विदेश
ट्रम्प को मांगने पर भी नोबेल पीस प्राइज नहीं मिला:वेनेजुएला में विपक्षी नेता मारिया मचाडो को अवॉर्ड, 20 साल से लोकतंत्र के लिए लड़ रहीं
ओस्लो,एजेंसी। वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया मचाडो को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला है। उन्होंने वेनेजुएला में लोकतांत्रिक अधिकारों को बढ़ावा देने और तानाशाही से लोकतंत्र की ओर शांतिपूर्ण बदलाव लाने के लिए 20 साल लगातार संघर्ष किया है।
नोबेल समिति ने कहा कि आज जब दुनिया के कई हिस्सों में तानाशाही बढ़ रही है और लोकतंत्र कमजोर हो रहा है, ऐसे समय में मारिया मचाडो जैसे लोगों की हिम्मत उम्मीद जगाती है।
समिति ने कहा- लोकतंत्र ही स्थायी शांति की शर्त है। जब सत्ता हिंसा और डर के जरिए जनता को दबाने लगती है, तो ऐसे साहसी लोगों को सम्मान देना जरूरी हो जाता है।

मचाडो 20 साल से वेनेजुएला में लोकतंत्र के लिए लड़ाई लड़ रहीं हैं।
मचाडो ने सुमाते नामक संगठन की स्थापना की, जो लोकतंत्र की बेहतरी के लिए काम करता है। वे देश में मुफ्त और निष्पक्ष चुनावों की मांग करती रही हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प बीते कई महीने से नोबेल की दावेदारी कर रहे थे, लेकिन नोबेल कमेटी ने उन्हें इस पुरस्कार के लिए नहीं चुना।

शांति का नोबेल पुरस्कार 10 दिसंबर को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में दिया जाएगा।
मचाडो ने नोबेल पुरस्कार ट्रम्प को समर्पित किया
वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया मचाडो नोबेल पुरस्कार वेनेजुएला के लोगों और डोनाल्ड ट्रम्प को समर्पित किया। X पर अपने बयान में मचाडो ने कहा- यह पुरस्कार वेनेजुएला के लोगों की आजादी की लड़ाई को मान्यता देता है। हम जीत के करीब हैं।
उन्होंने आगे कहा कि आज हमें ट्रम्प, अमेरिका, लैटिन अमेरिका और दुनिया के लोकतांत्रिक देशों का साथ चाहिए। मैं यह पुरस्कार वेनेजुएला के दुखी लोगों और ट्रम्प को समर्पित करती हूं, जिन्होंने हमारे संघर्ष को मजबूत समर्थन दिया।
अमेरिका ने नोबेल कमेटी पर पक्षपात का आरोप लगाया
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को नोबेल नहीं मिलने पर अमेरिका ने पक्षपात का आरोप लगाया। व्हाइट हाउस के एक प्रवक्ता ने रॉयटर्स न्यूज एजेंसी को कहा कि नोबेल कमेटी ने एक बार फिर साबित किया कि वे शांति से ज्यादा राजनीति को तरजीह देते हैं।
ट्रम्प को नोबेल क्यों नहीं मिला?
2025 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन की अंतिम तिथि 31 जनवरी 2025 थी। इस तिथि के बाद प्राप्त नामांकनों पर विचार नहीं किया गया। नामांकन की प्रक्रिया 1 फरवरी से शुरू होती है, और 31 जनवरी तक मिले नामांकनों को ही मान्य माना जाता है।
ट्रम्प के 20 जनवरी 2025 को दोबारा राष्ट्रपति बनने के सिर्फ 11 दिन बाद नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकन बंद हो गया था। इतने कम दिन में ट्रम्प के पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं था जिसके लिए उन्हें नोबेल मिलता।
शावेज का भाषण बंद कराकर दुनियाभर में मशहूर हुईं
मचाडो दुनिया में पहली बार तब सुर्खियों में आईं जब उन्होंने वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति का भाषण बंद करा दिया था। यह घटना 14 जनवरी 2012 की है। शावेज संसद में 9 घंटे 45 मिनट का भाषण दे चुके थे। तभी मचाहो ने चिल्लाते हुए उन्हें ‘चोर’ कहा और लोगों की जब्त की गई संपत्ति को लौटाने को कहा।
इसके जवाब में शावेज ने कहा कि वो बहस नहीं करेंगे क्योंकि वह इसके काबिल नहीं। यह घटना देशभर में चर्चा का विषय बन गई और माचाडो को एक साहसी विपक्षी नेता के रूप में स्थापित किया।
ट्रम्प माचाडो को स्वतंत्रता सेनानी कह चुके हैं
राष्ट्रपति ट्रम्प माचाडो को स्वतंत्रता सेनानी कह चुके हैं। मारिया मचाडो वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ चुनाव लड़ चुकी हैं।मचाडो 1 साल से भी ज्यादा समय से देश में ही छुपकर रह रही हैं।
मचाडो को कई पुरस्कार मिल चुके
- 2025 में लोकतंत्र की लड़ाई लड़ने के लिए नोबेल पीस प्राइज मिला।
- 2024 सखारोव पुरस्कार: यूरोपीय संसद ने उन्हें और एडमुंडो गोंजालेज को लोकतंत्र की रक्षा के लिए यह पुरस्कार दिया।
- 2024 वाच्लाव हावेल मानवाधिकार पुरस्कार: काउंसिल ऑफ यूरोप ने मानवाधिकारों के लिए उनकी मेहनत को सम्मानित किया।
- 2025 करेज अवॉर्ड: जेनेवा समिट फॉर ह्यूमन राइट्स ने उन्हें और गोंजालेज को यह पुरस्कार दिया।
- 2018 बीबीसी सम्मान: बीबीसी ने उन्हें दुनिया की 100 सबसे प्रभावशाली महिलाओं में शामिल किया।
- 2024 में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार थीं
- मचाडो 2024 के चुनाव से पहले विपक्ष की राष्ट्रपति उम्मीदवार थीं, लेकिन वेनेजुएला सरकार ने उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी। इसके बाद उन्होंने दूसरे पार्टी के प्रतिनिधि एडमंडो गोंजालेज उर्रुतिया का समर्थन किया। इसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी मिला।
- वेनेजुएला में मचाडो के समर्थक पार्टी को साफ जीत मिली लेकिन शासन ने चुनाव परिणाम स्वीकार नहीं किया और सत्ता पर कब्जा बनाए रखा।
- मचाडो ने नोबेल पुरस्कार के तीन मापदंड पूरे किए
- नोबेल कमिटि ने कहा कि मचाडो ने नोबेल पुरस्कार के तीनों मापदंडों को पूरा किया है। उन्होंने विपक्ष को एकजुट किया, सैन्यकरण के खिलाफ लगातार खड़ी रहीं और लोकतंत्र को समर्थन दिया। उन्होंने लोकतंत्र में ऐसे भविष्य की उम्मीद जगाई है जहां नागरिकों के मूल अधिकार सुरक्षित हों और उनकी आवाज सुनी जाए, और लोग स्वतंत्र और शांति से जी सकें।
- मचाडो वेनेजुएला की आयरन लेडी कहीं जाती हैंमचाडो को वेनेजुएला की ‘आयरन लेडी’ कहा जाता है। उन्होंने पूरे वेनेजुएला में लोगों को एकजुट किया ताकि वे देश के तानाशाह राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को चुनाव में हरा सकें। अब वे देश में अकेली ही छिपकर रह रही हैं।

नोबेल कमेटी बोली- हमने हमेशा बहादुरों को सम्मानित किया
नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने कहा कि हमने हमेशा बहादुर लोगों को सम्मानित किया है जिन्होंने दमन के खिलाफ खड़े होकर आजादी की उम्मीद बनाए रखी। पिछले साल मचाडो को अपनी जान के लिए छिपकर रहना पड़ा, लेकिन उन्होंने देश में ही रहना चुना, जिससे लाखों लोग प्रेरित हुए।
वेनेजुएला की विपक्षी नेता को शांति का नोबेल
मारिया कोरीना मचाडो को शांति का नोबेल पुरस्कार वेनेजुएला में लोकतांत्रिक अधिकारों को बढ़ावा देने और तानाशाही से लोकतंत्र की ओर शांतिपूर्ण बदलाव लाने के लिए उनके लगातार संघर्ष के लिए दिया गया है।

यहूदी संगठन की मांग- नोबेल का नाम बदलकर ट्रम्प के नाम पर रखो
अमेरिका के सबसे बड़े यहूदी रिपब्लिकन संगठन, रिपब्लिकन ज्यूइश कोएलिशन (RJC) ने डोनाल्ड ट्रम्प को नोबेल प्राइज देने की मांग की है। इसके साथ ही इन्होंने मांग की है कि इस पुरस्कार का नाम ट्रम्प के नाम पर होना चाहिए।
RJC ने कहा कि वे ट्रम्प के साहस और गाजा में बंधकों को छुड़ाने के लिए उनके मजबूत इरादे की तारीफ करते हैं। इसके अलावा इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने X पर लिखा कि ट्रम्प नोबेल के योग्य उम्मीदवार हैं।
उन्होंने एक तस्वीर भी शेयर की जिसमें वे ट्रम्प को नोबेल पुरस्कार देते दिख रहे हैं। माल्टा के विदेश मंत्री इयान बोर्ग ने भी फेसबुक पर कहा- मैंने भी ट्रम्प को नोबेल के लिए चुना है।
8 देशों ने ट्रम्प को नोबेल के लिए नॉमिनेट किया
8 देश ट्रम्प को नोबेल के लिए नॉमिनेट कर चुके हैं। इनमें पाकिस्तान और इजराइल जैसे धुर विरोधी देशों के अलावा अमेरिका, आर्मेनिया, अजरबैजान, माल्टा, कंबोडिया जैसे देश हैं। कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अर्जेंटीना ने भी ट्रम्प को नोबेल के लिए सिफारिश की है।
2025 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन की आखिरी तारीख 31 जनवरी 2025 थी। नार्वेजियन नोबेल कमेटी के नियमों के अनुसार, इस तारीख के बाद आए किसी भी नामांकन को 2025 के नोबेल के लिए स्वीकार नहीं किया गया।
हर साल 1 फरवरी से नामांकन की प्रक्रिया शुरू होती है और उसी दिन तक मिले नाम ही मान्य होते हैं। ट्रम्प ने 20 जनवरी को राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी, उसके 11 दिन बाद ही नॉमिनेशन प्रोसेस बंद हो गई थी। ऐसे में इस बार ट्रम्प की दावेदारी कमजोर है
अगले साल ट्रम्प की दावेदारी मजबूत हो सकती है
ट्रम्प ने हाल ही में गाजा सीजफायर प्लान पेश किया था, जिसे इजराइल और हमास दोनों मंजूर कर चुके हैं। ट्रम्प इसे भी अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रहे हैं।
हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि गाजा में शांति समझौता देर से हुआ, इसलिए इस बार ट्रम्प की जीत मुश्किल है। नोबेल कमेटी की निना ग्रेगर ने कहा कि नोबेल के फैसले पर गाजा सीजफायर का असर नहीं होगा, लेकिन अगर यह शांति स्थायी रही, तो अगले साल ट्रम्प की दावेदारी मजबूत हो सकती है।
इमरान मानवाधिकार और मस्क अभिव्यक्ति की आजादी के लिए नॉमिनेट
पाकिस्तान के पूर्व पीएम इमरान खान को पाकिस्तान वर्ल्ड अलायंस ने मानवाधिकार और लोकतंत्र के लिए नॉमिनेट किया है। खान अगस्त 2023 से पाकिस्तान की अडियाला जेल में बंद हैं। उन्हें भ्रष्टाचार के एक मामले में 14 साल की जेल हुई है।
टेस्ला के CEO इलॉन मस्क को यूरोपीय सांसद ब्रैंको ग्रिम्स ने अभिव्यक्ति की आजादी के लिए नॉमिनेट किया है। हालांकि मस्क कह चुके हैं कि उन्हें कोई पुरस्कार नहीं चाहिए।
गांधी नोबेल के लिए 5 बार नॉमिनेट हुए थे
नोबेल शांति पुरस्कार 1901 से 2024 तक 141 बार दिया जा चुका है। 111 व्यक्तियों और 30 संगठनों को यह सम्मान मिला है। गांधी को 1937 से 1948 तक 5 बार नोबेल के लिए नॉमिनेट किया गया था, लेकिन हर बार वे पुरस्कार से चूक गए।
गांधी 1948 में नोबेल के सबसे बड़े दावेदार थे, लेकिन नॉमिनेशन क्लोज होने से 1 दिन पहले ही उनकी हत्या कर दी गई थी। नोबेल कमेटी ने उस साल किसी को भी शांति का नोबेल नहीं दिया।
कमेटी का कहना था कि वे किसी ऐसे व्यक्ति को यह पुरस्कार देना चाहते थे जो गांधी जैसी शांति और अहिंसा की भावना को बढ़ावा दे, लेकिन उन्हें कोई उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिला।
1895 में हुई थी नोबेल पुरस्कार की स्थापना
नोबेल पुरस्कारों की स्थापना 1895 में हुई थी और पुरस्कार 1901 में मिला। 1901 से 2024 तक साहित्य की फील्ड में 121 लोगों को सम्मानित किया जा चुका है।
इन पुरस्कारों को वैज्ञानिक और इन्वेंटर अल्फ्रेड बर्नहार्ड नोबेल की वसीयत के आधार पर दिया जाता है। शुरुआत में केवल फिजिक्स, मेडिसिन, केमिस्ट्री, साहित्य और शांति के क्षेत्र में ही नोबेल दिया जाता था। बाद में इकोनॉमिक्स के क्षेत्र में भी नोबेल दिया जाने लगा।
नोबेल प्राइज वेबसाइट के मुताबिक उनकी ओर से किसी भी फील्ड में नोबेल के लिए नॉमिनेट होने वाले लोगों के नाम अगले 50 साल तक उजागर नहीं किए जाते हैं।
विदेश
मिडल ईस्ट टकराव निर्णायक मोड़ पर ! अमेरिका-ईरान आखिर बातचीत को तैयार, वेंस पहुंच रहे पाकिस्तान
इस्लामाबाद,एजेंसी। मिडल ईस्ट टकराव अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति वार्ता के लिए पाकिस्तान में बड़ा कूटनीतिक प्रयास शुरू हो गया है। JD Vance एक बड़े अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ Pakistan रवाना हो रहे हैं, जहां Iran के साथ शांति वार्ता की जाएगी। यह वार्ता ऐसे समय हो रही है जब अमेरिका, ईरान और Israel के बीच चल रहा युद्ध अब आठवें हफ्ते में पहुंच चुका है और दो हफ्ते का सीजफायर खत्म होने के करीब है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वैंस (JD Vance) के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंचने वाला है, जिसमें स्टीव विटकॉफ़ (Steve Witkoff) और (जेरेड कुशनर) Jared Kushner भी शामिल होंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि बुधवार को युद्धविराम समाप्त हो रहा है और वह इसे बढ़ाने के इच्छुक नहीं हैं।

ईरान हुआ राजी
ईरान ने क्षेत्रीय मध्यस्थों को बताया है कि वह अमेरिका के साथ शांति वार्ता के दूसरे दौर के लिए मंगलवार को पाकिस्तान में एक वार्ता टीम भेजेगा। तेहरान ने सार्वजनिक रूप से इस बात की पुष्टि नहीं की थी कि वह इस्लामाबाद में होने वाली बैठकों में अपने प्रतिनिधि भेजेगा। वार्ता में उसकी भागीदारी को लेकर भ्रम तब और बढ़ गया, जब ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधि इस्माइल बाकाई ने सोमवार को कहा कि पाकिस्तानी राजधानी में वार्ता के दूसरे दौर की कोई योजना नहीं है।
दबाव में बातचीत मंजूर नहीं
इससे पहले ईरान ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी दबाव में बातचीत नहीं करेगा। उसका कहना है कि जब तक अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगी नाकेबंदी नहीं हटाता, तब तक वार्ता का कोई मतलब नहीं है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के अंदर भी इस मुद्दे पर दबाव है, खासकर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की ओर से सख्त रुख अपनाने की मांग की जा रही है। इसी बीच पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की जैसे देश मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं और दोनों पक्षों को बातचीत के लिए तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान में होने वाली यह वार्ता तय करेगी कि हालात शांति की ओर बढ़ेंगे या फिर एक बड़े युद्ध की तरफ।अगर समझौता नहीं हुआ, तो मिडिल ईस्ट में एक बड़ा सैन्य संघर्ष शुरू हो सकता है ।
युद्ध की भयावह स्थिति
लगभग दो महीने से जारी युद्ध से वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला देने वाले ऊर्जा संकट के और गहराने की आशंका है। इस संघर्ष में अब तक भारी जान-माल का नुकसान हो चुका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान में 3,300 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें 300 से ज्यादा बच्चे शामिल हैं । Lebanon में 2,200 से ज्यादा मौतें हो चुकी और हजारों लोग घायल हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि इस युद्ध का सबसे ज्यादा असर आम नागरिकों पर पड़ा है।
देश
ईरान युद्ध के बीच भारत की आर्थिक रफ्तार बरकरार: GDP ग्रोथ में बना एशिया का नंबर-1 देश, चीन भी रह गया पीछे
नई दिल्ली,एजेंसी। संयुक्त राष्ट्र की संस्था United Nations Economic and Social Commission for Asia and the Pacific की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान युद्ध और उससे पैदा हुए ऊर्जा संकट के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। इस वित्त वर्ष में भारत की GDP ग्रोथ 6.4% रहने का अनुमान है, जिससे भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा। रिपोर्ट में बताया गया कि पिछले साल भारत की ग्रोथ 7.4% थी, जो इस साल थोड़ी कम होकर 6.4% रहेगी, लेकिन अगले साल फिर बढ़कर 6.6% हो सकती है। यह अनुमान उस समय के हालात पर आधारित है जब Iran युद्ध चल रहा था और Strait of Hormuz पर असर पड़ने लगा था।


एशिया-प्रशांत क्षेत्र के अन्य देशों की तुलना में भारत की स्थिति बेहतर है। China की ग्रोथ इस साल 4.3% रहने का अनुमान है, जबकि Pakistan की ग्रोथ और कमजोर रह सकती है। इससे साफ है कि भारत क्षेत्र में सबसे आगे बना हुआ है। भारत की मजबूत ग्रोथ के पीछे घरेलू मांग, खासकर ग्रामीण इलाकों में बढ़ता खर्च, सबसे बड़ा कारण बताया गया है। इसके अलावा सर्विस सेक्टर जैसे आईटी और बैंकिंग भी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रहे हैं। सरकार की नीतियां और गरीब वर्ग के लिए दी गई आर्थिक मदद ने भी बाजार में पैसा बनाए रखा।

ESCAP के अधिकारी Hamza Malik के अनुसार, भारत की बढ़ती उत्पादकता और बड़ी आबादी उसकी आर्थिक मजबूती का बड़ा आधार है। इससे देश लंबे समय तक ऊंची ग्रोथ बनाए रख सकता है। हालांकि कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं, जैसे अमेरिका को निर्यात में गिरावट और वैश्विक ऊर्जा संकट का असर। फिर भी, इन मुश्किलों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर बनी हुई है और दुनिया में तेजी से आगे बढ़ रही है।
विदेश
अमेरिका द्वारा जब्त ईरानी जहाज का चीन से कनेक्शन, ‘Touska’ का गुप्त मिशन बेनकाब
वाशिंगठन/बीजिंग, एजेंसी। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक नई रिपोर्ट ने बड़ा खुलासा किया है। ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सेना द्वारा जब्त किए गए ईरानी मालवाहक जहाज M/V Touska को लेकर अब चीन कनेक्शन सामने आया है, जिससे इस पूरे मामले की गंभीरता और बढ़ गई है। सरल शब्दों में समझें तो यह जहाज ईरान के एक ऐसे नेटवर्क का हिस्सा बताया जा रहा है, जो चीन के बंदरगाहों से जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक यह जहाज हाल ही में चीन के झुहाई पोर्ट पर दो बार गया था और इसके जरिए ऐसे सामान ले जाए जाने की आशंका है, जो नागरिक और सैन्य दोनों तरह के उपयोग में आ सकता है।

अमेरिकी अधिकारियों ने इस जहाज को उस समय रोका जब यह अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को पार करने की कोशिश कर रहा था। चेतावनी के बाद भी न रुकने पर अमेरिकी बलों ने फायरिंग कर जहाज के इंजन को निष्क्रिय किया और फिर उस पर कब्जा कर लिया। हालांकि अभी तक यह साफ नहीं किया गया है कि जहाज में क्या सामान था, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह “डुअल-यूज़” यानी संवेदनशील सामग्री हो सकती है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि यह जहाज मलेशिया के पोर्ट क्लांग और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई रास्तों से होकर आया था। ऐसे रूट्स का इस्तेमाल अक्सर माल के असली स्रोत को छिपाने के लिए किया जाता है। समुद्र में जहाज-से-जहाज ट्रांसफर के जरिए ट्रैकिंग को मुश्किल बना दिया जाता है।
चीन ने इस मामले में साफ कहा है कि वह ईरान को हथियार नहीं देता और उसके पास डुअल-यूज़ सामान के निर्यात पर नियंत्रण है। लेकिन चीन अमेरिकी प्रतिबंधों को नहीं मानता, इसलिए यह विवाद और गहरा हो गया है। बीजिंग ने जहाज जब्त किए जाने पर चिंता जताई है और संयम बरतने की अपील की है। इस घटना ने यह भी दिखा दिया है कि ईरान-यूएस संघर्ष अब सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार और सप्लाई नेटवर्क से भी जुड़ चुका है। खासकर होर्मुज स्ट्रेट जैसे अहम समुद्री रास्ते पर तनाव बढ़ने से दुनिया की तेल सप्लाई और बाजार पर असर पड़ रहा है। कुल मिलाकर, यह मामला सिर्फ एक जहाज की जब्ती नहीं, बल्कि ईरान, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते रणनीतिक टकराव का संकेत है, जो आने वाले समय में और बड़ा रूप ले सकता है।
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