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दो हफ्ते के हाई से फिसला गोल्ड, जानें क्यों क्रैश हुआ सोना-चांदी?

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मुंबई, एजेंसी। एक कारोबारी दिन की तेज बढ़त के बाद गुरुवार को घरेलू वायदा बाजार में सोना और चांदी की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों की मुनाफावसूली और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की आगामी मौद्रिक नीति बैठक से पहले सतर्क रुख के चलते बुलियन बाजार पर दबाव देखने को मिला।

एमसीएक्स (MCX) पर 5 अगस्त 2026 एक्सपायरी वाला गोल्ड फ्यूचर्स करीब 0.94 प्रतिशत की गिरावट के साथ 1,44,316 रुपए प्रति 10 ग्राम पर कारोबार करता दिखा। वहीं, 4 सितंबर 2026 एक्सपायरी वाला सिल्वर फ्यूचर्स लगभग 1.81 प्रतिशत टूटकर 2,22,900 लाख रुपए प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया।

इससे पहले 22 जुलाई को घरेलू स्पॉट बाजार में सोना और चांदी दोनों में तेज उछाल दर्ज किया गया था। गोल्ड के भाव प्रति 10 ग्राम रू.1900 उछलकर दो हफ्ते के हाई रू.1.49 लाख और चांदी रू.8500 मजबूत होकर प्रति किलो रू.2.30 लाख पर थी। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, हालिया तेजी के बाद निवेशकों ने मुनाफावसूली की, जिससे कीमतों में नरमी आई।

विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं। ऐसे में निवेशकों की नजर अब अमेरिकी फेडरल रिजर्व की आगामी नीति बैठक पर है, क्योंकि ब्याज दरों को लेकर दिए जाने वाले संकेत सोना-चांदी की कीमतों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

आमतौर पर ऊंची ब्याज दरें सोने जैसी गैर-ब्याज देने वाली संपत्तियों पर दबाव डालती हैं। हालांकि, वैश्विक अनिश्चितता और सुरक्षित निवेश (सेफ हेवन) की मांग सोने को समर्थन देती रही है। चांदी में भी निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है लेकिन औद्योगिक मांग के कारण इसमें उतार-चढ़ाव अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिलता है।

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UN में भारत ने पाकिस्तान क सुनाई खरी-खरी, कहा-आतंकवाद के साथ नहीं चल सकती सिंधु संधि

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न्यूयॉर्क/नई दिल्ली, एजेंसी। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की टिप्पणियों को कड़े शब्दों में खारिज करते हुए कहा कि जब ”सीमा पार आतंकवाद” का इस्तेमाल ”सरकारी नीति के हथियार” के रूप में किया जाता है तो सिंधु जल संधि के तहत सहयोग की उम्मीद नहीं की जा सकती। भारत ने यह भी दोहराया कि जम्मू कश्मीर देश का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा ”हमेशा था, है और रहेगा।” संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने बुधवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ”प्राकृतिक संसाधनों का प्रशासन: शांति, सुरक्षा और समृद्धि की नींव” विषय पर आयोजित उच्चस्तरीय खुली बहस में ये टिप्पणियां कीं। पर्वतनेनी ने पाकिस्तान को जवाब देते हुए कहा कि पाकिस्तान ने ”झूठे विमर्श” को आगे बढ़ाने के लिए चर्चा का ”दुरुपयोग” किया, जिसके कारण भारत को जवाब देना पड़ा।

पर्वतनेनी ने कहा, ”सिंधु जल संधि को लेकर हमारा रुख स्पष्ट और एकसमान है। जब सीमा पार आतंकवाद का सरकारी नीति के हथियार के तौर पर नियमित रूप से इस्तेमाल किया जाता है तो आपसी विश्वास और सद्भाव के आधार पर सहयोग की उम्मीद नहीं की जा सकती।” भारत ने यह तीखी प्रतिक्रिया संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि आसिम इफ्तिखार अहमद के आरोपों के बाद दी। अहमद ने सिंधु जल संधि को स्थगित रखने के भारत के फैसले को ”अवैध” बताते हुए उस पर ”पानी को हथियार की तरह इस्तेमाल करने” का आरोप लगाया था। उन्होंने दावा किया था कि इस कदम से पाकिस्तान के 24 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका खतरे में पड़ गई है।

वर्ष 1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुआ समझौता है। यह संधि सिंधु नदी घाटी की छह नदियों के जल बंटवारे को नियंत्रित करती है। इसके तहत पूर्वी नदियां भारत और पश्चिमी नदियां मुख्य रूप से पाकिस्तान को आवंटित की गई हैं। भारत ने 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया था। भारत ने कहा था कि सीमा पार आतंकवाद जारी रहने की स्थिति में समझौते के तहत सहयोग नहीं किया जा सकता। पर्वतनेनी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की खुली बहस के दौरान भारत के जवाब देने के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए कहा, ”जहां तक केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर का सवाल है, वह भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा हमेशा था, है और रहेगा। यह संवैधानिक और कानूनी वास्तविकता है, जिसे पाकिस्तान जानबूझकर नजरअंदाज करता है।”

उन्होंने कहा, ”जम्मू कश्मीर से जुड़ा एकमात्र लंबित मुद्दा पाकिस्तान द्वारा भारत के संप्रभु क्षेत्र पर खुलेआम हमला और अवैध कब्जा है। भारत पर उंगली उठाने के बजाय अपने देश को व्यवस्थित करके पाकिस्तान अपना और अपने लोगों का अधिक भला कर सकता है।” पर्वतनेनी ने अपने संबोधन में कहा कि ”प्राकृतिक संसाधनों का अवैध दोहन और उनकी तस्करी कुछ परिस्थितियों में सशस्त्र समूहों के वित्तपोषण और संघर्ष को लंबा खींचने में योगदान दे सकती है।” उन्होंने जोर दिया कि प्राकृतिक संसाधन मुख्य रूप से संप्रभु देशों के विकास और समृद्धि के साधन के रूप में काम आने चाहिए।  

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कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए ग्रीनलाइन, डाबर इंडिया ने की साझेदारी

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नई दिल्ली, एजेंसी। एस्सार समूह की इकाई ग्रीनलाइन मोबिलिटी सॉल्यूशंस लि. ने बृहस्पतिवार को दैनिक उपयोग का सामान बनाने वाली डाबर इंडिया लि. के साथ साझेदारी की घोषणा की। इस साझेदारी के तहत देश में एलएनजी (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) तथा इलेक्ट्रिक ईंधन से संचालित भारी वाणिज्यिक ट्रकों के माध्यम से हरित लॉजिस्टिक सेवाएं प्रदान करने वाली कंपनी ग्रीनलाइन मोबिलिटी, डाबर इंडिया के सड़क परिवहन परिचालन को कम उत्सर्जन वाले एलएनजी चालित ट्रक के माध्यम से अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाने में मदद करेगी। 

ग्रीनलाइन ने बयान में कहा कि इस साझेदारी के तहत वह डाबर इंडिया की लॉजिस्टिक गतिविधियों में एलएनजी से चलने वाले भारी वाणिज्यिक वाहनों को तैनात करेगी। इससे लंबी दूरी के माल परिवहन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलेगी। ग्रीनलाइन मोबिलिटी सॉल्यूशंस के उपाध्यक्ष (बिक्री) चार्ल्स डेवलिन डी’कोस्टा ने कहा, ”डाबर इंडिया जैसी प्रतिष्ठित उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनी के साथ साझेदारी कर हमें खुशी है। यह देखना उत्साहजनक है कि अधिक से अधिक भारतीय कंपनियां कम उत्सर्जन वाले लॉजिस्टिक समाधान को अपनी कारोबारी रणनीति का हिस्सा बना रही हैं।” 

डाबर इंडिया के वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला निदेशक सम्राट सहगल ने कहा कि कंपनी की सतत विकास रणनीति में आपूर्ति श्रृंखला के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कहा, ”ग्रीनलाइन के साथ साझेदारी से हमें अपनी लॉजिस्टिक गतिविधियों में कम उत्सर्जन वाले परिवहन समाधान को शामिल करने में मदद मिलेगी, जबकि दक्षता और विश्वसनीयता भी बनी रहेगी।” ग्रीनलाइन वर्तमान में भारत के प्रमुख माल परिवहन मार्गों पर 1,000 से अधिक एलएनजी और बिजलीचालित भारी वाणिज्यिक वाहनों का संचालन कर रही है। ये वाहन इस्पात, सीमेंट, खनन, रोजमर्रा के सामान और रसायन समेत विभिन्न क्षेत्रों के लिए सेवाएं दे रहे हैं। 

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मर्सिडीज-बेंज इंडिया हाइब्रिड वाहन लाना रखेगी जारी, नीतिगत समर्थन का अभाव बाधा नहीं: सीईओ

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नई दिल्ली, एजेंसी। जर्मनी की लक्जरी कार विनिर्माता कंपनी मर्सिडीज-बेंज भारतीय बाजार में हाइब्रिड वाहनों की अपनी पेशकश जारी रखेगी। कंपनी का कहना है कि भले ही इस प्रौद्योगिकी के लिए नीतिगत प्रोत्साहन का अभाव हो, फिर भी वह ग्राहकों की अंतर्निहित मांग को पूरा करने के लिए हाइब्रिड गाड़ियां लाती रहेगी। मर्सिडीज-बेंज इंडिया ने अपने एएमजी ई 53 प्लग-इन हाइब्रिड इलेक्ट्रिक वाहन (पीएचईवी) के दो संस्करण क्रमशः 1.45 करोड़ रुपए और 1.48 करोड़ रुपए (भारत में शोरूम कीमत) की कीमत पर पेश किए हैं। 

कंपनी के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) संतोष अय्यर ने कहा कि हाइब्रिड वाहन उन ग्राहकों के लिए एक माध्यम का काम करते हैं, जो अभी पूरी तरह से इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा, “दीर्घकालिक रूप से देखा जाए तो विद्युतीकरण ही अंतिम लक्ष्य है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि लगभग 75 प्रतिशत ग्राहक अब भी कुछ व्यावहारिक कारणों से पूरी तरह ईवी को प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं।” अय्यर ने कहा कि चार्जिंग बुनियादी ढांचा और सीमित दूरी को लेकर चिंता जैसे कारक अब भी इलेक्ट्रिक वाहनों की स्वीकार्यता की गति को प्रभावित कर रहे हैं। 

उन्होंने कहा, “हमारे लिए प्लग-इन हाइब्रिड (ऐसा वाहन जिसमें पेट्रोल इंजन के साथ इलेक्ट्रिक मोटर भी होती है और जिसकी बैटरी को बाहरी बिजली स्रोत से चार्ज किया जा सकता है) प्रौद्योगिकी उन ग्राहकों के लिए एक सेतु का काम करती है, जो अभी पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने के लिए तैयार नहीं हैं। इससे ग्राहकों को पेट्रोल इंजन की सुविधा के साथ इलेक्ट्रिक वाहन चलाने का अनुभव भी मिलता है।”

दिल्ली की इलेक्ट्रिक वाहन नीति में ऐसे वाहनों के लिए प्रोत्साहन नहीं मिलने जैसे नीतिगत समर्थन के अभाव के बावजूद हाइब्रिड मॉडल पेश करने के सवाल पर अय्यर ने कहा, “जहां भी अवसर और संभावनाएं होंगी, हम ‘प्लग-इन हाइब्रिड मॉडल’ पेश करना जारी रखेंगे।” अय्यर ने कहा कि कंपनी नीति-निर्माताओं के इलेक्ट्रिक वाहनों पर विशेष ध्यान को समझती है और उसका सम्मान करती है लेकिन वह ग्राहकों को विकल्प उपलब्ध कराना चाहती है ताकि वे पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने से पहले हाइब्रिड प्रौद्योगिकी का अनुभव प्राप्त कर सकें।  

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