले हुई थी शादी, सुप्रीम कोर्ट में सहमति से डिवोर्स
सुप्रीम कोर्ट ने 31 जुलाई को उमर अब्दुल्ला और उनकी पत्नी पायल के तलाक की मंजूरी दी थी। दोनों की शादी 32 साल पहले हुई थी। दोनों 2011 से अलग रह रहे थे।
दोनों ने कोर्ट को बताया कि आपसी सहमति से अपनी शादी खत्म करने और सभी विवादों को सुलझाने का फैसला किया है। उमर ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी शादी को खत्म करने से इनकार कर दिया था।
नई दिल्ली, एजेंसी। दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर मॉक पार्लियामेंट चल रही है। पूर्व स्पीकर मीरा कुमार इसकी अध्यक्षता कर रही हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जनमहाभियोग लाए।
उन्होंने कहा- हमारी मांग है सीईसी को तत्काल पद से हटाकर 2023 का कानून रद़्द हो। SIR को रोका जाए। संसद की अनुमति के बिना फॉर्म-6 बदला गया। जान-बूझकर वोटर हटाए गए।
इस कार्यक्रम में कांग्रेस सहित 19 दल के नेता शामिल हैं। पब्लिक महाभियोग में जनता या राजनीतिक दल किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ विरोध जताते हैं।
TMC सांसद बोलीं- बंगाल विधानसभा चुनाव चोरी किया गया
TMC सांसद सागरिका घोष ने कहा कि 2026 का बंगाल विधानसभा चुनाव चोरी किया गया। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर मतदाता सूची से कथित तौर पर नाम हटाए जाने के मामले में मोदी सरकार के साथ मिलीभगत करने का आरोप लगाया।
वोटर बोले- मैं जिंदा फिर भी मेरा नाम काट दिया गया
कांता प्रसाद जिनका नाम वोटर्स लिस्ट से काट दिया गया। उन्होंने कहा- मैं जिंदा हूं फिर भी मेरा नाम काट दिया है। मुझे मरा हुआ घोषित कर दिया गया। मैं जन सुनवाई में गया। BLO मेरे घर आया सादे कागज पर साइन करवाए।
फॉर्म 6 भरवा दिया। कहा वोटर कार्ड घर पर बनकर आ जाएगा। मंगोलपुरी में मैं रहता हूं। 35 साल से वोट करता आ रहा हूं। सारे चुनाव में वोट दिया है। अब नहीं कर पाउंगा।
बंगाल के इफ्तिकार बोले- मेरे सारे कागज पूरे, फिर भी नाम कटा
बंगाल के एक व्यक्ति, जिसका नाम काटा गया। इफ्तिकार ने कहा- मेरे पिता 50 साल से वोट दे रहे थे। मेरा कार्ड भी वहीं का है। मेरे पास सारे कागज हैं। एजुकेशन के सर्टिफिकेट भी मैंने जमा किए।
मैं यहां सिर्फ अपने लिए नहीं आया हूं। जानबूझकर जिन लोगों का नाम हटाया गया। ज्ञानेश कुमार जो इसके पीछे मास्टरमाइंड हैं उनको हटाया जाए।
दिल्ली की अनीता बोलीं- मेरा वोटर लिस्ट से नाम कटा, अब कहां जाउं
दिल्ली की अनीता जायसवाल का वोटर लिस्ट में नाम कट गया। वे भी कार्यक्रम में पहुंचीं। उन्होंने कहा- मैं दिहाड़ी मजदूर हूं। सिंगल मदर हूं। सरकार ने मेरा वोटर आईडी कार्ड काट दिया। इसी पहचान पत्र से मैंने आधार कार्ड बनवाया है। स्कूल में मेरी बेटी को स्कॉलरशिप मिल रही है। अब सब बंद हो जाएगा। आप साबित करें मैं किस देश की नागरिक हूं।
खड़गे बोले- CEC को कानूनन जीवनदान मिला, इसे हटाया जाए
खड़गे ने कहा- यह साफ है कि उन्हें मिला कानूनन जीवनदान, पीएम मोदी और शाह ने दिया है, जो दिसंबर 2023 में दिया गया। यह अपराध है। जो देश के संविधान के खिलाफ है। इसलिए उन्हें पद से तुरंत हटाया जाए।
आखिर में देश की 60 प्रतिशत जनता के प्रतिनिधि के तौर पर इंडिया ब्लॉक यह मांग करता है कि उन्हें सलाखों के पीछे भेजा जाए।
खड़गे बोले- CEC को हटाया जाए, 2023 का कानून रद़्द हो
खड़गे ने कहा- हमारी मांग है सीईसी को तत्काल पद से हटाकर 2023 का कानून रद़्द हो। SIR को रोका जाए। संविधान बनाने वालों ने वोट का अधिकार सबको दिया है। हर नागरिक को बराबरी का दर्जा दिया।
कई देश अमेरिका, यूके, फ्रांस आजादी मिलने या लोकतंत्र के बाद महिलाओं को वोट का अधिकार नहीं दिए, भारत केवल ऐसा देश है, कि संविधान लागू होते ही हर एक वोट का अधिकार दिया।
खड़गे बोले- SIR के डिजाइन में ही खामियां हैं
खड़गे ने कहा- आप नाम जरूर हटाएं, आप नाम निकाल सकते हैं। दूसरी बात SIR के डिजाइन में ही खामियां हैं। हमने मार्च किया, राष्ट्रपति से मिले, सुप्रीम कोर्ट गए। हम प्रयास कर रहे हैं। आज हम मजबूरी में सड़क पर आए हैं हमारी कोशिश रही है कि कानूनन हम जो कर सकते हैं हम कर रहे हैं।
मोदी सरकार ने बड़ी संख्या में लोगों को अरेस्ट किया। विरोध पर रोक लगा दी। रेल-इंटरनेट बंद कर दिया, ये सब किसने किया, हमको बोल रहे हैं। देश में अराजकता फैला रहे हैं, हम उचका रहे हैं या आप गलत कर रहे हैं।
खड़गे बोले- सत्ता पर काबिज रहने को साजिश हो रही
खड़गे ने कहा- मोदी ने सत्ता पर काबिज रहने के लिए हर साजिश रची। चुनावी बॉन्ड, सांसद चोरी और अब वोट चोरी, हमारे पास सैकड़ों उदाहरण है। विपक्ष के 145 सांसदों को सस्पेंड करके यह बिल पास किया गया। जो देश हित में काम कर रहे थे, उन्हें संसद से बाहर करके यह कानून पास करवाया गया। यह कानून चुनाव आयुक्त को ऐसी सुरक्षा देता है जो राष्ट्रपति को भी नहीं है।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी 40 लाख नए नाम जोड़े गए जिससे नतीजा पलट गया। SIR के दौरान 5 गुना ज्यादा नाम हटा दिए। यह काम ज्ञानेश कुमार मोदी जी और शाह कर रहे हैं।
खड़गे बोले- हम लोकतंत्र और प्रजातंत्र के लिए लड़ रहे
खड़गे ने कहा- आपने जो अभी कहा कि वोट के अधिकार से ही सरकार बनती और चलती है। इसलिए हम लोकतंत्र और प्रजातंत्र के लिए लड़ रहे हैं। महाभियोग के बारे में विस्तार से बताऊंगा
राजीव गांधी ने संविधान संशोधन करके मतदान की उम्र घटाकर 18 साल की। आज हम नौजवान की बात करते हैं लेकिन उनके लिए राजीव गांधी ने जो 21 साल की लिमिट को 18 किया ताकि नौजवान देश की किस्मत तय कर सकें।
आज ये खतरे में हैं क्योंकि ज्ञानेश कुमार सीधे पीएम गृहमंत्री के निर्देश पर चुनाव आयोग को चला रहे हैं।
16 साल पहले भी विपक्ष की मॉक संसद, लालू प्रधानमंत्री थे
20 अगस्त 2010 को लोकसभा की कार्यवाही स्थगित होने के बाद करीब 70 सांसदों ने मिलकर अपनी मॉक पार्लियामेंट चला दी थी। इसमें लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री बने, जबकि भाजपा के गोपीनाथ मुंडे ने स्पीकर और कीर्ति आजाद ने नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई।
सांसदों ने मेडिकल काउंसिल संशोधन विधेयक बिना चर्चा पास किए जाने और सांसदों के वेतन के मुद्दे पर विरोध जताया। यानी असली संसद में कामकाज रुकने के बाद सांसदों ने अपनी ही संसद लगाकर विरोध दर्ज कराया था।
मीरा कुमार बोलीं- हर वयस्क को वोट का अधिकार है
मीरा कुमार बोलीं- हमारा प्रजातंत्र, समता के सिद्धांत पर आधारित है। यहां हर वयस्क को वोट का अधिकार है। अमीर गरीब, स्त्री पुरुष थर्ड जेंडर किसी भी जाति धर्म का हो।
हमारे यहां जो प्रजांतत्र है, वो चुनाव की ताकत से चलता है। चुनाव की ताकत के पीछे मतदाता की आत्मा है। मतदाता उसका केंद्र बिंदु है।
मीरा कुमार बोलीं- ज्ञानेश कुमार को पद से हटाना जरूरी
मीरा कुमार ने कहा- आज की इस सभा में मैं सबका स्वागत करती हूं। ये सभा इसलिए बुलाई गई है, क्योंकि चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग की कार्रवाई की जाए। मैं इस सभा की अध्यक्षता कर रही हूं।
आपने देखा है पिछले कुछ सालों में जिन्हें वोट देना चाहिए उनके नाम वोटर लिस्ट से अनुचित ढंग से काटे जा रहे हैं। जब ये सवाल उठाया जाता है इंडिया ब्लॉक की तरफ से तो उसमें कोई पारदर्शिता नहीं दिखाई देती कि क्यों किया गया और कोई जवाबदेही भी नहीं मिलती। इसलिए यह निश्चित किया गया कि एक महाभियोग का प्रस्ताव लाया जाए ज्ञानेश को उनके पद से हटाने के लिए।
चुनाव में हार-जीत तो लगी रहती है, लेकिन जब जीत का घोड़ा दौड़ते-दौड़ते अचानक ठोकर खा जाए तो सवार को भी अपनी सवारी पर शक होने लगता है। चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों में सत्तापक्ष को मिले झटकों ने कुछ ऐसा ही माहौल बना दिया है। खासकर नागपुर में विपक्ष की जीत ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। यानी एक ही तीर वह भी बड़ा गंभीर। जैसे सत्ता पक्ष के दिल पर चोट कर दी हो।
नागपुर कोई साधारण जगह नहीं है। इसे संघ का मुख्यालय होने का गौरव प्राप्त है। ऐसे में वहां विपक्ष की जीत होना सत्तापक्ष के लिए किसी राजनीतिक पहेली से कम नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि जब घर के आसपास ही मतदाताओं का मिजाज बदलने लगे तो चुनावी रणनीतिकार आखिर किस दिशा में रणनीति बना रहे हैं?
प्रधानमंत्री ने विपक्ष की सीटों को लेकर सोशल मीडिया पर तंज कसा, लेकिन प्रकृति का न्याय देखिए कि कुछ ही समय बाद नागपुर ने ऐसा जवाब दिया कि राजनीतिक व्यंग्य का विषय ही बदल गया। लगता है मतदाता भी अब सोशल मीडिया की पोस्ट पढ़कर नहीं, अपनी पसंद से वोट डालने लगे हैं। इससे यह भी साबित होता है कि सोशल मीडिया पर जल्दबाजी में पोस्ट करना कितना भारी पड़ सकता है। इधर झट से पोस्ट की और उधर नुकसान हो गया।
उधर वाराणसी में भी सायकलवालों की जीत ने सत्तापक्ष को सोचने पर मजबूर कर दिया। अब इसे विपक्ष की किस्मत कहें या मतदाताओं की नाराजगी, लेकिन लोकतंत्र में जनता का फैसला सबसे ऊपर होता है।
वैसे चुनाव हारने के बाद आत्ममंथन करने की परंपरा बड़ी दिलचस्प है। हर पार्टी आत्ममंथन का ऐलान करती है, बैठकें होती हैं, रिपोर्ट बनती है और फिर अगले चुनाव में वही पुराने चेहरे, वही पुराने वादे और वही पुराने भाषण मैदान में उतर आते हैं। वैसे ही जैसे आते-जाते लहरों की तरह।
सच तो यह है कि लोकतंत्र में कोई भी पार्टी स्थायी विजेता नहीं होती। कुर्सी का तकिया कितना भी मुलायम क्यों न हो, जनता जब करवट बदलती है तो सत्तापक्ष की नींद उड़ ही जाती है। इसलिए बेहतर है कि नेता जनता की आवाज सुनें, वरना ईवीएम से पहले मतदाता ही राजनीतिक नींद का अलार्म बजा देते हैं!