रोम, एजेंसी। प्रधानमंत्री मोदी ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ रोम में संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रोम और काशी को इटर्नल सिटी यानी कभी न खत्म होने वाले शहर कहा। यह तुलना केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि सभ्यता की निरंतरता का प्रतीक भी है। वाराणसी को दुनिया के सबसे प्राचीन जीवित नगरों में माना जाता है, जहां हजारों वर्षों से धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं लगातार चलती आ रही हैं। जानें, क्या है भगवान शिव की नगरी वाराणसी का इतिहास-
काशी नाम का अर्थ और महत्त्व स्कंदपुराण में आया है कि ‘श्म’ का अर्थ है ‘शव’ और ‘शान’ का है सोना (शयन) या पृथ्वी पर पड़ जाना। जब प्रलय आती है तो महान तत्व शवों के समान यहां पड़ जाते हैं, अत: यह स्थान ‘श्मशान’ कहलाता है।
जैसे सूर्यदेव एक जगह स्थित होने पर भी सब को दिखाई देते हैं, वैसे ही संपूर्ण काशी में सर्वत्र बाबा विश्वनाथ का ही दर्शन होता है। पुराणों में ऐसा आया है कि काशी के पद-पद पर तीर्थ हैं, एक तिल भी स्थल ऐसा नहीं है, जहां शिव नहीं हों। काशी की महिमा विभिन्न धर्म ग्रंथों में गाई गई है।
वाराणसी नाम कैसे पड़ा? काशी शब्द का अर्थ है, प्रकाश देने वाली नगरी। जिस स्थान से ज्ञान का प्रकाश चारों ओर फैलता है, उसे काशी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी-क्षेत्र में देहांत होने पर जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
विश्वनाथ जी की अति-श्रेष्ठ नगरी काशी पूर्वजन्मों के पुण्यों के प्रताप से ही प्राप्त होती है। यहां शरीर छोड़ने पर प्राणियों को मुक्ति अवश्य मिलती है। काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है। काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ कहते हैं – ‘इदं मम प्रियंक्षेत्रं पंचकोशीपरीमितम्’ यानी पांच कोस तक विस्तृत यह क्षेत्र (काशी) मुझे अत्यंत प्रिय है।
मत्स्यपुराण (185/68-69) के अनुसार काशी में विश्वनाथ के अलावा 5 प्रमुख तीर्थ हैं : दशाश्वमेध, लोलार्क (काशी में कई सूर्य-तीर्थ हैं, जिनमें एक लोलार्क भी है), केशव, बिन्दुमाधव एवं मणिकर्णिका।
आधुनिक काल के प्रमुख पंचतीर्थ हैं असि एवं गंगा का संगम, दशाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका, पंचगंगा घाट तथा वरणा एवं गंगा का संगम। मणिकर्णिका को मुक्तिक्षेत्र भी कहा जाता है। यह बनारस के धार्मिक जीवन का केंद्र है और वहां के सभी तीर्थों में इसे सर्वोच्च माना जाता है। एक बार शिव जी का कर्णाभूषण यहां गिर पड़ा और इसी से इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा।
ऐसे ही पंचगंगा घाट का नाम इसलिए विख्यात हुआ कि यहां 5 नदियों के मिलने की कथा है। यथा – किरणा, धूतपापा, गंगा, यमुना एवं सरस्वती, जिनमें चार गुप्त हैं।
काशी का प्राचीन इतिहास काशी-क्षेत्र की सीमा निर्धारित करने के लिए पुराने समय में पंचक्रोशी (पंचकोसी) मार्ग का निर्माण किया गया था। जिस वर्ष अधिमास (अधिक मास) लगता है, उस वर्ष इस महीने में पंचक्रोशी यात्रा की जाती है। पंचक्रोशी यात्रा करके भक्तगण भगवान शिव और उनकी नगरी काशी के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं। अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। लोक-भाषा में इसे मलमास कहा जाता है। जो इन दिनों चल रहा है। 17 मई से आरंभ हुआ ये माह 15 जून 2026 तक रहने वाला है।
पौराणिक एवं शास्त्रीय मान्यता है की हरिवंश पुराण के अनुसार काशी को बसाने वाले भरतवंशी राजा ‘काश’ थे। स्कंदपुराण के मत से भगवान शंकर ने काशी को सबसे पहले आनंद वन कहा और फिर अविमुक्त कहा। काशी शब्द ‘काश’ (चमकना) से बना है। काशी इसलिए प्रसिद्ध हुई कि यह निर्वाण के मार्ग में प्रकाश फैंकती है। वाराणसी शब्द की व्युत्पत्ति कुछ पुराणों ने इस प्रकार की है कि यह ‘वरणा’ एवं ‘असि’ नामक दो धाराओं के बीच में है, जो क्रम से इसकी उत्तरी एवं दक्षिणी सीमाएं बनाती हैं।
पुराणों में बहुधा वाराणसी एवं अविमुक्त नाम आते हैं। बहुत-से पुराणों के मतानुसार इस पवित्र स्थल का नाम अविमुक्त इसलिए पड़ा कि शिव ने इसे कभी नहीं छोड़ा। स्कंदपुराण अनुसार यह पवित्र स्थल आनंदकानन है क्योंकि यद्यपि शिव पर्वत चले गए पर उन्होंने इसे पूर्णतया छोड़ा नहीं बल्कि अपने प्रतीक के रूप में विश्वनाथ शिवलिंग यहां छोड़ गए।
कुछ विद्वानों के मत में काशी वैदिक काल से भी पूर्व की नगरी है। शिव की उपासना का प्राचीनतम केंद्र होने के कारण ही इस धारणा का जन्म हुआ जान पड़ता है क्योंकि सामान्य रूप से शिवोपासना को पूर्व वैदिककालीन माना जाता है। वैसे, काशी जनपद के निवासियों का सर्वप्रथम उल्लेख हमें अथर्ववेद की पैप्पलादसंहिता में (5,22,14) मिलता है। शुक्लयजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण में (135, 4, 19) काशिराज धृतराष्ट्र का उल्लेख है, जिसे शतानीक सत्राजित् ने पराजित किया था।
बृहदारण्यकोपनिषद् में (2,1,1,3,8,2) काशिराज अजात शत्रु का भी उल्लेख है। कौषीतकी उपनिषद् (4,1) और बौधायन श्रौतसूत्र में काशी और विदेह तथा गोपथ ब्राह्मण में काशी और कोसल जनपदों का साथ-साथ वर्णन है।
इसी प्रकार काशी, कोसल और विदेह के सामान्य पुरोहित जलजातूकण्र्य का नाम शांखायन श्रौतसूत्र में प्राप्य है। काशी जनपद की प्राचीनता तथा इसकी स्थिति इन उपर्युक्त उल्लेखों से स्पष्ट हो जाती है।
दुनिया की सबसे प्राचीन जीवित नगरी बौद्ध-जैन ग्रंथों में उल्लेख मिलता है की प्राचीन बौद्ध ग्रंथों से पता चलता है कि वाराणसी बुद्ध काल (कम-से-कम पांचवीं ईसा पूर्व शताब्दी) में चम्पा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत एवं कौशाम्बी जैसे महान एवं प्रसिद्ध नगरों में गिनी जाती थी। विश्व में ऐसा कोई नगर नहीं है, जो बनारस से बढ़कर प्राचीनता, निरंतरता और मोहक आदर का पात्र हो। 3 हजार वर्ष से यह पवित्रता ग्रहण करता आ रहा है। इस नगर के कई नाम रहे हैं जैसे- वाराणसी, अविमुक्त एवं काशी। अपनी महान जटिलताओं एवं विरोधों के कारण यह नगर सभी युगों में भारतीय जीवन का एक सूक्ष्म स्वरूप रहता आया है। वाराणसी या काशी के विषय में महाकाव्यों एवं पुराणों में हजारों श्लोक कहे गए हैं। उस समय यह नगर आर्यों की लीलाओं का केंद्र बन चुका था। प्राचीन जैन ग्रंथों में भी वाराणसी एवं काशी का उल्लेख हुआ है। अश्वघोष ने अपने ‘बुद्धचरित’ में वाराणसी एवं काशी को एक-सा कहा है। वहां लिखा है कि बुद्ध ने वाराणसी में प्रवेश करके अपने प्रकाश से नगर को प्रकाशित करते हुए काशी के निवासियों के मन में कौतुक भर दिया।
भंडारा, एजेंसी। महाराष्ट्र के भंडारा जिले में शुक्रवार को ट्रक और बोलेरो की टक्कर में 3 बच्चों समेत 8 लोगों की मौत हो गई, जबकि 3 लोग घायल हैं। पुलिस के मुताबिक, हादसा सुबह करीब 4 बजे नागपुर-रायपुर नेशनल हाईवे पर पिंपलगांव सड़क के पास हुआ।
सभी लोग छत्तीसगढ़ के रायपुर से नेशनल हाईवे-53 के रास्ते नागपुर जा रहे थे। ट्रक में फंसे पिकअप को निकालने के लिए दो जेसीबी की मदद लेनी पड़ी। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और राहत-बचाव का काम शुरू किया।
घटना से जुड़ी तस्वीरें…
हादसे के बाद आसपास के लोगों ने घायलों को बाहर निकालकर अस्पताल भेजा।
हादसे के बाद बोलेरो पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। इसमें कितने लोग सवार थे, इसकी जानकारी अभी सामने नहीं आई है।
मौके पर पुलिस ने क्रेन और जेसीबी की मदद से ट्रक में फंसी बोलेरो को बाहर निकाला।
घायलों को पुलिस और स्थानीय लोगों ने एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचाया।
10 सितंबर: वैन-ट्रक की टक्कर में 6 की मौत
इससे पहले गुरुवार को नांदेड जिले में नांदेड-भोकर रोड पर वैन और ट्रक की टक्कर हो गई थी। हादसे में 6 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 8 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
पुलिस के मुताबिक हादसा शाम करीब 7 बजे सीताखंडी घाट के पास हुआ। टाटा मैजिक वैन नांदेड से भोकर की ओर जा रही थी, तभी सामने से आ रहे ट्रक से उसकी जोरदार टक्कर हो गई।
टक्कर इतनी तेज थी कि वैन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। हादसे के बाद स्थानीय लोग मौके पर पहुंचे और वैन में फंसे घायलों को बाहर निकाला। सभी घायलों को इलाज के लिए नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया।
काठमांडू/नई दिल्ली, एजेंसी। नेपाल में 26 अगस्त को आई भयानक बाढ़ से बड़े पैमाने पर तबाही हुई। टूटे घर, सड़कें, पुल और दूसरी सुविधाएं दोबारा बनाने के लिए 7,233 करोड़ नेपाली रुपए यानी करीब रू.45 हजार करोड़ की जरूरत का अनुमान है। यह नेपाल की GDP का करीब 11% है।
बाढ़ और भूस्खलन से 16 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। अब तक 1,377 लोगों की मौत और करीब 5,130 लोगों के लापता होने की खबर है। करीब 65% रिकवरी खर्च यानी रू.29 हजार करोड़ सड़क, पुल, बिजली और दूसरी जरूरी सुविधाओं पर खर्च होंगे। बाढ़ में 7,570 घर, 48 सरकारी इमारतें, 18 स्कूल और 7 स्वास्थ्य केंद्र भी क्षतिग्रस्त हुए हैं।
नेपाल त्रासदी से जुड़ी तस्वीरें…
बाढ़ और भूस्खलन से हुई मौतों के बाद नुवाकोट जिले के बिदुर में सामूहिक दफन की तैयारी करते सुरक्षाकर्मी।
बाढ़ और भूस्खलन के 16 दिन बाद भी तबाही के निशान साफ नजर आ रहे हैं। नुवाकोट के देवीघाट में मलबे के बीच से गुजरते स्थानीय लोग।
बाढ़ और भूस्खलन से जमा हुए मलबे को हटाने का काम जारी है। नुवाकोट के धुंगे बाजार इलाके में बाढ़ से बर्बाद हुए इलाकों से मलबा हटाती क्रेन।
बाढ़ के बाद प्रभावित लोगों की मदद जारी है। नुवाकोट में अस्थायी राहत केंद्र के बाहर मुफ्त दवा वितरण केंद्र पर बाढ़ पीड़ित मरीज से बात करतीं सशस्त्र पुलिस बल की डॉक्टर सबिता केसी।
545 लापता लोगों की तलाश में खोजी कुत्ते उतारे
अपर त्रिशूली-1 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में 545 लापता लोगों की तलाश के लिए प्रशिक्षित खोजी कुत्ते उतारे गए हैं। टीमें सुरंगों, हेडवर्क्स और मलबे में तलाश कर रही हैं।
बाढ़ के समय प्रोजेक्ट में 1,433 लोग काम कर रहे थे। इनमें 878 बचा लिए गए, जबकि 545 लापता हैं। इनमें 9 दक्षिण कोरियाई, 34 चीनी और 50 भारतीय शामिल हैं।
नेपाली सेना, ड्रोन टीम, दक्षिण कोरियाई विशेषज्ञ और शेरपा रेस्क्यू टीम भी अभियान में जुटी हैं।
भारत ने भेजी 130 टन से ज्यादा राहत सामग्री
नेपाल के राहत और बचाव अभियान में भारत लगातार मदद कर रहा है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, 26 अगस्त से अब तक आठ विशेष उड़ानों के जरिए नेपाल को 130 टन से ज्यादा राहत सामग्री भेजी गई है।
भारत ने 54 विशेषज्ञों को भी नेपाल भेजा है। इनमें सुरंग और मलबे में फंसे लोगों को निकालने वाली टीमें, मेडिकल विशेषज्ञ और फोरेंसिक कर्मी शामिल हैं।
भारत ने टेंट, कंबल, हाइजीन किट, सोलर लैंप और दवाओं के साथ मलबा हटाने और सुरंगों में बचाव के लिए गैस डिटेक्टर, ब्रीदिंग उपकरण, मड रेस्क्यू सूट, जनरेटर, लाइटिंग टावर और पानी निकालने वाले पंप भी भेजे हैं।
पुनर्निर्माण की लागत का 75% सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर पर
पुनर्निर्माण की अनुमानित लागत में करीब 75% यानी रू.2.96 लाख करोड़ बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करने में खर्च होंगे। बाढ़ में 7,570 निजी घर, 48 सार्वजनिक इमारतें, 18 स्कूल और 7 स्वास्थ्य संस्थान क्षतिग्रस्त हुए हैं।
इससे साफ है कि नेपाल के सामने चुनौती केवल लोगों को तत्काल राहत देने की नहीं है। उसे अगले कई वर्षों तक सड़क, पुल, बिजली, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और घरों को दोबारा बनाने के लिए भारी खर्च करना होगा।
हिसार, एजेंसी। केंद्र और हरियाणा सरकार ने भारत-पाकिस्तान धार्मिक यात्राओं के नियम बदल दिए हैं। यह फैसला ऑपरेशन सिंदूर के बाद सामने आए पाक जासूसी नेटवर्क और हिसार की यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा केस के बाद लिया गया है।
जांच में खुलासा हुआ है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी (ISI) और वहां के प्राइवेट टूर ऑपरेटर धार्मिक यात्रा के नाम पर भारतीय नागरिकों को स्पॉन्सर करते हैं, ताकि उनसे जासूसी करा सकें। इसे देखते हुए भारत सरकार ने पाकिस्तान से चलने वाले सभी प्रकार के प्राइवेट स्पॉन्सर्ड टूर पर पाबंदी लगा दी है। वीजा की शर्तें भी बदल दी गई हैं।
हरियाणा सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी के टूरिज्म इंचार्ज हरकीरत सिंह ने भी इसकी पुष्टि की। उन्होंने दैनिक भास्कर को बताया कि ज्योति मल्होत्रा जैसे जासूसी केस मिलने के बाद से प्राइवेट स्पॉन्सर टूर बंद कर दिए गए हैं। पहले पाकिस्तान जाने वाले लोग वहां की एजेंसी से संपर्क कर टूर प्रोग्राम अरेंज करते थे। फिर यहां से वहां जाकर धार्मिक टूर करते थे।
करीब 10 महीने पहले कुरुक्षेत्र के ऐतिहासिक गुरुद्वारा छठी पातशाही से जत्था रवाना हुआ था।
पाकिस्तान धार्मिक यात्रा कैसे होती है, कोटा कितना है
भारत और पाकिस्तान के बीच धार्मिक यात्राएं दोनों माध्यमों (इंडिविजुअल और जत्थे) से होती हैं। अधिकांश श्रद्धालु भारत-पाकिस्तान ‘रिलीजियस श्राइन्स प्रोटोकॉल 1974’ के तहत जत्थों (ग्रुप) में यात्रा करते हैं। इसमें विदेश मंत्रालय (MEA) और गृह मंत्रालय की ओर से वीजा व सुरक्षा क्लीयरेंस दी जाती है।
2019 में बने करतारपुर साहिब कॉरिडोर के जरिए भारतीय नागरिक/OCI कार्डधारक बिना वीजा के केवल पासपोर्ट के आधार पर सुबह जाकर शाम को वापस आ सकते हैं। इसके अलावा कटासराज मंदिर (शिवरात्रि) के लिए भी विशेष ग्रुप/इंडिविजुअल वीजा पर लोग जाते हैं।
SGPC और HSGMC सालाना जत्थे का स्वीकृत कोटा
1974 के द्विपक्षीय समझौते के तहत सिख श्रद्धालुओं के मुख्य जत्थे साल में 4 प्रमुख अवसरों पर पाकिस्तान जाते हैं। इस समझौते के तहत चारों मौकों पर मिलाकर हर साल कुल 8,000 सिख श्रद्धालुओं को पाकिस्तान जाने की अनुमति (वीजा कोटा) है।
बैसाखी/खालसा साजना दिवस (अप्रैल): अधिकतम 3,000 श्रद्धालु
श्री गुरु अर्जुन देव जी का शहीदी दिवस (मई-जून): अधिकतम 1,000 श्रद्धालु
महाराजा रणजीत सिंह की पुण्यतिथि (जून): अधिकतम 1,000 श्रद्धालु
श्री गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व (नवंबर- ननकाना साहिब): अधिकतम 3,000 श्रद्धालु
पाकिस्तान हाई कमीशन की 28 मार्च 2024 को दिल्ली में हुई इफ्तार पार्टी में पाकिस्तानी अधिकारी दानिश और उसकी पत्नी के साथ ज्योति। (फाइल)
कैसे होती थी स्पॉन्सरशिप और अब क्या बदला…
पुलिस वेरिफिकेशन ज्यादा सख्त
सभी आवेदन SGPC और HSGPC के पास एकत्र होंगे। इसके बाद लोकल पुलिस, सीआईडी (CID) और केंद्रीय खुफिया एजेंसियां आवेदकों के बैकग्राउंड की जांच करेंगी। क्लीयरेंस मिलने के बाद ही वीजा के लिए फाइल गृह मंत्रालय को भेजी जाएगी।
पहले का नियम (प्राइवेट स्पॉन्सरशिप)
पाकिस्तान के प्राइवेट टूर ऑपरेटर (जैसे लाहौर और इस्लामाबाद की ट्रैवल एजेंसियां) भारतीय नागरिकों, इन्फ्लुएंसर्स और श्रद्धालुओं को सीधे स्पॉन्सरशिप लेटर भेजती थीं। इससे दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग से वीजा आसानी से मिल जाता था। पंजाब और हरियाणा पुलिस की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, इसी आड़ में पाक एजेंसियां यात्रियों को ठहरने, घूमने और सुविधाएं देने का लालच देकर उनसे संपर्क करती थीं। फिर भारत से जुड़ी रणनीतिक व संवेदनशील जानकारियां जुटाने का काम करती थीं।
नया नियम (केवल मान्यता प्राप्त )
सरकार ने प्राइवेट नेटवर्क को पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब पाकिस्तान यात्रा के लिए केवल शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (HSGMC) जैसे पंजीकृत और संवैधानिक धार्मिक निकायों को ही तय सीमा में जत्थे (ग्रुप) ले जाने की अनुमति दी जाएगी। निजी तौर पर वीजा के लिए आवेदन नहीं कर सकेंगे।
गुरुपर्व पर हरियाणा से जाएगा 2000 श्रद्धालुओं का जत्था
इसी बीच श्री गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व (गुरुपर्व) के अवसर पर पाकिस्तान स्थित ननकाना साहिब और अन्य ऐतिहासिक गुरुद्वारों के दर्शन के लिए हरियाणा सरकार ने प्रक्रिया शुरू कर दी है। 22 नवंबर से 1 दिसंबर तक होने वाले धार्मिक समारोहों में शामिल होने के लिए सिख संगत से आवेदन मांगे गए हैं। श्रद्धालु 12 सितंबर तक आवेदन जमा कर सकते हैं।
हिसार की यू-ट्यूबर ज्योति मल्होत्रा वाघा बॉर्डर से पाकिस्तान जाते हुए।
ज्योति मल्होत्रा का केस क्या था…
सैन्य शिविरों के वीडियो पाक एजेंटों तक पहुंचाने का आरोप
हिसार की यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा को 16 मई 2025 को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस जांच में दावा किया गया कि उसने कश्मीर डैम और राजस्थान बॉर्डर के सैन्य शिविरों के वीडियो पाकिस्तानी एजेंटों तक पहुंचाए और उनसे लगातार संपर्क में रही। 90 दिन की जांच के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की।
पाक एजेंटों से संपर्क और मीटिंग का दावा
हिसार पुलिस के अनुसार ज्योति ने ट्रैवल एडवाइजरी के विरुद्ध पाकिस्तान की यात्रा की, पाक एजेंटों से नंबर शेयर किए और मीटिंग की। उसके मोबाइल से पाकिस्तान उच्चायोग के अधिकारी एहसान-उर-रहीम दानिश अली और ISI से जुड़े बताए गए शाकिर, हसन अली व नासिर ढिल्लों से संपर्क का पता चला।
पाकिस्तान-चीन यात्राओं से भी जांच में आई
ज्योति 2024 में पहले पाकिस्तान और फिर करीब 25 दिन बाद चीन गई थी। पाकिस्तान में उसने पंजाब की CM मरियम नवाज का इंटरव्यू भी किया था। इन यात्राओं और पाकिस्तानी संपर्कों के बाद सुरक्षा एजेंसियों की नजर उस पर गई।
जासूसी केस में टूरिज्म इंचार्ज भी जांच के दायरे में आए थे
हिसार जेल में बंद यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा ने पाकिस्तान वीजा के सिलसिले में हरियाणा सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी के टूरिज्म इंचार्ज हरकीरत सिंह से संपर्क साधा था। इसके बाद केंद्रीय एजेंसियों ने हरकीरत से पूछताछ की थी। बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।