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5 साल की तेजी के बाद थमा लग्जरी कार बाजार, धीमी पड़ी बिक्री

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मुंबई, एजेंसी। भारत के लग्जरी कार बाजार की रफ्तार 2026 की पहली छमाही में धीमी पड़ गई है। पिछले पांच वर्षों से लगातार मजबूत वृद्धि दर्ज करने वाला यह सेगमेंट अब ठहराव की स्थिति में पहुंच गया है। उद्योग के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, ₹40 लाख से अधिक कीमत वाली लग्जरी कारों की बिक्री 24,000 से 25,000 यूनिट के बीच ही सीमित रही। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, रुपए की कमजोरी और लगातार बढ़ती कीमतों ने मांग पर असर डाला है।

लगातार महंगी होती कारें बनीं बड़ी चुनौती

ऑटोमोबाइल कंपनियों ने 2026 के दौरान कई बार कीमतों में बढ़ोतरी की है। रुपए के मुकाबले यूरो मजबूत होने से आयात लागत बढ़ी, जिसका असर सीधे वाहनों की कीमतों पर पड़ा। पिछले पांच वर्षों में लग्जरी कारों की कीमतों में करीब 25 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। इससे प्रीमियम सेगमेंट के वे ग्राहक, जो पहली बार लग्जरी कार खरीदना चाहते थे, अब खरीदारी टाल रहे हैं।

वैश्विक हालात का भी दिखा असर

विशेषज्ञों के अनुसार, लग्जरी कार खरीदने वाले ग्राहक वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर अधिक नजर रखते हैं। शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर अनिश्चितता के कारण कई हाई-नेट-वर्थ निवेशकों ने अपने बड़े खर्च फिलहाल टाल दिए हैं। वहीं कमजोर रुपया कंपनियों की लागत बढ़ा रहा है, जिससे कीमतों में और इजाफा हो रहा है।

अल्ट्रा-लग्जरी कारों की मांग बनी मजबूत

हालांकि पूरे बाजार में सुस्ती नहीं है। सबसे महंगी और हाई-एंड लग्जरी कारों की मांग अब भी मजबूत बनी हुई है। वाहन निर्माता कंपनियां अब अधिक मुनाफा देने वाले प्रीमियम मॉडल्स और इलेक्ट्रिक लग्जरी वाहनों पर फोकस बढ़ा रही हैं। इससे अल्ट्रा-लग्जरी सेगमेंट में बिक्री का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर बना हुआ है।

आगे किन बातों पर रहेगी नजर

उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि आने वाले महीनों में लग्जरी कार बाजार की दिशा कई अहम कारकों पर निर्भर करेगी। इनमें रुपये की स्थिति, कीमतों में संभावित बदलाव, एंट्री-लेवल लग्जरी कारों की मांग और हाई-एंड इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती स्वीकार्यता प्रमुख हैं। यदि वैश्विक आर्थिक माहौल स्थिर रहता है और उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ता है, तो इस सेगमेंट में दोबारा तेजी लौट सकती है।

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सस्ता होगा सोना, 20 हजार रुपए तक गिर सकते हैं दाम, एक्सपर्ट्स का अनुमान

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मुंबई, एजेंसी। साल 2026 की शुरुआत में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बाद अब सोने की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। जनवरी में अंतरराष्ट्रीय बाजार में 5,595 डॉलर प्रति औंस का ऑल-टाइम हाई का लेवल छूने के बाद सोना अब 27 फीसदी तक टूट चुका है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में सोने में 16 फीसदी तक और गिरावट आ सकती है, यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 3,400 से 3,500 डॉलर प्रति औंस के दायरे तक पहुंच सकता है। इसका असर भारतीय बाजार पर भी देखने को मिलेगा, जहां सोने की कीमतों में करीब 20,000 रुपए प्रति 10 ग्राम तक की गिरावट संभव बताई जा रही है।

कमोडिटी बाजार के जानकारों का कहना है कि पिछले दो वर्षों में सोने की कीमतों में असाधारण तेजी आई थी। ऐसे में मौजूदा गिरावट को तकनीकी करेक्शन के तौर पर देखा जा रहा है। उनका मानना है कि लंबी अवधि में सोने का रुख अब भी सकारात्मक बना हुआ है लेकिन निकट भविष्य में कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

क्यों सस्ता होगा सोना?

विशेषज्ञों के अनुसार, सोने पर दबाव बढ़ने की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ा भू-राजनीतिक तनाव है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है, जिससे महंगाई और ब्याज दरों को लेकर चिंता बढ़ी है। इसके अलावा अमेरिकी डॉलर की मजबूती ने भी सोने की मांग को प्रभावित किया है। डॉलर मजबूत होने पर अन्य देशों के निवेशकों के लिए सोना महंगा हो जाता है, जिससे इसकी खरीदारी घटती है।

बाजार विश्लेषकों का मानना है कि 4,000 डॉलर प्रति औंस का स्तर सोने के लिए एक अहम सपोर्ट जोन है। हालांकि, यदि वैश्विक बाजारों में बिकवाली का दबाव और बढ़ता है तो कीमतें अस्थायी रूप से 3,500 डॉलर तक भी जा सकती हैं। इसके बावजूद लंबी अवधि के लिए सोने को लेकर विशेषज्ञ आशावादी बने हुए हैं। उनका अनुमान है कि अगले तीन वर्षों में सोना एक बार फिर नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ सकता है।

केंद्रीय बैंक लगातार गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे 

सोने को समर्थन देने वाले प्रमुख कारकों में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की खरीदारी भी शामिल है। कई देशों के केंद्रीय बैंक लगातार अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं, जिससे बाजार में सोने की मांग बनी हुई है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के हालिया सर्वे के अनुसार, अधिकांश केंद्रीय बैंक अगले 12 महीनों में भी अपने स्वर्ण भंडार में वृद्धि करने की योजना बना रहे हैं। पिछले चार वर्षों में केंद्रीय बैंकों ने औसतन 1,000 टन सोना खरीदा है, जो पिछले दशक के औसत से कहीं अधिक है।

निवेशकों के लिए सलाह

का कहना है कि आर्थिक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक जोखिम और महंगाई की आशंकाओं के बीच सोना अब भी सुरक्षित निवेश विकल्प बना हुआ है। ऐसे में अल्पकालिक गिरावट के बावजूद लंबी अवधि के निवेशकों के लिए कीमतों में आने वाली कमजोरी को चरणबद्ध खरीदारी के अवसर के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, निवेश से पहले बाजार की स्थिति और अपनी जोखिम क्षमता का आकलन करना जरूरी रहेगा।

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RBI के लक्ष्य से पार पहुंची महंगाई, जून में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 4.38%

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मुंबई, एजेंसी। जून 2026 में खुदरा महंगाई (Retail Inflation) बढ़कर 4.38 फीसदी पर पहुंच गई है। खाद्य पदार्थों और ईंधन की बढ़ती कीमतों, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कमजोर मानसून की आशंकाओं के चलते महंगाई पर दबाव बना रहा। 6 महीनों में यह पहली बार है जब खुदरा महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के टारगेट 4% के पार निकली है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 में खुदरा महंगाई दर 3.93 फीसदी थी, जो जून में बढ़कर 4.38 फीसदी हो गई।

RBI का क्या है महंगाई लक्ष्य?

भारतीय रिजर्व बैंक का लक्ष्य खुदरा महंगाई को 4 फीसदी पर बनाए रखना है। हालांकि, केंद्रीय बैंक को इसे 2 फीसदी से 6 फीसदी के दायरे में रखने की अनुमति है। यह लक्ष्य अवधि 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक के लिए निर्धारित की गई है।

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देश का निर्यात जून में 15.5 प्रतिशत बढ़कर 40.41 अरब डॉलर पर, व्यापार घाटा 30.43 अरब डॉलर

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नई दिल्ली, एजेंसी। देश का निर्यात जून महीने में 15.5 प्रतिशत बढ़कर 40.41 अरब डॉलर रहा। इस दौरान व्यापार घाटा बढ़कर 30.43 अरब डॉलर हो गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, आयात जून माह में करीब 31 प्रतिशत बढ़कर 70.84 अरब डॉलर रहा। चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में निर्यात 15.92 प्रतिशत बढ़कर 129.32 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 19.89 प्रतिशत बढ़कर 216.18 अरब डॉलर हो गया। 

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सोने का आयात बढ़कर 11.01 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले साल अप्रैल-जून में 7.49 अरब डॉलर था। 

वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि जून में पश्चिम एशियाई देशों को भारत का निर्यात 7.29 प्रतिशत बढ़कर पांच अरब डॉलर हो गया। अग्रवाल ने कहा कि कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और कीमती धातुओं के आयात बढ़ने के कारण कुल आयात बढ़ा है।

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