कोरबा
‘‘सामुदायिक मध्यस्थता मुकदमा मुक्त ग्रामीण’’ भारत के सफल क्रियान्वयन हेतु प्रतिभागियों की प्रशिक्षण कार्यक्रम
कोरबा। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली एवं छत्तीसगढ़ राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देशानुसार एवं प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश/अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकरण कोरबा के मार्गदर्शन में ए0डी0आर0 भवन, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में ‘‘सामुदायिक मध्यस्थता मुकदमा मुक्त ग्रामीण भारत’’ के सफल क्रियान्वयन हेतु प्रतिभागियों की प्रशिक्षण कार्यक्रम 19 जुलाई से 23 जुलाई तक आयोजन किया जा रहा है। उक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ संतोष शर्मा, प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश कोरबा द्वारा किया गया। जिसमें न्यायाधीशगण लीलाधर सारथी, विशेष सत्र न्यायाधीश (एस.टी./एस.सी.) अधि0 कोरबा, श्रीमती श्रद्धा शुक्ला शर्मा, विशेष न्यायाधीश कटघोरा छ0ग0, श्रीमती मधु तिवारी, प्रथम जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश, कटघोरा, श्रीमती गरिमा शर्मा, प्रथम जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश, कोरबा, श्रीमती ममता भोजवानी, द्वितीय जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश कोरबा, सुनील कुमार नन्दे, तृतीय अपर जिला न्यायाधीश, अविनाश तिवारी श्रम न्यायाधीश कोरबा, सुश्री सीमा प्रताप चन्द्रा, जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एफ.टी.सी.), कोरबा, हेमंत कुमार रात्रे, तृतीय जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश कटघोरा, शीलु सिंह, द्वितीय जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश कटघोरा, कु0 मयूरा गुप्ता, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोरबा, सत्यानंद प्रसाद, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी कोरबा, लोकेश पटले, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी कटघोरा, कु. डॉली धु्रव, द्वितीय व्यवहार न्यायाधीश वरिष्ठ श्रेणी कोरबा, कु. रन्जु वैष्णव, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी कटघोरा, श्रीमती सोनी तिवारी प्रथम व्यवहार न्यायाधीश वरिष्ठ श्रेणी कोरबा, कु0 डिम्पल, सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण कोरबा, कु. कुमुदिनी गर्ग, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी कोरबा, हेमंत राज धुर्वे, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी करतला, कु. शोआ मंसुर, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी पाली, सागर चन्द्राकर, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी कटघोरा, श्रीमती प्रेरणा वर्मा, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी कटघोरा, कु0 तृप्ति राघव, न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय श्रेणी कोरबा, उच्च न्यायालय बिलासपुर से पोटेंशियल ट्रेनर्स श्रीमती हदीमा सिद्दकी वरिष्ठ अधिवक्ता व सुश्री आकांक्षा जैन अधिवक्ता, विशिष्ठ अतिथि के रूप में व जिला जांजगीर-चाम्पा व जिला कोरबा के ग्रामीण अंचल से प्रतिभागियों के रूप में समुदायिक मेडियेटर्स, लीगल एड डिफेंस कौंसिल कोरबा के कौंसिलगण व समस्त कर्मचारीगण उपस्थित रहे है, तथा पोटेंशियल ट्रेनर्स के द्वारा समस्त प्रतिभागियों/समुदायिक मेटियेटर्स को ‘‘सामुदायिक मध्यस्थता मुकदमा मुक्त ग्रामीण भारत’’ के संदर्भ में प्रथम दिवस में प्रशिक्षित किया गया है।
कोरबा
एविडेंस एक्ट की धारा 68- रजिस्टर्ड सेल डीड के लिए गवाहों के सर्टिफिकेशन (अटेस्टेशन) के सबूत की ज़रूरत नहीं : सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली/कोरबा। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (14 जुलाई) को फैसला सुनाया कि इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 68 का प्रोविज़ो (शर्त) रजिस्टर्ड सेल डीड पर लागू नहीं होता है, क्योंकि कानून के तहत सेल डीड के लिए गवाहों से सर्टिफिकेशन ज़रूरी नहीं है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने केरल हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द करते हुए यह बात कही, जिसमें सेल डीड ट्रांज़ैक्शन पर धारा 68 के प्रोविज़ो को गलत तरीके से लागू किया गया।
बेंच ने कहा,
“धारा 68 का प्रोविज़ो कहता है कि किसी भी डॉक्यूमेंट (वसीयत को छोड़कर) के निष्पादन (execution) के सबूत के तौर पर अटेस्टिंग गवाह को बुलाना ज़रूरी नहीं है, अगर उसे इंडियन रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 (1908 का 16) के प्रावधानों के अनुसार रजिस्टर किया गया हो; सिवाय तब जब उस व्यक्ति द्वारा इसके निष्पादन से खास तौर पर इनकार किया गया हो, जिसके द्वारा इसे निष्पादित किया गया माना जाता है। चूंकि कानून के तहत सेल डीड के लिए अटेस्टेशन ज़रूरी नहीं है, इसलिए इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 68 के प्रावधान इस पर लागू नहीं होते हैं।”
बेंच ने धारा 68 के प्रोविज़ो के सीमित दायरे को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह प्रावधान केवल उन डॉक्यूमेंट्स पर लागू होता है जिनके लिए अनिवार्य अटेस्टेशन की ज़रूरत होती है।
“‘किसी भी डॉक्यूमेंट का निष्पादन, वसीयत को छोड़कर’ का मतलब है, वे डॉक्यूमेंट्स जिनके लिए अनिवार्य अटेस्टेशन की ज़रूरत होती है, जैसे कि गिफ्ट डीड, मॉर्गेज डीड, सेटलमेंट डीड आदि; लेकिन ऐसे डॉक्यूमेंट्स के सबूत के तौर पर किसी अटेस्टिंग गवाह से पूछताछ करना ज़रूरी नहीं है, जब तक कि इसके निष्पादन से खास तौर पर इनकार न किया गया हो।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद केरल में प्रॉपर्टी के मालिकाना हक से जुड़े एक सिविल प्रॉपर्टी विवाद से संबंधित है, जिसका दावा एक रजिस्टर्ड सेल डीड के ज़रिए किया गया।
वादी ने विवादित प्रॉपर्टी पर पूर्ण मालिकाना हक और कब्ज़ा साबित करने के लिए मुकदमा दायर किया और मालिकाना हक के मुख्य सबूत के तौर पर रजिस्टर्ड सेल डीड पेश की।
इसके जवाब में, प्रतिवादी ने लिखित बयान दायर करके साफ तौर पर इनकार किया कि सेल डीड निष्पादित की गई और दावा किया कि यह धोखाधड़ी थी। हालांकि, उन्होंने डॉक्यूमेंट को कानूनी रूप से अमान्य करने के लिए कोई स्वतंत्र मुकदमा या औपचारिक काउंटर-क्लेम दायर नहीं किया। केरल हाईकोर्ट ने सेल डीड (बिक्री विलेख) पेश करने वाले के खिलाफ फैसला सुनाया, क्योंकि उन्होंने गवाही देने वाले किसी भी गवाह को कोर्ट में नहीं बुलाया। कोर्ट का तर्क था कि चूंकि लिखित बयान में डीड के निष्पादन (execution) से “साफ तौर पर इनकार” किया गया, इसलिए एविडेंस एक्ट की धारा 68 का प्रावधान लागू होता है, जिसके तहत डीड को साबित करने के लिए गवाह की गवाही अनिवार्य हो जाती है।
इसके बाद वादी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की और तर्क दिया कि सेल डीड के लिए कानूनी रूप से गवाही (Attestation) की आवश्यकता ही नहीं होती है, इसलिए हाई कोर्ट द्वारा धारा 68 को लागू करना बुनियादी रूप से गलत था।
फैसला
अपील स्वीकार करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 68 केवल उन दस्तावेजों पर लागू होती है, जिनके लिए कानूनन गवाही अनिवार्य है, जैसे कि वसीयत (इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 की धारा 63 के तहत), गिफ्ट डीड (ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 123 के तहत) और मॉर्गेज डीड (बंधक विलेख)। हालांकि, सेल डीड इस श्रेणी में नहीं आती है। ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 54 के तहत सेल डीड का रजिस्ट्रेशन तो जरूरी है, लेकिन इसकी गवाही अनिवार्य नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
“पहली नज़र में ऐसा लगता है कि हाईकोर्ट ने एविडेंस एक्ट की धारा 68 के प्रोविज़ो (शर्त) में दिए गए वाक्यांश ‘वसीयत के अलावा किसी भी दस्तावेज़ का निष्पादन (Execution)’ का गलत अर्थ निकाला। हाईकोर्ट ने ‘किसी भी दस्तावेज़ के निष्पादन’ का अर्थ निकालते हुए इसमें रजिस्टर्ड सेल डीड (बिक्री विलेख) को भी शामिल कर लिया। हमारी राय है कि हाईकोर्ट ने एविडेंस एक्ट की धारा 68 के प्रोविज़ो के असली मकसद को समझने में गलती की। ‘वसीयत के अलावा किसी भी दस्तावेज़ का निष्पादन’ का मतलब है वे दस्तावेज़ जिनके लिए गवाहों द्वारा तस्दीक (Attestation) अनिवार्य है, जैसे कि गिफ्ट डीड, मॉर्गेज डीड, सेटलमेंट डीड आदि; लेकिन ऐसे दस्तावेज़ों को साबित करने के लिए गवाहों से पूछताछ करना तब तक ज़रूरी नहीं है जब तक कि उनके निष्पादन से साफ़ तौर पर इनकार न किया गया हो। वसीयत के मामले में गवाहों में से किसी एक से पूछताछ करना ज़रूरी है, चाहे उसके निष्पादन से साफ़ तौर पर इनकार किया गया हो या नहीं। एविडेंस एक्ट की धारा 68 का प्रोविज़ो बस यही बात बताना या स्पष्ट करना चाहता है।”
कोर्ट ने कानूनी व्याख्या के उस अहम नियम को दोहराया कि प्रोविज़ो को उसी मुख्य प्रावधान के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए, जिसे वह सीमित या स्पष्ट करता है।
कोर्ट ने कहा,
“धारा 68 का प्रोविज़ो केवल उन दस्तावेज़ों के संबंध में अपवाद बनाता है, जिनकी कानूनन तस्दीक (attestation) अनिवार्य है। सेल डीड ऐसे दस्तावेज़ों की श्रेणी में नहीं आती है।”
चूंकि हाई कोर्ट ने CPC की धारा 100 के तहत कानून का अहम सवाल (Substantial Question of Law) तय न करके गंभीर गलती की, इसलिए कोर्ट ने मामले को वापस हाईकोर्ट भेज दिया ताकि कानून का अहम सवाल तय करने के बाद मामले की फिर से सुनवाई हो सके।
Cause Title: R. VERONICA & ANR. VERSUS RUDRAYANI DEVAKI(D) THROUGH LRS. S. SATHA KUMAR & ORS.
कोरबा
मोर गांव मोर पानी अभियान के तहत जिले में बनाई गई 336 आजीविका डबरियों से बढ़ेगा फसल उत्पादन
मत्स्य पालन से किसानों की बढ़ेगी आय
3.36 लाख घनमीटर वर्षा जल का हुआ संचयन, सिंचाई सुविधा हुई सुदृढ़
कोरबा। जिले की विभिन्न ग्राम पंचायतों में निर्मित 336 आजीविका डबरियां ग्रामीणों के लिए रोजगार के साथ-साथ कृषि और आजीविका संवर्धन का मजबूत आधार बन रही हैं। इन डबरियों में वर्षा जल के भराव से सिंचाई सुविधाओं का विस्तार हुआ है, जिससे खरीफ एवं रबी दोनों मौसम की फसलों के उत्पादन में वृद्धि होगी। इससे किसानों की आय बढ़ने के साथ उनकी आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ होगी।

उल्लेखनीय है कि जिले में निर्मित सभी आजीविका डबरियां पूर्ण होकर वर्षा जल से लबालब भर चुकी हैं। प्रत्येक डबरी में लगभग 1,000 घनमीटर जल संचयन क्षमता है। इस प्रकार जिले में कुल 3 लाख 36 हजार घनमीटर वर्षा जल का संचयन डबरियों में हुआ है, जिससे भू-जल संरक्षण को बढ़ावा मिलने के साथ किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध होगा।

आजीविका डबरियों के निर्माण से कृषि उत्पादन बढ़ने के साथ ही किसानों के लिए आय के नए अवसर भी मिले हैं। किसान इन डबरियों में मत्स्य पालन कर अतिरिक्त आय अर्जित करेंगे। वहीं डबरियों की मेड़ों पर दलहन एवं तिलहन फसलों की खेती कर कृषि उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा, जिससे ग्रामीण परिवारों की आजीविका और अधिक मजबूत होगी।

गांवों में बनाई गई आजीविका डबरियां जिले में जल संरक्षण, सिंचाई विस्तार, कृषि उत्पादन वृद्धि तथा किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक प्रभावी पहल साबित हो रही हैं।
कोरबा
भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज पांडे ने लक्की नंदा के निवास पहुंच जाना उनका हाल-चाल
कोरबा। कोरबा जिले में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ नेत्री सुश्री सरोज पांडे ने नगर निगम कोरबा के एल्डरमैन एवं भाजपा जिला कोरबा के जिला उपाध्यक्ष लक्की नंदा के निवास पहुंचकर उनका हाल-चाल जाना। इस दौरान उन्होंने आत्मीयता के साथ उनके स्वास्थ्य एवं पारिवारिक कुशलक्षेम की जानकारी लेते हुए उनसे सौहार्दपूर्ण चर्चा की।
सुश्री सरोज पांडे ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी केवल एक राजनीतिक संगठन नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के सम्मान और आत्मीयता की संस्कृति को जीवंत रखने वाला एक परिवार है। संगठन के प्रत्येक कार्यकर्ता का योगदान भाजपा की सबसे बड़ी पूंजी है और उनके सुख-दुख में सहभागी होना पार्टी की कार्यशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुश्री सरोज पांडे का नगर निगम कोरबा के एल्डरमैन एवं भाजपा जिला उपाध्यक्ष लक्की नंदा के घर पहुंचकर हाल-चाल जानना भाजपा की कार्यकर्ता-केंद्रित विचारधारा और संवेदनशील नेतृत्व का परिचायक माना जा रहा है। उनकी इस आत्मीय मुलाकात ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अपने कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के साथ निरंतर संवाद और आत्मीय संबंध बनाए रखता है।
इस अवसर पर लक्की नंदा एवं उनके परिवारजनों ने सरोज पांडे के इस स्नेहपूर्ण आगमन के लिए उनका हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर की वरिष्ठ नेत्री का उनके निवास पहुंचकर कुशलक्षेम जानना उनके लिए अत्यंत सम्मान और प्रेरणा का विषय है।
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