छत्तीसगढ़ के स्टील से मिजोरम में बना 114-मीटर ऊंचा रेलवे-ब्रिज:देश में दूसरा सबसे ऊंचा, BSP के मटेरियल से बन चुके चिनाब ब्रिज,स्टैच्यू-ऑफ-यूनिटी, INS विक्रांत
रायपुर/आइजोल,एजेंसी। छत्तीसगढ़ का स्टील दुनिया के सबसे ऊंचे चिनाब रेलवे ब्रिज, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, INS विक्रांत बनाने के बाद मिजोरम की राजधानी आइजोल में नया इतिहास रचा है। भिलाई के BSP से भेजा गया 30-35 हजार टन लोहे से पियर ब्रिज बना है, जो देश का दूसरा सबसे बड़ा ब्रिज है। जिसकी ऊंचाई 114 मीटर है। जबकि चिनाब रेलवे ब्रिज 359 मीटर ऊंचा है।
बइरबी-सायरंग रेल प्रोजेक्ट के तहत ट्रैक, टनल और ब्रिज निर्माण के लिए बिलासपुर जोन के इंजीनियरिंग सपोर्ट, मशीनरी और विशेषज्ञ टीमें भेजी गई थी। इसके साथ ही रेलवे ट्रैक बिछाने में इस्तेमाल होने वाला रेलपांत, गर्डर, लोहा और स्टील मटेरियल भी भेजा गया था।
आजादी के बाद पहली बार मिजोरम की राजधानी आइजोल रेल नेटवर्क से जुड़ी है। आने वाले समय में रेल लाइन म्यांमार बॉर्डर तक जाएगी। इस रेल नेटवर्क से मिजोरम की विकास को नई दिशा मिलेगी। इस पियर ब्रिज को बनाने में 10 साल से अधिक का समय लगा। इसके बनने से अब 7 घंटे का सफर 3 घंटे में पूरा होगा।
रेलवे के मुताबिक बइरबी-सायरंग रेल प्रोजेक्ट की शुरुआत 2014 में की गई थी, तब इसकी लागत 5 हजार 20 करोड़ रुपए थी, लेकिन ब्रिज और 51.38 किलोमीटर लंबी बइरबी-सायरंग रेल लाइन बनाने में 8 हजार 71 करोड़ रुपए लगे।
बताया जा रहा है कि PM नरेंद्र मोदी इसी महीने लोकार्पण कर सकते हैं।
सबसे पहले जानिए एशिया के सबसे बड़े स्टील प्लांट BSP के बारे में
भिलाई स्टील प्लांट एरिया के हिसाब से एशिया का सबसे बड़ा स्टील प्लांट है। प्रोडक्शन के हिसाब से यह सेल का सबसे बड़ा प्लांट है। इसकी स्थापना सोवियत संघ के सहयोग से वर्ष 1955 में हुई थी। भिलाई को स्टील प्लांट के लिए चुनने का मुख्य कारण स्टील निर्माण के लिए आवश्यक कच्चा माल पास के क्षेत्रों में आसानी से उपलब्ध होना था।
भिलाई स्टील प्लांट में आयरन ओर राजहरा माइंस से मंगाया जाता है। यहां से इन माइंस की दूरी लगभग 100 किलोमीटर है। लाइम स्टोन नंदिनी माइंस से लाया जाता है। यहां से इनकी दूरी करीब 25 किलोमीटर है। डोलोमाइट बिलासपुर के हिर्री से मंगाया जाता है। यहां से इसकी दूरी लगभग 140 किलोमीटर है।
भिलाई स्टील प्लांट एरिया के हिसाब से एशिया का सबसे बड़ा स्टील प्लांट है।
बइरबी-सायरंग रेल प्रोजेक्ट में छत्तीसगढ़ का कनेक्शन
भिलाई स्टील प्लांट का लोहा देश के दूसरे सबसे बड़े ब्रिज के निर्माण में इस्तेमाल हुआ है। ब्रिज के साथ-साथ टनल और रेलपांत सहित अन्य जरूरी संरचनाओं के लिए भी सेल की अलग-अलग इकाइयों से स्टील की आपूर्ति की गई। अकेले भिलाई प्लांट से 30 से 35 हजार टन लोहा भेजा गया था।
रेलवे के इस पुल के निर्माण के लिए सेल ने कुल 17 हजार टन स्टील सप्लाई किया, जिसमें प्लेट्स, टीएमटी बार और स्ट्रक्चर शामिल थे। इसमें 7,590 टन टीएमटी उत्पाद, 1,878 टन स्ट्रक्चरल स्टील और 8,505 टन स्टील प्लेट्स के साथ हॉट स्ट्रिप मिल प्रोडक्ट और चेकर्ड प्लेट भी शामिल हैं।
भिलाई स्टील प्लांट का लोहा बइरबी-सायरंग रेल प्रोजेक्ट के देश के दूसरे सबसे बड़े ब्रिज के निर्माण में इस्तेमाल हुआ है।
BSP से 60 टन स्ट्रक्चरल स्टील उपलब्ध कराया गया
ब्रिज निर्माण के लिए भिलाई इस्पात संयंत्र से ही 6,522 टन टीएमटी स्टील, 7,450 टन प्लेट्स और 60 टन स्ट्रक्चरल स्टील उपलब्ध कराया गया। इसके अलावा सेल की अन्य इकाइयां बर्नपुर स्थित इस्को स्टील प्लांट, दुर्गापुर स्टील प्लांट, राउरकेला स्टील प्लांट और बोकारो स्टील लिमिटेड से भी शेष स्टील की आपूर्ति की गई थी।
यह मिजोरम की राजधानी आइजोल के पियर ब्रिज की तस्वीर है।
दुनिया के सबसे ऊंचे ब्रिज पर भी लगा है BSP का लोहा
जम्मू-कश्मीर के चिनाब नदी पर बने दुनिया के सबसे ऊंचे पुल पर सेल की इकाई भिलाई स्टील प्लांट का लोहा इस्तेमाल किया गया है। इस ब्रिज के लिए सेल की अलग-अलग इकाइयों से लोहे की आपूर्ति की गई है। इसमें अकेले 12432 टन लोहा भिलाई के प्लांट से भेजा गया था।
रेलवे के इस पुल के निर्माण के लिए सेल ने 16,000 टन लोहे की आपूर्ति की थी, जिसके तहत प्लेट्स, टीएमटी बार और स्ट्रक्चर शामिल हैं। इसमें 6690 टन टीएमटी उत्पाद, 1793 टन स्ट्रक्चरल स्टील और 7511 टन स्टील प्लेट्स सहित हॉट स्ट्रिप मिल प्रोडक्ट और चेकर्ड प्लेट शामिल हैं।
जम्मू-कश्मीर के चिनाब नदी पर बने दुनिया के सबसे ऊंचे पुल पर सेल की इकाई भिलाई स्टील प्लांट का लोहा इस्तेमाल।
भिलाई इस्पात संयंत्र से भेजा गया 5 हजार 922 टन टीएमटी स्टील
पुल के निर्माण के लिए सेल ने भिलाई इस्पात संयंत्र से 5922 टन टीएमटी स्टील, 6454 टन प्लेट्स और 56 टन स्ट्रक्चरल स्टील सहित कुल 12,432 टन इस्पात की आपूर्ति की है। सेल के बर्नपुर स्थित इस्को स्टील प्लांट, दुर्गापुर स्टील प्लांट, राउरकेला स्टील प्लांट और बोकारो स्टील लिमिटेड से शेष लोहे की आपूर्ति की गई थी।
रेलवे के ज्यादातर प्रोजेक्ट में छत्तीसगढ़ का लोहा
बीएसपी के स्टील का इस्तेमाल बांद्रा-वर्ली सी-लिंक, मुंबई में अटल सेतु, अरुणाचल प्रदेश में सेला सुरंग, हिमाचल प्रदेश में अटल सुरंग और राष्ट्रीय महत्व की कई अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के निर्माण में किया गया है।
CPRO बोले- भारतीय रेल के लिए बड़ी उपलब्धि
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के CPRO डॉ. सुस्कर विपुल विलासराव ने बताया कि, ट्रैक-टनल और ब्रिज निर्माण के लिए बिलासपुर जोन के इंजीनियरिंग सपोर्ट, मशीनरी और विशेषज्ञ टीमें भेजी गई थी। रेलवे ट्रैक बिछाने में इस्तेमाल होने वाला रेलपांत, गर्डर, लोहा और स्टील मटेरियल भी छत्तीसगढ़ से ही मिज़ोरम पहुंचाया गया था।
वहीं, असम, पश्चिम बंगाल और मेघालय से भी तकनीकी उपकरण और निर्माण सामग्री लगातार सप्लाई की गई। पहाड़ियों पर बना यह रेल नेटवर्क भारतीय रेल के लिए बड़ी उपलब्धि है।
बइरबी-सायरंग रेल प्रोजेक्ट के तहत बने देश का सबसे ऊंचा दूसरा पुल है। ड्रोन से ली गई तस्वीर।
बइरबी-सायरंग रेलवे के पियर ब्रिज के पहले बने टनल की ड्रोन से ली गई तस्वीर है।
ये टनल के अंदर की तस्वीर है, जो ट्रायल के दौरान ली गई थी।
जानिए बइरबी-सायरंग रेल प्रोजेक्ट के बारे में ?
दरअसल, इस बइरबी-सायरंग प्रोजेक्ट की शुरुआत 29 नवंबर 2014 को हुई थी। सिलचर (असम) से बइरबी तक रेल सेवा पहले से मौजूद थी, लेकिन मिजोरम की राजधानी आइजोल तक पहुंचाने के लिए बइरबी से सायरंग तक नई लाइन बिछाई गई। अंतिम सेक्शन हरतकी-सायरंग को 10 जून 2025 को पूरा किया गया।
पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी कपिंजल किशोर शर्मा ने बताया कि यह पूरी रेल लाइन दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों से गुजरती है। निर्माण के लिए सामान पहुंचाने तक के लिए अलग से 200 किलोमीटर लंबा सड़क नेटवर्क तैयार करना पड़ा।
रेलवे ने बनाई 200 KM सड़क
पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के CPRO कपिंजल किशोर शर्मा ने बताया कि, यह प्रोजेक्ट बेहद दुर्गम पहाड़ी इलाकों से गुजरता है। लिहाजा, यहां रेल लाइन का काम बहुत ही मुश्किलों भरा रहा है। यहां तक सामान पहुंचाने के लिए रेलवे को 200 किलोमीटर लंबा सड़क नेटवर्क अलग से बनाना पड़ा। लगातार 10 साल की मेहनत के बाद यह सपना साकार हुआ।
पीएम नरेंद्र मोदी जल्द इस ब्रिज का उद्घाटन करेंगे।
जानिए इस रेल परियोजना की खासियत
इस रेल लाइन में 45 टनल, 153 पुल और 114 मीटर ऊंचाई (देश का दूसरा सबसे ऊंचा पियर ब्रिज) तक के मेगा ब्रिज शामिल हैं। इसके लिए 12.8 किलोमीटर लंबा चट्टानों को काटकर सुरंग का निर्माण किया गया है। इसमें 1.8 किलोमीटर लंबी सबसे बड़ी सुरंग भी है। इस रेल लाइन पर 31% ट्रैक सुरंगों के भीतर और 23% हिस्सा पुलों में हैं।
7 घंटे का सफर अब 3 घंटे में
पहले सड़क मार्ग से आइजोल से सिलचर जाने में 7 घंटे लगते थे। वहीं रेल नेटवर्क के जरिए यह दूरी सिर्फ 3 घंटे में तय होगी। गुवाहाटी 12 घंटे और दिल्ली करीब 48 घंटे में पहुंचा जा सकेगा। बरसात के दिनों में भूस्खलन से बंद होने वाले रास्तों की तुलना में अब यात्रा कहीं ज्यादा सुरक्षित और आसान होगी।
यह परियोजना न केवल मिजोरम के लिए ऐतिहासिक पल है। बल्कि पूरे पूर्वोत्तर को अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कनेक्टिविटी से जोड़ने का मार्ग भी तैयार करेगा। इससे न केवल मिजोरम का देश से संपर्क मज़बूत होगा, बल्कि म्यांमार बॉर्डर तक रेल लाइन ले जाने का रास्ता भी साफ हो जाएगा।
रेलवे के सभी तरह के ट्रायल रन हो चुके हैं पूरे।
रेल लाइन म्यांमार बॉर्डर तक ले जाने की योजना
CPRO कपिंजल किशोर शर्मा के अनुसार बइरबी-सायरंग लाइन सिर्फ मिजोरम तक सीमित नहीं रहेगी। रेलवे इस परियोजना को और आगे बढ़ाकर म्यांमार बॉर्डर तक ले जाने की योजना पर काम चल रहा है। बहुत जल्द सर्वे पूरा कर डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) केंद्र को सौंप दी जाएगी।
2-3 ट्रेनें चलाने का है प्रस्ताव, राजधानी-वंदेभारत की भी उम्मीद
रेलवे प्रशासन ने शुरुआत में यहां 2 से 3 ट्रेनें चलाने की योजना बनाई है। इसमें गुवाहाटी और दिल्ली तक की ट्रेनें प्राथमिकता पर हैं। मिजोरम सरकार ने उम्मीद जताई है कि आगे राजधानी एक्सप्रेस और वंदे भारत जैसी ट्रेनें भी यहां तक पहुंचेंगी, जिससे लोगों का यहां पहुंचना आसान होगा।
समय-सीमा में कार्य पूर्ण करने और विभागवार मासिक कार्ययोजना तैयार करने के दिए निर्देश
रायपुर। मुख्य सचिव विकासशील की अध्यक्षता में आज मंत्रालय महानदी भवन, नवा रायपुर अटल नगर में राज्यों को पूंजीगत निवेश हेतु विशेष सहायता योजना (SASCI) 2026-27 के अंतर्गत विभिन्न विभागों द्वारा किए जा रहे सुधार कार्यों एवं उनके क्रियान्वयन की प्रगति की समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक में मुख्य सचिव ने सभी विभागों को निर्देश दिए कि लंबित कार्यों को निर्धारित समय-सीमा के भीतर पूरा किया जाए। उन्होंने अधिकारियों से विभागवार मासिक कार्ययोजना तैयार कर उसके अनुसार कार्यों की नियमित मॉनिटरिंग सुनिश्चित करने को कहा, ताकि योजना के तहत तय लक्ष्यों को समय पर हासिल किया जा सके। बैठक में राज्यों को पूंजीगत निवेश हेतु विशेष सहायता योजना (SASCI) 2026-27 के तहत जारी दिशा-निर्देशों एवं विभिन्न परिचालन गाइडलाइंस के अनुरूप विभागवार सुधार कार्यों की प्रगति, अब तक की उपलब्धियों तथा आगामी कार्ययोजना की विस्तृत समीक्षा की गई। इस दौरान योजना के प्रभावी क्रियान्वयन, समयबद्ध लक्ष्य-पूर्ति तथा विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश भी दिए गए। बैठक में वित्त विभाग के सचिव डॉ. रोहित यादव, मुख्यमंत्री एवं वाणिज्यिक कर विभाग के सचिव मुकेश कुमार, कृषि विकास एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी, सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव रजत कुमार, आवास एवं पर्यावरण विभाग के सचिव अंकित आनंद, पर्यटन एवं संस्कृति विभाग के सचिव डॉ. एस.भारतीदासन, नगरीय प्रशासन विभाग की सचिव सुश्री आर.शंगीता, राजस्व विभाग की सचिव श्रीमती शम्मी आबिदी, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव अमित कटारिया, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के सचिव मोहम्मद कैसर अब्दुलहक, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सचिव भीम सिंह, ऊर्जा विभाग के सचिव डॉ. सारांश मित्तर, वित्त विभाग के विशेष सचिव चंदन कुमार, प्रबंध संचालक छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल विवेक आचार्य सहित विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।
रायपुर : ‘भारत भाग्य विधाता‘ फिल्म के लेखक-निर्देशक मनोज तापड़िया तथा फिल्म निर्माता आदि शर्मा ने की छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड के एमडी विवेक आचार्य से सौजन्य मुलाकात
चित्रोत्पला फिल्म सिटी के विकास, फिल्म पर्यटन को बढ़ावा देने और छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्म निर्माण के आकर्षक गंतव्य के रूप में विकसित करने पर हुई विस्तृत चर्चा
रायपुर। छत्तीसगढ़ को देश के प्रमुख फिल्म निर्माण केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड में चित्रोत्पला फिल्म सिटी के विकास को लेकर महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। रायपुर में आयोजित इस बैठक में छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड के प्रबंध संचालक विवेक आचार्य से भारत भाग्य विधाता फिल्म के डायरेक्टर मनोज तापड़िया तथा फिल्म निर्माता आदि शर्मा ने सौजन्य भेंट कर राज्य में विकसित की जा रही चित्रोत्पला फिल्म सिटी की अवधारणा, उसकी संभावनाओं तथा भविष्य की कार्ययोजना पर विस्तार से चर्चा की। बैठक में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि छत्तीसगढ़ की अनुपम प्राकृतिक सुंदरता, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक धरोहरें, जलप्रपात, वन क्षेत्र, जनजातीय संस्कृति तथा विविध प्राकृतिक लोकेशन राज्य को फिल्म निर्माण के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाते हैं। इन विशेषताओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म निर्माताओं के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर राज्य को फिल्मांकन का आकर्षक गंतव्य बनाने की रणनीति पर विचार-विमर्श किया गया। चर्चा के दौरान चित्रोत्पला फिल्म सिटी को आधुनिक सुविधाओं से युक्त एक ऐसे समग्र फिल्म परिसर के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया, जहाँ फिल्म निर्माण से जुड़ी सभी आवश्यक व्यवस्थाएँ उपलब्ध हों। साथ ही फिल्म पर्यटन को बढ़ावा देने, राज्य में फिल्म निर्माण गतिविधियों का विस्तार करने तथा इस क्षेत्र में निजी और संस्थागत सहयोग की संभावनाओं पर भी विस्तार से मंथन हुआ।
प्रबंध संचालक विवेक आचार्य ने कहा कि चित्रोत्पला फिल्म सिटी का विकास छत्तीसगढ़ के फिल्म और पर्यटन क्षेत्र के लिए मील का पत्थर सिद्ध होगा। इससे राज्य को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी, फिल्म निर्माण गतिविधियों को गति मिलेगी तथा स्थानीय कलाकारों, तकनीशियनों, रचनात्मक युवाओं और फिल्म से जुड़े अन्य पेशेवरों के लिए रोजगार एवं कौशल विकास के नए अवसर सृजित होंगे। उन्होंने कहा कि फिल्म उद्योग के विकास से पर्यटन, आतिथ्य, परिवहन, हस्तशिल्प और स्थानीय व्यवसायों को भी व्यापक लाभ मिलेगा, जिससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था को नई गति प्राप्त होगी। बैठक में इस बात पर भी सहमति बनी कि छत्तीसगढ़ को एक उभरते हुए फिल्म निर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए फिल्म उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों, निर्माताओं और निर्देशकों के साथ निरंतर संवाद एवं सहयोग को बढ़ावा दिया जाएगा। राज्य की प्राकृतिक संपदा, सांस्कृतिक विविधता और विकसित की जा रही आधुनिक फिल्म अवसंरचना के समन्वय से छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म निर्माण के लिए एक पसंदीदा गंतव्य बनाने की दिशा में ठोस प्रयास किए जाएंगे। बैठक में चित्रोत्पला फिल्म सिटी के विकास, फिल्म पर्यटन के विस्तार तथा भविष्य में फिल्म निर्माण और पर्यटन संवर्धन के क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग की व्यापक संभावनाओं पर सहमति व्यक्त की गई।
320.15 हेक्टेयर में फैला नंदनवन जंगल सफारी बना प्रकृति प्रेमियों और पर्यटकों का पसंदीदा केंद्र
धनंजय राठौर ,संयुक्त संचालक, जनसंपर्क
अशोक कुमार चंद्रवंशी, सहायक जनसंपर्क अधिकारी
नंदनवन जंगल सफारी नवाँ रायपुर में पर्यटकों के लिए कई प्रकार की रोमांचक सफारी राइड्स उपलब्ध हैं, जिनमें शाकाहारी सफारी, टाइगर सफारी, भालू सफारी और लायन सफारी प्रमुख हैं। इसके अलावा यहाँ एक छोटा चिड़ियाघर (नंदनवन जू) भी है। छत्तीसगढ़ की राजधानी नवा रायपुर (अटल नगर) के सेक्टर-39 में स्थित नंदनवन जंगल सफारी राज्य के प्रमुख पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण केंद्रों में शामिल है। 320.15 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह विशाल परिसर प्रकृति प्रेमियों, वन्यजीव प्रेमियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। यहां वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ पर्यटकों को प्राकृतिक वातावरण में वन्यजीवों को देखने और उनके बारे में जानने का अवसर मिलता है।
मिनी जू से जंगल सफारी तक का सफर नंदनवन की शुरुआत वर्ष 1979 में रायपुर में ‘नंदनवन मिनी जू’ के रूप में हुई थी। यह वन्यजीवों के रेस्क्यू और राहत केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। वर्ष 2008 में केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए) ने इसे आधिकारिक रूप से ‘मिनी जू’ की मान्यता दी। इसके बाद नवा रायपुर में आधुनिक और विशाल जंगल सफारी विकसित करने के लिए वर्ष 2012 से 2015 के बीच 320.15 हेक्टेयर भूमि आवंटित की गई। 1 नवंबर 2016 को छत्तीसगढ़ राज्य के 16वें स्थापना दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नंदनवन जंगल सफारी का उद्घाटन किया।
वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा पर विशेष जोर नंदनवन जंगल सफारी का मुख्य उद्देश्य वन्यजीवों का संरक्षण, दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण एवं प्रजनन और लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यहां वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप सुरक्षित और तनावमुक्त आवास उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। विद्यार्थियों और पर्यटकों को वन्यजीवों तथा जैव विविधता के महत्व की जानकारी देने के लिए यहां विभिन्न पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। पांच प्रमुख सफारी जोन हैं आकर्षण का केंद्र नंदनवन जंगल सफारी को वन्यजीवों की सुरक्षा और पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग जोन में विकसित किया गया है।
शाकाहारी सफारी 30.89 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस जोन में चीतल, सांभर, नीलगाय और काला हिरण जैसे वन्यजीव प्राकृतिक वातावरण में विचरण करते हैं। भालू सफारी 20.03 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित भालू सफारी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। यहां भालुओं को प्राकृतिक वातावरण में देखने का अवसर मिलता है। बाघ सफारी 20.04 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली बाघ सफारी में पर्यटक देश के राष्ट्रीय पशु बाघ को करीब से देखने का रोमांचक अनुभव प्राप्त करते हैं। सिंह सफारी 20.01 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित सिंह सफारी में एशियाई शेरों का संरक्षण किया जा रहा है। जू जोन 50 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जू जोन में विभिन्न प्रजातियों के पक्षी, सरीसृप और अन्य वन्यजीव आकर्षण का केंद्र हैं।
दुर्लभ और विशेष वन्यजीवों का भी संरक्षण नंदनवन जंगल सफारी में विभिन्न चिड़ियाघरों के साथ पशु विनिमय कार्यक्रम के माध्यम से कई दुर्लभ और विशेष वन्यजीवों को लाया गया है। यहां सफेद बाघ, दरियाई घोड़ा, घड़ियाल और क्लोन जंगली भैंसा ‘दीपाशा’ जैसे वन्यजीव पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण हैं। देश-विदेश से पहुंचते हैं पर्यटक वनमंडलाधिकारी थेजस शेखर ने बताया कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप की मंशानुरूप नंदनवन जंगल सफारी पर्यटकों के बीच लगातार लोकप्रिय हो रहा है। गौरतलब है कि वर्ष 2018-19 में ही देश-विदेश से 1 लाख 74 हजार 611, वर्ष 2019-20 में 1 लाख 60 हजार 767 ,वर्ष 2020-21 में 1 लाख 60 हजार 32, वर्ष 2021-22 में 1 लाख 73 हजार 72, वर्ष 2022-23 में 2 लाख 77 हजार 881, वर्ष 2023-24 में 2 लाख 62 हजार 486, वर्ष 2024-25 में 2 लाख 70 हजार 942, वर्ष 2025-26 में 3 लाख 24 हजार 785, से अधिक पर्यटकों ने जंगल सफारी का भ्रमण किया। यह आंकड़ा इसकी बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है। जैव विविधता संरक्षण के प्रति जागरूकता का केंद्र नंदनवन जंगल सफारी में अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस, विश्व बाघ दिवस और वन्यजीव सप्ताह जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों के माध्यम से लोगों, विद्यार्थियों और पर्यटकों को वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जाता है। रायपुर से आसान पहुंच नंदनवन जंगल सफारी नवा रायपुर (अटल नगर) के सेक्टर-39 में स्थित है। यह स्वामी विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे, रायपुर से लगभग 15 किलोमीटर और रायपुर रेलवे स्टेशन से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जंगल सफारी प्रत्येक सोमवार को बंद रहती है। वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा का ऐसा अनूठा केंद्र नंदनवन जंगल सफारी आज छत्तीसगढ़ में पर्यटन, वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा का ऐसा अनूठा केंद्र बन चुका है, जहां प्रकृति के करीब पहुंचकर वन्यजीवों को देखने के साथ-साथ उनके संरक्षण का संदेश भी मिलता है ।