वाशिंगठन, एजेंसी। इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स का एक बेकाबू रॉकेट चांद की सतह से टकरा गया है। 4 हजार किलो वजनी और करीब 5 मंजिला इमारत जितना बड़ा यह रॉकेट करीब 8,690 किमी/घंटा की रफ्तार से टकराया। नासा ने कहा कि इस टक्कर से पृथ्वी को कोई खतरा नहीं है। हालांकि इस टक्कर की पुष्टि तस्वीरों के आने के बाद होगी।
यह बेकाबू टुकड़ा स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट का ऊपरी हिस्सा है। इसे जनवरी 2025 में फ्लोरिडा से अमेरिका और जापान के दो लूनर लैंडर को अंतरिक्ष में भेजने के लिए लॉन्च किया गया था। मिशन पूरा होने के बाद रॉकेट का यह हिस्सा अंतरिक्ष में तैरता रह गया।
पिछले 18 महीनों के दौरान पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण की वजह से इसका रास्ता धीरे-धीरे बदल गया। खगोलविदों ने डेटा का अध्ययन करके पहले ही अनुमान लगा लिया था कि यह रॉकेट भटककर सीधे चांद की ओर जा रहा है और उससे टकराएगा।
15 जनवरी 2025 को केनेडी स्पेस सेंटर के फ्लोरिडा स्थित लॉन्च सेंटर 39A से ‘ब्लू घोस्ट’ और ‘हकुटो-आर’ को लेकर स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट ने उड़ान भरी थी।
आइंस्टीन क्रेटर के पास टक्कर हुई, दूरबीन से भी देखना मुश्किल
यह टक्कर चांद के ‘आइंस्टीन क्रेटर’ के पास हुई। यह क्षेत्र चांद के उस हिस्से में है जहां दिन का उजाला रहता है और जो पृथ्वी से दिखाई देता है। हालांकि, वैज्ञानिकों के मुताबिक इसे आम टेलिस्कोप से देखना नामुमकिन था, क्योंकि टक्कर के वक्त बनी रोशनी बेहद हल्की थी।
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के खगोलविद डॉ. मैट बोथवेल का कहना है कि टक्कर के कारण चांद की धूल का एक बड़ा गुबार उठा होगा, जो 100 किलोमीटर तक ऊपर गया होगा और कई मिनटों तक रहा होगा।
फिलहाल जब यह हादसा हुआ, तब चांद का चक्कर लगा रहा कोई भी स्पेसक्राफ्ट सही पोजिशन में नहीं था, इसलिए लाइव तस्वीरें नहीं मिल पाई हैं।
दक्षिण कोरिया का ‘दानुरी’ ऑर्बिटर और नासा का ‘लूनर रिकोनिसेंस ऑर्बिटर’ (LRO) आने वाले दिनों में टक्कर वाली जगह के ऊपर से गुजरेंगे और तस्वीरें लेंगे। वैज्ञानिक पुरानी और नई तस्वीरों की तुलना करके चांद की सतह पर बने नए निशान की पहचान करेंगे।
चांद पर पहले से मौजूद है 190 टन कचरा
इस टक्कर के बाद चांद पर इंसानों की छोड़ी गई या दुर्घटनाग्रस्त हुई चीजों की संख्या बढ़कर लगभग 3,000 हो गई है। इनका कुल वजन करीब 190 टन हो चुका है।
सितंबर 1959 में सोवियत संघ का ‘लूना 2’ चांद की सतह पर पहुंचने वाला पहला मानव निर्मित ऑब्जेक्ट था। इसके अलावा नासा के अकेले अपोलो प्रोग्राम से जुड़ी 796 चीजें चांद पर मौजूद हैं।
चांद पर कोई वायुमंडल या पर्यावरण नहीं है, इसलिए इस कचरे से वहां किसी ईकोसिस्टम को नुकसान नहीं पहुंचता। हालांकि, वैज्ञानिक चिंतित हैं कि भविष्य में बढ़ते लूनर ट्रैफिक के कारण ऐतिहासिक अपोलो लैंडिंग साइट्स को नुकसान न पहुंचे और नए स्पेसक्राफ्ट्स के टकराने का जोखिम न बढ़े।
NASA और वैज्ञानिकों को इस टक्कर से क्या फायदा होगा?
साइंस म्यूजियम की स्पेस हेड लिब्बी जैक्सन के अनुसार, यह वैज्ञानिकों के लिए काफी रोमांचक प्रयोग है क्योंकि रॉकेट की स्पीड, वजन और आकार का डेटा पहले से मौजूद था।
आमतौर पर जब कोई प्राकृतिक उल्कापिंड चांद से टकराता है, तो वैज्ञानिकों के पास उसका शुरुआती डेटा नहीं होता। इस टक्कर से बने नए गड्ढे और उड़ी हुई धूल की परत का अध्ययन करके वैज्ञानिक यह समझ सकेंगे कि अरबों साल पहले चांद और हमारे सौर मंडल का निर्माण कैसे हुआ था।
इधर ऊपरी हिस्सा टकराया, उधर 18वीं बार उड़ने को तैयार बूस्टर
स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट का निचला हिस्सा रीयूजेबल होता है। इसे बूस्टर कहते हैं और लैंडिंग करके धरती पर वापस आ जाता है। जिस जनवरी 2025 वाले मिशन का ऊपरी हिस्सा भटककर चांद से टकराया, उसी रॉकेट के निचले बूस्टर को 10 अगस्त को 18वीं बार लॉन्च किया जाएगा।
इंसान द्वारा अंतरिक्ष में भेजे गए रॉकेट्स के छूटे हुए टुकड़े, निष्क्रिय सैटेलाइट्स और मलबे को स्पेस डैब्रिस कहा जाता है। वहीं चंद्रमा के पश्चिमी किनारे पर स्थित एक बड़ा गड्ढा है, जिसका व्यास करीब 170 किलोमीटर है। इसे आइंस्टीन क्रेटर नाम दिया गया है।
तेल अवीव/तेहरान/वॉशिंगटन, एजेंसी। ईरान जंग शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं तो दुनियाभर में महंगाई भी बढ़ गई। इस दौरान अप्रैल से जून के बीच दुनिया की 6 सबसे बड़ी तेल कंपनियों ने रिकॉर्ड 81 अरब डॉलर का मुनाफा कमाया। अल जजीरा की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।
मुनाफे की यह रकम करीब 7.7 लाख करोड़ रुपए होती है, जो भारत के पूरे साल के रक्षा बजट 6.81 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा है।
जंग शुरू हुई तक कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल था। यह अप्रैल से जून के बीच 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। यानी, तेल कंपनियों ने इस दौरान करीब 23% मुनाफा कमाया।
यमन में भारतीय जहाज पर हमला
यमन के पास लाल सागर में भारतीय झंडे वाले कारोबारी जहाज पर हमला हुआ है। जहाज ‘एमएसवी फैजे नूर-ए-औलिया’ हमले में डूब गया। सवार सभी 13 भारतीय नागरिकों को बचा लिया गया।
ईरान में विदेश मंत्री अब्बास अराघची को हटाने की तैयारी
ईरान के कुछ सांसद विदेश मंत्री अब्बास अराघची के खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी कर रहे हैं। उनका आरोप है कि अमेरिका से बातचीत और संभावित समझौते ने देश के हितों को नुकसान पहुंचाया है।
राष्ट्रपति पजशकियान की ताकत घटी
इजराइली चैनल 14 की रिपोर्ट के मुताबिक सुरक्षा, विदेश नीति और परमाणु कार्यक्रम जैसे अहम मामलों में अब राष्ट्रपति की भूमिका सीमित कर दी गई है। इन फैसलों में IRGC कमांडर अहमद वाहिदी की राय अंतिम मानी जाएगी।
अमेरिका-ईरान समझौते की उम्मीद से कच्चे तेल के दाम गिरे
होर्मुज स्ट्रेट पर समझौते की उम्मीद के बाद अमेरिकी WTI क्रूड करीब 5% गिरकर 76.32 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जबकि ब्रेंट क्रूड भी 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे पहुंच गया।
नई दिल्ली, एजेंसी। थाईलैंड के फुकेट से दिल्ली आ रही एअर इंडिया फ्लाइट AI2379 मंगलवार को टर्बुलेंस, यानी तेज हवा के झटकों में फंस गई। अचानक 300 फीट तक नीचे आ गई।
हालांकि, पायलट ने स्थिति संभाली और फ्लाइट को दिल्ली एयरपोर्ट पर सुबह 11:30 बजे सुरक्षित उतार लिया। प्लेन में 134 यात्री और 8 क्रू मेंबर्स सवार थे।
डायरेक्टर जनरल सिविल एविएशन (DGCA) के अधिकारी ने न्यूज एजेंसी PTI को बताया कि घटना में 11 यात्री और 4 क्रू मेंबर्स समेत 15 लोग घायल हुए हैं। इनमें से कुछ को दिल्ली एयरपोर्ट के मेडिकल सेंटर और 7 घायलों को फोर्टिस अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
एअर इंडिया ने पहले बताया था कि सभी यात्री और क्रू सुरक्षित हैं। किसी के गंभीर रूप से घायल होने की खबर नहीं है।
फ्लाइट में सवार एक यात्री ने दावा किया कि उड़ान भरने के करीब डेढ़ घंटे बाद तेज झटके लगने लगे। सुबह का समय था और ज्यादातर यात्री सो रहे थे। अचानक विमान जोर से हिलने लगा और 2-3 मिनट तक पलटी खाता रहा।
डायरेक्टर जनरल सिविल एविएशन (DGCA) इस घटना की जांच कर रहा है।
यात्री के मुताबिक कुछ लोगों को ज्यादा चोटें आई हैं, जबकि 70 से 80% लोगों को मामूली चोट लगी हैं। फ्लाइट की तस्वीरें भी सामने आई हैं, जिनमें उसकी सीलिंग के पैनल में दरारें दिखीं।
विमान की छत में दरारें…
टर्बुलेंस में अचानक कई फीट नीचे आ सकता है विमान
टर्बुलेंस का मतलब है हवा का बहाव अचानक बदल जाना, जिससे विमान को झटके लगने लगते हैं। इस दौरान विमान कुछ समय के लिए ऊपर-नीचे या दाएं-बाएं हिल सकता है और कभी-कभी कुछ फीट नीचे भी आ जाता है। इसी वजह से यात्रियों को लगता है कि विमान गिर रहा है। हालांकि, ज्यादातर मामलों में ऐसा नहीं होता।
टर्बुलेंस तीव्रता के लिहाज से तीन तरह के होते हैं
हल्के टर्बुलेंस: इसमें प्लेन 1 मीटर तक ऊपर-नीचे होता है। यात्रियों को पता भी नहीं चलता।
मध्यम टर्बुलेंस: इसमें जहाज 3-6 मीटर तक ऊपर-नीचे होते हैं। इससे ड्रिंक गिर सकता है।
गंभीर टर्बुलेंस: इसमें जहाज 30 मीटर तक ऊपर-नीचे होते हैं। सीट बेल्ट न लगाए रहने पर पैसेंजर उछलकर गिर सकते हैं।
क्या टर्बुलेंस की वजह से प्लेन क्रैश हो सकता है?
आधुनिक तकनीक और बेहतर सुरक्षा सिस्टम की वजह से आज टर्बुलेंस से विमान हादसे की आशंका काफी कम हो गई है। हालांकि, बेहद गंभीर टर्बुलेंस या खराब मौसम में दुर्घटना का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता।
हालांकि, आज के आधुनिक विमान हर तरह के टर्बुलेंस को झेलने के हिसाब से बनाए जाते हैं। पायलटों को भी ऐसी परिस्थितियों से सुरक्षित तरीके से निपटने की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है।
दुनिया में टर्बुलेंस से जुड़े 5 बड़े विमान हादसे
2001 में अमेरिकन एयरलाइंस फ्लाइट 587 टेकऑफ के कुछ देर बाद वेक टर्बुलेंस की वजह से क्रैश हो गई थी। इस हादसे में विमान में सवार सभी 260 लोगों की मौत हो गई थी।
1966 में जापान की बीओएसी फ्लाइट का पिछला हिस्सा माउंट फूजी के पास माउंटेन वेव टर्बुलेंस से हवा में टूट गया, जिससे 124 लोगों की मौत जो गई।
1964 में अमेरिका की नॉर्थवेस्ट ओरिएंट फ्लाइट तूफान और उससे पैदा हुई टर्बुलेंस की चपेट में आकर दुर्घटनाग्रस्त हो गई। हादसे में 84 लोगों की मौत हो गई।
1994 में अमेरिका की यूएस एयर फ्लाइट 1016 लैंडिंग के दौरान तूफान से पैदा हुए टर्बुलेंस की चपेट में आकर क्रैश हो गई थी। इस हादसे में 37 लोगों की मौत हुई थी।
1999 में अमेरिकन एयरलाइंस फ्लाइट 1420 भी खराब मौसम और टर्बुलेंस के बाद रनवे से फिसलकर क्रैश हो गई थी, जिसमें 11 लोगों की जान गई।
काठमांडु, एजेंसी। मशहूर पर्वतारोही निर्मल पुर्जा की पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में हिमस्खलन की चपेट में आने से मौत हो गई। उनकी ही पर्वतारोहण कंपनी एलीट एक्सपेडिशन ने इसकी पुष्टि की है।
निर्मल 30 जुलाई को काराकोरम इलाके में 8,051 मीटर ऊंची ब्रॉड पीक पर चढ़ाई कर रहे थे। इस दौरान करीब 7,000 मीटर की ऊंचाई पर यह हादसा हुआ। इसमें निर्मल समेत 10 पर्वतारोही लापता हो गए थे। इनमें छह नेपाली थे।
पुर्जा ने 2012 में ब्रिटिश नागरिकता ले ली थी, जिसके बाद उनकी नेपाली नागरिकता खत्म हो गई थी।
निर्मल पुर्जा का शव हेलिकॉप्टर से लाया गया।
30 जुलाई को ब्रॉड पीक पर चढ़ाई के दौरान हुए हिमस्खलन में 10 पर्वतारोहियों की मौत हो गई। इससे पहले 2013 में ब्रॉड पीक पर चढ़ाई के दौरान छह पर्वतारोहियों की जान गई थी।
6 महीने में 14 सबसे ऊंची चोटियां फतह कीं
नेपाल और दुनियाभर के पर्वतारोहियों के बीच ‘निम्स दाइ’ के नाम से मशहूर निर्मल पुर्जा ने 2019 में ‘प्रोजेक्ट पॉसिबल’ की शुरुआत की थी।
उनका मकसद था दुनिया की 8,000 मीटर से ऊंची सभी 14 चोटियों को सिर्फ सात महीने में फतह करना। उस समय इसे लगभग असंभव माना जा रहा था।
निर्मल पुर्जा ने यह कारनामा महज छह महीने और छह दिन में पूरा कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने दक्षिण कोरिया के पर्वतारोही किम चांग-हो का करीब 8 साल पुराना विश्व रिकॉर्ड तोड़ दिया।
तीसरी बार ब्रॉड पीक की चढ़ाई में जान गई
निर्मल पुर्जा ने पहली बार ब्रॉड पीक को 2019 में प्रोजेक्ट पॉसिबल के दौरान फतह किया था। ब्रॉड पीक को दुनिया के सबसे मुश्किल पर्वतों में गिना जाता है।
दूसरी बार इस चोटी को उन्होंने 2023 में फतह किया। तब उन्होंने बिना सप्लीमेंट ऑक्सीजन के चढ़ाई की थी।
इस चढ़ाई की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने पाकिस्तान की पांचों 8,000 मीटर से ऊंची चोटियां (नंगा पर्वत, गाशरब्रुम-2, गाशरब्रुम-1, ब्रॉड पीक और के2) सिर्फ 26 दिनों में फतह कर नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया।
तीसरी बार ब्रॉड पीक पर चढ़ाई के दौरान शिखर के पास हिमस्खलन की चपेट में आने से उनका निधन हो गया।
सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि इसी हिमस्खलन में निर्मल पुर्जा और उनके सहयोगियों की जान गई।
ब्रिटिश स्पेशल फोर्स जॉइन करने वाले पहले नेपाली
निर्मल पुर्जा का जन्म 25 जुलाई 1983 को नेपाल के म्याग्दी जिले के दाना गांव में हुआ था। उनके परिवार का सेना से गहरा नाता रहा है। कई पीढ़ियों से परिवार के लोग गोरखा रेजिमेंट में सेवा करते रहे।
उनके पिता और तीन बड़े भाई भी गोरखा सैनिक थे। ऐसे माहौल में पले-बढ़े निर्मल ने भी बचपन से ही सैनिक बनने का सपना देखा। बाद में उन्होंने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया और ब्रिटिश सेना की गोरखा रेजिमेंट में भर्ती हो गए।
करीब छह साल तक गोरखा सैनिक के रूप में सेवा देने के बाद उन्होंने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की। वे ब्रिटिश रॉयल नेवी की स्पेशल बोट सर्विस (SBS) में शामिल होने वाले पहले नेपाली बने।
SBS ब्रिटेन की नौसेना की सबसे खतरनाक और प्रतिष्ठित स्पेशल फोर्स है। इसके सैनिक समुद्र, पहाड़, जंगल और दुश्मन के इलाके में सीक्रेट ऑपरेशन चलाने के लिए ट्रेंड होते हैं। इसमें चयन इतना मुश्किल है कि बहुत कम सैनिक इसे पूरा कर पाते हैं।
निर्मल पूर्जा ब्रिटेन की एलीट स्पेशल फोर्स SBS में टियर-1 ऑपरेटर रहे।
सपने को पूरा करने के लिए नौकरी छोड़ दी
सेना में रहते हुए निर्मल पुर्जा ने अत्यधिक ठंडे और मुश्किल इलाकों में कई स्पेशल ऑपरेशन में हिस्सा लिया। इसी दौरान उनके मन में दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करने का ख्याल आया
साल 2012 में निर्मल पुर्जा पहली बार एवरेस्ट बेस कैंप ट्रेक पर गए थे। उस समय वे सेना में थे तभी उनके मन में एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने का ख्याल आया। इसके लिए उन्होंने ट्रेनिंग शुरू की।
करीब दो साल की मेहनत के बाद 2014 में उन्होंने पहली बार माउंट एवरेस्ट फतह किया। इसके बाद उन्होंने दुनिया की 8,000 मीटर से ऊंची सभी चोटियों पर चढ़ने का लक्ष्य बना लिया।
अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने 2018 में नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह पर्वतारोहण पर फोकस किया।
इसमें सबसे बड़ी चुनौती पैसों की थी। खर्च जुटाने के लिए उन्होंने अपना घर तक बेच दिया, ताकि दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों पर चढ़ने का सपना पूरा कर सकें।
निर्मल पुर्जा ने मई 2019 को माउंट एवरेस्ट की चोटी पर चढ़े थे।
नेटफ्लिक्स की डॉक्यूमेंट्री से दुनियाभर में मिली पहचान
2019 में छह महीने और छह दिन में दुनिया की 14 सबसे ऊंची चोटियां फतह करने के बाद निर्मल पुर्जा की कहानी पूरी दुनिया तक पहुंची। उनके इस रिकॉर्ड अभियान पर नेटफ्लिक्स ने ’14 पीक्स: नथिंग इज इम्पॉसिबल’ नाम से डॉक्यूमेंट्री बनाई।
इस डॉक्यूमेंट्री में दिखाया गया कि कैसे निर्मल पुर्जा और उनकी नेपाली टीम ने बेहद कम समय में दुनिया की सबसे कठिन चोटियों को फतह किया। इसमें उनके सामने आई खराब मौसम की चुनौतियां, मौत का खतरा, ऑक्सीजन की कमी और कई जानलेवा हालात भी दिखाए गए हैं।
डॉक्यूमेंट्री रिलीज होने के बाद इसे 191 देशों में देखा गया। इसके जरिए नेपाली पर्वतारोहियों के योगदान पर पूरी दुनिया का ध्यान गया। इससे पहले पर्वतारोहण की बड़ी उपलब्धियों में अक्सर विदेशी पर्वतारोहियों की चर्चा होती थी, जबकि नेपाली शेरपाओं और पर्वतारोहियों की भूमिका उतनी सामने नहीं आ पाती थी।
इसके बाद 2020 में निर्मल पुर्जा ने ‘बियॉन्ड पॉसिबल’ नाम से अपनी आत्मकथा भी प्रकाशित की। इस किताब में उन्होंने अपने बचपन, सैन्य जीवन, पर्वतारोहण की शुरुआत, ‘प्रोजेक्ट पॉसिबल’ और विश्व रिकॉर्ड बनाने तक के पूरे सफर को विस्तार से बताया है।
रिकॉर्ड की परवाह किए बिना पर्वतारोही का रेस्क्यू किया
निर्मल पुर्जा ने प्रोजेक्ट पॉसिबल के तहत अन्नपूर्णा-1 पर सफल चढ़ाई की। लौटे तो पता चला कि मलेशिया के डॉ. वुई किन चिन अन्नपूर्णा पर करीब 7500 फीट की ऊंचाई पर फंसे हुए हैं।
पुर्जा रिकॉर्ड की परवाह किए बगैर हेलिकॉप्टर से ऊंचाई वाले कैंप तक पहुंचे। रेस्क्यू शुरू किया। उनकी टीम करीब 4 घंटे में डॉ. चिन तक पहुंच गई। सामान्य रूप से यह दूरी करीब 16 घंटे में पूरी होती है। डॉ. चिन को नीचे लाया गया, हालांकि बाद में सिंगापुर के अस्पताल में उनकी मौत हो गई।