छत्तीसगढ़
RTE-प्रतिपूर्ति विवाद…प्रति छात्र वास्तविक खर्च सार्वजनिक करने की मांग:प्राइवेट एसोसिशन बोला-11 साल से RTE फीस नहीं बढ़ी, कर्मचारियों की सैलरी 8 गुना तक बढ़ाई
रायपुर,एजेंसी। स्कूल शिक्षा विभाग की हालिया विज्ञप्ति बयान के बाद शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत निजी स्कूलों को मिलने वाली प्रतिपूर्ति राशि को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि प्रतिपूर्ति राशि शासकीय विद्यालय में हर विद्यार्थी पर होने वाले खर्च या निजी स्कूल की वास्तविक फीस (दोनों में से जो कम हो), उसी आधार पर तय की जाएगी।

प्राइवेट स्कूल एसोसिशन ने हर छात्र वास्तविक खर्च सार्वजनिक करने की मांग की है। प्राइवेट एसोसिशन का कहना है कि, 11 साल से RTE फीस नहीं बढ़ी, लेकिन कर्मचारियों की सैलरी 8 गुना तक बढ़ाई गई है।
दरअसल, शिक्षा के अधिकार कानून के प्रावधानों के अनुसार निजी स्कूलों में आरटीई के तहत प्रवेश लेने वाले बच्चों की फीस सरकार की ओर से प्रतिपूर्ति के रूप में दी जाती है। यह राशि दो मानकों पर तय होती है। पहला सरकारी स्कूल में प्रति छात्र खर्च और दूसरा निजी स्कूल की वास्तविक फीस। इनमें से जो कम हो, वही प्रतिपूर्ति राशि बनती है।
उदाहरण से समझिए
सरकारी स्कूल में प्रति छात्र खर्च रू.8,000 आता है और निजी स्कूल की फीस रू.12,000 है। यहां रू.8,000 कम है, इसलिए निजी स्कूल को रू.8,000 ही प्रतिपूर्ति मिलेगी। यदि सरकारी स्कूल में खर्च रू.10,000 है और निजी स्कूल की फीस रू.6,000 है। यहां रू.6,000 कम है, इसलिए निजी स्कूल को रू.6,000 ही मिलेगा।
प्रति छात्र वास्तविक खर्च सार्वजनिक करने की मांग
निजी स्कूलों और शिक्षा से जुड़े लोगों का कहना है कि, सरकार को प्रति छात्र वास्तविक खर्च सार्वजनिक करना चाहिए। आशंका जताई जा रही है कि सख्त वित्तीय नियंत्रण के कारण यह खर्च घटकर रू.4000 या उससे भी कम हो सकता है।
अगर ऐसा है, तो उसी आधार पर नई प्रतिपूर्ति राशि तय होनी चाहिए। प्रदेश के निजी स्कूलों ने संकेत दिए हैं कि वे विभाग की ओर से तय किए गए नियम सरकारी खर्च या वास्तविक फीस में जो कम हो के आधार पर ही प्रतिपूर्ति स्वीकार करेंगे।
14 साल से नहीं बदली दर
अभी कक्षा 1 से 5 तक रू.7000 प्रति छात्र/वर्ष और कक्षा 6 से 8 तक रू.11,400 प्रति छात्र/वर्ष प्रतिपूर्ति राशि बनती है। यह दरें 2011 से अब तक लागू हैं, जबकि प्राइवेट स्कूलों का कहना है कि इस दौरान महंगाई और वेतन में कई गुना वृद्धि हो चुकी है।
वेतन बढ़ा 3-4 गुना, पर प्रतिपूर्ति जस की तस
प्राइवेट स्कूल एसोसिशन ने तर्क देते हुए कहा है कि पिछले 14 वर्षों में सरकारी वेतन में भारी वृद्धि हुई है। विधायकों का वेतन रू.45,000 से बढ़कर रू.1,60,000 हो गया। IAS (एंट्री लेवल) रू.45,000 से बढ़कर रू.1,06,500 से अधिक हो गया है।
इसी तरह राज्य कर्मचारियों का वेतन रू.42,000 से रू.1,08,600 तक बढ़ गया है। यानी वेतन 3 से 4 गुना बढ़ा, लेकिन RTE प्रतिपूर्ति राशि नहीं बढ़ी।
छत्तीसगढ़
रायपुर : मधुमक्खी पालन: कम लागत में ज्यादा मुनाफे का बेहतर विकल्प
राष्ट्रीय बागवानी मिशन से किसानों को मिल रहा प्रोत्साहन, बढ़ रही आय और रोजगार के अवसर

रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें वैकल्पिक आजीविका से जोड़ने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इसी क्रम में राष्ट्रीय बागवानी मिशन एवं राज्य योजना के अंतर्गत मधुमक्खी पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है। जशपुर जिले में इस योजना के तहत 20 किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है।
योजना के अंतर्गत लाभार्थियों को मधुमक्खी पालन के लिए आवश्यक संसाधनों पर अनुदान दिया जा रहा है, जिसमें मधुमक्खी पेटी (बी बॉक्स) सहित कॉलोनी के लिए 1600 रुपये, मधुमक्खी छत्ता हेतु 800 रुपये तथा मधु निष्कासन यंत्र के लिए 8000 रुपये की सहायता शामिल है। इस पहल से किसान कम लागत में अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं।

फसल उत्पादन बढ़ाने में अहम भूमिका
मधुमक्खियां केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि परागण के माध्यम से फसलों की पैदावार बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सरसों, आम, लीची, अमरूद, सूरजमुखी, धनिया एवं विभिन्न सब्जी फसलों में मधुमक्खियों द्वारा परागण से उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। इससे कृषि अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनती है।
स्वरोजगार का सशक्त माध्यम
मधुमक्खी पालन ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए स्वरोजगार का एक प्रभावी साधन बनकर उभर रहा है। प्रशिक्षण लेकर कोई भी व्यक्ति इस व्यवसाय को आसानी से शुरू कर सकता है। शहद, मोम और रॉयल जेली जैसे उत्पादों की बाजार में अच्छी मांग होने से आय के स्थायी स्रोत विकसित हो रहे हैं।
पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान
मधुमक्खियां जैव विविधता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मधुमक्खियों की संख्या में कमी आ रही है, जो पर्यावरण के लिए चिंता का विषय है। ऐसे में मधुमक्खी-अनुकूल खेती को बढ़ावा देना आवश्यक है।
कम निवेश, अधिक लाभ
मधुमक्खी पालन कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाला व्यवसाय है। एक मधुमक्खी बॉक्स से वर्ष में कई बार शहद उत्पादन किया जा सकता है। वैज्ञानिक तकनीकों, उचित प्रबंधन और मौसम के अनुसार देखभाल करने से किसान बेहतर उत्पादन और अधिक आय प्राप्त कर सकते हैं।
यह पहल न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

छत्तीसगढ़
रायपुर : छत्तीसगढ़ में ‘ज्ञानभारतम’ पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान को मिली रफ्तार, हजारों विरासत दस्तावेज़ हो रहे संरक्षित
26 जिलों में समितियाँ गठित, 4 हजार से अधिक पांडुलिपियों का सर्वे पूरा; डिजिटल संरक्षण से सहेजी जाएगी सांस्कृतिक धरोहर
रायपुर। केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया गया “ज्ञानभारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान” छत्तीसगढ़ में तेजी से गति पकड़ रहा है। इस महत्वपूर्ण पहल का उद्देश्य राज्य में उपलब्ध प्राचीन एवं ऐतिहासिक पांडुलिपियों का सर्वेक्षण कर उन्हें सुरक्षित, संरक्षित एवं डिजिटल माध्यम से भावी पीढ़ियों तक पहुंचाना है।

मार्च 2026 से प्रारंभ इस राष्ट्रव्यापी अभियान में छत्तीसगढ़ की सक्रिय भागीदारी देखने को मिल रही है। प्रदेश के 33 जिलों में से अब तक 26 जिलों में जिला स्तरीय समितियों का गठन कर नोडल अधिकारियों की नियुक्ति कर दी गई है, जबकि शेष 7 जिलों में यह प्रक्रिया जारी है।
अभियान के तहत जिला स्तर पर समितियों की बैठकें आयोजित कर पांडुलिपि संग्रह करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं की पहचान की जा रही है। इसके साथ ही ग्राम एवं क्षेत्रवार सर्वेक्षकों की नियुक्ति कर जमीनी स्तर पर कार्य को मजबूत किया जा रहा है।
संस्कृति विभाग, जो इस अभियान का नोडल विभाग है, ज्ञानभारतम के क्षेत्रीय संयोजकों के सहयोग से जिला स्तर पर प्रशिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान कर रहा है, ताकि सर्वेक्षण कार्य गुणवत्ता और सटीकता के साथ पूरा किया जा सके।
ज्ञानभारतम अभियान के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा प्रारंभिक रूप से छत्तीसगढ़ में 148 पांडुलिपियों की जानकारी उपलब्ध कराई गई थी। इसके बाद अब सर्वेक्षण कार्य में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। वर्तमान में राज्य के 6 जिलों में सर्वेक्षण कार्य प्रारंभ हो चुका है और अब तक 4191 पांडुलिपियों का सर्वे ‘ज्ञानभारतम एप’ के माध्यम से सफलतापूर्वक किया जा चुका है।
यह अभियान न केवल प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान के इस अमूल्य भंडार को डिजिटल रूप में सुरक्षित रखने का एक सशक्त माध्यम भी बन रहा है।

छत्तीसगढ़
बीजापुर : बीजापुर में विकास की नई दस्तक: नियद नेल्लानार , मनरेगा और प्रधान मंत्री आवास से बदल रही 224 गांवों की तस्वीर
दशकों से विकास से कटे इलाकों में पहुंचा रोजगार, राशन और शिक्षा, सुरक्षित आवास; 5 लाख मानव दिवस हुए सृजित
वापस लौटे गांव, बदली जिंदगी: नक्सल इलाके में विकास की कहानी




बीजापुर। लंबे समय तक नक्सल प्रभाव के कारण विकास से अछूते रहे बीजापुर जिले के अंदरूनी क्षेत्रों में अब बदलाव की बयार देखने को मिल रही है। नियद नेल्लानार योजना और मनरेगा के संयुक्त प्रयासों से उन गांवों तक विकास पहुंचा है, जहां दशकों तक नक्सल प्रभाव के कारण बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही थी।
बीजापुर जिले में नियद नेल्लानार योजना के तहत 42 सुरक्षा कैम्पों के माध्यम से 67 ग्राम पंचायतों के 224 गांवों को शामिल किया गया है। इस पहल में मनरेगा की सक्रिय भागीदारी से स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और आधारभूत ढांचे के निर्माण को गति मिली है।

16 हजार से अधिक परिवारों को रोजगार का सहारा
इन ग्रामों में अब तक 16671 जॉबकार्ड पंजीकृत हैं, जिनमें से 7,271 नए जॉब कार्ड बनाए गए हैं। जिससे हजारों परिवारों को गांव में ही रोजगार उपलब्ध हो रहा है। विशेष रूप से नक्सल प्रभावित वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर दिया गया है। इसमें 966 आत्मसमर्पित नक्सली, 178 घायल पीड़ित परिवार और 477 मृतक नक्सल पीड़ित परिवारों के जॉब कार्ड बनाकर मनरेगा योजना से जोड़ा गया है।
पहली बार दिखा विकास का असर
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत नियद नेल्लानार क्षेत्रों में 1,744 विकास कार्य कराए गए हैं, जिसमें 5 लाख से अधिक मानव दिवस सृजित हुए हैं।
इन कार्यों के जरिए न केवल स्थानीय स्तर पर ग्रामीण श्रमिकों को रोजगार मिला है, अपितु पलायन में भी कमी आई है और ग्रामीणों का शासन पर भरोसा मजबूत हुआ है।
आजीविका डबरी बन रही आय का जरिया
नियद नेल्लानर क्षेत्र में 372 आजीविका डबरी की स्वीकृति देकर ग्रामीणों को आजीविकामूलक गतिविधियों से जोड़ने की पहल की जा रही है।
जनपद पंचायत भैरमगढ़ के नियद नेल्लानार ग्राम पंचायत बेलनार जहां कभी नक्सली दहशत के कारण ग्रामीण गांव छोड़कर विस्थापित होने पर मजबूर थे। नियद नेल्लानार योजना में शामिल होने के बाद ग्रामीण पुनः अपने गांव लौट आये है। उनके आजीविका संवर्धन के लिए महात्मा गाँधी नरेगा योजनांतर्गत वर्ष 2025-26 में हितग्राही श्री सहदेव कोरसा, लखु, सुदरू कोरसा की आजीविका डबरी पूर्ण हो चुके हैं। इन डबरी में मत्स्य पालन एवं हॉर्टिकल्चर विभाग से अभिसरण के माध्यम से मछली पालन एवं सब्जी उत्पादन का कार्य प्रस्तावित है।
2977 परिवारों को मिला पक्का आवास
नियद नेल्लनार क्षेत्र में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के अंतर्गत आवास निर्माण कार्य तेजी से प्रगति पर है। इस योजना के तहत कुल 2977 हितग्राहियों को आवास स्वीकृति प्रदान की गई है, जिनमें से अब तक 690 हितग्राहियों का उनके पक्के आवास बनकर तैयार हैं। पूर्ण हो चुके आवासों में अब परिवार सुरक्षित एवं सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं।
गांव-गांव में बदलाव की कहानी
दुगाली का कुआं बना जीवनरेखा: 100 से अधिक ग्रामीणों को मिला पेयजल-
जनपद पंचायत बीजापुर के नियद नेल्लानार अंतर्गत ग्राम दुगाली में मनरेगा से निर्मित कुआं 100 से अधिक ग्रामीणों की प्यास बुझा रहा है। दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण इस गांव में बोरिंग संभव नहीं थी, वहां यह कुआं स्थायी समाधान बनकर उभरा है। इससे ग्रामीणों को सुलभ पेयजल के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार भी मिला है।
पालनार- जहां पहले प्रशासन नहीं पहुंचता था, आज पंचायत भवन, आंगनबाड़ी और गौठान निर्माण कार्य जारी हैं, वर्तमान में 200 से अधिक श्रमिक काम कर रहे हैं।
कावड़गांव – 50 वर्षों के भय और अलगाव के बाद 100 प्रतिशत ग्रामीण श्रमिकों को जॉब कार्ड वितरण कर लिया गया है। साथ ही इस गांव में सड़क, बिजली, पेयजल, स्कूल और मोबाइल टॉवर जैसी सुविधाएं पहुंच चुकी हैं।
सावनार (तोड़का पंचायत)- 9.35 लाख की लागत से बने आंगनबाड़ी भवन से 40–45 बच्चों को नियमित शिक्षा और पोषण मिल रहा है।
पुसुकोण्टा (उसूर) – 11.69 लाख की लागत से बने आंगनबाड़ी भवन ने बच्चों को सुरक्षित और बेहतर वातावरण दिया है।
धरमारम और तोड़का- क्षेत्र में उचित मूल्य दुकानों के निर्माण से अब ग्रामीणों को गांव में ही राशन मिल रहा है।
बांगोली- जहां पहले 18 किमी दूर जाकर राशन लाना पड़ता था, अब 524 परिवारों को गांव में ही यह सुविधा उपलब्ध है।
युवाओं का कौशल विकास
पुनर्वासित आत्मसमर्पित नक्सलियों एवं स्थानीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए राजमिस्त्री प्रशिक्षण दिया गया है, जिससे वे निर्माण कार्यों में रोजगार पा रहे हैं।
नियद नेल्लानार योजना और मनरेगा के अभिसरण ने बीजापुर के अंदरूनी गांव में अब विकास ने रफ्तार पकड़ रही है। रोजगार, बुनियादी ढांचे और शासन के प्रति बढ़ते विश्वास से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी व्यापक बदलाव आ रहा है।

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