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क्या सिल्वर में आ सकता है 1980 जैसा क्रैश:तब हंट ब्रदर्स के कारण आई थी गिरावट, एक हफ्ते में करीब ₹25 हजार घटे दाम
मुंबई,एजेंसी। 1980 की बात है। चांदी की कीमत 2 डॉलर प्रति औंस (28.35 ग्राम) से बढ़कर 48 डॉलर तक पहुंच गई। पर यह हुआ कैसे? इसके पीछे थे अमेरिका के हंट ब्रदर्स।
दुनिया की चांदी का एक तिहाई हिस्सा इन दो भाइयों की जेब में था। नेल्सन बंकर हंट और विलियम हर्बर हंट ने चांदी को 700% से ज्यादा बढ़ा दिया। हंट ब्रदर्स की इस कहानी में शामिल है लालच, साजिश और एक ऐसा क्रैश जिसे सिल्वर थर्सडे कहा जाता है।
हंट ब्रदर्स की ये कहानी आज हम इसलिए बता रहे हैं क्योंकि 10 महीने में चांदी के दाम दोगुने हो गए, लेकिन बीते एक ही हफ्ते में रू.1.78 लाख रुपए प्रति किलो के हाई से ये रू.1.52 लाख पर आ चुकी है। यानी, इसके दामों में करीब 25 हजार रुपए की गिरावट आई है।
तो क्या अब चांदी में वैसा ही फॉल आ सकता है, जैसा 1980 के दशक में आया था? चांदी के भाव में आई तेजी की वजहें क्या है? हंट ब्रदर्स की स्टोरी से इसे समझते हैं…
चैप्टर 1: शुरुआत
हंट ब्रदर्स अमीर परिवार से आते थे। उनके पिता हरॉल्डसन लेफायेट हंट गरीब परिवार में पैदा हुए, लेकिन 22 साल की उम्र में बिजनेसमैन बन गए। वह कॉटन की खरीद-बेच करते थे।
जल्दी ही उनका फोकस ऑयल पर शिफ्ट हो गया, जिसमें उन्होंने अरबों डॉलर की कमाई की। पिता की मौत के बाद हंट ब्रदर्स ने अरबों डॉलर का फैमिली बिजनेस संभाला।

विलियम हर्बर्ट हंट (बाएं) और नेल्सन बंकर हंट ने मिलकर सिल्वर प्राइस बढ़ाए थे।
चैप्टर 2: पपेट मास्टर
1970 के दशक के आखिर में डॉलर कमजोर हो रहा था और हाइपरइन्फ्लेशन की भविष्यवाणी थी। ऐसे में हंट ब्रदर्स का फोकस सिल्वर की तरफ शिफ्ट हो गया।
उन्होंने फिजिकल सिल्वर जमा करना शुरू किया और सिल्वर फ्यूचर्स के कॉन्ट्रैक्ट्स खरीदे। उन्हें यकीन था कि सिल्वर की वैल्यू आसमान छू लेगी।
फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए कैश सेटलमेंट लेने की बजाय, उन्होंने फिजिकल सिल्वर डिलीवर करवाया। ऐसा कम ही लोग करते थे। 70 के दशक की शुरुआत में जब हंट ब्रदर्स ने सिल्वर खरीदना शुरू किया, तो कीमत 2 डॉलर प्रति औंस थी। 1979 तक ये 6 डॉलर पहुंच गई।
हंट ब्रदर्स के पास 100 मिलियन औंस से ज्यादा सिल्वर था। हंट ब्रदर्स सिल्वर के पपेट मास्टर बन चुके थे। यानी, वो अपने हिसाब से कीमतों को बढ़ा रहे थे।
इससे सिल्वर मार्केट में सप्लाई की दिक्कतें बढ़ने लगीं। दिसंबर 1979 में सिल्वर की कीमत 25 डॉलर प्रति औंस और 1980 में 50 डॉलर प्रति औंस पहुंच गई। लेकिन हंट ब्रदर्स ने उधार लेकर सिल्वर खरीदना जारी रखा।

हंट ब्रदर्स ने 1970 के दशक में फिजिकल सिल्वर जमा करना शुरू किया था।
चैप्टर 3: सिल्वर थर्सडे
हंट ब्रदर्स का प्लान बिल्कुल ठीक चल रहा था, लेकिन कमोडिटी एक्सचेंज, इंक. यानी, COMEX के दखल ने सब कुछ बदल दिया। सिल्वर के पीक से एक हफ्ते पहले 7 जनवरी 1980 को COMEX सिल्वर रूल 7 लाई। इसमें मार्जिन पर कमोडिटी खरीदने पर पाबंदियां लगा दी गई।
इससे हंट ब्रदर्स के लिए ब्रोकरेज से उधार लेकर सिल्वर खरीदना मुश्किल हो गया। इससे हंट ब्रदर्स की ताकत कमजोर पड़ने लगी। अब आती है वो तारीख जिसे सिल्वर थर्सडे कहा जाता है।
27 मार्च 1980 को हंट ब्रदर्स मार्जिन कॉल मिस कर गए। यानी, जो पैसा उन्हें देना था वो नहीं दे पाए। ऐसे में ब्रोकर ने सिल्वर बेचना शुरू कर दिया और एक ही दिन ये 50% से ज्यादा गिर गया।
- मार्जिन: जब आप ब्रोकर से उधार लेकर कुछ खरीदते हैं, तो कुछ पैसे पहले ही जमा करने पड़ते हैं। ये “मार्जिन” है। मान लीजिए आप रू.100 का सामान खरीदना चाहते हैं, लेकिन आपके पास सिर्फ रू.20 हैं। ब्रोकर बाकी रू.80 उधार देता है। यहां रू.20 “मार्जिन” है।
- मार्जिन कॉल: अगर बाजार में चीजों की कीमत गिरने लगे तो निवेश की वैल्यू कम हो जाती है। ब्रोकर को डर लगता है कि अगर और नुकसान हुआ, तो उधार का पैसा डूब सकता है। इसलिए वे आपको तुरंत और पैसे जमा करने के लिए कहते हैं। इसे मार्जिन कॉल कहते हैं।
- अगर मार्जिन कॉल मिस हो जाए: अगर आप पैसे नहीं जमा कर पाते तो ब्रोकर आपकी सारी होल्डिंग जबरदस्ती बेच देता है। हंट ब्रदर्स के साथ भी ऐसा ही हुआ था। जब चांदी की कीमत गिरने लगी तो ब्रोकर ने उनसे पैसे मांगे, लेकिन वो और पैसे नहीं दे पाए।

27 मार्च 1980 को सिल्वर के दाम एक ही दिन में 50% से ज्यादा गिर गए थे।
चैप्टर 4: क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन
इस क्रैश के बाद हंट ब्रदर्स के खिलाफ क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन शुरू हुआ। 1986 में उन्होंने अपनी कंपनी के दिवालिया होने की घोषणा की। 1988 में पर्सनल बैंकरप्सी भी घोषित की।
1988 में न्यूयॉर्क की जूरी ने हंट ब्रदर्स को ऑर्डर दिया कि वे पेरू सरकार की मिनरल मार्केटिंग कंपनी को 130 मिलियन डॉलर पेमेंट करें, क्योंकि क्रैश से उस कंपनी को नुकसान हुआ था।
कमोडिटी फ्यूचर्स ट्रेडिंग कमीशन ने दोनों भाइयों पर 10-10 मिलियन डॉलर का फाइन भी लगाया। सिल्वर रिजर्व्स को मैनिपुलेट करने के लिए ट्रेडिंग करने से हमेशा के लिए बैन कर दिया।
चैप्टर 5: फ्यूचर
इतिहास में सिल्वर में दो बार बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। 1980 में और 2011 में। 2011 में चांदी 31 साल बाद 50 डॉलर प्रति औंस के करीब पहुंच गई थी।
लेकिन उसके बाद ये तेजी से गिरने लगीं और 26 डॉलर प्रति औंस तक लुढ़क गईं। ये गिरावट स्पेकुलेशन, रेगुलेटरी ऐक्शन और ग्लोबल फीयर्स के कारण आई थी।
अब, दस साल से ज्यादा समय के बाद, चांदी का भाव फिर से 50 डॉलर प्रति औंस को क्रॉस कर दिया है। रुपए प्रति किलो में ये 1.55 लाख के करीब होती है। ऐसे में, कई लोगों के मन में सवाल है कि क्या आज के समय में सिल्वर में इसी तरह की गिरावट आ सकती है?
जानकार कहते हैं कि सिल्वर प्राइसेस में बड़े उतार-चढ़ाव आज के समय में भी देखने को मिलते हैं, लेकिन सिल्वर थर्सडे के बाद लगाए गए सेफगार्ड्स के कारण इतने बड़े स्केल पर मार्केट मैनिपुलेशन आसान नहीं है। उस समय बाजार में काफी कम रेगुलेशन्स थे।
सिल्वर की वैल्यू को ड्राइव करने वाले फंडामेंटल्स भी हंट के जमाने से काफी बदल चुके हैं। इंडस्ट्रियल डिमांड ट्रेडिशनल फोटोग्राफी से आगे बढ़कर क्रूशियल मॉडर्न टेक्नोलॉजीज में फैल गई है। सोलर पैनल्स में फोटोवोल्टेइक सेल्स के लिए सिल्वर का भारी मात्रा में इस्तेमाल होता हैं।
अभी चांदी में जो तेजी आई है उसकी तीन बड़ी वजहें हैं…
- फेस्टिव सीजन: भारत दुनिया में चांदी के सबसे बड़े कंज्यूमर्स में से एक है। दिवाली-धनतेरस पर सोना-चांदी खरीदना शुभ माना जाता है। इससे चांदी की डिमांड बढ़ी है।
- इंडस्ट्रियल डिमांड: चांदी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल सोलर फैक्ट्रियों में होता है। इसके अलावा AI इंडस्ट्री और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स में भी चांदी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है।
- सप्लाई की कमी: चांदी की मांग तो बढ़ रही है, लेकिन इसकी सप्लाई में रुकावट आ रही है। कुछ देशों में पर्यावरण नियम या खदान बंद होने से प्लान्ड माइनिंग कम हो गई है।
एनालिस्टों का कहना है कि 2025 में आई कीमतों की तेजी स्पेकुलेटिव बबल नहीं है। आज इंडस्ट्रियल डिमांड और इन्फ्लेशन हेजिंग से कीमते बढ़ी है।
इसलिए, चांदी की कीमतों में थोड़ा बहुत करेक्शन आ सकता है, लेकिन 1980 और 2011 जैसे शार्प क्रैश का रिस्क अब कम है।
देश
इजराइल-ईरान जंग: मोदी ने ओमान पर हमले की निंदा की,8 खाड़ी देशों से बात की, दुबई-अबूधाबी से 2000 से ज्यादा भारतीय लौटे
नई दिल्ली,एजेंसी। इजराइल-ईरान जंग का आज चौथा दिन है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बाद भारतीय वापिस आ रहे हैं। दुबई और अबूधाबी से मंगलवार शाम तक सात फ्लाइट से 2100 से ज्यादा भारतीय लौट चुके हैं।
वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो दिन में भारतीयों की सुरक्षा को लेकर 8 खाड़ी देशों के नेताओं से बात की है। पीएम ने आज ओमान के सुल्तान, कतर के अमीर और कुवैत के क्राउन प्रिंस से फोन पर बात वहां हुए हमलों की निंदा की।
एयरस्पेस बंद होने के कारण मंगलवार को दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर और चेन्नई एयरपोर्ट पर 250 से ज्यादा इंटरनेशनल फ्लाइट कैंसिल कर दी गईं। इनमें दिल्ली से 80+, मुंबई से 107, बेंगलुरु से 42 और चेन्नई से 30 उड़ानें शामिल हैं।
इंडिगो आज जेद्दाह से हैदराबाद, मुंबई, दिल्ली और अहमदाबाद के लिए 10 स्पेशल उड़ानें भी चला रहा है। एअर इंडिया एक्सप्रेस ने मस्कट के लिए उड़ानें शुरू की हैं।
ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत के विरोध में जम्मू-कश्मीर में प्रदर्शन जारी हैं। बांदीपोरा के शादीपोरा में शिया समुदाय ने पोस्टर लेकर प्रदर्शन किया। श्रीनगर दूसरे दिन भी बंद रहा। केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को भड़काऊ भाषणों पर सतर्क रहने का निर्देश दिया है।
अबू धाबी से भारत लौटे लोग

अबू धाबी से एक भारतीय परिवार के सुरक्षित दिल्ली पहुंचने पर परिजन ने राहत की सांस ली।

अबू धाबी से भारत सुरक्षित लौटने पर दिल्ली के IGI एयरपोर्ट पर सेल्फी लेता एक परिवार।

अबू धाबी से आए अपने लोगों को मिलकर खुश होता एक परिवार।

दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर अबू धाबी से लौटी युवती के आंसू झलक उठे।
देश
भारत के पास सिर्फ 25 दिन का तेल बचा:इजराइल-ईरान जंग के बीच इम्पोर्ट रूट बंद, सरकार नए सप्लायर्स तलाश रही
नई दिल्ली,एजेंसी। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-इजराइल युद्ध के बीच भारत के पास अब सिर्फ 25 दिनों का क्रूड ऑयल यानी कच्चा तेल और रिफाइंड ऑयल का स्टॉक बचा है।
न्यूज एजेंसी ANI ने देश की एनर्जी सिक्योरिटी को लेकर यह अपडेट सरकारी सूत्रों के मुताबिक दिया है। हालांकि सरकार अभी पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाएगी।
दरअसल, ईरान ने स्ट्रैट ऑफ होर्मुज को बंद करने का ऐलान कर दिया है। साथ ही ईरान की सेना ने चेतावनी दी है कि इस रूट से अगर कोई भी जहाज गुजरता है, तो उसे आग लगा दी जाएगी। ओमान और ईरान के बीच स्थित यह रूट दुनिया के ऑयल बिजनेस के लिए सबसे जरूरी माना जाता है।
होर्मुज रूट के बंद होने से दुनिया के कई देशों की तेल सप्लाई पर प्रभाव पड़ेगा, जिसमें भारत समेत एशियाई देशों पर सबसे ज्यादा असर होगा। इस रूट के बंद होने कारण ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें भी 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। अभी ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 5.58% बढ़कर 80.41 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई है।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का अभी कोई प्लान नहीं
आम जनता के लिए राहत की बात यह है कि भारत सरकार का फिलहाल पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का कोई इरादा नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, इंटरनेशनल मार्केट में उतार-चढ़ाव के बावजूद घरेलू स्तर पर कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश की जा रही है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा है कि देश में प्रमुख पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की अवेलेबिलिटी और किफायती दाम तय करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे।
सोमवार को पेट्रोलियम मंत्री ने रिव्यू मीटिंग की थी
इससे पहले सोमवार को केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और सरकारी तेल कंपनियों के साथ एक हाई-लेवल मीटिंग की थी। इस बैठक में कच्चे तेल और एलपीजी की सप्लाई स्थिति की समीक्षा की गई। मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर बताया कि वे बदलती परिस्थितियों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।
एक्सपोर्ट-इंपोर्ट पर असर को लेकर सरकार एक्टिव
सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि व्यापार पर पड़ने वाले असर को लेकर भी सरकार एक्टिव है। वाणिज्य मंत्रालय के तहत आने वाले डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) ने एक स्टेकहोल्डर कंसल्टेशन मीटिंग की थी। इसमें इस बात पर चर्चा हुई कि पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव का भारत के एक्सपोर्ट-इंपोर्ट और कार्गो फ्लो पर क्या असर पड़ सकता है।

केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी।
शिपिंग रूट और इंश्योरेंस कॉस्ट बढ़ने की चुनौती
बैठक में लॉजिस्टिक ऑपरेटर्स और शिपिंग लाइन्स के प्रतिनिधियों ने बताया कि मौजूदा तनाव के कारण जहाजों के रूट बदलने पड़ रहे हैं, जिससे ट्रांजिट टाइम बढ़ गया है। इसके अलावा, माल ढुलाई और इंश्योरेंस की लागत में भी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। सरकार ने एक्सपोर्टर्स और इंपोर्टर्स के लिए डॉक्यूमेंटेशन और पेमेंट प्रोसेस को आसान बनाने और कार्गो मूवमेंट में देरी को कम करने पर जोर दिया है।
पश्चिम एशिया पर भारत की निर्भरता बड़ी
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का करीब 85% इंपोर्ट करता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आता है। यही वजह है कि इस क्षेत्र में होने वाली किसी भी हलचल का सीधा असर भारत की इकोनॉमी और एनर्जी सिक्योरिटी पर पड़ता है। सरकार अब रूस और अन्य अफ्रीकी देशों जैसे वैकल्पिक रास्तों पर फोकस बढ़ा रही है ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम की जा सके।
भारत फिर बढ़ाएगा रूस से कच्चे तेल की खरीद
एक दिन पहले ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि ईरान-इजराइल के बीच जंग और तेल की सप्लाई चेन प्रभावित होने के बाद भारत ने एक बार फिर रूस की ओर रुख किया है। भारत अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाने का प्लान बना रहा है।
स्ट्रैट ऑफ होर्मुज के जरिए होने वाली तेल की सप्लाई लगभग ठप हो गई है, जिसके चलते सरकारी रिफाइनरीज और पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों ने दिल्ली में एक इमरजेंसी मीटिंग कर विकल्प तलाशने शुरू कर दिए हैं।

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता है। भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है।
भारत की समुद्र में खड़े रूसी तेल टैंकरों को खरीदने की तैयारी
रिपोर्ट के अनुसार, भारत उन रूसी तेल कार्गो को खरीदने पर विचार कर रहा है, जो फिलहाल भारतीय समुद्र के करीब या एशियाई जल क्षेत्र में मौजूद हैं। आंकड़ों के मुताबिक, इस समय लगभग 95 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल टैंकरों में भरकर एशियाई देशों के आसपास वेटिंग मोड में है। सप्लाई में कमी आने की स्थिति में भारत इन टैंकरों को तुरंत रिसीव कर सकता है, जिससे ट्रांसपोर्टेशन का समय और लागत दोनों कम होगी।
भारत के लिए क्यों जरूरी है रूसी तेल?
सस्ता विकल्प: रूस भारत को बेंचमार्क कीमतों से डिस्काउंट पर तेल ऑफर करता है।
सप्लाई सिक्योरिटी: मिडिल ईस्ट में तनाव होने पर स्ट्रैट ऑफ होर्मुज से सप्लाई रुक जाती है, रूस एक सुरक्षित विकल्प है।
इकोनॉमी पर असर: सस्ता तेल मिलने से देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रहती हैं और महंगाई काबू में रहती है।
भारत रूसी तेल का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार
दिसंबर 2025 में भारत रूस से तेल खरीदने में तीसरे नंबर पर रहा। तुर्किये दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बन गया। तुर्किये ने 2.6 बिलियन यूरो का तेल खरीदा। भारत ने दिसंबर में रूस से 2.3 बिलियन यूरो (लगभग 23,000 करोड़ रुपए) का तेल खरीदा। नवंबर में भारत ने 3.3 बिलियन यूरो (34,700 करोड़ रुपए) का तेल खरीदा था।
चीन अब भी सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है, उसने दिसंबर में रूस से 6 बिलियन यूरो यानी करीब 63,100 करोड़ रुपए का तेल खरीदा। भारत की खरीद कम होने की सबसे बड़ी वजह रिलायंस इंडस्ट्रीज रही। रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी ने रूस से तेल खरीद करीब आधी कर दी।
पहले रिलायंस पूरी सप्लाई रूस की कंपनी रोसनेफ्ट से लेती थी, लेकिन अमेरिका के प्रतिबंधों के डर से अब कंपनियां रूस से तेल कम खरीद रही हैं। रिलायंस के अलावा सरकारी तेल कंपनियों ने भी दिसंबर में रूस से तेल खरीद करीब 15% घटा दी।
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विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियों में वृद्धि फरवरी में चार महीने के उच्चतम स्तर पर
नई दिल्ली,एजेंसी। देश की विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियों में वृद्धि फरवरी में चार महीने के उच्चतम स्तर 56.9 पर पहुंच गई। सोमवार को जारी मासिक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई। घरेलू मांग में मजबूत सुधार के कारण यह बढ़ोतरी हुई, हालांकि नए निर्यात ऑर्डर की वृद्धि में कमी देखी गई। मौसमी रूप से समायोजित एचएसबीसी इंडिया विनिर्माण खरीद प्रबंधक सूचकांक (पीएमआई) जनवरी के 55.4 से बढ़कर फरवरी में चार महीने के उच्चतम स्तर 56.9 पर पहुंच गया। पीएमआई की भाषा में 50 से ऊपर का अंक विस्तार जबकि 50 से नीचे का अंक संकुचन दर्शाता है। एचएसबीसी की मुख्य अर्थशास्त्री (भारत) प्रांजुल भंडारी ने कहा, ”फरवरी महीने में भारत के विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियों में पहले से ज्यादा तेजी देखने को मिली। मजबूत घरेलू ऑर्डर की वजह से उत्पादन लगातार दूसरे महीने भी तेज गति से बढ़ा।”
सर्वेक्षण में कहा गया, “समिति के सदस्यों के अनुसार, काम करने की दक्षता में सुधार, बाजार में मजबूत मांग, नए ऑर्डर में बढ़ोतरी और तकनीक में निवेश की वजह से उत्पादन में कुल मिलाकर अच्छी बढ़त दर्ज की गई।” एक क्षेत्र जहां वृद्धि में कुछ कमी आई, वह नए निर्यात ऑर्डर रहे। हालांकि, जिन कंपनियों की विदेशों में बिक्री बढ़ी, उन्होंने एशिया, यूरोप, पश्चिम एशिया और अमेरिका से ऑर्डर मिलने की बात कही। भंडारी ने कहा, “नए निर्यात ऑर्डर में वृद्धि ने 2025 के मध्य में शुरू हुई धीमी गति को जारी रखा, जिससे विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार सृजन कुछ हद तक सीमित हो गया।”
कुल नए ऑर्डर में लगातार तेज बढ़ोतरी होने के कारण भारत के विनिर्माताओं ने उत्पादन बढ़ाने और भंडारण करने के लिए अतिरिक्त कच्चे माल की खरीद की। काम का दबाव बढ़ने पर कंपनियों ने कच्चे माल की खरीद तेज की, अपना भंडार बढ़ाया और अतिरिक्त कर्मचारियों की नियुक्ति भी की। आने वाले एक वर्ष के लिए उत्पादन को लेकर कंपनियों का रुख सकारात्मक बना हुआ है। लगभग 16 प्रतिशत कंपनियों ने उत्पादन बढ़ने का अनुमान जताया है, जबकि एक प्रतिशत से भी कम कंपनियों को गिरावट की आशंका है।
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