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छत्तीसगढ़

‘बिजली-बिल हाफ योजना बंद करना गरीबों पर सीधा हमला’:कल प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों में कांग्रेस करेगी प्रदर्शन, बिजली दफ्तर के बाहर पुतला-दहन करेंगे

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रायपुर,एजेंसी। बिजली बिल हाफ योजना में कटौती के खिलाफ कांग्रेस 7 अगस्त को प्रदेश भर के जिला मुख्यालयों में पुतला दहन कर आंदोलन करेगी। आंदोलन से पहले बुधवार को रायपुर के गांधी मैदान स्थित कांग्रेस भवन में शहर और ग्रामीण जिला कांग्रेस कमेटी ने एक संयुक्त पत्रकार वार्ता आयोजित कर भाजपा सरकार पर हमला बोला।

पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा ने कहा कि, कांग्रेस सरकार ने बिजली बिल हाफ योजना लागू कर 400 यूनिट तक छूट देकर 44 लाख से अधिक उपभोक्ताओं को राहत दी थी, लेकिन भाजपा ने यह योजना लगभग समाप्त कर दी है। भाजपा गरीबों के अधिकार छीन रही है। हम सड़क से लेकर सदन तक लड़ाई इसकी लड़ेंगे।

इस पत्रकार वार्ता में पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा, पूर्व राज्यसभा सांसद छाया वर्मा, पूर्व महापौर प्रमोद दुबे, शहर कांग्रेस अध्यक्ष गिरीश दुबे और ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष उधो राम वर्मा उपस्थित रहे।

मंगलवार को युवा कांग्रेस ने किया था CSPDCL दफ्तर का घेराव।

मंगलवार को युवा कांग्रेस ने किया था CSPDCL दफ्तर का घेराव।

महिलाओं पर बढ़ा बोझ, रसोई पर सीधा असर- छाया वर्मा

पूर्व राज्यसभा सांसद छाया वर्मा ने कहा कि, इस फैसले का सीधा असर महिलाओं पर पड़ा है, क्योंकि रसोई का खर्च तो बढ़ा ही है। अब बिजली बिल भी दोगुना हो गया है। भाजपा सरकार को गरीबों की कोई चिंता नहीं है। कांग्रेस जनता को अन्याय सहने नहीं देगी। सरकार यह फैसला वापस ले इसके लिए आंदोलन करेंगे।

स्मार्ट मीटर के नाम पर लूट- प्रमोद दुबे

पूर्व महापौर प्रमोद दुबे ने कहा कि, रायपुर जैसे शहरों में लोग बिजली बिल से परेशान हैं। पुराना मीटर हटाकर स्मार्ट मीटर के नाम पर लूट मची है। नए स्मार्ट मीटर तेजी से भागता है और ज्यादा बिल आ रहा है। दुबे ने कहा कि सरकार तत्काल बिजली बिल हाफ योजना बहाल करें।

गांव-शहर में बिजली संकट- गिरीश दुबे

शहर कांग्रेस अध्यक्ष गिरीश दुबे ने और ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष उधो राम वर्मा ने बताया कि, कांग्रेस सरकार के समय 24 घंटे बिजली मिलती थी, जबकि अब गांव और शहर दोनों ही बिजली संकट से जूझ रहे हैं । भाजपा सिर्फ उद्योगपतियों की हितैषी है। आम जनता उपेक्षित है खेती के लिए पंप चलाना मुश्किल हो गया है, भाजपा ने अंधेरगर्दी मचा दी है। कांग्रेस गांव-गांव जाकर आवाज उठाएगी।

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कोरबा

17 सितम्बर विश्वकर्मा जयंती पर मे.सर्वमंगला इंटरप्राईजेस का लोकार्पण

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जिले को वृहद स्तर पर उपलब्ध होगी गुणवत्तायुक्त फ्लाई ऐश ईंट
भव्य रूप से मनाई जाएगी भगवान श्री विश्वकर्मा जयंती
कोरबा। कोरबा जिले से 07 किलोमीटर दूर सर्वमंगला मंदिर-कनकी नहर मार्ग में स्थित ग्राम पंचायत कनबेरी में राखड़ की खपत बढ़ाने फ्लाई एश ब्रिक्स का निर्माण प्रारंभ किया जा रहा है। कनबेरी में फ्लाई एश ब्रिक्स निर्माण से जिले को बहुतायत स्तर पर राखड़ ईंट उपलब्ध हो सकेगी। 17 सितम्बर को भगवान विश्वकर्मा जयंती के दिन इसका लोकार्पण किया जाएगा। राखड़ ईंट का निर्माण मे. सर्वमंगला इंटरप्राईजेस नामक संस्था करेगी। सर्वमंगला इंटरप्राईजेस के डायरेक्टर ने बताया कि कोरबा जिले में बहुतायत रूप से राखड़ का उत्सर्जन होता है, इसकी खपत जरूरी है। राखड़ ईंट की मांग भी जिले में काफी है और हम इस दिशा में राखड़ ईंट का निर्माण प्रारंभ करने जा रहे हैं और 17 सितम्बर को भगवान विश्वकर्मा की भव्य जयंती मनाने के साथ भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना के साथ मे. सर्वमंगला इंटरप्राईजेस का भी लोकार्पण करेंगे।
ग्राम पंचायत कनबेरी पंचायत भवन के आगे स्थित मे. सर्वमंगला इंटरप्राईजेस का लोकार्पण दोपहर 12.00 बजे से भगवान श्री विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना के साथ किया जाएगा।
गुणवत्तापरक बनाई जाएगी राखड़ ईंट

मे. सर्वमंगला इंटरप्राईजेस के डायरेक्टर ने बताया कि हम गुणवत्तापरक राखड़ ईंट का निर्माण करेंगे और मांग के अनुसार कोरबा जिला सहित अन्य जिलों को राखड़ ईंट की आपूर्ति करेंगे। राखड़ ईंट के निर्माण से जहां पावर प्लांटों से उत्सर्जित राखड़ की खपत होगी, वहीं जिले को मांग के अनुसार राखड़ ईंट की आपूर्ति भी हो सकेगी।
कमलेश यादव और नमन पाण्डेय के आतिथ्य में होगा विश्वकर्मा पूजन एवं लोकार्पण
मे. सर्वमंगला इंटरप्राईजेस के डायरेक्टर ने बताया कि भगवान श्री विश्वकर्मा की जयंती भव्यता के साथ परिसर में मनाई जाएगी और मे. सर्वमंगला इंटरप्राईजेस का लोकार्पण किया जाएगा। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार कमलेश यादव एवं अतिविशिष्ट अतिथि माँ सर्वमंगला देवी मंदिर दुरपा के प्रबंधक एवं राजपुरोहित नमन पाण्डेय (नन्हा महराज) सहित अन्य अतिथिगण उपस्थित रहेंगे।

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कोरबा

सेवा संकल्प अभियान:पीएम-किसान सम्मान निधि से बदली छत्रपाल सिंह की जिंदगी

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समय पर मिली आर्थिक सहायता से खेती हुई आसान, परिवार की जिम्मेदारियां भी हुईं सहज
कोरबा 15 सितंबर 2026। विकासखंड पोड़ी-उपरोड़ा के ग्राम मादन निवासी किसान छत्रपाल सिंह, पिता नेवरात सिंह कंवर के लिए खेती सिर्फ आजीविका का साधन नहीं, बल्कि परिवार के बेहतर भविष्य की उम्मीद है। पत्नी और दो बच्चों की जिम्मेदारी के साथ वे सीमित संसाधनों में खेती करते रहे हैं। कृषि कार्य में बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई और मजदूरी जैसी जरूरतों पर समय से राशि जुटाना उनके लिए लंबे समय तक बड़ी चुनौती रहा।
किसान के लिए खेती ऐसा कार्य है, जिसमें खर्च पहले करना पड़ता है और आमदनी फसल तैयार होने के बाद मिलती है। कई बार पर्याप्त राशि उपलब्ध नहीं होने के कारण छत्रपाल सिंह उन्नत बीज या आवश्यक कृषि दवाइयां समय पर नहीं खरीद पाते थे। धान कटाई के समय मजदूरों के भुगतान की चिंता भी बनी रहती थी। आर्थिक तंगी के कारण उन्हें कई बार उधार लेकर खेती का काम पूरा करना पड़ता था।

वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से जुड़ने के बाद उनके जीवन में धीरे-धीरे सकारात्मक बदलाव आने लगा। योजना के तहत मिलने वाली प्रति वर्ष 6 हजार रुपये की सहायता राशि तीन समान किस्तों में सीधे बैंक खाते में मिलने लगी। छत्रपाल सिंह बताते हैं कि राशि भले ही बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन खेती के समय जरूरत के मुताबिक सीधे खाते में मिलने वाली यह सहायता उनके लिए बेहद उपयोगी साबित हुई।
वे बताते हैं कि पीएम-किसान सम्मान निधि से मिलने वाली राशि का उपयोग वे खेती की जरूरतों को पूरा करने में करते हैं। खरीफ मौसम में उन्नत बीज खरीदने, फसल में कीट एवं रोग लगने पर समय पर दवाइयां लेने तथा धान कटाई के दौरान मजदूरों का भुगतान करने में इस राशि से उन्हें काफी मदद मिलती है। इससे खेती के जरूरी काम समय पर पूरे हो पाते हैं और उत्पादन एवं फसल की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है।
कृषि कार्य में मिली इस आर्थिक राहत का असर परिवार की अन्य जरूरतों पर भी दिखाई देता है। अब वे बच्चों की पढ़ाई के लिए समय पर कॉपी-किताबें, कपड़े और आवश्यक शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध करा पा रहे हैं। आर्थिक दबाव कम होने से परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी पहले की तुलना में आसान हुआ है।
छत्रपाल सिंह कहते हैं कि “पहले खेती के समय पैसों की बहुत समस्या होती थी। बीज, दवाई और मजदूरी के लिए कई बार उधार लेना पड़ता था। पीएम-किसान की राशि समय पर खाते में आने से अब खेती के जरूरी खर्चों में काफी मदद मिलती है। इससे आत्मविश्वास बढ़ा है और खेती करना पहले से आसान हुआ है।”
वे आगे कहते हैं कि सरकार द्वारा सहायता राशि सीधे बैंक खाते में पहुंचने से उन्हें यह भरोसा मिला है कि सरकार किसानों के साथ खड़ी है। पीएम-किसान सम्मान निधि उनके लिए केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि खेती को मजबूती देने और परिवार के भविष्य को बेहतर बनाने का माध्यम बनी है।
 समय पर मिलने वाली छोटी-सी आर्थिक सहायता भी किसान के लिए बड़ी राहत बन सकती है। पीएम-किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं से किसानों को कृषि कार्य में आवश्यक पूंजी उपलब्ध हो रही है, जिससे वे अपनी खेती को बेहतर तरीके से संचालित करने के साथ परिवार की जिम्मेदारियों को भी अधिक सहजता से पूरा कर पा रहे हैं।

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छत्तीसगढ़

झीरम केस में 10 दोषियों को कल सुनाई जाएगी सजा:कई सवाल आज भी अनसुलझे, भूपेश ने कहा था- मेरे जेब में साजिश के सबूत

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रायपुर, एजेंसी। 13 साल बाद झीरम घाटी केस में 10 आरोपी दोषी ठहराए गए हैं। अब 16 सितंबर को जगदलपुर की NIA स्पेशल कोर्ट सजा सुनाएगी। लेकिन अदालत के इस फैसले के बाद भी झीरम की सबसे बड़ी पहेली जस की तस है। क्या कांग्रेस की टॉप लीडरशिप पर हुए हमले के पीछे सिर्फ यही 10 लोग थे?

25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर झीरम घाटी में माओवादी हमला हुआ था। इसमें तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की हत्या हुई थी। कुल 29 लोगों ने जान गंवाई थी।

करीब 13 साल चली सुनवाई में 101 गवाहों के बयान और दस्तावेज दर्ज किए गए। पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने आरोप लगाया कि एनआईए ने लीपापोती का काम किया। एसआईटी की जांच में षड्यंत्रों का पर्दाफाश होता। भाजपा इस मामले की तह तक ही नहीं जाना चाहती। भाजपा षड्यंत्रकारियों को बचाने का काम कर रही है।

पीसीसी चीफ दीपक बैज ने कहा था कि जिन 10 लोगों को आरोपी बनाया गया, वे बड़े नक्सली नहीं थे। हमले की प्लानिंग करने वाले बड़े नक्सली लीडरों पर कार्रवाई नहीं हुई। पीड़ितों के साथ न्याय नहीं हुआ है। ऐसे कई सवालों के जवाब आज भी अधूरे हैं।

भूपेश बघेल ने कहा था – मेरी जेब में साजिश के सबूत

झीरम को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल लंबे समय से इसे सिर्फ नक्सली हमला नहीं, बल्कि बड़ी साजिश बताते रहे हैं। वे यह भी कहते रहे हैं कि झीरम की साजिश के सबूत उनकी जेब में हैं। सीनियर जर्नलिस्ट सुनील कुमार इसी सवाल को सबसे अहम मानते हैं।

उनका कहना है कि भूपेश बघेल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं, प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं और मुख्यमंत्री भी रहे हैं। जिस पार्टी ने झीरम में अपनी पूरी टॉप लीडरशिप का बड़ा हिस्सा खो दिया, उस पार्टी के एक जिम्मेदार नेता के तौर पर अगर उनके पास साजिश के सबूत हैं तो उन्हें सामने रखना चाहिए।

क्या 10 लोवर कैडर ही पूरी साजिश के जिम्मेदार थे?

झीरम का हमला कोई सामान्य नक्सली वारदात नहीं थी। निशाना कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा थी और हमले में प्रदेश कांग्रेस की शीर्ष राजनीतिक लीडरशिप खत्म हो गई। ऐसे में दूसरा बड़ा सवाल है कि क्या इतने बड़े हमले की पूरी योजना सिर्फ उन 10 लोगों तक सीमित थी, जिन्हें कोर्ट ने दोषी ठहराया है?

सीनियर जर्नलिस्ट सुदीप ठाकुर का कहना है कि पहली नजर में जिन 10 लोगों को दोषी ठहराया गया है, वे नक्सली संगठन के लोअर कैडर के लोग दिखाई देते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इतने बड़े राजनीतिक हमले की प्लानिंग और उसे अंजाम देने के पीछे इससे बड़ा नेटवर्क था या नहीं?

मास्टर प्लान किस स्तर पर बना था? किसने टारगेट तय किया?

अगर हमला इतना बड़ा था तो स्वाभाविक सवाल है कि इसका मास्टर प्लान किस स्तर पर बना था? किसने टारगेट तय किया? काफिले की जानकारी कैसे मिली? इतने बड़े नेताओं की मौजूदगी की सूचना नक्सलियों तक कैसे पहुंची? हमले की पूरी तैयारी किस स्तर पर हुई?

NIA ने मामले में प्रतिबंधित CPI (माओवादी) के अलग-अलग कैडर और सैन्य इकाइयों की भूमिका की जांच की थी। लेकिन मौजूदा फैसला ट्रायल में शामिल 10 आरोपियों की दोषसिद्धि तक पहुंचा है। यहीं से सवाल उठता है कि क्या हमले के पीछे मौजूद पूरे नेटवर्क की तस्वीर सामने आई है?

इंटेलिजेंस सिस्टम कहां फेल हुआ?

वरिष्ठ पत्रकार सुदीप ठाकुर के मुताबिक झीरम मामले में सिर्फ नक्सलियों की भूमिका देखना पर्याप्त नहीं है। एक बड़ा सवाल इंटेलिजेंस फेलियर और सिस्टम की जिम्मेदारी का भी है।

इतना बड़ा राजनीतिक काफिला बस्तर के बेहद संवेदनशील इलाके से गुजर रहा था। नक्सलियों ने इतनी बड़ी संख्या में हमला किया। ऐसे में सवाल है कि सुरक्षा व्यवस्था में कहां चूक हुई? क्या पहले से कोई इनपुट था? अगर था तो उस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? अगर इनपुट नहीं था तो इंटेलिजेंस सिस्टम कहां फेल हुआ? जो फैसला आया है उससे यह कही भी जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय नहीं हई है?

सुदीप ठाकुर का कहना है कि मौजूदा फैसला सिस्टम के लैप्स और उसकी जिम्मेदारी की तस्वीर साफ नहीं करता है।

बड़े नक्सली नेताओं से नहीं हुई पूछताछ

झीरम में मारे गए महेंद्र कर्मा के परिवार की ओर से भी जांच को लेकर सवाल उठते रहे हैं। सीनियर जर्नलिस्ट सुदीप ठाकुर के कहा कि महेंद्र कर्मा की बेटी ने भी सवाल उठाया है कि घटना के सबसे पहले वे घटनास्थल पर पहुंची थी। लेकिन NIA ने उनसे भी पूछताछ नहीं की है। इसके साथ ही कई ऐसे लोगों को और गवाह थे जिनसे जांच के दौरान NIA ने पूछताछ के लिए कभी बुलाया ही नहींं।

4,184 पेज की जांच आयोग की रिपोर्ट, अब तक सार्वजनिक नहीं

झीरम की कहानी में सबसे दिलचस्प और अब तक अनसुलझे अध्यायों में से एक है न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट। 2013 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाया था। आयोग ने कई साल तक सुनवाई की। 2021 में करीब 4,184 पेज की रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी गई।

लेकिन रिपोर्ट पेश होने के बाद नया विवाद शुरू हो गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि रिपोर्ट अधूरी है, इसलिए इसे सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।

इसके बाद आयोग को नए अध्यक्ष और सदस्य के साथ आगे बढ़ाने का फैसला लिया गया। जस्टिस सतीश के. अग्निहोत्री को नया अध्यक्ष और जस्टिस जी. मिन्हाजुद्दीन को सदस्य बनाया गया। जांच के दायरे में नए बिंदु भी जोड़े गए। लेकिन इसके खिलाफ मामला हाईकोर्ट पहुंच गया।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2022 में पुनर्गठित जांच आयोग के कामकाज पर आगामी आदेश तक रोक लगा दी। यानी झीरम की एक जांच NIA के स्तर पर चली, दूसरी न्यायिक आयोग के स्तर पर। दोनों के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी चलते रहे। लेकिन आम लोगों के सामने पूरी तस्वीर अब भी साफ नहीं है।

10 को सजा की तैयारी, लेकिन 33 अब भी फरार

कोर्ट ने प्रमिला मोडियम, चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना, सुमित्रा पुनेम, मोडियम मुक्का, मंडवी कोसा कवासी उर्फ कोसाराम, आयाता मरकाम, मड़ाकामी देवा, जोगा मड़ाकामी, बंजामी सन्ना उर्फ चामरू उर्फ डेंगा और महादेव नाग को दोषी माना है।

मामले में नामजद कई अन्य आरोपी अब भी फरार हैं। करीब 33 आरोपी अदालत की पकड़ से बाहर बताए जा रहे हैं। इनमें कुछ ऐसे आरोपी भी हैं, जिन्होंने बाद में छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलंगाना में सरेंडर कर दिया।

जांच रिकॉर्ड के मुताबिक, थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी घटना के समय माओवादी संगठन की क्षेत्रीय कमान (SRUC) में सीनियर कमांडर था। वहीं, बारसे सुक्का उर्फ देवा दरभा डिवीजन कमेटी का सचिव रहा और बाद में बटालियन-1 का कमांडर बना। जांच में दोनों की भूमिका झीरम हमले से जुड़ी बताई गई है।

NIA ने 23 दिसंबर 2023 को जारी वांटेड इश्तहार में देवजी और देवा समेत 19 नक्सलियों की जानकारी सार्वजनिक की थी। इसमें देवजी का नाम और फोटो भी शामिल था। देवजी ने 24 फरवरी 2026 को तेलंगाना में सरेंडर किया, जबकि देवा ने 2 जनवरी 2026 को तेलंगाना में सरेंडर किया। सरेंडर के बाद थिप्पिरी तिरुपति देवजी ने मई में इंटरमीडिएट सेकंड ईयर की तेलुगु परीक्षा भी दी थी। आरोप है कि इस मामले में पुलिस ने अब तक उससे पूछताछ नहीं की है।

मई 2026 में देवजी ने 12वीं की परीक्षा दी थी।

मई 2026 में देवजी ने 12वीं की परीक्षा दी थी।

इस मामले में कट्कम सुदर्शन को भी आरोपी बनाया गया था, लेकिन 2023 में उसकी मौत हो गई। वहीं, सबसे बड़ा वांछित आरोपी मुपल्ला लक्ष्मणा राव उर्फ गणपति अब तक पकड़ से बाहर है। घटना के समय वह CPI (माओवादी) का महासचिव था।

25 मई 2013 को हुआ क्या था?

13 साल पहले बस्तर में कांग्रेस अपनी परिवर्तन यात्रा निकाल रही थी। 25 मई 2013 की शाम यह यात्रा सुकमा की ओर से लौट रही थी। काफिला जब दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी से गुजर रहा था, तभी माओवादियों ने घात लगाकर हमला कर दिया।

हमले की शुरुआत IED विस्फोट से हुई। इसके बाद सड़क पर पेड़ गिराकर रास्ता बंद किया गया और जंगल से काफिले पर गोलियां बरसाई गई। कुछ ही देर में पूरा इलाका गोलियों की आवाज से गूंज उठा। नक्सलियों ने नेताओं और सुरक्षाकर्मियों को अलग-अलग किया।

माओवादियों का खास निशाना महेंद्र कर्मा थे। नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और कई अन्य लोगों की भी हत्या कर दी गई। एक ही हमले में कांग्रेस की उस समय की प्रदेश की शीर्ष नेतृत्व पंक्ति लगभग खत्म हो गई थी। झीरम हमला अचानक लिया गया फैसला नहीं था। इसके लिए कई सप्ताह पहले से तैयारी चल रही थी।

2013 में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा रैली के दौरान नक्सलियों ने जंगल में हमला किया था।

2013 में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा रैली के दौरान नक्सलियों ने जंगल में हमला किया था।

मिनपा से दरभा कैसे बदला टारगेट

माओवादियों की शुरुआती योजना सुकमा के मिनपा क्षेत्र में सुरक्षा बलों की चौकी पर हमला करने की थी। फरवरी 2013 में बीजापुर के पिडिया गांव में हुई बैठक में रणनीति बदली गई। बैठक में फैसला हुआ कि हमला मिनपा के बजाय दरभा क्षेत्र में किया जाएगा। यह निर्णय वरिष्ठ माओवादी कमांडर देवजी की मौजूदगी में लिया गया था।

इसके बाद अलग-अलग हथियारबंद टीमों को दरभा की ओर भेजा गया। इनमें मिलिट्री कंपनी नंबर-2, प्लाटून 24 और 26, दरभा डिविजन कमेटी और CRC-2 के सदस्य शामिल थे।

25 बोरी चावल से लेकर जंगल में कैंप तक

हमले के लिए केवल हथियार ही नहीं जुटाए गए थे। NIA की जांच में सामने आया कि आसपास के गांवों से रसद और खाना जुटाया गया। करीब 25 बोरी चावल अलग-अलग जगहों से जुटाया गया था। प्रत्येक बोरी करीब 50 किलो की थी।

माओवादी कैडरों के लिए जंगल में अस्थायी कैंप भी तैयार किया गया। यानी हमले के लिए हथियार, लड़ाके, राशन, रास्ते की जानकारी और वापसी की योजना सब पहले से तैयार की जा रही थी। इसके लिए अलग-अलग टीमों को जिम्मेदारी दी गई थी।

असॉल्ट ग्रुप – सीधे हमला करने के लिए

स्टॉप ग्रुप – काफिले का रास्ता रोकने के लिए

सिग्नल ग्रुप – हमले के संकेत के लिए

ब्लास्ट स्क्वॉड – IED विस्फोट के लिए

जान गंवाने वाले कांग्रेस नेताओं के नाम

नंदकुमार पटेल (तत्कालीन कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष) महेंद्र कर्मा (पूर्व नेता प्रतिपक्ष), विद्याचरण शुक्ल (पूर्व केंद्रीय मंत्री), दिनेश पटेल, उदय मुदलियार, भागीरथी पालिया, राजकुमार, गोपीचंद माधवानी, अल्लानूर, योगेंद्र शर्मा, राजेश चंद्राकर, मनोज जोशी, अभिषेक गोलचा, गनपथ नाग, सदा सिंह, चंद्रहास ध्रुव, दीपक उपाध्याय, तरुण देशमुख, प्रहलाद, चंदर राम मांझी, पैतृक खलखो, पवन कोंद्रा, सियाराम सिंह, पुलिसकर्मी- प्रधान आरक्षक प्रफुल्ल शुक्ला, अशोक कुमार, राहुल प्रताप सिंह और इमैनुअल केरकेट्टा।

हमला खत्म करने के बाद हथियार भी लूटकर ले गए

नक्सलियों ने काफिले की गाड़ियों और मारे गए सुरक्षाकर्मियों के हथियारों को भी अपने कब्जे में लिया था। 25 सितंबर 2014 को NIA की चार्जशीट के मुताबिक हमले के बाद एक 9 एमएम पिस्टल के साथ 2 मैगजीन और 20 कारतूस, दो AK-47 राइफलें, 14 मैगजीन और 455 कारतूस और 10 हैंड ग्रेनेड और वॉकी टॉकी और अन्य डिवाइस लूटे थे।

इसके साथ ही घटनास्थल से मिले विस्फोटकों की फोरेंसिक जांच में अमोनियम नाइट्रेट, PETN और अमाटोल जैसे पदार्थों का इस्तेमाल सामने आया था।

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