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बांग्लादेश में साजिश से गिराई गई हसीना सरकार:तख्तापलट से 2 दिन पहले यूनुस छात्रों से मिले, विदेशी पत्रकार ने मीटिंग कराई, वहीं योजना बनी

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ढाका, एजेंसी। बांग्लादेश में साजिश के तहत शेख हसीना की सरकार गिराई गई थी। छात्र संगठन चाहते थे कि बांग्लादेश की सरकार मोहम्मद यूनुस चलाएं।

छात्रों की यूनुस से मुलाकात करवाने में न्यूज एजेंसी AFP के पत्रकार कादरुद्दीन शिशिर ने मदद की। यह दावा अंतरिम सरकार के सलाहकार रहे मोहम्मद यूनुस के पूर्व प्रेस सचिव शफीकुल आलम ने किया है।

शेख हसीना ने 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश छोड़ा था। इसके दो दिन पहले ही यूनुस और छात्रों के बीच बातचीत हुई थी। इसी बातचीत में तख्तापलट का प्लान बना।

शफीकुल आलम 13 अगस्त 2024 से 17 फरवरी 2026 तक मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में प्रेस सचिव रहे हैं। (फाइल फोटो)

शफीकुल आलम 13 अगस्त 2024 से 17 फरवरी 2026 तक मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में प्रेस सचिव रहे हैं। (फाइल फोटो)

सुरक्षा एजेंसियों को बातचीत की जानकारी ही नहीं थी

शफीकुल आलम के मुताबिक, छात्र नेताओं को यूनुस तक अपनी बात पहुंचाने के लिए एक भरोसेमंद व्यक्ति की जरूरत थी। ऐसे में कादरुद्दीन शिशिर ने दोनों पक्षों के बीच संपर्क कराने में मदद की।

आलम ने दावा किया कि सुरक्षा एजेंसियों को इस बातचीत की जानकारी नहीं थी। अगर अधिकारियों को इसका पता चल जाता तो शिशिर और AFP की पूरी टीम को खतरा हो सकता था।

आलम ने बातचीत का पूरा ब्योरा नहीं दिया। यह भी पता नहीं है कि शिशिर की भूमिका केवल शुरुआती बातचीत कराने तक सीमित थी या उन्होंने आगे की बातचीत में भी हिस्सा लिया था।

छात्र आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल नाहिद इस्लाम ने उन्हें अंतरिम सरकार का मुख्य सलाहकार बनाने का प्रस्ताव दिया था। बाद में यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी।

AFP की ढाका स्थित फैक्ट-चेकिंग टीम के तत्कालीन संपादक कादरुद्दीन शिशिर। (फाइल फोटो)

AFP की ढाका स्थित फैक्ट-चेकिंग टीम के तत्कालीन संपादक कादरुद्दीन शिशिर। (फाइल फोटो)

हसीना सरकार के खिलाफ कैसे शुरू हुआ था आंदोलन?

बांग्लादेश में 2024 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ छात्र आंदोलन शुरू हुआ था। वहां सरकारी नौकरियों में 1971 के मुक्ति संग्राम में लड़ने वालों के परिवारों के लिए 30% तक सीटें आरक्षित थीं।

छात्रों का कहना था कि इससे आम युवाओं के लिए सरकारी नौकरी पाने के मौके कम हो रहे हैं। वे चाहते थे कि भर्ती में परीक्षा और योग्यता के आधार पर ज्यादा नौकरियां मिलें।

इसी मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे सरकार के खिलाफ प्रदर्शन में बदल गया। सरकार की कार्रवाई में बड़ी संख्या में लोग मारे गए। संयुक्त राष्ट्र के आकलन के मुताबिक, जुलाई और अगस्त 2024 के दौरान करीब 1,400 लोगों की मौत हुई।

शेख हसीना की यह फुटेज हेलिकॉप्टर में बैठने से पहले की है। 5 अगस्त को बांग्लादेश छोड़ने के बाद वे भारत आ गईं थीं।

शेख हसीना की यह फुटेज हेलिकॉप्टर में बैठने से पहले की है। 5 अगस्त को बांग्लादेश छोड़ने के बाद वे भारत आ गईं थीं।

यूनुस की अंतरिम सरकार के बाद सत्ता में आए तारिक रहमान

यूनुस की अंतरिम सरकार का काम चुनाव कराकर सत्ता चुनी हुई सरकार को सौंपना था। इसके लिए 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव हुए, जिसमें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने बड़ी जीत हासिल की। पार्टी ने संसद की 300 में से 209 सीटें जीतीं।

इसके बाद 17 फरवरी 2026 को तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उनके सत्ता संभालने के साथ ही यूनुस की अंतरिम सरकार का कार्यकाल खत्म हो गया।

अब देश लौटना चाहती हैं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 19 अक्टूबर 2026 को कहा था कि वे दिसंबर में अपने देश लौटेंगी। उन्होंने कहा कि,

बांग्लादेश की मौजूदा तारिक रहमान सरकार उन्हें गिरफ्तार कर सकती है, मार सकती है या टॉर्चर कर सकती है, लेकिन वे इन खतरों से नहीं डरतीं। हसीना ने कहा कि खतरा कितना भी हो, उन्हें इसकी परवाह नहीं है और उन्हें अपने देश लौटना ही है।

रहमान की सरकार कई बार प्रत्यर्पण की मांग कर चुकी

तारिक रहमान की सरकार शेख हसीना को बांग्लादेश वापस भेजने की मांग कई बार उठा चुकी है। इस मुद्दे का असर बांग्लादेश और भारत के रिश्तों पर भी पड़ा है।

भारत ने BRICS समिट में तारिक रहमान को शामिल होने का न्योता दिया था। इसके अलावा, फरवरी से ही भारत की ओर से उन्हें अलग से भारत आने का निमंत्रण दिया गया था।

हालांकि, प्रधानमंत्री बनने के बाद से तारिक रहमान ने भारत का दौरा नहीं किया है। हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा दोनों देशों के बीच तनाव का कारण बना हुआ है।

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पाकिस्तान में सिर्फ 1.7% हिंदू बचे:ब्रिटिश संगठन की रिपोर्ट- आजादी से पहले 14.6% थे, हिंसा-धर्म परिवर्तन वजह

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इस्लामाबाद, एजेंसी। पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी अब सिर्फ 1.7% रह गई है। ब्रिटिश हिंदू संगठन इनसाइट यूके की एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई। 1941 में आज के पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी 14.6% थी।

रिपोर्ट में हिंदुओं की आबादी घटने की वजह हिंसा और धर्म परिवर्तन बताया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि बंटवारे के समय और उसके बाद हजारों हिंदू परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ा। कई परिवारों की पुश्तैनी जमीन और खेत भी छिन गए।

रिपोर्ट में धार्मिक स्वतंत्रता पर रोक और जबरन धर्म परिवर्तन के मामले भी उठाए गए हैं। संगठन ने ब्रिटिश सरकार से पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने की मांग की है।

बंटवारे के बाद हिंदू परिवारों की जमीनें छीनीं

रिपोर्ट के मुताबिक, 1947 के बंटवारे के दौरान और उसके बाद हुई हिंसा के कारण हजारों हिंदू परिवार विस्थापित हुए। कई परिवारों ने अपनी पुश्तैनी जमीन और खेत खो दिए।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान के एनिमी प्रॉपर्टी कानूनों के तहत इन संपत्तियों पर कब्जे से हिंदू समुदाय की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई।

पाकिस्तान में एनिमी प्रॉपर्टी यानी दुश्मन की संपत्ति उन मकानों, जमीनों या दूसरी संपत्तियों को कहा जाता है, जिन्हें सरकार ने भारत चले गए लोगों या दुश्मन देश के नागरिकों की संपत्ति मानकर अपने कब्जे में ले लिया है।

हिंदुओं के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री बनने पर भी पाबंदी

रिपोर्ट में पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 41 और 91 का जिक्र किया गया है। इनके तहत राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का पद केवल मुस्लिम नागरिकों के लिए है। इन नियमों को बदलने के लिए 2019 में लाया गया सुधार विधेयक आगे नहीं बढ़ सका।

संगठन ने यह भी कहा कि पाकिस्तान में पासपोर्ट बनवाते समय नागरिकों को अपना धर्म बताना पड़ता है। इस्लामाबाद में हिंदू मंदिर बनाने की योजना भी अब तक पूरी नहीं हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में मंदिर निर्माण को मंजूरी मिलने के बाद इस्लामी संगठनों के विरोध के चलते काम रोक दिया गया था।

ब्रिटिश हिंदू संगठन इनसाइट यूके की रिपोर्ट की कवर फोटो।

ब्रिटिश हिंदू संगठन इनसाइट यूके की रिपोर्ट की कवर फोटो।

हर साल 1,000 से ज्यादा हिंदू-ईसाई महिलाओं के अपहरण

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान में हर साल करीब 1,000 या इससे ज्यादा हिंदू और ईसाई महिलाओं व लड़कियों का अपहरण होता है। आरोप है कि बाद में उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराकर अपहरण करने वालों से शादी करा दी जाती है। इनमें कई नाबालिग गरीब परिवारों से होती हैं। उन्हें न्याय पाने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

हिंदू संगठन की ब्रिटेन सरकार से 5 मांगें

  1. मंदिरों की सुरक्षा और धार्मिक मामलों में जल्द सुनवाई के लिए समयसीमा तय की जाए।
  2. पाकिस्तान को दी जाने वाली ब्रिटिश सहायता को मानवाधिकारों में सुधार से जोड़ा जाए।
  3. इस्लामाबाद स्थित ब्रिटिश हाई कमीशन में अल्पसंख्यक समुदायों के दो प्रतिनिधियों को जिम्मेदारी दी जाए, ताकि हिंसा और भेदभाव के मामले सामने आ सकें।
  4. हिंदू, ईसाई, सिख और दूसरे अल्पसंख्यकों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर हर छह महीने में रिपोर्ट जारी की जाए।
  5. जबरन धर्म परिवर्तन और धार्मिक उत्पीड़न के शिकार लोगों के लिए ब्रिटेन में शरण पाने के सुरक्षित रास्ते बनाए जाएं।

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विदेश

रूस का यूक्रेन के रेलवे स्टेशन पर हमला, 14 मौतें:ड्रोन से इलेक्ट्रिक ट्रेन को निशाना बनाया, इस साल रेल नेटवर्क पर 1600 हमले

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कीव, एजेंसी। यूक्रेन के मध्य में स्थित निप्रो शहर में गुरुवार सुबह रूसी ड्रोन ने रेलवे स्टेशन पर हमला किया। अधिकारियों के मुताबिक, हमले में 14 लोगों की मौत हो गई, जबकि 10 अन्य घायल हुए हैं।

शहर के मेयर बोरिस फिलातोव ने कहा कि ड्रोन ने यात्रियों को ले जाने वाली इलेक्ट्रिक ट्रेन को निशाना बनाया।

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने हमले को भयावह बताया। उन्होंने रूस पर और कड़े प्रतिबंध लगाने की मांग की, ताकि ऐसे हमलों को रोका जा सके।

रूस के ट्रेन पर हमले के बाद की तस्वीरें

ड्रोन हमले के बाद स्टेशन पर खड़ी दो ट्रेनों से धुआं निकलता दिखाई दिया।

ड्रोन हमले के बाद स्टेशन पर खड़ी दो ट्रेनों से धुआं निकलता दिखाई दिया।

रूसी ड्रोन हमले के बाद रेलवे स्टेशन पर राहत और बचाव कार्य करते कर्मचारी।

रूसी ड्रोन हमले के बाद रेलवे स्टेशन पर राहत और बचाव कार्य करते कर्मचारी।

रेलवे स्टेशन पर राहत और बचाव कार्य में जुटे आपातकालीन कर्मचारी।

रेलवे स्टेशन पर राहत और बचाव कार्य में जुटे आपातकालीन कर्मचारी।

रूसी ड्रोन हमले के बाद अपनी बेटी के शव के पास दुख जताता पिता।

रूसी ड्रोन हमले के बाद अपनी बेटी के शव के पास दुख जताता पिता।

हमले के वक्त प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी ट्रेन

यूक्रेन की सरकारी रेलवे कंपनी के मुताबिक, ड्रोन ने उस प्लेटफॉर्म को निशाना बनाया, जहां निप्रो से जापोरिजिया जाने वाली ट्रेन नंबर 866 खड़ी थी।

ट्रेन रवाना होने की तैयारी में थी। रेलवे कंपनी ने बताया कि खतरे को लेकर चेतावनी जारी की गई थी, लेकिन इसके बावजूद प्लेटफॉर्म पर बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।

रेलवे नेटवर्क पर 8 महीने में 1600 से ज्यादा हमले

  • रूस ने 2026 के पहले 8 महीनों में यूक्रेन के रेलवे नेटवर्क पर 1,600 से ज्यादा हमले किए। इनमें ट्रेन, रेल इंजन और रेलवे से जुड़े दूसरे ठिकानों को निशाना बनाया गया।
  • विदेश मंत्री आंद्रिय सिबिहा के मुताबिक, 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद से रूस 500 से ज्यादा रेल इंजनों को नुकसान पहुंचा चुका है या नष्ट कर चुका है। इनमें से आधे से ज्यादा घटनाएं इसी साल हुईं।
  • यूक्रेन के लिए रेलवे यात्रियों के साथ-साथ जरूरी सामान और अनाज की आवाजाही का भी अहम साधन है। ऐसे में रेलवे पर हमलों से देश की परिवहन व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
  • यूक्रेन के पूर्व उप परिवहन मंत्री वासिल शेवचेंको के मुताबिक, रेल इंजन पर हमला होने से पूरे रेल मार्ग पर यातायात ठप हो जाता है। डीजल इंजन में बड़ी मात्रा में ईंधन होने के कारण विस्फोट के बाद भीषण आग लग जाती है।
ड्रोन हमले में जान गंवाने वाले यात्रियों के शव स्टेशन पर मौजूद

ड्रोन हमले में जान गंवाने वाले यात्रियों के शव स्टेशन पर मौजूद

रेल नेटवर्क पर हमला क्यों करता है रूस

यूक्रेन के रेलवे नेटवर्क पर हमलों का असर सिर्फ यात्रियों तक सीमित नहीं है। रेलवे के जरिए अनाज, जरूरी सामान और युद्ध प्रभावित इलाकों में राहत सामग्री पहुंचाई जाती है।

रेलवे की आवाजाही बाधित होने से अर्थव्यवस्था और देश की आपूर्ति व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।

रेलवे को सुरक्षित रखने के लिए यूक्रेन की तैयारी

रूसी ड्रोन हमलों के खतरे को देखते हुए यूक्रेन की सरकारी रेलवे कंपनी ने ट्रेनों और ड्रोन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए निगरानी केंद्र बनाए हैं। खतरे का संकेत मिलने पर ट्रेनों को रोककर यात्रियों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की कोशिश की जाती है।

यूक्रेन की सरकारी रेलवे कंपनी के मुताबिक, सितंबर में ड्रोन हमलों के खतरे के कारण 5,831 ट्रेनों से यात्रियों को सुरक्षित उतारा गया। यानी औसतन हर दिन करीब 205 ट्रेनों को रोकना पड़ा।

कुछ यात्रियों को खतरा टलने तक रेलवे ट्रैक के पास या खुले मैदानों में इंतजार करना पड़ा। एक ट्रेन को सितंबर में 6.5 घंटे तक रोकना पड़ा था।

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विदेश

इजराइल चुनाव में विदेशी दखल के जांच के आदेश:कतर-तुर्किये से फंडिंग का शक, बैलट वोटों की गिनती पूरी, नेतन्याहू-आइजनकोट दोनों बहुमत से दूर

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तेल अवीव, एजेंसी। इजराइल में 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव में विदेशी दखल की आशंका जताई गई है। चुनाव आयोग ने जांच एजेंसी ‘शिन बेट’ को मामले की जांच के आदेश दिए हैं। द टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक, एजेंसी एक हफ्ते में जांच रिपोर्ट सौंपेगी।

प्रधानमंत्री नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को शक है कि कतर और तुर्किये से इजराइल और वेस्ट बैंक में पैसे भेजे गए। इनका इस्तेमाल अरब नागरिकों की फंडिंग के लिए किया गया।

चुनाव खत्म होने के बाद दूसरे दिन सभी बैलट वोट की गिनती पूरी हो चुकी है। अब सिर्फ दोहरे लिफाफों के वोटों की गिनती बाकी है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू और विपक्षी नेता आइजनकोट दोनों बहुमत से दूर हैं।

अब तक नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें, जबकि विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिलती दिख रही हैं। वहीं, अरब पार्टियों को कुल 19 सीटें मिलने का अनुमान है।

कतर ने इजराइली चुनाव में दखल के आरोपों को बेतुका बताया

कतर ने इजराइल के चुनाव में दखल देने और अरब वोट बढ़ाने के लिए पैसा देने के आरोपों को खारिज किया है।

कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल अंसारी ने इन आरोपों को बेतुका और खतरनाक बताया। उन्होंने कहा कि इजराइली नेता अपनी राजनीतिक नाकामी का दोष कतर पर डाल रहे हैं।

अंसारी ने X पर पोस्ट कर आरोप लगाया कि कुछ इजराइली नेता और मीडिया से जुड़े लोग गलत जानकारी फैलाकर कतर को अपने राजनीतिक विवादों में घसीट रहे हैं।

चुनाव आयोग ने धांधली के आरोपों को बेबुनियाद बताया

चुनाव आयोग ने चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली के आरोपों को बेबुनियाद बताया है। आयोग के कार्यवाहक महानिदेशक डीन लिवने ने कहा कि चुनाव कानून के मुताबिक हुआ और अब तक गड़बड़ी के कोई सबूत नहीं मिले हैं।

लिवने ने कहा कि मतदान केंद्रों पर चुनाव की निष्पक्षता बनाए रखने के पुख्ता इंतजाम किए गए थे।

उन्होंने यह भी बताया कि चुनाव आयोग के अध्यक्ष नोआम सोहलबर्ग ने शिन बेट को गोपनीय खुफिया जानकारी के आधार पर जांच करने को कहा है। हालांकि, इस जानकारी की अभी पुष्टि नहीं हुई है।

डबल-एनवेलप बैलेट से नतीजों में बड़े बदलाव की उम्मीद कम

27 अक्टूबर को एक IDF सैनिक ने 'जनरल स्टाफ सप्लाई सेंटर' बेस पर अपना वोट डाला।

27 अक्टूबर को एक IDF सैनिक ने ‘जनरल स्टाफ सप्लाई सेंटर’ बेस पर अपना वोट डाला।

डबल-एनवेलप बैलेट की गिनती गुरुवार सुबह शुरू हुई। इन बैलेट का इस्तेमाल उन लोगों के वोटों के लिए होता है, जो अपने तय मतदान केंद्र से अलग जगह पर वोट डालते हैं। इनमें सैनिक, राजनयिक, पुलिसकर्मी और विस्थापित लोग शामिल हैं।

द टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक, सैन्य ठिकानों, अस्पतालों और जेलों में डाले गए इन वोटों से चुनावी नतीजों में बड़े बदलाव की संभावना कम है। इस बार ऐसे करीब 5 लाख वोटों की गिनती होनी है, जो गुरुवार शाम तक पूरी हो जाएगी।

पिछले चुनावों में भी इन वोटों का रुझान देशभर के नतीजों जैसा ही रहा है। इजराइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के 2021 के चुनाव विश्लेषण के मुताबिक, नेतन्याहू के गठबंधन को डबल-एनवेलप वोटों में 48.76% वोट मिले थे। आम वोटों में उसका हिस्सा 47.95% था।

वहीं, विपक्षी पार्टियों को डबल-एनवेलप वोटों में 48.56% और आम वोटों में 50.06% वोट मिले थे। चुनाव समिति के कमांड सेंटर प्रमुख एलाद नवेह ने भी कहा कि इन वोटों का बंटवारा आमतौर पर देशभर में पड़े वोटों जैसा ही रहता है। दोनों में कोई बड़ा अंतर नहीं दिखता।

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