वॉशिंगटन,एजेंसी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प और रूस के राष्ट्रपति पुतिन 15 अगस्त को अलास्का में मुलाकात करेंगे। दोनों नेताओं के बीच 7 साल बाद हो रही इस मुलाकात का एजेंडा रूस-यूक्रेन जंग रोकना है।
ट्रम्प और रूस के पुतिन के बीच अलास्का के सबसे बड़े शहर एंकरेज में एलमेंडॉर्फ-रिचर्डसन मिलिट्री बेस पर वन-टू-वन मीटिंग होगी। उनके बीच सिर्फ एक ट्रांसलेटर (अनुवादक) होगा।
दोनों के बीच क्या बात होगी, इसका ब्योरा नहीं आएगा। मुलाकात के बाद दोनों नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे।
54 साल पहले 1971 में इसी सैन्य बेस ने राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और जापान के राजा हिरोहितो की ऐतिहासिक मुलाकात की मेजबानी की थी।
यह पहली बार था, जब कोई जापानी राजा विदेशी धरती पर आए थे।
अमेरिकी बेस से 88 किमी की दूरी पर तैनात रहेंगे रूसी जेट
पुतिन के अलास्का पहुंचने से पहले उनकी आर्मर्ड लिमोजिन ऑरस सेनट रूसी कार्गो विमान से पहले ही बेस पर पहुंच गई है। मीटिंग में इस्तेमाल होने वाले पानी की बोतल और कप भी पुतिन की टीम द्वारा सील किए जाएंगे।
अलास्का से 88 किमी दूर आनादिर में रूसी फाइटर जेट को तैनात किया गया है।
पुतिन के साथ उनकी एफएसओ (फेडरल प्रोटेक्टिव सर्विस) यूनिट आएगी। यह एजेंसी पुतिन की हर विदेश यात्रा को सुरक्षित रखती है।
आइस फोर्ट्रेस कहलाने वाले इस मिलिट्री बेस पर पहले से 32 हजार अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। ट्रम्प के सुरक्षा प्रोटोकॉल के मुताबिक कीहोल (केएच-11) रीकॉन सैटेलाइट्स भी एक्टिव रहेंगे। वहीं, साइबर सुरक्षा के लिए बेस का पूरा नेटवर्क एयर-गैप्ड (इंटरनेट से कट) किया जाएगा।
पूरे क्षेत्र में 300 किमी के दायरे तक नो-फ्लाई जोन लागू होगा। बेस के भीतर और बाहर दोहरी लेयर सुरक्षा होगी। पहली में सैन्य पुलिस और नेशनल गार्ड, दूसरी में स्पेशल फोर्सेज और सीक्रेट सर्विस की काउंटर-असॉल्ट टीम। ट्रम्प का एयर फोर्स वन विमान उतरने के साथ ही फुल-टाइम मिलिट्री गार्ड में रहेगा।
7 दिन पहले ट्रम्प-पुतिन मुलाकात का प्लान बना
ट्रम्प और पुतिन 2022 से जारी रूस-यूक्रेन जंग को खत्म करने को लेकर बातचीत शुरू करने के लिए मिल रहे हैं। ट्रम्प ने 2023-24 के राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान कई मौकों पर वादा किया था कि वे राष्ट्रपति बनने के बाद 24 घंटे के भीतर रूस-यूक्रेन जंग को खत्म करवा देंगे। उनको राष्ट्रपति बने 6 महीने से ज्यादा हो गया, लेकिन ट्रम्प का यह वादा अभी तक पूरा नहीं हो सका।
इसके उलट रूस ने यूक्रेन पर हवाई हमले और तेज कर दिए। इससे नाराज होकर ट्रम्प ने रूस को पीस डील पर बात करने के लिए 50 दिन का वक्त दिया था। ट्रम्प ने तत्काल युद्धविराम पर सहमति नहीं होने पर और कड़े अमेरिकी प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी थी। 8 अगस्त को यह डेडलाइन खत्म हो गई।
डेडलाइन से दो दिन पहले 6 अगस्त को अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने मॉस्को में पुतिन से मुलाकात की थी। इस मुलाकात के बाद ही ट्रम्प और पुतिन के बीच मुलाकात का प्लान बना। 8 अगस्त को ट्रम्प ने मुलाकात का ऐलान किया।
इस मुलाकात के बाद फिलहाल सीजफायर की उम्मीद नहीं है। व्हाइट हाउस ने भी तुरंत सीजफायर से इनकार करते हुए कहा कि इस मीटिंग का मकसद यह समझना है कि यूक्रेन जंग को खत्म करने के रास्ते क्या हो सकते हैं।
ट्रम्प और पुतिन अलास्का में ही क्यों मिल रहे हैं
बीबीसी के मुताबिक ट्रम्प और पुतिन के अलास्का में ही मिलने की सबसे बड़ी वजह सुरक्षा है। अलास्का की मुख्य भूमि का सबसे नजदीकी हिस्सा रूस के चुकोटका से सिर्फ 90 किलोमीटर दूर है। पुतिन बिना किसी ‘दुश्मन’ देश के ऊपर से उड़ान भरे वहां पहुंच सकते हैं।
इस क्षेत्र में रूस के कुछ एयरफोर्स बेस और सैन्य निगरानी स्टेशन हैं, जहां परमाणु हथियार भी हो सकते हैं। पुतिन का यहां पर मिलना ज्यादा सुरक्षित होगा।
दूसरी वजह है दूरी। अलास्का यूक्रेन और यूरोप से काफी दूर है। यह पुतिन की उस सोच के मुताबिक है, जिसमें वह कीव और यूरोपीय संघ के नेताओं को बीच में लाए बिना सीधे अमेरिका से बात करना चाहते हैं।
अलास्का में पुतिन के लिए क्या कोई रिस्क है, एक्सपर्ट से जाने
भारत के रिटायर्ड एडमिरल गिरीश कुमार गर्ग कहते हैं- यह बैठक अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की पहल पर हो रही है, मुझे नहीं लगता कि अमेरिका अलास्का में पुतिन की सुरक्षा को लेकर कोई जोखिम उठाएगा। यह न केवल अमेरिका-रूस संबंधों के भविष्य के लिए, बल्कि रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए भी खतरनाक हो सकता है।
रूस ने अमेरिकी धरती पर बैठक के लिए सहमत होने से पहले पुतिन की सुरक्षा की गारंटी मांगी होगी। पुतिन अलास्का में अमेरिकी जाल में फंस जाएं, वो इतने बेवकूफ नहीं हैं।
पुतिन का EU या किसी और ज्यादा सुरक्षित जगह जाने के बजाय अमेरिका जाने के लिए तैयार होना उनके अमेरिका के साथ संबंध सुधारने के प्रयास के तौर पर भी देखा जा सकता है।
पुतिन यूक्रेन का 20% हिस्सा छोड़ने को तैयार नहीं
रूस ने यूक्रेन के करीब 20% हिस्से, यानी लगभग 1 लाख 14 हजार 500 वर्ग किलोमीटर पर कब्जा कर रखा है। इसमें क्रीमिया, डोनेट्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन, और जापोरिजिया जैसे क्षेत्र शामिल हैं। रूस इन क्षेत्रों को अपनी सामरिक और ऐतिहासिक धरोहर मानता है और इन्हें छोड़ने को तैयार नहीं है।
पुतिन साफ कह चुके हैं कि यूक्रेन से शांति को लेकर बातचीत तभी हो सकती है जब यूक्रेन, रूस के कब्जाए गए क्षेत्रों से अपना दावा छोड़े और उन इलाकों को रूस के हिस्से के रूप में स्वीकारे। इसके अलावा पुतिन की यह शर्त भी है कि यूक्रेन नाटो में शामिल होने की अपनी मंशा छोड़ दे।
जेलेंस्की यूक्रेन की एक इंच जमीन भी देने को राजी नहीं
यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की यूक्रेन की एक इंच जमीन भी रूस को नहीं देंगे। उनका मानना है कि अगर यूक्रेन अभी पीछे हटता है तो इससे देश की संप्रभुता और सुरक्षा कमजोर हो सकती है। साथ ही रूस को भविष्य में और ज्यादा हमले करने का मौका मिल सकता है।
ट्रम्प ने 13 अगस्त को यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की और यूरोपीय नेताओं के साथ वर्चुअल मीटिंग की। इस मीटिंग में ट्रम्प ने जंग खत्म करने के लिए जमीन अदला-बदली की बात कही।
जेलेंस्की ने बिना किसी शर्त के युद्धविराम की मांग की। जेलेंस्की ने कहा कि रूस को किसी भी हाल में यूक्रेन का दूसरा बंटवारा नहीं करने दिया जाएगा। उन्होंने ट्रम्प से युद्धविराम और सुरक्षा गारंटी देने की बात कही।
यूरोपीय देश भी यूक्रेन के सरेंडर करने के पक्ष में नहीं
यूरोपीय देश, खासकर जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस, यूक्रेन के आत्मसमर्पण के पक्ष में नहीं हैं। वे रूस की शर्तों को मानने से इनकार कर चुके हैं और यूक्रेन की संप्रभुता का समर्थन करते हैं। यूरोपीय देशों का मानना है कि बिना यूक्रेन को शामिल किए या सुरक्षा गारंटी दिए कोई समझौता करना गलत होगा। इससे शांति वार्ता में सहमति बनाना मुश्किल हो रहा है।
जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने बुधवार को ट्रम्प के साथ हुई वर्चुअल बैठक के दौरान यूक्रेनी सुरक्षा हितों को ध्यान में रख कर पुतिन से बातचीत करने को कहा है। वहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि यूक्रेन में किसी भी क्षेत्रीय आदान-प्रदान पर केवल यूक्रेन के साथ ही चर्चा की जानी चाहिए।
उन्होंने आगे कहा, “हमें यूक्रेन का समर्थन जारी रखना चाहिए, और जब मैं ‘हम’ कहता हूं, तो मेरा मतलब यूरोपियन और अमेरिकन दोनों से हैं।” ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के प्रवक्ता ने वर्चुअल मीटिंग के बाद कहा कि यूक्रेन को किसी भी शांति समझौते के तहत विश्वसनीय सुरक्षा गारंटी मिलनी चाहिए।
नई दिल्ली, एजेंसी। अमेरिकी यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन के साथ पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी की कई तस्वीरें वायरल हैं। ये तस्वीरे इसलिए अहम मानी जा रही हैं, क्योंकि पुरी लगातार कहते रहे हैं वे एपस्टीन से केवल प्रतिनिधिमंडल के साथ मिले, अलग से कभी मुलाकात नहीं हुई।
तस्वीरें सामने आने के बाद कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा- जब पुरी ने कहा था कि वे एपस्टीन से कभी अकेले नहीं मिले, तो इन तस्वीरों के क्या मायने हैं?
TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा- पुरी कहते थे कि वे एपस्टीन से तीन-चार बार डेलिगेशन के साथ मिले थे, दोनों तस्वीरों में बाकी सदस्य कहां थे।
इन तस्वीरों को जस्टिस डिपार्टमेंट की तरफ जारी जारी दस्तावेजों के नौवें सेट में रखा गया था। इस सेट में कम से कम 11 तस्वीरें हैं। मंगलवार को यह तस्वीर सोशल मीडिया पर चर्चा में आई।
इन तस्वीरों में दोनों लगभग एक ही स्थिति में बैठे दिखाई देते हैं। तस्वीरों के कोण में मामूली अंतर है।
इस साल फरवरी में हरदीप सिंह पुरी ने लोकसभा में राहुल गांधी की ओर से एपस्टीन फाइलों को लेकर लगाए गए आरोपों को खारिज किया था।
पुरी ने बताया था कि वह संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत का पद छोड़ने के बाद और 2017 में केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने से पहले एपस्टीन से मिले थे। उन्होंने इन मुलाकातों को पूरी तरह पेशेवर बताया था और कहा था कि उनका एपस्टीन के खिलाफ लगे आपराधिक आरोपों से कोई संबंध नहीं था।
पुरी ने फरवरी में एक इंटरव्यू में कहा था कि वह इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूशन (IPI) से जुड़े एक डेलिगेशन के रूप में गए थे। उसी दौरान एपस्टीन से मिले। वे सार्वजनिक जीवन में कई तरह के लोगों से मिलते हैं, जिनमें से कुछ का आपराधिक रिकॉर्ड भी हो सकता है। पुरी के मुताबिक IPI में उनके बॉस टेर्जे रोड-लार्सन एपस्टीन को जानते थे।
पुरी ने कहा-
पहली बार मुलाकात के दौरान मुझे नहीं पता था कि एपस्टीन कौन हैं। हमने उनके बारे में गूगल पर सर्च किया। फिर हमने आपस में भी चर्चा की कि हमें उनसे मिलना चाहिए या नहीं?
नवंबर 2025 में पहली बार सामने आया नाम
निगरानी समिति की ईमेल में जिक्र: हरदीप सिंह पुरी और जेफ्री एपस्टीन के संपर्क का मामला पहली बार नवंबर 2025 में सार्वजनिक चर्चा में आया था। उस समय हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की निगरानी समिति की ओर से जारी एक ईमेल में एपस्टीन और पुरी के बीच की बातचीत का जिक्र हुआ था।
ईमेल कब के हैं: इसके बाद अमेरिकी न्याय विभाग (DoJ) ने 30 जनवरी को एपस्टीन से जुड़े लाखों पन्नों के दस्तावेज जारी किए थे। इनमें जून 2014 से जून 2017 के बीच के ईमेल शामिल हैं।
तीन मुलाकातों का जिक्र: ईमेल के मुताबिक पुरी 4 फरवरी 2015, 6 जनवरी 2016 और 19 मई 2017 को न्यूयॉर्क में एपस्टीन के घर गए थे।
एपस्टीन यौन अपराधी साबित हो चुका था: 2008 में एपस्टीन यौन अपराध के मामले में दोषी ठहराया जा चुका था। यानी पुरी की बताई गई मुलाकातें उस समय हुईं, जब एपस्टीन का आपराधिक रिकॉर्ड पहले से मौजूद था।
‘एक्जॉटिक आइलैंड’ का जिक्र: एक ईमेल में पुरी ने एपस्टीन के ‘एक्जॉटिक आइलैंड’ यानी अनोखे द्वीप का जिक्र किया और उसे ‘हैव फन’ कहा, जिसका मतलब है ‘मौज करो’। पुरी ने बाद में कहा कि ‘हैव फन’ उनके बोलने का आम तरीका है।
हरदीप सिंह पुरी और एपस्टीन से जुड़ा ईमेल
यह ईमेल हरदीप सिंह पुरी ने 24 दिसंबर 2014 को जेफ्री एपस्टीन को भेजा था।
इसमें लिखा है-प्रिय जेफ, त्योहारों की शुभकामनाएं। जब आप अपने द्वीप से वापस आएं, तो मुझे जरूर बताइएगा।मैं आपसे बातचीत करने के लिए मिलना चाहूंगा। साथ ही, भारत में रुचि जगाने के लिए आपको कुछ किताबें भी देना चाहूंगा।
करोड़पति फाइनेंसर था यौन अपराधी एपस्टीन
जेफ्री एपस्टीन न्यूयॉर्क का करोड़पति फाइनेंसर था। उसकी बड़े नेताओं और सेलिब्रिटीज से दोस्ती थी।
उस पर 2005 में नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न का आरोप लगा। 2008 में उसे नाबालिग से सेक्स की मांग करने का दोषी ठहराया गया।
उसे 13 महीने की जेल हुई। 2019 में जेफ्री को सेक्स ट्रैफिकिंग के आरोपों में गिरफ्तार किया गया। लेकिन मुकदमे से पहले ही उसने जेल में आत्महत्या कर ली।
उसकी पार्टनर घिसलीन मैक्सवेल को 2021 में उसकी मदद करने के आरोपों में दोषी करार दिया गया। वह 20 साल की सजा काट रही है।
पेशावर, एजेंसी। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की राजधानी पेशावर की दिर कॉलोनी में एक निजी स्कूल की छत गिरने से कई बच्चों की मौत हो गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हो गए। हादसे के बाद घटनास्थल पर अफरा-तफरी मच गई। बचाव दल मलबा हटाकर उसमें दबे बच्चों और स्कूल कर्मचारियों को निकालने में जुटे हैं। इस दर्दनाक हादसे में कम से कम 28 बच्चों और एक शिक्षिका की मौत हो गई। तीन दर्जन से अधिक लोग घायल हुए हैं।
अस्पताल प्रशासन के अनुसार, कुछ घायलों की हालत गंभीर है।आपातकालीन सेवाओं के प्रवक्ता बिलाल फैजी ने बताया कि हादसे के बाद कई बच्चे मलबे के नीचे फंसे हुए थे। बचावकर्मी मलबा हटाकर उन तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। अस्पताल के प्रवक्ता मोहम्मद आसिम ने मृतकों और घायलों की जानकारी की पुष्टि की।
अस्पताल के प्रवक्ता के मुताबिक, हादसे में मारे गए और घायल हुए सभी बच्चे 13 वर्ष या उससे कम उम्र के थे। घायलों को उपचार के लिए सरकारी लेडी रीडिंग अस्पताल पहुंचाया गया, जहां घायलों की संख्या और उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए आपातकाल घोषित कर दिया गया। चिकित्साकर्मी घायलों के इलाज में जुटे रहे। हादसे में मृतकों की अंतिम संख्या अभी स्पष्ट नहीं है और बचाव अभियान के दौरान इसमें बदलाव हो सकता है।
बीजिंग/नई दिल्ली, एजेंसी। चीन ने लद्दाख की 28 जगहों पर अपना बताया है। चीन ने मंगलवार को इन जगहों के नाम तय करने के भारत के फैसले पर आपत्ति भी जताई। चीन ने कहा- ये इलाके हमारे हैं और भारत के नाम बदलने या नया नाम रखने से जमीन पर मालिकाना हक नहीं बदलेगा।
भारत ने 2 अक्टूबर को इन जगहों के नाम आधिकारिक तौर पर तय किए थे। इनमें गोगरा और हॉट स्प्रिंग जैसे इलाके भी शामिल हैं, जहां 2020 में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच तनाव हुआ था।
चीन बोला- लद्दाख को भारत का UT नहीं मानते
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने मंगलवार को कहा कि चीन लद्दाख को भारत की ओर से बनाया गया केंद्र शासित प्रदेश नहीं मानता। चीन ने भारत के इस कदम को गैरकानूनी बताते हुए कहा कि सीमा के पश्चिमी हिस्से के ये इलाके उसके हैं।
माओ के मुताबिक, भारत के इस फैसले से सीमा के पश्चिमी हिस्से में उन इलाकों पर चीन का दावा नहीं बदल सकता, जिन्हें वह अपना क्षेत्र मानता है।
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने मंगलवार को भारत के लद्दाख के इलाकों का नाम तय करने या बदलने का विरोध किया।
भारत बोला- लद्दाख हमारा हिस्सा, इनकार करने से हकीकत नहीं बदलेगी
चीन की आपत्ति पर भारत ने भी जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को कहा कि लद्दाख भारत का हिस्सा है। चीन के इनकार करने से यह हकीकत नहीं बदलेगी।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि इन जगहों के नाम सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक नक्शे में दर्ज किए गए हैं। यह काम लद्दाख प्रशासन और स्थानीय लोगों से सलाह लेकर किया गया है।
जायसवाल ने कहा कि इन जगहों के नाम नक्शे में दर्ज करने का मकसद उनकी सही पहचान करना और लोगों को उनके बारे में जानकारी देना है।
भारत ने 28 जगहों के नाम क्यों तय किए?
भारत के गृह मंत्रालय ने 2 अक्टूबर को आधिकारिक तौर पर लद्दाख की 28 जगहों और क्षेत्रों के नाम तय किए थे।
भारत का फैसला 2023 में चीन की ओर से अरुणाचल प्रदेश के इलाकों के नाम बदलने के जवाब में उठाया गया था। चीन अरुणाचल प्रदेश को ‘जांगनान’ यानी दक्षिणी तिब्बत कहता रहा है।
गोगरा और हॉट स्प्रिंग पूर्वी लद्दाख के संवेदनशील इलाके
भारत ने जिन जगहों के नाम तय किए, इनमें गोगरा और हॉट स्प्रिंग भी शामिल हैं। ये पूर्वी लद्दाख के संवेदनशील इलाके हैं, जहां भारत और चीन के सैनिकों के बीच सीमा पर तनाव रहा है। इन जगहों पर भारतीय सैनिक गश्त भी करते हैं।
मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच सीमा विवाद बढ़ गया था। 5 मई को पैंगोंग झील के पास दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी।
2020 के जून में गलवान घाटी में भी दोनों सेनाओं के बीच हिंसक संघर्ष हुआ था। इसके बाद दोनों देशों ने सीमा पर तनाव कम करने और सैनिकों को पीछे हटाने के लिए बातचीत शुरू की। सैनिकों को पीछे हटाने की प्रक्रिया 2022 में शुरू हुई।
लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर पैंगोंग झील के इलाके में दोनों देशों के सैन्य अधिकारी मिले थे। तस्वीर 10 फरवरी 2022 की है।
28 जगहों में कौन-कौन से नाम शामिल हैं?
भारत की ओर से तय किए गए 28 नामों में पहाड़, दर्रे, ग्लेशियर, जमीन के हिस्से, घाटियां और जल स्रोत शामिल हैं।
दर्रे-ग्लेशियर: चापचिंगल दर्रा, शाचमिरिक दर्रा, पारपिक ग्लेशियर और स्कामरी ग्लेशियर।
जमीन के इलाके: ब्रांगसा, कुकसेल, देहरा कम्पास, गोगरा, कुमारायण पॉइंट, पंगलुंग और शमाल लुंगपा।
घाटी-जल स्रोत: श्कोर्गा घाटी, गुरु रिनपोछे झील, यांगपा नदी और हॉट स्प्रिंग।
इन जगहों के नाम तय करके सरकारी नक्शे में शामिल करने का मकसद उनकी सही पहचान बताना है।
गलवान में भारत और चीन के बीच हिंसक झड़प हुई थी
जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच सीमा विवाद को लेकर हिंसक झड़प हुई थी। भारत के मुताबिक, 6 जून को दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच सैनिकों को पीछे हटाने पर सहमति बनी थी, लेकिन 15 जून की रात फिर टकराव हो गया।
इस दौरान सैनिकों के बीच पत्थरों और डंडों से लड़ाई हुई। झड़प में भारत के 20 सैनिकों की मौत हुई थी। चीन ने फरवरी 2021 में अपने 4 सैनिकों की मौत की बात स्वीकार की थी। इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया और सीमा पर सैनिकों की तैनाती बढ़ा दी गई।
जून 2020 में गलवान घाटी में भारत-चीन सीमा पर झड़प के दौरान आमने-सामने खड़े दोनों देशों के सैनिक।
अरुणाचल प्रदेश को लेकर भी दोनों देशों के बीच विवाद
भारत और चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश को लेकर लंबे समय से सीमा विवाद है। चीन अरुणाचल प्रदेश के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है और इसे ‘जांगनान’ यानी दक्षिणी तिब्बत कहता है।
इसी दावे के तहत चीन 2017 से कई बार अरुणाचल प्रदेश की जगहों के चीनी नाम जारी कर चुका है। 2023 में चीन ने 11 और 2024 में करीब 30 जगहों के नाम जारी किए थे। भारत हर बार इसका विरोध करता रहा है।
भारत का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश उसका अभिन्न हिस्सा है और चीन के नाम बदलने से जमीन पर स्थिति नहीं बदल सकती। भारत की नजर में यह सिर्फ नामों का मामला नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र पर चीन के दावे से जुड़ा विवाद है।