ढाका,एजेंसी। बांग्लादेश में BNP अध्यक्ष तारिक रहमान नए प्रधानमंत्री बन गए हैं। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने संसद भवन में तारिक को पीएम पद की शपथ दिलाई। इसके साथ ही 18 महीने से चल रही अंतरिम सरकार का कार्यकाल खत्म हो गया।
तारिक रहमान पहली बार प्रधानमंत्री बने हैं। इससे पहले आज दोपहर में BNP के सांसदों ने उन्हें संसदीय दल का नेता चुना था। वह पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान के बेटे हैं। 17 साल तक लंदन में रहने के बाद वह दो महीने पहले ही बांग्लादेश लौटे थे।
रहमान के अलावा 25 कैबिनेट मंत्रियों और 24 राज्य मंत्रियों को भी पद की शपथ दिलाई है। इनमें एक हिंदू मंत्री निताई रॉय चौधरी भी शामिल है। वह कैबिनेट मंत्री बने। 25 कैबिनेट मंत्रियों में से 17 नए चेहरे हैं। सभी 24 राज्य मंत्री नए हैं।
पिछले गुरुवार को हुए आम चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने 299 में से 209 सीटें जीतकर बहुमत के लिए जरूरी 150 के आंकड़े को पार कर लिया था। इसके अलावा 3 सीटों पर उसकी सहयोगी पार्टियों ने जीत हासिल की।
राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने तारिक रहमान को प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ दिलाई। बाद में दोनों ने हाथ मिलाया।
तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद हस्ताक्षर किए।
निताई रॉय चौधरी 30,878 वोटों से चुनाव जीतें।
राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने मंत्रिमंडल के सदस्यों को शपथ दिलाई।
शपथ ग्रहण समारोह देखने के लिए हजारों लोग संसद भवन के पास पहुंचे।
संविधान बदलाव को लेकर सियासी टकराव तेज
इस बीच संविधान में बदलाव को लेकर सियासी टकराव तेज हो गया है। दरअसल, 12 फरवरी को संसद चुनाव के साथ ‘जुलाई चार्टर’ पर जनमत संग्रह भी हुआ था। इसमें 62% लोगों ने ‘हां’ में वोट दिया। जुलाई चार्टर के मुताबिक नई संसद 180 दिनों के लिए संविधान सभा की तरह काम करेगी। इस अवधि के दौरान संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं में बदलाव किए जाते।
जुलाई चार्टर का मकसद देश में ताकत का एकाधिकार खत्म करना और संतुलन बनाना है। इससे प्रधानमंत्री की ताकत घट जाती और राष्ट्रपति को अधिकार दिए जाते। BNP ने जुलाई चार्टर पर हस्ताक्षर तो किए थे, लेकिन उसके नेता कई प्रावधानों पर आपत्ति जता रहे हैं। पार्टी का कहना है कि चार्टर तैयार करते समय उनसे सलाह नहीं ली गई थी।
BNP बोली- संविधान में ऐसी किसी परिषद का प्रावधान नहीं
BNP के स्टैंडिंग कमिटी सदस्य और सांसद सलाहुद्दीन अहमद ने बताया कि पार्टी के कोई भी सांसद इस परिषद के सदस्य के रूप में शपथ नहीं लेंगे।
वर्तमान संविधान में ऐसी किसी परिषद का कोई प्रावधान नहीं है और न ही कोई अलग शपथ का फॉर्मेट मौजूद है। उनका कहना है कि संसद सदस्य केवल संसद के लिए चुने गए हैं, संवैधानिक सुधार परिषद के लिए नहीं।
इस परिषद को वैध बनाने के लिए पहले संविधान में संशोधन करके इसे शामिल करना होगा, फिर संसद में इसे अपनाना होगा और उसके बाद ही शपथ का कोई कानूनी आधार बनेगा। यह परिषद जुलाई चार्टर के तहत संवैधानिक सुधारों को लागू करने के लिए बनाई गई है।
योजना थी कि नए संसद सदस्य के साथ-साथ इस परिषद के सदस्य भी बनें और दोनों के लिए शपथ लें, लेकिन BNP ने इसे असंवैधानिक बताते हुए केवल संसद सदस्य की शपथ ली है।
जुलाई चार्टर से कोई नेता अधिकतम 10 साल ही पीएम रह सकेगा
जुलाई चार्टर के तहत PM के लिए जीवनभर कुल 10 साल (या अधिकतम दो टर्म) की सख्त टर्म लिमिट लगाई गई है, ताकि कोई लंबे समय तक सत्ता में न रह सके।
PM पार्टी चीफ के पद के साथ नहीं रह सकता, इमरजेंसी घोषणा के लिए कैबिनेट और विपक्षी लीडर की लिखित सहमति जरूरी होगी। प्रेसिडेंट की भूमिका मजबूत होगी, जैसे कई स्वतंत्र संस्थाओं के प्रमुखों की नियुक्ति में प्रेसिडेंट को ज्यादा स्वतंत्र अधिकार मिलेंगे, जो पहले PM के प्रभाव में थे।
बाइकैमरल संसद (ऊपरी सदन) बनने से PM-केंद्रित निचले सदन के फैसलों पर कंट्रोल लगेगा और कई संस्थाओं के लिए अलग सेलेक्शन कमिटी बनेंगी, जिससे PM का एकतरफा नियंत्रण कम होगा।
नेशनल पार्लियामेंट में नवनिर्वाचित सांसदों ने शपथ ली
बांग्लादेश की 13वीं नेशनल पार्लियामेंट के नवनिर्वाचित सदस्यों ने मंगलवार को नेशनल पार्लियामेंट के साउथ प्लाजा में शपथ ली। सुबह करीब 10:42 बजे (स्थानीय समयानुसार) मुख्य चुनाव आयुक्त एएमएम नासिर उद्दीन ने सांसदों को शपथ दिलाई।
बांग्लादेशी मीडिया प्रथोम ओलो के मुताबिक, यह शपथ ग्रहण समारोह कड़ी सुरक्षा के बीच आयोजित हुआ, जिसमें 1,000 से ज्यादा स्थानीय और विदेशी मेहमान शामिल हुए। शपथ ग्रहण समारोह से पहले कुरान पढ़ी गई।
मुख्य समारोह शाम 4 बजे शुरू होगा। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन निर्वाचित प्रधानमंत्री तारिक रहमान और उनके शुरुआती मंत्रिमंडल को पद की शपथ दिलाएंगे।
शपथ ग्रहण समारोह के लिए 13 देशों को आधिकारिक न्योता भेजा गया है, जिनमें भारत, चीन, पाकिस्तान जैसे बड़े नाम शामिल हैं। भारत की ओर से लोकसभा स्पीकर ओम बिरला बांग्लादेश पहुंचे हैं। उनके साथ विदेश सचिव विक्रम मिश्री भी शामिल होंगे।
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला आज तारिक रहमान के शपथ समारोह में शामिल होने के लिए बांग्लादेश पहुंचे हैं।
कई देशों और क्षेत्रीय संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए
व्यक्ति
देश/संगठन
ओम बिरला
लोकसभा स्पीकर, भारत
शेरिंग तोबगे
भूटान के प्रधानमंत्री
अहसान इकबाल
प्लानिंग मिनिस्टर, पाकिस्तान
बाला नंदा शर्मा
विदेश मंत्री, नेपाल
अब्दुल्ला खलील
विदेश मंत्री, मालदीव
नलिंदा जयतिस्सा
स्वास्थ्य मंत्री, श्रीलंका
सीमा मल्होत्रा
यूके इंडो-पैसिफिक अंडर सेक्रेट्ररी
मंत्रियों के चयन का प्रोसेस जानिए
पार्टी सूत्रों के अनुसार, कैबिनेट की अंतिम संरचना का फैसला BNP की स्थायी समिति और अध्यक्ष तारिक रहमान करेंगे। प्रधानमंत्री के रूप में वे अंतिम सूची में कभी भी बदलाव कर सकते हैं।
आज सांसदों के शपथ लेने के बाद सत्तारूढ़ दल और विपक्ष अलग-अलग बैठक कर अपने संसदीय नेता का चुनाव करेंगे। बहुमत दल का नेता इसके बाद बंगभवन जाकर राष्ट्रपति मोहम्मद शाहाबुद्दीन से मुलाकात करेगा।
राष्ट्रपति औपचारिक रूप से उसे सरकार बनाने का निमंत्रण देंगे। इसके बाद प्रधानमंत्री पद के दावेदार मंत्रियों, राज्य मंत्रियों और उपमंत्रियों की सूची राष्ट्रपति को सौंपेंगे।
राष्ट्रपति सूची कैबिनेट डिवीजन को भेजेंगे, जो शपथ समारोह की तैयारी पूरी करेगा। कैबिनेट सचिव नामित मंत्रियों को व्यक्तिगत रूप से फोन कर शपथ समारोह में शामिल होने का निमंत्रण देंगे और उनके घरों पर आधिकारिक वाहन भेजे जाएंगे।
तारिक रहमान ने दो जीती सीटों में से एक छोड़ा
BNP के चेयरमैन तारिक रहमान ने ढाका-17 सीट को अपने पास रखने और बोगरा-6 सीट को खाली करने का फैसला किया है। 13वीं संसदीय चुनाव में तारिक रहमान ने दोनों सीटों से भारी बहुमत से जीत हासिल की थी।
ढाका-17 से उन्होंने लगभग 72,699 वोट प्राप्त किए, जबकि बोगरा-6 से उन्होंने 216,284 वोट हासिल कर जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार को बड़े अंतर से हराया था।
अब तारिक रहमान ने बांग्लादेश निर्वाचन आयोग (ईसी) को एक लिखित पत्र भेजकर बोगरा-6 सीट छोड़ने की औपचारिक घोषणा की है। ईसी के वरिष्ठ सचिव अख्तर अहमद ने इसकी पुष्टि की है।
बांग्लादेश के नियमों (आरपीओ) के अनुसार, जब कोई सांसद दो सीटों से जीतता है और एक सीट छोड़ता है, तो उस खाली सीट पर उपचुनाव कराना होता है। इसलिए बोगरा-6 सीट पर अब उपचुनाव होगा, जिसे ईसी को 90 दिनों के अंदर आयोजित करना होगा।
दमिश्क, एजेंसी। सीरिया की एक अदालत ने मंगलवार को देश के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद और उनके छोटे भाई माहेर अल-असद को फांसी की सजा सुनाई। दोनों को गृहयुद्ध के दौरान लाखों लोगों की हत्या और अत्याचार के मामलों में दोषी ठहराया गया।
इसी मामले में बशर अल-असद के मामा के बेटे अतीफ नजीब को भी फांसी की सजा सुनाई गई। बशर और माहेर दिसंबर 2024 में सरकार गिरने के बाद रूस भाग गए थे। पुतिन सरकार ने उन्हें शरण दी हुई है। दोनों की गैरमौजूदगी में सजा सुनाई गई।
अतीफ नजीब को जनवरी 2025 में गिरफ्तार किया गया था। उन्हें मंगलवार को कैदी की वर्दी पहनाकर पिंजरे में कोर्ट लाया गया।
बशर अल असद के ममेरे भाई अतीफ नजीब को पिंजरे में कोर्ट लाया गया था।
अतीफ के आदेश के बाद सीरिया में गृहयुद्ध भड़का
अतीफ नजीब सीरियाई सेना में ब्रिगेडियर जनरल रह चुके हैं। 2011 में वे दारा प्रांत में राजनीतिक सुरक्षा शाखा के प्रमुख थे। वह असद सरकार के सबसे बड़े अधिकारियों में से एक हैं, जिन पर अदालत में मुकदमा चला।
अतीफ पर आरोप है कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों से सख्ती से निपटने का आदेश दिया था। आदेश के बाद सीरिया में विरोध प्रदर्शन और उग्र हो गया। देश में गृहयुद्ध शुरू हो गया जो 2024 तक चलता रहा। इसमें करीब 5 लाख लोगों की मौत हुई।
सीरिया के इदलिब के एक रिफ्यूजी कैंप में गृहयुद्ध के दौरान घायल हुआ एक बच्चा। मार्च 2011 से 2024 तक सीरिया में 30 हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हुई थी।
दिसंबर 2024 में 53 साल पुराना राज खत्म हुआ
यह बशर अल-असद के खिलाफ किसी आपराधिक मामले में आया पहला फैसला है। दिसंबर 2024 में विद्रोहियों ने दमिश्क पर कब्जा कर उनकी सरकार गिरा दी थी। इसके साथ ही 1971 से सीरिया पर शासन कर रहे असद परिवार का 53 साल पुराना राज भी खत्म हो गया था।
सरकार गिरने से ठीक पहले बशर अल-असद ने देश छोड़ दिया था। इसके बाद सीरिया पर विद्रोही नेता अहमद अल-शरा का कब्जा हो गया। उनकी सरकार ने उनके शासन के दौरान लोगों पर हुए अत्याचार और हत्याओं के मामलों की जांच शुरू की।
दिसंबर 2024 में दारा शहर पर कब्जे के बाद विद्रोही लड़ाके सीरिया का झंडा लहराते हुए।
रूस और ईरान के साथ के बावजूद कैसे गिरी असद सरकार?
गृहयुद्ध के दौरान बशर अल-असद की सरकार को रूस, ईरान और हिजबुल्लाह का समर्थन मिलता था। इसी वजह से वह कई साल तक सत्ता में बने रहे।
साल 2024 में हालात बदल गए। इजराइल के लगातार हमलों से हिजबुल्लाह और ईरान समर्थित गुट कमजोर पड़ गए। दूसरी ओर, रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ था, इसलिए वह भी पहले जैसी सैन्य मदद नहीं कर सका।
इसी मौके का फायदा उठाकर तुर्किये के समर्थन वाले विद्रोही गुटों ने उत्तर-पश्चिमी प्रांत इदलिब से बड़ा हमला शुरू किया। कुछ ही दिनों में उन्होंने कई शहरों पर कब्जा कर लिया और 8 दिसंबर 2024 को राजधानी दमिश्क पहुंच गए।
विद्रोहियों के दमिश्क पहुंचते ही बशर अल-असद अपने परिवार के साथ रूस भाग गए। उनकी सरकार गिर गई और असद परिवार का 53 साल से ज्यादा पुराना शासन खत्म हो गया।
वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ईरान के साथ बिना परमाणु समझौते के भी जंग खत्म करने पर विचार कर रहे हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, अमेरिका की एक बड़ी शर्त होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलना है। अगर ईरान वहां से गुजरने वाले कारोबारी जहाजों को बिना किसी रुकावट के आने-जाने देता है, तो अमेरिका जंग से पीछे हट सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रम्प पिछले कुछ हफ्तों से इस योजना पर काम कर रहे हैं। उन्होंने अपने सीनियर अफसरों से कहा है कि अगर ईरान होर्मुज स्ट्रेट खोल देता है तो अमेरिका औपचारिक परमाणु समझौते के बिना भी संघर्ष खत्म करने को तैयार हो सकता है।
अब परमाणु समझौता नहीं, होर्मुज खोलना अमेरिका की नई प्राथमिकता
पहले अमेरिका की सबसे बड़ी शर्त ईरान के साथ नया परमाणु समझौता करना थी। लेकिन जंग लंबी खिंचने के बाद उसका फोकस बदलता दिख रहा है।
अब होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही शुरू कराना जंग खत्म करने की अहम शर्त बन सकता है। यह रास्ता दुनिया के लिए बेहद अहम है, क्योंकि यहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होती है।
ईरान ने रखीं 7 बड़ी शर्तें
होर्मुज स्ट्रेट खोलने के बदले ईरान ने भी अमेरिका के सामने कई शर्तें रखी हैं। सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहम्मद बाघेर जोलघदार के मुताबिक, अमेरिका को…
ईरान के सहयोगी गुटों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई बंद करनी होगी।
जंग हमेशा के लिए खत्म करनी होगी।
ईरान की समुद्री नाकाबंदी हटानी होगी।
क्षेत्र से अपने सैनिक वापस बुलाने होंगे।
ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाने होंगे।
विदेशों में रोकी गई ईरानी संपत्ति लौटानी होगी।
जंग में हुए नुकसान का मुआवजा देना होगा।
अमेरिका में बढ़ रहा जंग खत्म करने का दबाव
ईरान के साथ जंग लंबी खिंचने का असर अमेरिका में भी दिखने लगा है। पेट्रोल की कीमतें बढ़ने लगी हैं, जिससे आम लोगों पर असर पड़ रहा है। अगले साल होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले यह ट्रम्प प्रशासन के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
ऐसे में ट्रम्प पर जल्द से जल्द संघर्ष खत्म करने का दबाव बढ़ रहा है। यही वजह है कि वे पिछले कुछ समय से लगातार कह रहे हैं कि ईरान के साथ समझौता जल्द हो सकता है। हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया पर यह संकेत भी दिया था कि अमेरिका इस जंग में अपना मकसद हासिल कर चुका है।
परमाणु समझौते के बिना भी ट्रम्प क्यों तैयार?
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प का मानना है कि उनके कार्यकाल में ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को दोबारा आसानी से शुरू नहीं कर पाएगा। उनका भरोसा है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां ईरान की हर गतिविधि पर नजर रख सकती हैं।
ट्रम्प यह भी मानते हैं कि अगर ईरान फिर से परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करता है, तो अमेरिका दोबारा सैन्य कार्रवाई कर सकता है। इसलिए उनके लिए औपचारिक परमाणु समझौते से ज्यादा अहम होर्मुज स्ट्रेट को फिर से पूरी तरह खुलवाना है।
ईरान होर्मुज स्ट्रेट खोलने के बदले अमेरिकी सैनिकों की वापसी, सभी प्रतिबंध हटाने, विदेशों में जमा अपनी संपत्ति लौटाने और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा जैसी बड़ी मांगें कर रहा है। ऐसे में दोनों देशों के बीच समझौता होना आसान नहीं माना जा रहा।
अमेरिकी खुफिया एजेंसी ODNI के मुताबिक, युद्ध से पहले ईरान के पास 3,000 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें थीं, जिनकी मारक क्षमता 2,000 किमी तक है। इन मिसाइलों का बड़ा हिस्सा पहाड़ों के नीचे बने अंडरग्राउंड ठिकानों में रखा गया है। यहां मिसाइलें, लॉन्चर और कंट्रोल सेंटर सुरंगों के अंदर होते हैं, इसलिए हवाई हमलों में इन्हें पूरी तरह नष्ट करना आसान नहीं माना जाता।
दुनिया के 20% तेल का रास्ता ईरान के पास
हॉर्मुज स्ट्रेट से दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का करीब 20% और LNG का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसका उत्तरी तट ईरान के पास है। इसलिए यहां तनाव बढ़ने और हॉर्मुज बंद होने का असर सीधे वैश्विक तेल कीमतों और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ता है।
हजारों ड्रोन का बेड़ा
ईरान ने पिछले एक दशक में शाहेद जैसे हजारों ड्रोन विकसित किए हैं। इनका इस्तेमाल लंबी दूरी के हमलों और निगरानी के लिए किया जाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध में भी ईरानी ड्रोन के इस्तेमाल ने इसकी क्षमता को वैश्विक स्तर पर चर्चा में ला दिया।
पश्चिम एशिया में सहयोगी सशस्त्र नेटवर्क
ईरान के समर्थन वाले समूह हिजबुल्लाह (लेबनान), हूती (यमन) और इराक के कई शिया सशस्त्र गुट पश्चिम एशिया में एक्टिव हैं। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ इन्हें ईरान की फॉरवर्ड डिफेंस स्ट्रटजी का हिस्सा मानते हैं, जिससे वह अपने सीमावर्ती क्षेत्र से बाहर भी दबाव बना सकता है।
होर्मुज पर ईरान दावा क्यों करता है?
हॉर्मुज स्ट्रेट ईरान और ओमान के बीच स्थित है। इसका उत्तरी किनारा ईरान के पास है, जबकि दक्षिणी किनारा ओमान के पास है। सबसे संकरी जगह पर इसकी चौड़ाई सिर्फ 21 नॉटिकल मील (करीब 39 किलोमीटर) है।
शुरुआत में दोनों देशों का समुद्री क्षेत्र सिर्फ 3 नॉटिकल मील तक माना जाता था। लेकिन बाद में समुद्री कानूनों में बदलाव के बाद ईरान ने 1959 में और ओमान ने 1972 में अपने-अपने समुद्री क्षेत्र की सीमा बढ़ाकर 12-12 नॉटिकल मील (करीब 22-22 किलोमीटर) कर दी।
इस फैसले के बाद हॉर्मुज स्ट्रेट का सबसे संकरा हिस्सा पूरी तरह ईरान और ओमान के समुद्री क्षेत्रों में आ गया। हालांकि समुद्री आवाजाही जारी रहे इसके 2-2 नॉटिकल मील का चौड़ा ट्रांजिट लेन बनाया गया।
तेहरान, एजेंसी। ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई का जंग के बाद पहली बार वीडियो सामने आया है। ईरानी न्यूज एजेंसी मेहर ने यह वीडियो जारी किया है। इसमें मुजतबा जमीन पर बैठे लोगों के बीच उनसे बातचीत करते नजर आ रहे हैं।
सुप्रीम लीडर बनने के बाद यह उनका पहला वीडियो है। हालांकि, वीडियो कब रिकॉर्ड किया गया, इसकी जानकारी नहीं दी गई है। पिछले कुछ दिनों से मुजतबा की सेहत को लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे थे। इजराइली चैनल 14 ने उनकी हालत गंभीर होने और अस्पताल में भर्ती होने का दावा किया था। यहां तक कहा गया था कि उनकी जल्द मौत हो सकती है।
अब वीडियो सामने आने के बाद इन दावों पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, मुजतबा की मौजूदा सेहत को लेकर अभी भी पूरी तस्वीर साफ नहीं है।
सऊदी मीडिया का दावा- ईरान में नहीं थे मुजतबा
सऊदी मीडिया अल-हदथ ने इजराइली सुरक्षा सूत्र के हवाले से दावा किया था कि मुजतबा ईरान में नहीं थे। सूत्र ने यह भी कहा था कि मुजतबा के नाम से जारी सरकारी संदेश IRGC प्रमुख अहमद वाहिदी और दूसरे वरिष्ठ अधिकारी तैयार कर रहे थे।
सुप्रीम लीडर बनने के बाद से मुजतबा सार्वजनिक तौर पर नजर नहीं आए थे। उन्होंने कोई भाषण भी नहीं दिया था। सरकारी मीडिया ने उनके नाम से सिर्फ लिखित संदेश जारी किए थे।
ईरानी मीडिया के मुताबिक, पिता अली खामेनेई की मौत के बाद भी मुजतबा किसी मंत्री से नहीं मिले थे और पिता के अंतिम संस्कार में भी नजर नहीं आए। राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने भी कहा था कि मुजतबा से सीधे संपर्क करना मुश्किल है।
पहले भी गंभीर चोट की खबरें आई थीं
मुजतबा की सेहत को लेकर पहले भी कई दावे सामने आ चुके हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स ने रिपोर्ट किया था कि 28 फरवरी को अमेरिका-इजराइल के हमले के बाद मुजतबा एक गुप्त ठिकाने पर थे और डॉक्टरों की टीम उनका इलाज कर रही थी।
रिपोर्ट में दावा किया गया था कि उनके एक पैर की तीन बार सर्जरी हुई और एक हाथ का भी ऑपरेशन किया गया। चेहरे और होंठ पर चोट के कारण उन्हें बोलने में परेशानी होने की बात भी कही गई थी। हालांकि, ईरानी अधिकारियों ने इन दावों को खारिज किया था।
अमेरिका-इजराइल ने 28 फरवरी को पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के घर को निशाना बनाया था।
पिता की मौत के बाद बने सुप्रीम लीडर
अमेरिकी-इजराइली हमले में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद 56 साल के मुजतबा खामेनेई ईरान के नए सुप्रीम लीडर बने। वह लंबे समय से ईरान की सत्ता में पर्दे के पीछे प्रभावशाली माने जाते रहे हैं।
मुजतबा ने कभी चुनाव नहीं लड़ा और सरकार में कोई औपचारिक पद भी नहीं संभाला। इसके बावजूद उनके पिता के कार्यालय, IRGC और सुरक्षा तंत्र में मजबूत संपर्क माने जाते थे।
उन्होंने ईरान-इराक युद्ध के आखिरी दौर में IRGC में सेवा की थी। बाद में कोम में शिया धर्मशास्त्र और इस्लामी कानून की पढ़ाई की। 2009 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद हुए प्रदर्शनों के दौरान भी उनका नाम सत्ता के भीतर प्रभाव रखने वाले नेताओं में सामने आया था। अमेरिका ने 2019 में उन पर प्रतिबंध लगाया था।