मुख्यमंत्री ने ‘स्रोत महोत्सव 2026’ एवं राज्य स्तरीय कार्यशाला का किया शुभारंभ
नदियों के उद्गम स्थलों और कैचमेंट एरिया के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक एवं समयबद्ध कार्ययोजना पर जोर
मानचित्रण, संरक्षण, पुनर्भरण, जनभागीदारी और कार्ययोजना के पांच प्रमुख स्तंभों पर होगा नदी संरक्षण का काम
नेशनल वाटर एकेडमी पुणे के साथ एमओयू से जल संरक्षण के क्षेत्र में मजबूत होगा क्षमता निर्माण
एंट्रिक्स कॉरपोरेशन बेंगलुरु के सहयोग से आधुनिक भू-स्थानिक तकनीक का होगा उपयोग
कुनकुरी तहसील के लगभग 1540 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में आधुनिक तकनीक से जल संसाधनों की होगी निगरानी और विश्लेषण
मुख्यमंत्री ने किया जल संरक्षण पर आधारित ‘नीर-नारी-निधि’ पुस्तक का विमोचन
रायपुर, 19 अगस्त 2026। नदियां केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता, संस्कृति, कृषि और समृद्धि की जीवनधारा हैं। छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा बनाने में प्रदेश की जीवनदायिनी नदियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जिन नदियों ने हमारी सभ्यता को पोषित किया और हमें समृद्धि दी, उनका संरक्षण हम सभी का साझा दायित्व है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज राजधानी रायपुर के ओमाया गार्डन में आयोजित ‘स्रोत महोत्सव 2026’ एवं राज्य स्तरीय कार्यशाला को संबोधित करते हुए यह बात कही।
मुख्यमंत्री श्री साय ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यशाला का शुभारंभ किया। कार्यशाला का उद्देश्य प्रदेश की नदियों के उद्गम स्थलों एवं जलग्रहण क्षेत्रों की पहचान और संरक्षण, जल संचयन एवं भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा देने तथा नदी संरक्षण को व्यापक जन अभियान का स्वरूप देना है। कार्यशाला में जल संरक्षण, नदी पुनरुद्धार और जल प्रबंधन से जुड़े विषय विशेषज्ञों के साथ राज्य एवं जिला स्तरीय समितियों के सदस्य तथा विभिन्न जिलों के प्रतिनिधियों द्वारा मंथन किया गया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि नदी बचेगी तो जल बचेगा और जल बचेगा तो जीवन बचेगा। इसी भावना के साथ राज्य सरकार नदियों के उद्गम स्थलों और कैचमेंट एरिया के संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आधुनिक तकनीक, पारंपरिक ज्ञान और जनभागीदारी के समन्वय से व्यापक कार्ययोजना पर आगे बढ़ रही है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ की भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान नदियों से गहराई से जुड़ी हुई है। महानदी सहित प्रदेश की अनेक नदियों ने कृषि, आजीविका और सामाजिक जीवन को समृद्ध किया है। नदियों का अस्तित्व उनके उद्गम स्थलों और कैचमेंट एरिया के स्वास्थ्य पर निर्भर है। इसलिए नदी संरक्षण का कार्य केवल उसके प्रवाह क्षेत्र तक सीमित नहीं रह सकता। हमें नदी के स्रोत से लेकर उसके पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को समझकर संरक्षण की समग्र योजना बनानी होगी।
उन्होंने कहा कि नदी संरक्षण एवं पुनरुद्धार के कार्यों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने के लिए राज्य एवं जिला स्तर पर समितियों का गठन किया गया है। स्रोत महोत्सव में विषय विशेषज्ञों के मार्गदर्शन और विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवों के आधार पर ऐसी ठोस कार्ययोजना तैयार की जाएगी, जिसे धरातल पर समयबद्ध तरीके से लागू किया जा सके।
’पांच प्रमुख स्तंभों पर आगे बढ़ेगा नदी संरक्षण अभियान’
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि प्रदेश में नदी संरक्षण के लिए मानचित्रण, संरक्षण, पुनर्भरण, जनभागीदारी और कार्ययोजना के पांच प्रमुख स्तंभों पर काम किया जाएगा। प्रत्येक नदी और उसके जलग्रहण क्षेत्र का वैज्ञानिक तरीके से मानचित्रण किया जाएगा। नदी का उद्गम कहां है, उसके प्रवाह क्षेत्र की प्रकृति कैसी है, भू-उपयोग में किस प्रकार के बदलाव हुए हैं और किन कारणों से नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर प्रभाव पड़ रहा है – इन सभी पहलुओं का अध्ययन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक मानचित्रण और अध्ययन के आधार पर नदी के पूरे इकोसिस्टम के संरक्षण की योजना तैयार की जाएगी। इसमें वन एवं वनस्पति संरक्षण, मृदा क्षरण की रोकथाम, पारंपरिक जल संरचनाओं का संरक्षण एवं पुनर्जीवन, आवश्यकतानुसार नई जल संग्रहण संरचनाओं का निर्माण और भू-जल पुनर्भरण जैसे कार्य शामिल होंगे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्षाजल हमारे नदी तंत्र और भू-जल का मूल आधार है। इसलिए बारिश के पानी को तेजी से बहकर निकल जाने देने के बजाय उसे अधिक से अधिक मात्रा में धरती के भीतर पहुंचाने के उपाय करने होंगे। इससे भू-जल स्तर में सुधार होगा, जल स्रोतों को पुनर्जीवन मिलेगा और नदियों में लंबे समय तक जल प्रवाह बनाए रखने में सहायता मिलेगी।
नदी संरक्षण को बनाना होगा जन आंदोलन
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि जल संरक्षण का लक्ष्य केवल सरकारी प्रयासों से हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज की सक्रिय भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण है। नदियों के किनारे बसे गांवों और वहां रहने वाले लोगों का नदी से सीधा संबंध है, इसलिए उन्हें नदी संरक्षण की प्रक्रिया का प्रमुख भागीदार बनाना होगा।
उन्होंने जिला स्तरीय समितियों के सदस्यों से कहा कि नदियों के किनारे बसे गांवों में स्थानीय समितियां गठित कर पंचायतों के सहयोग से नदी संरक्षण एवं पुनरुद्धार के कार्य आगे बढ़ाए जाएं। स्थानीय समुदाय को नदी की स्थिति, उसके महत्व और संरक्षण के उपायों की जानकारी दी जाए। जब समाज स्वयं अपनी नदी और जल स्रोतों के संरक्षण की जिम्मेदारी लेता है, तब ऐसे प्रयास अधिक प्रभावी और स्थायी होते हैं।
मुख्यमंत्री ने विशेषज्ञों से भी आग्रह किया कि जल संरक्षण से जुड़े वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान को सरल एवं सहज भाषा में लोगों तक पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि तकनीक तभी सार्थक है, जब उसका लाभ धरातल पर दिखाई दे और आम नागरिक उसे समझकर अपने जीवन में अपना सके।
मुख्यमंत्री ने कहा कि मानव सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ है। नदियों ने पीढि़यों से मानव जीवन को जल, भोजन और आजीविका प्रदान की है। इसलिए एक सभ्य समाज के रूप में हमारा दायित्व है कि हम अपनी आने वाली पीढि़यों के लिए नदियों और जल स्रोतों को सुरक्षित रखें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि स्रोत महोत्सव 2026 से निकलने वाले निष्कर्ष छत्तीसगढ़ में नदी संरक्षण और जल सुरक्षा की दिशा में एक प्रभावी रोडमैप तैयार करने में महत्वपूर्ण सिद्ध होंगे।
’जल संरक्षण और आधुनिक तकनीक के लिए दो महत्वपूर्ण एमओयू’
कार्यक्रम के दौरान जल संरक्षण के क्षेत्र में राज्य की संस्थागत और तकनीकी क्षमता को मजबूत बनाने के उद्देश्य से दो महत्वपूर्ण एमओयू किए गए। नेशनल वाटर एकेडमी, पुणे के साथ हुए एमओयू के माध्यम से जल संरक्षण एवं जल प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों और मैदानी अमले के प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण को बढ़ावा मिलेगा। इससे आधुनिक जल प्रबंधन, नवीन तकनीकों और वैज्ञानिक पद्धतियों की जानकारी को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में मदद मिलेगी। इसी प्रकार एंट्रिक्स कॉरपोरेशन, बेंगलुरु के साथ हुए एमओयू के माध्यम से इसरो की विशेषज्ञता और आधुनिक भू-स्थानिक तकनीकों का उपयोग जल संसाधनों के वैज्ञानिक विश्लेषण एवं निगरानी में किया जाएगा। प्रारंभिक चरण में कुनकुरी तहसील के लगभग 1540 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में उन्नत भू-स्थानिक तकनीक के माध्यम से जल संसाधनों की स्थिति का अध्ययन, निगरानी और विश्लेषण किया जाएगा।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि आधुनिक तकनीक से प्राप्त वैज्ञानिक आंकड़ों को स्थानीय अनुभव और पारंपरिक ज्ञान के साथ जोड़कर जल संरक्षण की अधिक प्रभावी योजनाएं बनाई जा सकती हैं। इससे क्षेत्र विशेष की आवश्यकता के अनुरूप समाधान तैयार करने और उनके परिणामों की निगरानी करने में भी मदद मिलेगी।
‘नीर-नारी-निधि’ पुस्तक का विमोचन
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कार्यक्रम में जल संरक्षण पर आधारित ‘नीर-नारी-निधि’ पुस्तक का विमोचन किया। यह पुस्तक नीर की रक्षा, नारी की भागीदारी और जल संपदा के संरक्षण की अवधारणा को रेखांकित करती है। पुस्तक में जल प्रबंधन एवं जल संरक्षण से जुड़े विभिन्न अनुभवों, प्रयासों और नवाचारों का दस्तावेजीकरण किया गया है।
जलस्रोतों की पहचान और संरक्षण भविष्य की जल सुरक्षा के लिए जरूरी : डॉ. विनोद तारे
सीगंगा के संस्थापक एवं आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर डॉ. विनोद तारे ने कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नदियों के उद्गम और उन्हें पोषित करने वाले जल स्रोतों की पहचान एवं संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। बारिश का पानी ही नदियों और भू-जल का प्रमुख आधार है। वर्षाजल के तेज बहाव को नियंत्रित कर उसे अधिक से अधिक मात्रा में जमीन के भीतर पहुंचाना होगा, जिससे भू-जल स्तर बढ़े और भविष्य के लिए जल सुरक्षित किया जा सके।
डॉ. तारे ने कहा कि जल संरक्षण के लिए प्राचीन ज्ञान, स्थानीय एवं पारंपरिक अनुभव और आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के बीच समन्वय जरूरी है। इन तीनों को एक साथ जोड़कर तैयार की गई कार्ययोजना ही जल स्रोतों के दीर्घकालिक संरक्षण और जल के सतत उपयोग का आधार बन सकती है।
साइंस बेस्ड और साइट स्पेसिफिक समाधान तैयार होंगे: जल संसाधन विभाग सचिव
जल संसाधन विभाग के सचिव राजेश सुकुमार टोप्पो ने कहा कि स्रोत महोत्सव 2026 का उद्देश्य प्रदेश की नदियों के उद्गम और कैचमेंट एरिया के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक, व्यवहारिक और समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करना है। नदी संरक्षण में केवल डाउनस्ट्रीम फ्लो का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सोर्स एरिया, भूमि उपयोग, मिट्टी की नमी, भू-जल रिचार्ज, वनस्पति और मृदा क्षरण सहित नदी के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को एक साथ समझना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि कार्यशाला में नौ नदी समूहों पर अलग-अलग चर्चा की जा रही है। इन समूहों में क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों के अनुरूप साइट स्पेसिफिक और साइंस बेस्ड समाधान तैयार किए जाएंगे। इसमें समस्या की स्पष्ट पहचान के साथ समाधान, क्रियान्वयन की जिम्मेदारी और परिणामों के आकलन की समय-सीमा भी निर्धारित करने पर जोर रहेगा।
श्री टोप्पो ने कहा कि जल संरक्षण केवल अधोसंरचना निर्माण का विषय नहीं है। स्थानीय समुदाय की भागीदारी ही संरक्षण कार्यों की दीर्घकालिक सफलता और स्थायित्व की कुंजी है। कार्यशाला से प्राप्त सुझावों और निष्कर्षों के आधार पर छत्तीसगढ़ के लिए समयबद्ध रिवर सोर्स रेस्टोरेशन रोडमैप तैयार करने की दिशा में आगे कार्य किया जाएगा।
कार्यशाला में सीगंगा के संस्थापक एवं आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर डॉ. विनोद तारे, नमामि गंगे मिशन से जुड़े विषय विशेषज्ञ, एनआईटी रायपुर के प्राध्यापक, राज्य एवं जिला स्तरीय समितियों के सदस्य, विभिन्न जिलों के कलेक्टर एवं अधिकारी तथा जल एवं नदी संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत विशेषज्ञ उपस्थित थे।
कोरबा 17 अगस्त 2026। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कलेक्टर कुणाल दुदावत के मार्गदर्षन में जिले में उल्लास-नवभारत साक्षरता कार्यक्रम के अंतर्गत उल्लास महा चौपाल एवं विविध जनजागरूकता गतिविधियों का आयोजन उत्साहपूर्वक किया गया। जिले के विभिन्न विकासखंडों, ग्राम पंचायतों, शासकीय विद्यालयों एवं सार्वजनिक स्थलों पर आयोजित कार्यक्रमों के माध्यम से साक्षरता को जन-जन से जोड़ते हुए शिक्षा, जागरूकता और आत्मनिर्भरता का संदेश दिया गया।
कार्यक्रम के दौरान मशाल रैली, टॉर्च रैली एवं प्रभात फेरी निकालकर लोगों को साक्षरता के महत्व के प्रति जागरूक किया गया। अधिकारियों, शिक्षकों, स्वयंसेवी शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं नागरिकों ने ‘उल्लास शपथ’ लेकर निरक्षर व्यक्तियों को साक्षर बनाने तथा समाज में शिक्षा की अलख जगाने का संकल्प लिया। डिजिटल साक्षरता शपथ पत्र भी हुआ जारी
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जिले में डिजिटल साक्षरता शपथ पत्र भी जारी किया गया। इसके माध्यम से नागरिकों को डिजिटल माध्यमों का सुरक्षित एवं जिम्मेदार उपयोग करने, ऑनलाइन सेवाओं की जानकारी प्राप्त करने तथा तकनीक के माध्यम से शिक्षा एवं सशक्तिकरण से जुड़ने के लिए प्रेरित किया गया। डिजिटल युग में प्रत्येक व्यक्ति को तकनीकी रूप से सक्षम बनाने की दिशा में इसे महत्वपूर्ण पहल बताया गया। सेल्फी पॉइंट से लेकर खेल-कूद और रंगोली तक बनी आकर्षण का केंद्र
उल्लास महा चौपाल के दौरान सेल्फी पॉइंट लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा। इसके साथ ही खेल-कूद प्रतियोगिता, रंगोली, चित्रकला एवं विभिन्न जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया गया। विद्यार्थियों, शिक्षकों, स्वयंसेवी शिक्षकों और नागरिकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए साक्षरता के संदेश को रचनात्मक रूप से प्रस्तुत किया। ‘अंगूठे से कलम तक’ अभियान ने दिया सशक्तिकरण का संदेश
कार्यक्रम में ‘अंगूठे से कलम तक’ अभियान के माध्यम से नवसाक्षरों एवं निरक्षर व्यक्तियों को पढ़ने-लिखने की क्षमता से जोड़ने का संदेश दिया गया। अभियान का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर, जागरूक और सशक्त बनाना है।
स्वयंसेवी शिक्षकों और नवसाक्षरों का हुआ सम्मान उल्लास कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले शिक्षकों, स्वयंसेवी शिक्षकों एवं नवसाक्षरों को उनके उत्कृष्ट योगदान और उपलब्धि के लिए प्रमाण-पत्र एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। इससे साक्षरता अभियान से जुड़े लोगों का उत्साह बढ़ा और अन्य लोगों को भी अभियान में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरणा मिली। जिला परियोजना अधिकारी साक्षरता श्रीमती ज्योति शर्मा ने कहा कि साक्षरता अभियान को सफल बनाने में शिक्षकों, स्वयंसेवी शिक्षकों, नवसाक्षरों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों की सहभागिता महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि साक्षरता केवल पढ़ना-लिखना सीखने तक सीमित नहीं, बल्कि यह व्यक्ति को आत्मनिर्भर, जागरूक और अपने अधिकारों के प्रति सक्षम बनाने का माध्यम है।
कार्यक्रम में ग्रामीणों, विद्यार्थियों, शिक्षकों, स्वयंसेवी शिक्षकों, जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों की सक्रिय भागीदारी रही। स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित इन गतिविधियों से जिले में उल्लास-नवभारत साक्षरता अभियान के साथ डिजिटल साक्षरता को भी जनआंदोलन का रूप देने का संदेश मिला। संदेशः “अंगूठे से कलम तक, साक्षरता से डिजिटल साक्षरता तक-हर व्यक्ति बने सक्षम, हर परिवार बने सशक्त।”
कोरबा 17 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ शासन, कृषि एवं किसान कल्याण तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग रायपुर द्वारा प्रदेश में फसल क्षेत्राच्छादन, उत्पादन, उत्पादकता में वृद्धि करने, फसल कास्त लागत में कमी कर आय में वृद्धि करने, नवीन कृषि तकनीकी में निवेश को प्रोत्साहन, एवं बाजारोन्मुखी फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से खरीफ 2026 से कृषक उन्नति योजना के क्रियान्वयन हेतु दिशा-निर्देश जारी किया गया है।
शासन द्वारा जारी दिशा निर्देश में कृषक उन्नति योजना का लाभ लेने हेतु कृषकों को एकीकृत किसान पोर्टल एवं एग्रीस्टेक पोर्टल में पंजीयन कराना आवश्यक है। एकीकृत किसान पोर्टल में पंजीकृत ऐसे समस्त कृषक, जिन्होने विगत खरीफ में धान की फसल लेने वाले ऐसे कृषक, जिन्होने आगामी खरीफ में धान के बदलें अन्य खरीफ फसल लेने हेतु एकीकृत किसान पोर्टल पर पंजीयन कराया हो, खरीफ में दलहन, तिलहन, मक्का, कोदो, कुटकी, रागी और कपास की फसल लेने हेतु पंजीयन कराया हो, योजनांतर्गत पात्र होंगे। विधिक व्यक्तियों यथा ट्रस्ट/मण्डल/प्राईवेट लिमि. कंपनी/शाला विकास समिति/केन्द्र एवं राज्य शासन के संस्थान/महाविद्यालय आदि संस्थाओं को योजना से लाभ लेने की पात्रता नही होगी।
योजनांतर्गत आदान सहायता राशि कृषकों के बैंक खातें में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डी.बी.टी.) के माध्यम से की जाएगी। विगत खरीफ में धान की फसल लेने वाले ऐसे कृषक, जिन्होने आगामी खरीफ में धान के बदलें अन्य खरीफ फसल लेने हेतु एकीकृत किसान पोर्टल पर पंजीयन कराया हो, उन्हे एग्रीस्टेक पर पंजीयन तथा डिजिटल क्रॉप सर्वे में रकबें की पुष्टि उपरांत मान्य रकबें पर राशि 15 हजार रूपये प्रति एकड़ की दर से आदान सहायता राशि प्रदान की जाएगी। विगत वर्ष के फसल एवं रकबें की पुष्टि डिजिटल क्रॅाप सर्वे के डेटा से तथा जहां यह डेटा उपलब्ध नही हो, वहां जिला कलेक्टर की अनुमति से गिरदावरी के डेटा से पुष्टि की जाएगी। पूर्व से ही खरीफ में दलहन, तिलहन, मक्का, कोदो, कुटकी, रागी और कपास की फसल लेने वाले कृषकों को एकीकृत किसान पोर्टल तथा एग्रीस्टेक पर पंजीयन एवं डिजिटल क्रॉप सर्वे में रकबें की पुष्टि उपरांत मान्य रकबें पर पूर्ववत् राशि 10 हजार रूपये प्रति एकड़ की दर से आदान सहायता राशि प्रदान की जाएगी। जिन क्षेत्रों में रकबें की पुष्टि हेतु डिजिटल क्रॉप सर्वे का डेटा उपलब्ध नही है, वहां जिला कलेक्टर की अनुमति पर गिरदावरी से सत्यापित रकबें पर आदान सहायता राशि दी जाएगी। कलेक्टर के निर्देशानुसार खरीफ वर्ष 2026 में फसलवार, रकबावार, खसरावार शत-प्रतिशत एवं त्रुटिरहित गिरदावरी/ई-गिरदावरी करने राजस्व एवं कृषि विभाग के मैदानी अमलें को भू-अभिलेख कोरबा द्वारा आदेश जारी किया गया है। भू-अभिलेख द्वारा डिजिटल क्रॉप सर्वे करने हेतु सर्वेयरों की नियुक्ति किया जाकर तहसील स्तर पर प्रशिक्षण भी दिया जा चुका है। डी.पी.एस. कंवर, उप संचालक कृषि द्वारा जिलें के समस्त इच्छुक एवं पात्र कृषकों से अपील की गई है कि शासन द्वारा जारी दिशा निर्देश में कृषक उन्नति योजना का लाभ लेने हेतु कृषकों को एकीकृत किसान पोर्टल एवं एग्रीस्टेक पोर्टल में पंजीयन कराना सुनिश्चित करें। एकीकृत किसान पोर्टल में पंजीयन हेतु पात्र एवं इच्छुक कृषक आवश्यक दस्तावेज सहित नजदीकी सहकारी समिति से संपर्क करे। एग्रीस्टेक छ.ग. फार्मर रजिस्ट्री पोर्टल में पंजीयन कराने के लिए किसानों को अपने साथ आधार कार्ड, भूमि का अद्यतन ऋण पुस्तिका/ब-1, खसरा तथा विशेष रूप से आधार कार्ड से लिंक मोबाईल नंबर लेकर नजदीकी लोक सेवा केन्द्र अथवा सेवा सहकारी समिति पहुंचना होगा। पंजीयन के दौरान आधार कार्ड लिंक मोबाईल नंबर पर ओ.टी.पी. प्राप्त होगी, जिसके जरिये ही सत्यापन की प्रक्रिया पूर्ण की जा सकेगी। तदोपरांत सत्यापन का कार्यवाही संबंधित क्षेत्र के पटवारी के लॉगिन से तथा अनुमोदन की कार्यवाही तहसीलदार लॉगिन से की जायेगी। एकीकृत किसान पोर्टल, एग्रीस्टेक पोर्टल में किसान पंजीयन तथा समर्थन मूल्य पर धान उपार्जन, कृषक उन्नति योजना, प्राईस सपोर्ट स्कीम, अंतर्गत पंजीकृत रकबें का समयावधि में गिरदावरी/ई-गिरदावरी/डिजिटल क्रॉप सर्वे कार्य के संबंध में अधिक जानकारी हेतु किसान अपने क्षेत्र के पटवारी, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी, सेवा सहकारी समिति अथवा लोक सेवा केन्द्र से संपर्क कर सकते है।
ग्रामीणों के दबाव का असर, मानिकपुर खदान विस्तार की जनसुनवाई स्थगित… अंतत: secl प्रबंधन को झुकना पड़ा भू-विस्थापितों की एकता के सामने — 500 से अधिक ग्रामीणों के संकल्प के बाद SECL प्रबंधन ने 21 अगस्त की प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई टाली — जयसिंह अग्रवाल बोले, “स्थगन समाधान नहीं, अब ग्रामीणों की जायज मांगों के निराकरण का समय” कोरबा। मानिकपुर ओपन कास्ट परियोजना के प्रस्तावित विस्तार को लेकर प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों द्वारा लगातार उठाई जा रही आवाज और जनसुनवाई का विरोध करने के सामूहिक संकल्प का असर सामने आया है। SECL प्रबंधन ने 21 अगस्त को प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई को स्थगित करने का निर्णय लिया है। भिलाईखुर्द क्रमांक-1 में हाल ही में आयोजित बैठक में मानिकपुर खदान विस्तार से प्रभावित 8 गांवों के 500 से अधिक ग्रामीणों ने स्पष्ट घोषणा की थी कि जब तक मुआवजा, पुनर्वास, रोजगार, छूटे हुए मकानों एवं परिवारों को पात्रता में शामिल करने सहित उनकी जायज और लंबित मांगों का समाधान नहीं किया जाता, तब तक वे जनसुनवाई का पुरजोर विरोध करेंगे। ग्रामीणों के इस सामूहिक रुख के बाद SECL प्रबंधन द्वारा जनसुनवाई स्थगित किए जाने को ग्रामीणों के दबाव और उनकी जायज मांगों की गंभीरता का परिणाम माना जा रहा है। इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने कहा कि जनसुनवाई का स्थगित होना निश्चित रूप से ग्रामीणों के लिए तत्काल राहत की बात है, लेकिन इसे किसी समस्या का अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि, “ग्रामीणों ने अपनी एकजुटता और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट रूप से प्रबंधन तक पहुंचा दी है। जनसुनवाई का स्थगित होना इस बात का संकेत है कि ग्रामीणों की मांगों को नजरअंदाज करके प्रक्रिया को आगे बढ़ाना संभव नहीं है। अब यह SECL प्रबंधन के लिए एक अवसर है कि वह इस मिले हुए समय का सदुपयोग करे और ग्रामीणों की सभी जायज समस्याओं के समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए।” श्री अग्रवाल ने कहा कि ग्रामीणों की मांगें अचानक सामने आई हुई मांगें नहीं हैं। मुआवजा, पुनर्वास, रोजगार, छूटे हुए मकानों एवं परिवारों को पात्रता में शामिल करने तथा अन्य लंबित अधिकारों से संबंधित समस्याएं लंबे समय से ग्रामीणों के बीच असंतोष का कारण बनी हुई हैं। इसलिए केवल जनसुनवाई को आगे के लिए टाल देना पर्याप्त नहीं होगा। उन्होंने कहा कि “स्थगन से प्रबंधन को निश्चित रूप से कुछ समय मिला है। इसे मैं ग्रामीणों की ओर से प्रबंधन को दिया गया एक तरह का समय-अवकाश मानता हूं। अब इस समय का उपयोग समस्याओं को और लंबा खींचने के लिए नहीं, बल्कि समाधान के लिए होना चाहिए। प्रबंधन को चाहिए कि वह प्रभावित गांवों के प्रतिनिधियों के साथ बैठकर प्रत्येक मांग पर गंभीरता से चर्चा करे और समयबद्ध तरीके से उसका निराकरण करे।” उन्होंने स्पष्ट कहा कि विकास और खनन परियोजनाओं का विरोध करना ग्रामीणों का उद्देश्य नहीं है। ग्रामीण केवल यह चाहते हैं कि उनकी जमीन, मकान और आजीविका प्रभावित होने की स्थिति में उन्हें कानून एवं न्याय के अनुरूप उचित मुआवजा, पुनर्वास, रोजगार और अन्य अधिकार मिलें। जब तक प्रभावित परिवारों को न्याय नहीं मिलेगा, तब तक केवल परियोजना विस्तार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से समस्याओं का समाधान नहीं होगा। श्री अग्रवाल ने SECL प्रबंधन से अपेक्षा किया है कि अब किसी टकराव की स्थिति पैदा करने के बजाय विश्वास का वातावरण बनाया जाए और प्रभावित ग्रामीणों के साथ सीधा संवाद स्थापित किया जाए। उन्होंने कहा कि यदि प्रबंधन ईमानदारी और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ता है तो समाधान निकालना मुश्किल नहीं है। उन्होंने कहा, “ग्रामीणों ने अपनी बात कह दी है और अपना संघर्ष भी स्पष्ट कर दिया है। अब गेंद SECL प्रबंधन के पाले में है। जनसुनवाई स्थगित करना पहला कदम हो सकता है, लेकिन असली सफलता तभी मानी जाएगी जब ग्रामीणों की जायज मांगों का वास्तविक और न्यायपूर्ण समाधान होगा।” श्री अग्रवाल ने एक बार फिर स्पष्ट करते हुए कहा कि जब तक मानिकपुर खदान विस्तार से प्रभावित ग्रामीणों की जायज मांगों का समाधान नहीं हो जाता, वे ग्रामीणों के साथ खड़े रहेंगे। इस पूरे घटनाक्रम से अब ग्रामीणों में यह उम्मीद जगी है कि जनसुनवाई के स्थगन से मिले समय का उपयोग SECL प्रबंधन केवल अगली तारीख तय करने में नहीं, बल्कि वर्षों से लंबित ग्रामीण समस्याओं के समाधान के लिए करेगा। ग्रामीणों का स्पष्ट संदेश है—“सिर्फ जनसुनवाई स्थगित नहीं, पहले अधिकारों का समाधान।”