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क्या सिल्वर में आ सकता है 1980 जैसा क्रैश:तब हंट ब्रदर्स के कारण आई थी गिरावट, एक हफ्ते में करीब ₹25 हजार घटे दाम
मुंबई,एजेंसी। 1980 की बात है। चांदी की कीमत 2 डॉलर प्रति औंस (28.35 ग्राम) से बढ़कर 48 डॉलर तक पहुंच गई। पर यह हुआ कैसे? इसके पीछे थे अमेरिका के हंट ब्रदर्स।
दुनिया की चांदी का एक तिहाई हिस्सा इन दो भाइयों की जेब में था। नेल्सन बंकर हंट और विलियम हर्बर हंट ने चांदी को 700% से ज्यादा बढ़ा दिया। हंट ब्रदर्स की इस कहानी में शामिल है लालच, साजिश और एक ऐसा क्रैश जिसे सिल्वर थर्सडे कहा जाता है।
हंट ब्रदर्स की ये कहानी आज हम इसलिए बता रहे हैं क्योंकि 10 महीने में चांदी के दाम दोगुने हो गए, लेकिन बीते एक ही हफ्ते में रू.1.78 लाख रुपए प्रति किलो के हाई से ये रू.1.52 लाख पर आ चुकी है। यानी, इसके दामों में करीब 25 हजार रुपए की गिरावट आई है।
तो क्या अब चांदी में वैसा ही फॉल आ सकता है, जैसा 1980 के दशक में आया था? चांदी के भाव में आई तेजी की वजहें क्या है? हंट ब्रदर्स की स्टोरी से इसे समझते हैं…
चैप्टर 1: शुरुआत
हंट ब्रदर्स अमीर परिवार से आते थे। उनके पिता हरॉल्डसन लेफायेट हंट गरीब परिवार में पैदा हुए, लेकिन 22 साल की उम्र में बिजनेसमैन बन गए। वह कॉटन की खरीद-बेच करते थे।
जल्दी ही उनका फोकस ऑयल पर शिफ्ट हो गया, जिसमें उन्होंने अरबों डॉलर की कमाई की। पिता की मौत के बाद हंट ब्रदर्स ने अरबों डॉलर का फैमिली बिजनेस संभाला।

विलियम हर्बर्ट हंट (बाएं) और नेल्सन बंकर हंट ने मिलकर सिल्वर प्राइस बढ़ाए थे।
चैप्टर 2: पपेट मास्टर
1970 के दशक के आखिर में डॉलर कमजोर हो रहा था और हाइपरइन्फ्लेशन की भविष्यवाणी थी। ऐसे में हंट ब्रदर्स का फोकस सिल्वर की तरफ शिफ्ट हो गया।
उन्होंने फिजिकल सिल्वर जमा करना शुरू किया और सिल्वर फ्यूचर्स के कॉन्ट्रैक्ट्स खरीदे। उन्हें यकीन था कि सिल्वर की वैल्यू आसमान छू लेगी।
फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए कैश सेटलमेंट लेने की बजाय, उन्होंने फिजिकल सिल्वर डिलीवर करवाया। ऐसा कम ही लोग करते थे। 70 के दशक की शुरुआत में जब हंट ब्रदर्स ने सिल्वर खरीदना शुरू किया, तो कीमत 2 डॉलर प्रति औंस थी। 1979 तक ये 6 डॉलर पहुंच गई।
हंट ब्रदर्स के पास 100 मिलियन औंस से ज्यादा सिल्वर था। हंट ब्रदर्स सिल्वर के पपेट मास्टर बन चुके थे। यानी, वो अपने हिसाब से कीमतों को बढ़ा रहे थे।
इससे सिल्वर मार्केट में सप्लाई की दिक्कतें बढ़ने लगीं। दिसंबर 1979 में सिल्वर की कीमत 25 डॉलर प्रति औंस और 1980 में 50 डॉलर प्रति औंस पहुंच गई। लेकिन हंट ब्रदर्स ने उधार लेकर सिल्वर खरीदना जारी रखा।

हंट ब्रदर्स ने 1970 के दशक में फिजिकल सिल्वर जमा करना शुरू किया था।
चैप्टर 3: सिल्वर थर्सडे
हंट ब्रदर्स का प्लान बिल्कुल ठीक चल रहा था, लेकिन कमोडिटी एक्सचेंज, इंक. यानी, COMEX के दखल ने सब कुछ बदल दिया। सिल्वर के पीक से एक हफ्ते पहले 7 जनवरी 1980 को COMEX सिल्वर रूल 7 लाई। इसमें मार्जिन पर कमोडिटी खरीदने पर पाबंदियां लगा दी गई।
इससे हंट ब्रदर्स के लिए ब्रोकरेज से उधार लेकर सिल्वर खरीदना मुश्किल हो गया। इससे हंट ब्रदर्स की ताकत कमजोर पड़ने लगी। अब आती है वो तारीख जिसे सिल्वर थर्सडे कहा जाता है।
27 मार्च 1980 को हंट ब्रदर्स मार्जिन कॉल मिस कर गए। यानी, जो पैसा उन्हें देना था वो नहीं दे पाए। ऐसे में ब्रोकर ने सिल्वर बेचना शुरू कर दिया और एक ही दिन ये 50% से ज्यादा गिर गया।
- मार्जिन: जब आप ब्रोकर से उधार लेकर कुछ खरीदते हैं, तो कुछ पैसे पहले ही जमा करने पड़ते हैं। ये “मार्जिन” है। मान लीजिए आप रू.100 का सामान खरीदना चाहते हैं, लेकिन आपके पास सिर्फ रू.20 हैं। ब्रोकर बाकी रू.80 उधार देता है। यहां रू.20 “मार्जिन” है।
- मार्जिन कॉल: अगर बाजार में चीजों की कीमत गिरने लगे तो निवेश की वैल्यू कम हो जाती है। ब्रोकर को डर लगता है कि अगर और नुकसान हुआ, तो उधार का पैसा डूब सकता है। इसलिए वे आपको तुरंत और पैसे जमा करने के लिए कहते हैं। इसे मार्जिन कॉल कहते हैं।
- अगर मार्जिन कॉल मिस हो जाए: अगर आप पैसे नहीं जमा कर पाते तो ब्रोकर आपकी सारी होल्डिंग जबरदस्ती बेच देता है। हंट ब्रदर्स के साथ भी ऐसा ही हुआ था। जब चांदी की कीमत गिरने लगी तो ब्रोकर ने उनसे पैसे मांगे, लेकिन वो और पैसे नहीं दे पाए।

27 मार्च 1980 को सिल्वर के दाम एक ही दिन में 50% से ज्यादा गिर गए थे।
चैप्टर 4: क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन
इस क्रैश के बाद हंट ब्रदर्स के खिलाफ क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन शुरू हुआ। 1986 में उन्होंने अपनी कंपनी के दिवालिया होने की घोषणा की। 1988 में पर्सनल बैंकरप्सी भी घोषित की।
1988 में न्यूयॉर्क की जूरी ने हंट ब्रदर्स को ऑर्डर दिया कि वे पेरू सरकार की मिनरल मार्केटिंग कंपनी को 130 मिलियन डॉलर पेमेंट करें, क्योंकि क्रैश से उस कंपनी को नुकसान हुआ था।
कमोडिटी फ्यूचर्स ट्रेडिंग कमीशन ने दोनों भाइयों पर 10-10 मिलियन डॉलर का फाइन भी लगाया। सिल्वर रिजर्व्स को मैनिपुलेट करने के लिए ट्रेडिंग करने से हमेशा के लिए बैन कर दिया।
चैप्टर 5: फ्यूचर
इतिहास में सिल्वर में दो बार बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। 1980 में और 2011 में। 2011 में चांदी 31 साल बाद 50 डॉलर प्रति औंस के करीब पहुंच गई थी।
लेकिन उसके बाद ये तेजी से गिरने लगीं और 26 डॉलर प्रति औंस तक लुढ़क गईं। ये गिरावट स्पेकुलेशन, रेगुलेटरी ऐक्शन और ग्लोबल फीयर्स के कारण आई थी।
अब, दस साल से ज्यादा समय के बाद, चांदी का भाव फिर से 50 डॉलर प्रति औंस को क्रॉस कर दिया है। रुपए प्रति किलो में ये 1.55 लाख के करीब होती है। ऐसे में, कई लोगों के मन में सवाल है कि क्या आज के समय में सिल्वर में इसी तरह की गिरावट आ सकती है?
जानकार कहते हैं कि सिल्वर प्राइसेस में बड़े उतार-चढ़ाव आज के समय में भी देखने को मिलते हैं, लेकिन सिल्वर थर्सडे के बाद लगाए गए सेफगार्ड्स के कारण इतने बड़े स्केल पर मार्केट मैनिपुलेशन आसान नहीं है। उस समय बाजार में काफी कम रेगुलेशन्स थे।
सिल्वर की वैल्यू को ड्राइव करने वाले फंडामेंटल्स भी हंट के जमाने से काफी बदल चुके हैं। इंडस्ट्रियल डिमांड ट्रेडिशनल फोटोग्राफी से आगे बढ़कर क्रूशियल मॉडर्न टेक्नोलॉजीज में फैल गई है। सोलर पैनल्स में फोटोवोल्टेइक सेल्स के लिए सिल्वर का भारी मात्रा में इस्तेमाल होता हैं।
अभी चांदी में जो तेजी आई है उसकी तीन बड़ी वजहें हैं…
- फेस्टिव सीजन: भारत दुनिया में चांदी के सबसे बड़े कंज्यूमर्स में से एक है। दिवाली-धनतेरस पर सोना-चांदी खरीदना शुभ माना जाता है। इससे चांदी की डिमांड बढ़ी है।
- इंडस्ट्रियल डिमांड: चांदी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल सोलर फैक्ट्रियों में होता है। इसके अलावा AI इंडस्ट्री और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स में भी चांदी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है।
- सप्लाई की कमी: चांदी की मांग तो बढ़ रही है, लेकिन इसकी सप्लाई में रुकावट आ रही है। कुछ देशों में पर्यावरण नियम या खदान बंद होने से प्लान्ड माइनिंग कम हो गई है।
एनालिस्टों का कहना है कि 2025 में आई कीमतों की तेजी स्पेकुलेटिव बबल नहीं है। आज इंडस्ट्रियल डिमांड और इन्फ्लेशन हेजिंग से कीमते बढ़ी है।
इसलिए, चांदी की कीमतों में थोड़ा बहुत करेक्शन आ सकता है, लेकिन 1980 और 2011 जैसे शार्प क्रैश का रिस्क अब कम है।
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नेपाल सीमा से गिरफ्तार हुए TMC के पूर्व विधायक जहांगीर खान, STF की बड़ी कार्रवाई
कोलकाता, एजेंसी। तृणमूल कांग्रेस के नेता जहांगीर खान को ‘जबरन वसूली’ के आरोप में सोमवार को उत्तर बंगाल में भारत-नेपाल सीमा के पास से गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने यह जानकारी दी। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने खान को गिरफ्तारी से दी गई अंतरिम सुरक्षा 26 मई को वापस ले ली थी। खान के खिलाफ दक्षिण 24 परगना जिले के फाल्टा थाने में सात प्राथमिकी दर्ज हैं।
पुलिस के एक अधिकारी ने बताया, ”खान को उत्तर बंगाल में भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया।” हालांकि पुलिस ने गिरफ्तारी के संबंध में विस्तृत जानकारी नहीं दी है। खान 21 मई को फाल्टा विधानसभा उपचुनाव में चौथे स्थान पर रहे थे। हालांकि, उन्होंने चुनाव से कुछ दिन पहले अपनी उम्मीदवारी वापस लेने की घोषणा की थी, लेकिन नाम वापस लेने की अवधि समाप्त हो चुकी थी इसीलिए उनका नाम ईवीएम में दर्ज रहा।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने खान को मिली अंतरिम सुरक्षा वापस ली
इससे पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने खान के खिलाफ दर्ज कई आपराधिक मामलों में पुलिस की किसी भी सख्त कार्रवाई से उन्हें मिली अंतरिम सुरक्षा वापस ले ली थी। कोर्ट ने 18 मई को खान को सख्त कार्रवाई से राहत दी थी, लेकिन बाद में इसे रद्द कर दिया गया। जजों ने कहा कि राज्य में राजनीतिक स्थिति में बदलाव और याचिकाकर्ता द्वारा राजनीतिक बदले की भावना के दावों के कारण ऐसी सुरक्षा जारी रखना उचित नहीं होगा।
खान के वकील किशोर दत्ता ने कोर्ट में तर्क दिया कि 4 मई को विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद उनके मुवक्किल के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे। उन्होंने दावा किया कि ये मामले राजनीतिक बदले की भावना का नतीजा थे और कहा कि सुरक्षा न केवल चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी थी, बल्कि खान को कथित उत्पीड़न से बचाने के लिए भी थी। दूसरी ओर, अतिरिक्त महाधिवक्ता राजदीप मजूमदार ने सुरक्षा बढ़ाने की मांग का विरोध किया। उन्होंने कहा कि पहले दी गई सुरक्षा केवल खान को 21 मई को फाल्टा में हुए दोबारा मतदान (रीपोल) में भाग लेने में सक्षम बनाने के लिए थी, जिसके नतीजे 24 मई को घोषित किए गए थे।
पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में फाल्टा विधानसभा उपचुनाव (रीपोल) के बीच एक बड़ी राजनीतिक घटनाक्रम में, जहांगीर खान ने अपना नामांकन वापस ले लिया, जो पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए एक बड़ा झटका था। उन्होंने कहा कि दौड़ से हटने का फैसला फाल्टा के लोगों की भलाई के लिए लिया गया था। खान ने कहा, “मैं फाल्टा का बेटा हूं और चाहता हूं कि फाल्टा शांतिपूर्ण रहे और तरक्की करे। हमारे मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी फाल्टा के विकास के लिए एक विशेष पैकेज दे रहे हैं, इसलिए मैंने निर्वाचन क्षेत्र में दोबारा मतदान प्रक्रिया से दूर रहने का फैसला किया है।”
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भाजपा की फूट डालने की पुरानी चाल कामयाब नहीं होगी, क्रॉस वोटिंग की आशंका पर दिग्विजय सिंह का तीखा हमला
भोपाल, एजेंसी। मध्य प्रदेश में कांग्रेस से राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन ने अपना नामाकंन दाखिल किया। उनका मुकाबले में भाजपा ने तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट को उतारा है। ऐसे में मुकाबला बेहद रोचक हो गया है। वहीं कांग्रेस में क्रॉस वोटिंग का खतरा बढ़ गया है। हालांकि कांग्रेस ने इसे भाजपा की गलतफहमी बताया है।

कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह का कहना है, “बीजेपी को गलतफहमी है कि वे पार्टी में फूट डाल सकते हैं। कांग्रेस पूरी तरह से संगठित और एकजुट है; सभी कांग्रेस विधायक पार्टी की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन को मजबूती से अपना पूरा समर्थन देंगे और बीजेपी की फूट डालने की पुरानी चाल कामयाब नहीं होगी। मीनाक्षी नटराजन कांग्रेस की उम्मीदवार हैं और हम कांग्रेस में एकजुट हैं।”
बता दें कि 230 सदस्यों वाली मध्य प्रदेश विधानसभा में प्रभावी वोट संख्या 228 है। इनमें से BJP के पास 164 और कांग्रेस के पास 64 विधायक हैं। बीना की विधायक निर्मला सप्रे के वोट की स्थिति साफ न होने (जो BJP की तरफ झुकती दिख रही है) और विजयपुर के विधायक मुकेश मल्होत्रा के वोटिंग पर रोक के कारण, कांग्रेस की प्रभावी संख्या घटकर 62 रह गई है।
राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए हर उम्मीदवार को 58 वोटों की ज़रूरत होती है। इस तरह, BJP को दो सीटें जीतने के लिए 116 वोटों की ज़रूरत है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, कुल 164 वोटों में से 116 वोट डालने के बाद BJP के पास 48 वोट बचेंगे, जबकि तीसरी सीट पक्की करने के लिए उसे 10 और वोटों की ज़रूरत होगी। कांग्रेस के पास एक सीट जीतने के लिए ज़रूरी संख्या तो है, लेकिन BJP द्वारा तीसरे उम्मीदवार के ऐलान ने उसकी चिंताएं बढ़ा दी हैं और नटराजन के चुनाव जीतने की राह मुश्किल कर दी है।
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क्या शिवसेना की तहर दो गुटों में बंट जाएगी TMC?, सांसद के इस्तीफे से बंगल में गरमाई सियासत
कोलकाता, एजेंसी। बंगाल चुनाव में बीजेपी की शानदार जीत की पूरे देश में चर्चा है तो वहीं तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद पार्टी के बीच अंदरूनी कलह भी सामने आने लगी है इसे लेकर अब पार्टी के भविष्य की रणनीति पर लोग चर्चा कर रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में अब इस बात को लेकर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या तृणमूल कांग्रेस में भी Shiv Sena की तरह अंदरूनी खींचतान बढ़ेगी या पार्टी नेतृत्व समय रहते हालात संभाल लेगा। विपक्ष लगातार TMC में असंतोष और गुटबाजी के आरोप लगा रहा है, जबकि पार्टी नेतृत्व इसे सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम बता रहा है।

अगल गुट बनाने को लेकर चर्चा तेज इस्तीफा
दरअसल, अंदरूनी कलह के बीच पार्टी के सांसदों के एक समूह ने भविष्य की रणनीति और पार्टी से अलग होकर एक नया गुट बनाने की संभावना पर चर्चा करने के लिए सोमवार को यहां बैठक की। बैठक में हिस्सा लेने वाले नेताओं में सुखेंदु शेखर राय भी शामिल थे, जिन्होंने सोमवार को ही पार्टी से इस्तीफा दे दिया और राज्यसभा की सदस्यता भी छोड़ दी थी। उनके अलावा तृणमूल के लोकसभा सांसद प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार, जगदीश चंद्र बसुनिया, कालीपद सरन खेरवाल और अरूप चक्रवर्ती भी बैठक में मौजूद थे।
ममता बनर्जी को व्हाट्सऐप पर भेजा
मीडिया से बातचीत में राय ने कहा कि उन्होंने राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन से मुलाकात कर उन्हें अपना इस्तीफा सौंप दिया है। राय ने कहा, ”मैंने पार्टी से इस्तीफा देने के अपने फैसले से ममता बनर्जी को व्हाट्सऐप और ईमेल के जरिये अवगत करा दिया है। यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल के 60 विधायकों द्वारा एक अलग गुट बनाने के बाद सामने आया है, जहां रिताब्रता बनर्जी ने ममता बनर्जी के नामित उम्मीदवार के बजाय नेता प्रतिपक्ष का कार्यभार संभाल लिया है।
इस्तीफे को लेकर दिया ये बयान
राय ने कहा, “विधानसभा में जो कुछ भी हुआ, क्या कोई यह बता सकता है कि राज्यसभा या लोकसभा में वैसी ही स्थिति पैदा नहीं होगी?” हालांकि, राय ने स्पष्ट किया कि राज्यसभा और पार्टी से उनका इस्तीफा राज्य विधानसभा में हुए घटनाक्रम से अलग है, क्योंकि वहां के विधायकों ने इस्तीफा नहीं दिया है। उन्होंने कहा, ”उनके कदम और मेरे कदम के बीच कोई संबंध नहीं है। यह पूरी तरह से अलग है। मैंने पार्टी से इस्तीफा दिया है, उन्होंने नहीं। राज्यसभा में मेरा कार्यकाल 2029 में समाप्त होना था, लेकिन मैंने सैद्धांतिक तौर पर इस्तीफा दे दिया, क्योंकि मेरे लिए (पार्टी में) बने रहना मुश्किल हो गया था।”
‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक में शामिल हुए अभिषेक बनर्जी
यह राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी और उनके भतीजे एवं पार्टी सांसद अभिषेक बनर्जी यहां ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक में भाग ले रहे हैं। इस बैठक में गठबंधन के भीतर एकजुटता पर जोर दिया गया और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने तथा जनता की आजीविका से जुड़े मुद्दों को उठाने की आवश्यकता बताई गई।
तृणमूल के इन दोनों नेताओं के अलावा बैठक में कांग्रेस की सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के तेजस्वी यादव, नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला और पीडीपी की महबूबा मुफ्ती के साथ-साथ वामपंथी नेता भी मौजूद थे। हालांकि ममता से नाराज विधायकों ने अभी तक अलग पार्टी बनाए जाने को लेकर कोई भी अधिकारिक ऐलान नहीं किया।
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