विदेश
ईरान जंग में रूस की जबरदस्त एंट्री ! अमेरिका से मुकाबले की प्लानिंग, विदेश मंत्री लावरोव पहुंचे चीन
बीजिंग/मास्को, एजेंसी। ईरान (Iran) और अमेरिका (United States) के बीच बढ़ते युद्ध जैसे हालात के बीच अब Russia ने भी सक्रिय भूमिका निभाने के संकेत दिए हैं। रूस के विदेश मंत्री Sergei Lavrov चीन पहुंच गए हैं, जहां वे China के शीर्ष नेतृत्व के साथ अहम बैठक करेंगे। इस बैठक में पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट और Strait of Hormuz पर अमेरिका की नाकेबंदी को लेकर रणनीति बनाई जाएगी। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव (Sergei Lavrov) मंगलवार को चीन (China) की राजधानी बीजिंग पहुंचेंगे। उनका यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब अमेरिका (United States) द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य ( Strait of Hormuz) पर नाकेबंदी की घोषणा के बाद वैश्विक तनाव और ऊर्जा संकट बढ़ गया है।

यह यात्रा चीन के विदेश मंत्री Wang Yi के निमंत्रण पर हो रही है। दोनों देशों के नेता पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट, खासकर Iran और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव पर चर्चा करेंगे। China और Russia के बीच पहले से ही मजबूत रणनीतिक संबंध हैं, जिन्हें उनके नेताओं Xi Jinping और Vladimir Putin “नो लिमिट्स पार्टनरशिप” बता चुके हैं। दोनों देश कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एक-दूसरे के साथ खड़े रहे हैं। इस बैठक में खास तौर पर इस बात पर चर्चा होगी कि अमेरिका की नाकेबंदी का मुकाबला कैसे किया जाए और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति को कैसे सुरक्षित रखा जाए।
चीन लंबे समय से ईरान से तेल आयात करता रहा है, भले ही उस पर अमेरिकी प्रतिबंध लगे हों। ऐसे में होरमुज जलडमरूमध्य पर नाकेबंदी का सीधा असर चीन की ऊर्जा जरूरतों पर पड़ सकता है। इसके अलावा, चीन रूस से भी बड़े पैमाने पर तेल और गैस आयात करता है, जिससे दोनों देशों की ऊर्जा साझेदारी और मजबूत हो गई है।चीनी विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस दौरे में दोनों देश द्विपक्षीय संबंधों, आर्थिक सहयोग और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपने विचार साझा करेंगे और एक संयुक्त रणनीति तैयार करने की कोशिश करेंगे। रूस और चीन की यह बैठक सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन के लिए अहम मानी जा रही है। होरमुज संकट और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर इन दोनों देशों की रणनीति आने वाले समय में दुनिया की दिशा तय कर सकती है।

बिज़नस
ट्रंप के एक्शन से हिला पाकिस्तान शेयर बाजार, 5000+ अंक लुढ़का KSE-100, निवेशकों में डर
इस्लामाबाद, एजेंसी। इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई शांति वार्ता विफल होने के बाद वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी के आदेश के बाद इसका सीधा असर पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज (PSX) पर देखने को मिला।

शेयर बाजार में भारी गिरावट, फिर आंशिक रिकवरी
डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार को कारोबार की शुरुआत में पाकिस्तान का बेंचमार्क KSE-100 इंडेक्स 5000 अंकों से ज्यादा टूट गया और सुबह करीब 9:50 बजे 161,638.07 के इंट्राडे निचले स्तर तक गिर गया। पिछला बंद स्तर 167,191.37 था।
क्यों मचा बाजार में हड़कंप?
दरअसल, 21 घंटे चली मैराथन वार्ता के बाद भी सीजफायर पर सहमति नहीं बन सकी। ईरान द्वारा परमाणु कार्यक्रम जारी रखने के फैसले के बाद अमेरिका ने सख्त रुख अपनाते हुए ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी का आदेश दिया। इससे Strait of Hormuz में सप्लाई बाधित होने की आशंका बढ़ गई है, जिससे निवेशकों में घबराहट फैल गई।
इसका असर सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि एशियाई बाजारों जैसे हैंगसेंग और निक्केई पर भी देखने को मिला।
पाकिस्तान के लिए कितना अहम है होर्मुज?
पाकिस्तान अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 80-85% सऊदी अरब, कुवैत, यूएई और कतर जैसे खाड़ी देशों से आयात करता है। वहीं, लगभग 99% LNG सप्लाई भी इन्हीं देशों से आती है।
यदि नाकेबंदी लंबी चलती है, तो पाकिस्तान का पेट्रोलियम आयात बिल 3.5 बिलियन डॉलर से बढ़कर 5 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
महंगाई और बिजली संकट का खतरा
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से पाकिस्तान का सालाना आयात बिल 1.8 से 2 बिलियन डॉलर तक बढ़ सकता है। इससे घरेलू महंगाई 15-17% तक पहुंचने की आशंका है।
तेल और गैस सप्लाई प्रभावित होने पर बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ेगा, जिससे पावर कट बढ़ सकते हैं और उद्योगों में कामकाज ठप पड़ने का खतरा है।

विदेश
वार्ता विफल होने बाद ट्रंप का आखिरी दांवः ईरान को भेजा “फाइनल और बेस्ट ऑफर”, अगर ये ठुकराया तो…
इस्लामाबाद,एजेंसी। अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते को लेकर Islamabad में हुई महत्वपूर्ण बातचीत आखिरकार किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। यह वार्ता करीब 21 घंटे तक लगातार चली, जिसमें दोनों पक्षों ने कई अहम मुद्दों पर चर्चा की, लेकिन अंतिम सहमति नहीं बन पाई। J. D. Vance ने बताया कि इस पूरी प्रक्रिया में Donald Trump की सीधी भूमिका रही। बातचीत के दौरान अमेरिकी टीम लगातार व्हाइट हाउस के संपर्क में थी और कई बार ट्रंप से सलाह ली गई। ट्रंप ने पहले ही निर्देश दिया था कि बातचीत पूरी ईमानदारी से की जाए, लेकिन अमेरिका की सीमाएं (red lines) स्पष्ट रहें।

अमेरिका का “फाइनल ऑफर”
अमेरिका ने ईरान के सामने एक “फाइनल और बेस्ट ऑफर” रखा। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ईरान भविष्य में कभी भी परमाणु हथियार विकसित न करे। ईरान स्पष्ट और लिखित रूप में वादा करे कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। वह ऐसी तकनीक या संसाधन भी विकसित नहीं करेगा जिससे जल्दी हथियार बनाया जा सके। यह प्रतिबद्धता अस्थायी नहीं, बल्कि लंबे समय के लिए हो।
अगर ईरान इसे ठुकराता है तो
अगर ईरान इसे ठुकराता है, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। मध्य-पूर्व में पहले से ही तनाव बना हुआ है, और ऐसे में यह असफल बातचीत हालात को और जटिल बना सकती है। ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु मुद्दे पर भरोसे की कमी साफ दिखाई दे रही है। हालांकि बातचीत का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, लेकिन फिलहाल दोनों देशों के बीच दूरी बनी हुई है। अगर ईरान फाइनल ऑफर को ठुकराता है, तो
- अमेरिका नए प्रतिबंध लगा सकता है।
- क्षेत्रीय तनाव बढ़ सकता है।
- कूटनीतिक टकराव और गहरा सकता है।
Islamabad बातचीत क्यों फेल हुई?
वेंस के अनुसार, Islamabad बातचीत में कुछ सकारात्मक पहलू भी रहे, दोनों पक्षों के बीच गहन चर्चा हुई। लेकिन सबसे बड़ा विवाद इस बात पर रहा कि ईरान अमेरिका की शर्तों को मानने के लिए तैयार नहीं हुआ। अमेरिका को लगा कि ईरान की तरफ से “मजबूत और स्थायी प्रतिबद्धता” नहीं मिल रही है। यही वजह रही कि 21 घंटे की कोशिशों के बावजूद कोई समझौता नहीं हो सका। वेंस ने दावा किया कि अमेरिकी पक्ष ने बातचीत में लचीलापन दिखाया और कई मामलों में समझौता करने की कोशिश की। इसके बावजूद दोनों पक्षों के बीच विश्वास और शर्तों को लेकर अंतर बना रहा। अब अमेरिका ने साफ कर दिया है कि उसने अपना “फाइनल ऑफर” दे दिया है। अब फैसला ईरान को करना है कि वह इस प्रस्ताव को स्वीकार करता है या नहीं।

विदेश
मिडल ईस्ट तनाव के बीच चीन का बड़ा फैसलाः ताइवान के लिए दिखाया प्यार, खोली उड़ानें और व्यापार
बीजिंग, एजेंसी। मिडल ईस्ट में तनाव के बीच चीन (China) ने घोषणा की है कि वह ताइवान (Taiwan) के साथ कुछ समय से रुके हुए संबंधों को फिर से शुरू करेगा। इस फैसले में सीधी उड़ानों की बहाली और ताइवान के समुद्री (मत्स्य) उत्पादों का आयात शामिल है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब ताइवान की विपक्षी पार्टी कुओमिंतांग (KMT) के नेताओं ने हाल ही में चीन का दौरा किया। इस दौरान उनकी मुलाकात Xi Jinping से हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने शांति और संवाद बढ़ाने की बात कही।

चीन ने अपने बयान में कहा कि वह ताइवान के साथ एक दीर्घकालिक संवाद तंत्र (communication mechanism) बनाने की संभावना भी तलाश रहा है, ताकि दोनों पक्षों के बीच बातचीत जारी रह सके। इसके अलावा, चीन ने योजना बनाई है कि वह शीआन और उरुमकी जैसे शहरों से ताइवान के लिए सीधी उड़ानें फिर शुरू करेगा। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि यह व्यवस्था कब और कैसे लागू होगी।
रिश्ते कब बिगड़े
चीन और ताइवान के बीच संबंध 2016 के बाद से लगातार खराब होते गए। जब Tsai Ing-wen की पार्टी सत्ता में आई, तो चीन ने ताइवान सरकार के साथ अपने ज्यादातर आधिकारिक संपर्क बंद कर दिए।
- चीन ने ताइवान के आसपास सैन्य गतिविधियां बढ़ा दीं
- रोजाना लड़ाकू विमान और जहाज भेजने शुरू किए
- व्यापार और यात्रा पर कई प्रतिबंध लगा दिए
व्यापार और यात्रा पर असर
- 2019 में चीन ने अपने नागरिकों के ताइवान जाने पर रोक लगा दी
- ताइवान ने भी सख्त वीजा नियम लागू कर दिए
- 2021 से चीन ने अनानास, मछली, स्क्विड, टूना जैसी चीजों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया
- अब चीन इन प्रतिबंधों में धीरे-धीरे ढील दे रहा है, जिससे दोनों के बीच व्यापार बढ़ सकता है।
नए प्रोजेक्ट्स की योजना
चीन ने यह भी कहा है कि वह मात्सु और किनमेन द्वीपों को जोड़ने के लिए पुल बनाने पर काम करेगा। ये द्वीप ताइवान के हैं, लेकिन भौगोलिक रूप से चीन के काफी करीब हैं। हालांकि ये कदम रिश्तों में सुधार का संकेत हैं, लेकिन मूल विवाद अब भी बना हुआ है कि चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है जबकि
ताइवान खुद को स्वतंत्र और अलग शासन वाला क्षेत्र मानता है। यही वजह है कि दोनों के बीच राजनीतिक और सैन्य तनाव अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

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