नई दिल्ली,एजेंसी। अमेरिका-इजराइल की ईरान से जंग की वजह से देशभर में LPG की किल्लत हो गई है। गैस एजेंसियों के बाहर लम्बी लाइनें हैं। सिलेंडर की कालाबाजारी भी हो रही है।
बिहार के कई शहरों में 1000 रुपए वाले घरेलू सिलेंडर के लिए 1800 रुपए तक वसूले जा रहे हैं। वहीं मध्य प्रदेश में 1900 का कॉमर्शियल सिलेंडर 4000 में बिक रहा है।
उधर, कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की सप्लाई पर रोक से होटलों और रेस्टोरेंट्स ने इंडक्शन पर खाना बनाना शुरू कर दिया है। इससे बाजार में इंडक्शन की डिमांड भी बढ़ गई है।
जयपुर के जयंती बाजार, एसोसिएशन के अध्यक्ष सचिन गुप्ता ने बताया कि जयपुर में महीने के 2500 से 3000 इंडक्शन बिकते थे। इनकी डिमांड अब 50% तक बढ गई है।
गैस की कमी के कारण बेंगलुरु के राजराजेश्वरी नगर स्थित नम्माओरु कॉफी कट्टा होटल में चूल्हा जलाकर इडली पकाते हुए कर्मचारी।
गांवों में अब 45 दिन में सिलेंडर बुक कर सकेंगे
ग्रामीण इलाकों के लिए सिलेंडर बुकिंग का नियम बदल दिया है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने ससंद में बताया कि अब ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को एक सिलेंडर लेने के बाद अगला सिलेंडर 45 दिन बाद ही मिलेगा। यानी दो सिलेंडरों के बीच अब कम से कम 45 दिन का अंतर रखना जरूरी होगा।
मध्य प्रदेश: ब्लैक में कॉर्मिशयल सिलेंडर 4000 में बिक रहा
अभी मध्य प्रदेश में कॉमर्शियल सिलेंडर की कीमत 1,910 रुपए है, लेकिन भोपाल के बरखेड़ा पठानी में गैस एजेंसी पर खुलेआम इसे 4 हजार में बेचा जा रहा है। सरकार ने कालाबाजारी रोकने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम को लागू किया है लेकिन कालाबाजारियों पर इसका असर नहीं पड़ा है।
बिहार: ब्लैक में 1800 रुपए में मिल रहा घरेलू गैस सिलेंडर
गैस सिलेंडर की किल्लत होने से 900 रुपए का घरेलू गैस सिलेंडर ब्लैक में 1700 से 1800 रुपए तक बेचा जा रहा है। कॉमर्शियल गैस सिलेंडर जिसकी सामान्य कीमत 2100 रुपए है, ब्लैक में इसके 5000 रुपए तक वसूले जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश: ब्लैक में 1600 रुपए देने पर तुरंत मिल रहा सिलेंडर
लखनऊ में दिन-दिनभर लाइन में खड़े रहने पर भी लोगों को सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है। लोगों का दावा है कि इन सबके बावजूद 950 रुपए वाला सिलेंडर 1600 रुपए देने पर तुरंत मिल रहा है। कॉमर्शियल सिलेंडर भी 3500 रुपए में आसानी से उपलब्ध है।
पंजाब: लोग सिलेंडर लेकर लाइनों में खड़े, फिर भी गैस नहीं मिल रही
पंजाब में कॉमर्शियल सिलेंडर मिलने बंद हो गए हैं, जबकि घरेलू सिलेंडरों के लिए भी बुकिंग में समस्या आ रही है। जंग से पहले जहां घरेलू सिलेंडर घरों में डिलीवर होता था, अब हालात ये हैं कि लोग एजेंसियों के सामने सिलेंडर लेकर लाइनों में खड़े हैं। फिर भी उन्हें गैस नहीं मिल रही।
जालंधर में लोग कॉमर्शियल सिलेंडर को ब्लैक में खरीदने को मजबूर हैं। यहां जो सिलेंडर पहले 1900 रुपए में मिलता था, वह अब 3500 रुपए का मिल रहा है। जबकि, सभी जिलों के प्रशासनिक अधिकारी बता रहे हैं कि LPG की कोई समस्या नहीं है। उनके पास गैस का भरपूर भंडारण है।
लुधियाना में सिलेंडर लेने के लिए लगी लोगों की भीड़।
राजस्थान: रेस्टोरेंट बंद कर कर्मचारियों को घर भेजा जा रहा
होटल-रेस्टोरेंट में गैस का स्टॉक खत्म होने से बिजनेस ठप होने लगे हैं। चित्तौड़गढ़ में रेस्टोरेंट बंद कर कर्मचारियों को घर भेज दिया है। सवाई माधोपुर में भी रेस्टोरेंट बंद होने लगे हैं।
जैसलमेर के सम में 150 रिसॉर्ट को बंद करने की तैयारी है। जयपुर में चाय की थड़ी, मिठाई की दुकानों और ढाबों पर कॉमर्शियल की जगह घरेलू सिलेंडर का उपयोग करने लगे हैं।
कोटा में गैस सिलेंडर की कमी के चलते लकड़ी और कोयले की भट्ठी की मांग बढ़ गई है। मेस और हॉस्टलों के लिए 35 से 40 किलो वजन की भट्टियां बनाई जा रही हैं।
उत्तराखंड: होटल-ढाबों के मेन्यू से 70% फूड आइटम गायब
देहरादून और हल्द्वानी में व्यावसायिक गैस सिलेंडर की आपूर्ति प्रभावित होने से होटल, रेस्टोरेंट, ढाबा और ठेला संचालकों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। सिलेंडर की कमी के कारण कई प्रतिष्ठानों ने अपने मेन्यू से करीब 70% फूड आइटम हटा दिए हैं, जबकि कई लोग वैकल्पिक इंतजाम में जुट गए हैं।
देहरादून के रेस कोर्स इलाके में गैस एजेंसी पर सिलेंडर बुकिंग करने वालों की भीड़ लग रही है।
वहीं तेल कंपनियों ने ग्रामीण इलाकों में घरेलू गैस सिलेंडर की बुकिंग का टाइम 45 दिन का कर दिया है। यानी जिस दिन सिलेंडर डिलीवर होगा, उसके 45 दिन बाद दूसरी बुकिंग की जाएगी। हालांकि शहरी क्षेत्र में अब भी 25 दिन की बुकिंग का प्रावधान है।
जयपुर, अलवर, कोटा, भरतपुर, जोधपुर सहित कई जिलों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी-लंबी लाइन लगी हुई हैं। गैस की कालाबाजारी रोकने के लिए सरकार ने फूड डिपार्टमेंट के अधिकारी-कर्मचारियों की छुटि्टयां कैंसिल कर दी हैं।
हरियाणा: LPG स्टॉक घटा, OTP नहीं आ रहा
घरेलू सिलेंडरों की डिलीवरी पहले जो 1-2 दिन में हो जाती थी, अब एक हफ्ते तक इंतजार करना पड़ रहा है। हिसार, सोनीपत, फतेहाबाद, हांसी, पानीपत, कैथल, रेवाड़ी और फरीदाबाद में गैस एजेंसियों के बाहर लोगों की लंबी कतारें लगी हैं।
तिरुपति मंदिर में गैस की सप्लाई जारी
तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) ने बताया कि मंदिर के ‘लड्डू’ और अन्नदानम किचन में कुकिंग गैस की सप्लाई में कोई रुकावट नहीं आई है। तिरुमाला में हर दिन औसतन करीब 4 लाख लड्डू तैयार किए जाते हैं। त्योहारों के दौरान यह संख्या बढ़कर 10 लाख तक पहुंच जाती है।
अधिकारी ने बताया कि लड्डू बनाने और अन्नदानम यूनिट्स को मिलाकर रोजाना 10 टन से ज्यादा कुकिंग गैस की जरूरत पड़ती है। लड्डू बनाने और मुख्य अन्नदानम केंद्र के लिए TTD पाइप्ड गैस (PNG), जबकि बाकी अन्नदानम यूनिट्स में सिलेंडर इस्तेमाल किए जाते हैं।
फूड डिलीवरी के ऑर्डर 50 से 60% तक कम हुए
गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन’ ने कहा कि LPG की किल्लत के कारण जोमैटो और स्विगी जैसे प्लेटफॉर्म्स पर फूड डिलीवरी के ऑर्डर 50 से 60% तक कम हो गए हैं। इससे डिलीवरी पार्टनर्स और इस सेक्टर से जुड़े दूसरे वर्कर्स की कमाई पर संकट खड़ा हो गया है।
यूनियन ने केंद्रीय श्रम मंत्री को पत्र लिखकर तुरंत दखल देने की मांग की है। यूनियन की मांग है कि जोमैटो, स्विगी और दूसरे प्लेटफॉर्म्स प्रभावित होने वाले हर वर्कर को तुरंत 10,000 रुपए की राहत राशि दें। वर्कर्स की ID बंद करने पर 3 महीने की रोक लगे और उन्हें रोजाना कम से कम इंसेंटिव दिया जाए।
सरकार ने तैयारियों का लेखा-जोखा पेश किया
पेट्रोलियम, विदेश, शिपिंग और सूचना-प्रसारण मंत्रालय की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ किया गया कि देश में ईंधन का पर्याप्त स्टॉक है, लेकिन सप्लाई चैन पर युद्ध का साया मंडरा रहा है।
घरेलू एलपीजी उत्पादन जो कल तक 25% बढ़ा था, अब 28% तक बढ़ गया है। वहीं देश भर में लगभग 1 लाख पेट्रोल पंप चालू हैं। कहीं भी स्टॉक खत्म होने की खबर नहीं है।
रेस्टोरेंट्स और होटलों को एक महीने के लिए बायोमास, केरोसिन या कोयले के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है ताकि एलपीजी का इस्तेमाल केवल जरूरी सेक्टर के लिए हो सके।
शहरी इलाकों में लोग 25 दिन से पहले दूसरा सिलेंडर बुक नहीं कर पाएंगे। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि स्टॉक की जमाखोरी न हो और सबको जरूरत के हिसाब से गैस मिल सके।
सूचना और प्रसारण मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, शिपिंग मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों ने गुरुवार को दिल्ली में जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस की।
सरकार रोजाना 50 लाख सिलेंडर बांट रही
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा, “हम अपनी जरूरत की लगभग 60% LPG बाहर से मंगवाते हैं और इसका करीब 90% हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से आता है। स्थिति थोड़ी मुश्किल है, लेकिन सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है।”
उन्होंने कहा, “हम हर दिन लगभग 50 लाख सिलेंडर डिलीवर करते हैं। डिस्ट्रीब्यूशन के स्तर पर फिलहाल कहीं भी किल्लत की कोई खबर नहीं है। लेकिन घबराहट की वजह से बुकिंग कई गुना बढ़ गई है। राज्य सरकारों से लाभार्थियों की लिस्ट तैयार करने को कहा है ताकि सिलेंडर की डिलीवरी प्राथमिकता के आधार पर की जा सके।”
सरकार ने अब तक 5 जरूरी कदम उठाए
1. हाई-लेवल कमेटी बनाई: संकट को देखते हुए पेट्रोलियम मंत्रालय ने तीन तेल कंपनियों के कार्यकारी निदेशकों की एक हाई-लेवल कमेटी बनाई है, जो सप्लाई की समीक्षा करेगी।
2. एसेंशियल कमोडिटी एक्ट लागू: गैस की सप्लाई को कंट्रोल करने के लिए केंद्र सरकार ने देशभर में ‘एसेंशियल कमोडिटी एक्ट 1955’ लागू कर दिया है।
3. 25 दिन बाद होगी LPG बुकिंग: घरेलू सिलेंडर की बुकिंग के नियमों में बदलाव किया है। उपभोक्ता एक सिलेंडर डिलीवर होने के बाद दूसरा सिलेंडर 25 दिन बाद ही बुक कर सकेंगे।
4. OTP और बायोमेट्रिक अनिवार्य: गैस की जमाखोरी रोकने के लिए डिलीवरी एजेंट OTP या बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन का सख्ती से इस्तेमाल कर रहे हैं।
5. LPG उत्पादन बढ़ाने का आदेश: सरकार ने सभी ऑयल रिफाइनरीज को LPG उत्पादन बढ़ाने का आदेश दिया था। अब उत्पादन 28% बढ़ गया है।
नई दिल्ली, एजेंसी। पीएम मोदी 13 साल बाद शनिवार को दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) पहुंचे। वे मेट्रो का सफर करके कॉलेज पहुंचे। इस दौरान उन्होंने मेट्रो में बैठे बच्चों और लोगों से भी बातचीत की।
कॉलेज के 100 साल पूरे होने पर शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है। इसी दौरान पीएम जेन-Z को संबोधित कर रहे हैं।
उन्होंने कहा- यहां के एलुमिनाई OG हैं, यानी ओरिजनल गैंगस्टर हैं। यहां के एलुमिनाई स्टूडेंट्स ने हर क्षेत्र में धूम मचाई है। वे धुरंधर भले न हों, पर धूम तो मचाई है।
समारोह की शुरुआत में पीएम ने 100 रुपए का सिक्का जारी किया। इसी साल अप्रैल में वे डाक टिकट भी जारी कर चुके हैं।
पीएम इससे पहले 2013 में श्रीराम कॉलेज का दौरा कर चुके हैं। उस समय वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे।
पीएम मोदी 2013 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के समारोह में शामिल हो चुके हैं।
मोदी ने 13 साल पहले दी स्पीच की खास बातें दोहराईं
संबोधन के दौरान पीएम ने 2013 में दी गई अपनी स्पीच की खास बातें दोहराईं। उन्होंने कहा- “उस समय आप सब स्कूल में रहे होंगे। पर आज इंटरनेट पर जाकर उस समय की खबरें पढ़ेंगे तब आपको पता चलेगा उस समय देश में क्या हालत थी। मैं चाहूंगा कि आप इंटरनेट पर पढ़ें। मैं उस वक्त की हेडलाइन की कुछ झलक दिखाना चाहता हूं। LOC पर भारतीय सैनिकों की हत्या। वर्ल्ड बैंक ने GDP का नंबर घटाया। महंगाई दर 10% के करीब। हेलिकॉप्टर में घूसखोरी और हैदराबाद में ब्लास्ट ये उस समय की हेडलाइंस थीं।”
मोदी बोले- देश के लिए जीने का जज्बा मेरे अंदर भावविष्ट
स्पीच के दौरान पीएम ने कहा- “देश के लिए जी जान से जुटना। देश के लिए जीने का जज्बा, जो मेरे अंदर भावविष्ट है। वो 2013 में यहीं से शब्दों की माला में गढ़ता गया। मैं काफी देर बोला था। मैंने उस दिन पानी के ग्लास का एक उदाहरण दिया था। मैंने कहा था कि पानी के आधे भरे ग्लास को देखने के तीन नजरिए क्या होते हैं। एक जिनको ग्लास आधा खाली दिखता है। दूसरा जिन्हें ग्लास आधा भरा दिखता है। और तीसरा जिन्हें ग्लास पूरा भरा दिखता है। आधा हवा से आधा पानी से।”
पीएम बोले- कुछ दिन इस आयोजन की खूब चर्चा है
पीएम मोदी ने कहा- “कुछ दिनों से इस कार्यक्रम की खूब चर्चा है। लोग मेरे 2013 के संबोधन को याद कर रहे हैं। नई पीढ़ी के लोगों ने भी उसे रिविजिट किया है। आज भी 13-14 साल बाद भी उस सभा और संबोधन का प्रभाव बरकरार है। साथियों तब आपकी जगह आपके सीनियर थे। मैं तब सीएम तो था पर मैं विपक्षी पार्टी में था। लोग उम्मीद कर रहे थे कि मैं उस वक्त तब की केंद्र सरकार पर आरोपों की झड़ी लगा दूंगा। पर मैंने इस मंच का वो उपयोग नहीं किया। मैंने एक विजन रखा था। मैंने तब जो कहा था वो मेरा कनविक्शन था।”
पीएम बोले- यहां के एलुमिनाई जेन जी की भाषा में OG और धुरंधर
इस कॉलेज की यात्रा दरियागंज के एक छोटे से स्थान से शुरू हुई थी। और वही छोटा कॉलेज एक विशाल वृक्ष बन चुका है। इसने कई लोगों को छांव और शीतलता दी है।
आज भी जब कोई पूछता है कि DU में कौन सा कॉलेज, तो SRCC कहना ही अपने आप में फ्लैक्स होता है। आपकी भाषा में कहूं तो यहां के एल्युमनाई OG हैं।
जिन्होंने SRCC का नाम पूरी दुनिया में पहुंचाया। हमारे अरुण जेटली जी यहीं पढ़े थे। और मैं कह सकता हूं कि हमारी ऐसी कोई मुलाकात नहीं हुई जहां उन्होंने SRCC की बात न की हो। कभी-कभी तो मैं तंग आ जाता था।
लोग मेरे 2013 के संबोधन को याद कर रहे हैं। नई पीढ़ी के लोगों ने भी उसे रिविजिट
पीएम मोदी का संबोधन शुरू, बोले- मैं छठा खिलाड़ी हूं
पीएम मोदी ने संबोधन की शुरुआत में एलुमिनाई स्टूडेंट्स के नाम लिए और फिर बोले- मैं छठा खिलाड़ी हूं। आज का ये अवसर बहुत ऐतिहासिक है। ये देश के शिक्षा जगत के लिए भी अहम है। यहां SRCC का हिस्सा रही अनेक पीढ़ियां जुड़ी हैं।
मोदी ने कहा- मैं कॉलेज के संस्थापक सर श्री राम जी का भी धन्यवाद करता हूं। जब कोई इंसान 100 साल जीता है तो उसके अनुभवों का सागर माना जाता है। और जब कोई संस्थान ऐसा करता है तो वो उपलब्धियों का महासागर हो जाता है।
नई दिल्ली, एजेंसी। पीएम मोदी 13 साल बाद शनिवार को दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) पहुंचे। वे मेट्रो का सफर करके कॉलेज पहुंचे। इस दौरान उन्होंने मेट्रो में बैठे बच्चों और लोगों से भी बातचीत की।
कॉलेज के 100 साल पूरे होने पर शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है। इसी दौरान पीएम जेन-Z को संबोधित करेंगे।
समारोह की शुरुआत में पीएम ने 100 रुपए का सिक्का जारी किया। इसी साल अप्रैल में वे डाक टिकट भी जारी कर चुके हैं।
पीएम इससे पहले 2013 में श्रीराम कॉलेज का दौरा कर चुके हैं। उस समय वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे।
पीएम मोदी 2013 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के समारोह में शामिल हो चुके हैं।
दिल्ली मेट्रो में सफर के दौरान पीएम मोदी की तस्वीरें…
मोदी ने लिखा- SRCC ने लीडर्स की पीढ़ियां तैयार कीं
इवेंट के लिए रवाना होने से पहले पीएम मोदी ने X पर एक पोस्ट में लिखा- इस कॉलेज ने एकेडमिक एक्सीलेंस, संस्थान बनाने और बिजनेस, पब्लिक लाइफ और समाज में लीडर्स की पीढ़ियों को तैयार करने के मामले में सालों में अपनी अलग पहचान बनाई है।
अप्रैल में डाक टिकट जारी किया गया था
इस साल अप्रैल में पीएम ने संस्थान के 100 साल पूरे होने के मौके पर एक स्मारक डाक टिकट भी जारी किया था।
1926 में हुई थी श्रीराम कॉलेज की स्थापना
दिल्ली यूनिवर्सिटी का श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स भारत के प्रमुख उच्च शिक्षा संस्थानों में से एक है और कॉमर्स, इकोनॉमिक्स और मैनेजमेंट के क्षेत्रों में सीखने का एक प्रतिष्ठित केंद्र है।
मशहूर उद्योगपति और समाजसेवी सर श्री राम ने 1926 में स्थापित इस कॉलेज ने एक सदी के दौरान विद्वानों, पेशेवरों, प्रशासकों, उद्यमियों, नीति-निर्माताओं और राष्ट्र-निर्माताओं की पीढ़ियों को तैयार किया है।
नई दिल्ली, एजेंसी। दुनिया का नक्शा अब कुछ बदला नजर आएगा। इसे लेकर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने शुक्रवार को ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया है। भारत ने भी प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। अमेरिका प्रस्ताव के खिलाफ वोट करने वाला अकेला देश रहा।
इस फैसले से देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल पर कोई असर नहीं पड़ेगा, बस इनका आकार पहले से थोड़ा छोटा या बड़ा दिख सकता है।
अब तक धरती पर देशों और महाद्वीपों को दिखाने के लिए मर्केटर वर्ल्ड मैप का उपयोग किया जाता था। इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार उनके असली क्षेत्रफल से बड़ा या छोटा दिखता था।
नए नक्शे का नाम इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन है। इसमें अफ्रीका पहले से काफी बड़ा, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका छोटे नजर आएंगे। एशिया के कुछ हिस्सों का आकार भी पहले से छोटा दिखेगा।
भारत: क्षेत्रफल वही, आकार बड़ा दिख सकता है
भारत की वास्तविक जमीन, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं या क्षेत्रफल में कोई बदलाव नहीं होगा। यह बदलाव देशों की सीमाएं बदलने वाला नहीं, बल्कि नक्शे पर पृथ्वी को दिखाने का तरीका बदलने वाला है।
भारत का नक्शा देखने में भी थोड़ा अलग दिख सकता है, लेकिन भारत के मामले में बदलाव बहुत बड़ा नहीं होगा।
नया नक्शा क्षेत्रफल सही अनुपात में दिखाता है। पुराने नक्शे में भूमध्य रेखा के आसपास के इलाके अपने आकार से छोटे और ध्रुवों के पास के इलाके बड़े दिखते हैं।
भारत भूमध्य रेखा से बहुत दूर नहीं है, इसलिए पुराने नक्शे में भी उसका आकार कुछ हद तक छोटा दिखता है।
भारत के लिए इसका मतलब
क्षेत्रफल: बिल्कुल वही रहेगा।
सीमाएं: नहीं बदलेंगी।
भारत की आकृति: थोड़ी बदली हुई/कम खिंची हुई दिखाई दे सकती है।
दूसरे देशों की तुलना में आकार: भारत कुछ बड़ा दिखाई दे सकता है, खासकर जब उसकी तुलना यूरोप, रूस, कनाडा जैसे ज्यादा उत्तरी देशों से की जाए।
अफ्रीका पर असर: सबसे ज्यादा नजर आएगा, क्योंकि उसका वास्तविक आकार पुराने मर्केटर नक्शे की तुलना में बहुत बड़ा दिखाई देगा।
अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध क्यों किया?
संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने वोट दिया, जबकि 6 देश वोटिंग से दूर रहे। अमेरिका ने इस पहल की कड़ी आलोचना की। अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेन्सेविच ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को दुनिया की असली समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए, न कि 16वीं सदी के नक्शे को बदलने जैसी बहस पर।
उन्होंने इसे एक वैचारिक एजेंडा बताया और कहा कि ऐसी बहसों की वजह से संयुक्त राष्ट्र अपनी विश्वसनीयता खो रहा है।
वहीं, अफ्रीकी संघ ने इस फैसले का स्वागत किया। उसने दुनिया के नए नक्शे को ज्यादा सटीक और बराबरी वाला बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया।
मौजूदा नक्शे में आखिर दिक्कत क्या थी?
दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नक्शों में से एक मर्केटर नक्शा है। इसे यूरोपियन मैप मेकर जेरार्डस मर्केटर ने 1569 में बनाया था।
इसका मकसद समुद्र में जहाजों के रास्ते और दिशा को समझना आसान बनाना था। लेकिन पूरी गोल धरती को सपाट नक्शे पर दिखाने की वजह से इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार असल से अलग नजर आने लगता है।
जैसे-जैसे कोई इलाका भूमध्य रेखा से दूर जाता है, वह नक्शे पर जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है। यही वजह है कि उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों के कई इलाके असल से काफी बड़े नजर आते हैं।
मर्केटर प्रोजेक्शन में पृथ्वी का नक्शा। (फोटो: NASA)
ग्रीनलैंड इसका सबसे मशहूर उदाहरण है। मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड दक्षिण अमेरिका के लगभग बराबर दिखाई देता है। लेकिन असल में दोनों के आकार में बहुत बड़ा अंतर है।
ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 22 लाख वर्ग किलोमीटर है। यह लगभग डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के बराबर है। वहीं अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है।
फिर भी मर्केटर नक्शे को देखकर दोनों का आकार लगभग एक जैसा लग सकता है। यही वह फर्क है जिसे अब कम करने की कोशिश हो रही है।
अफ्रीकी देश नक्शा बदलने की मांग क्यों कर रहे थे?
अफ्रीकी देशों का कहना है कि बात सिर्फ नक्शे पर किसी देश या महाद्वीप के छोटा-बड़ा दिखने की नहीं है। दुनिया का नक्शा यह भी तय करता है कि हम अलग-अलग हिस्सों को किस नजर से देखते हैं।
UN के सामने रखे गए प्रस्ताव में कहा गया था कि मर्केटर नक्शे में अफ्रीका का वास्तविक आकार काफी छोटा नजर आता है। लंबे समय तक ऐसी तस्वीर देखने से लोगों के मन में अफ्रीका के आकार और वैश्विक महत्व को लेकर गलत धारणा बन सकती है।
प्रस्ताव में लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया का भी जिक्र है। इसमें कहा गया है कि नक्शे में इन क्षेत्रों का छोटा नजर आना उनकी विकास जरूरतों, बुनियादी ढांचे और आर्थिक क्षमता को भी कम करके आंकने की धारणा बना सकता है।
अफ्रीकी देश टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसे ने कहा कि नक्शे सिर्फ भूगोल समझने का साधन नहीं हैं, बल्कि वे शिक्षा और लोगों की सोच को भी प्रभावित करते हैं। यह प्रस्ताव टोगो ने पेश किया था और इसे अफ्रीकी संघ का समर्थन मिला।
फ्रांस भी मर्केटर मैप छोड़ने की तैयारी में
UN में मतदान से पहले फ्रांस ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। फ्रांस के विदेश मंत्री ज्यां-नोएल बारो ने कहा कि उनका देश मर्केटर मैप की जगह ऐसे नक्शों का इस्तेमाल करेगा, जिनमें देशों का वास्तविक क्षेत्रफल ज्यादा सही तरीके से दिखाई दे।
फ्रांस अब एकर्ट IV प्रोजेक्शन का इस्तेमाल करेगा। एकर्ट IV नक्शा 1906 में जर्मन कार्टोग्राफर मैक्स एकर्ट-ग्राइफेंडॉर्फ ने बनाया था। उन्होंने दुनिया के नक्शे के छह अलग-अलग डिजाइन तैयार किए थे। इनमें चौथा नक्शा यानी एकर्ट IV क्षेत्रफल के लिहाज से सबसे सटीक माना गया।
एकर्ट IV और इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन दोनों ऐसे नक्शे हैं, जिनमें देशों और महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल सही अनुपात में दिखता है।
फिर 2018 में इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन की जरूरत क्यों पड़ी?
एकर्ट IV में क्षेत्रफल तो सही दिखाया गया है, लेकिन कई जगह देशों और महाद्वीपों के आकार में ज्यादा विकृति नजर आती है। इसी समस्या को कम करने के लिए इक्वल अर्थ बनाया गया,
इक्वल अर्थ बनाने का मकसद सिर्फ देशों और महाद्वीपों का सही क्षेत्रफल दिखाना नहीं था, बल्कि पूरी दुनिया को ऐसे रूप में दिखाना था, जो देखने में भी ज्यादा संतुलित लगे।
क्या UN का फैसला सभी पर लागू होगा?
नहीं। संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। यानी यह देशों, स्कूलों, किताबों के प्रकाशकों या टेक कंपनियों को मर्केटर नक्शा हटाने के लिए मजबूर नहीं करता।
लेकिन इससे नक्शे बनाने और पढ़ाने में ऐसे तरीकों को बढ़ावा मिल सकता है, जिनमें देशों और महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल ज्यादा सही दिखाई दे।
मर्केटर नक्शे को पूरी तरह खत्म करने की भी बात नहीं कही गई है। समुद्री और हवाई नेविगेशन में इसका इस्तेमाल जारी रह सकता है, क्योंकि इसमें दिशाओं को सही रखने की खासियत है।
मैप: यह अंग्रेजी का शब्द है। माना जाता है कि यह लैटिन के माप्पा से आया। जिसका अर्थ कपड़ा या चादर है, जिस पर नक्शा बनाया जाता था। बाद में इसका अर्थ मानचित्र हो गया।
नक्शा: यह अरबी मूल का शब्द है। अरबी में नक्श का अर्थ है चित्र या नक्काशी। इसी से नक्शा बना और हिंदी-उर्दू में किसी जगह का चित्र/मानचित्र बताने के लिए इस्तेमाल होने लगा।
मानचित्र: संस्कृत मूल का शब्द है। मान + चित्र, यानी किसी स्थान को माप या अनुपात के साथ चित्र के रूप में दिखाना।